आगरा महत्वपूर्ण है. मुग़लों के जमाने से अब तक. 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभाचुनाव में भाजपा की बौद्ध दलित चेतना यात्रा हो या फिर योगी का ताजमहल आकर स्वच्छभारत अभियान के तहत झाड़ू लगाना.ये आगरा लोकसभा सीट का महत्त्व ही है कि यहां के भाजपा सांसद रामशंकर कठेरिया कोपीएम नरेंद्र मोदी ने मंत्री बनाया. लेकिन जब मंत्री पद से हटाया तो अनुसूचित जातिआयोग का मुखिया बना दिया.अब 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले भाजपा ने यहां टिकट बदल दिया. मौजूदा सांसदकठेरिया को इटावा की सुरक्षित सीट से लड़ने भेज दिया है. आगरा से टिकट दिया है एसपीसिंह बघेल को. बघेल टूंडला सीट से विधायक हैं, योगी सरकार में पशुधन, लघु सिंचाई औरमत्स्य विभाग में मंत्री हैं.2017 में ओबीसी से एससी बन गए बघेल उत्तर प्रदेश के 2017 विधानसभा चुनाव में टुंडला (सुरक्षित) सीट पर भी भाजपा केओबीसी लीडर बघेल ने अपना नामांकन एससी प्रत्याशी के तौर पर किया. इसके लिए बघेल नेअनुसूचित जाति का प्रमाणपत्र भी आयोग को दिया. बघेल ने चुनाव में जीत हासिल की.मंत्री भी बने.लेकिन इसी समय बघेल की जाति सवालों के घेरे में आ गई. बघेल एससी हैं या ओबीसी, इसमामले को टुंडला के पूर्व विधायक राकेश बाबू ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में उठाया. औरयहीं से शुरू होता है जाति को लेकर विवाद.बघेल भाजपा के ओबीसी नेता थे. 2015 में भाजपा ने एक ओबीसी मोर्चा का गठन किया तोबघेल इस मोर्चे के अध्यक्ष बने. तो फिर उन्हें एससी के लिए सुरक्षित सीट से टिकटक्यों दिया गया?अगर खालिस यूपी लहजे में कहें तो बघेल सुरक्षित कैटिगरी में कब आ गए? जानते हैंशुरुआत से -कौन हैं एसपी सिंह बघेलसत्यपाल सिंह बघेल. प्रदेश के इटावा जिले से ताल्लुक रखने वाले बघेल का राजनीतिकइतिहास बहुत कूदता-फांदता हुआ है. बघेल समाजवादी पार्टी से लम्बे समय तक जुड़े रहे.सपा के ही टिकट पर 1998, 1999 और 2004 के लोकसभा चुनाव में जलेसर लोकसभा सीट सेसांसद चुने गए. 2007 में नए सिरे से परिसीमन हुआ. जलेसर सीट खत्म कर दी गई. नई सीटअस्तित्व में आई. फिरोजाबाद. और सामने आया एक नया समीकरण कि अब सपा में शिवपाल केकहने पर ही टिकट नहीं मिलेगा. अखिलेश की सहमति भी चाहिए. ऐसे में बघेल को टिकट नहींमिला.2007 से टिकट के बंटवारे में चाचा शिवपाल के साथ ही अखिलेश यादव महत्वपूर्ण भूमिकानिभाने लगे.अखिलेश यादव 2009 के लोकसभा चुनाव में पहली बार दो सीटों से चुनाव लड़े. क्योंलड़े. पापा मुलायम का फॉर्मूला दोहराने के लिए. जिसे बाद में मोदी ने भी अपनाया.जहां पार्टी कमजोर दिखे, वहां खुद पर्चा भर दो. आसपास की सीटों पर भी असर हो जाएगा.इसी तर्क के तहत 1993 के विधानसभा चुनाव में मुलायम सिंह नवगठित सपा के टिकट पर तीनतीन विधानसभा सीटों से चुनाव लड़े थे. जसवंत नगर, शिकोहाबाद और निधौलीकलां. इसकेसहारे उन्होंने ब्रज प्रदेश से लेकर इटावा तक की पट्टी कवर कर ली. मुलायम तीनों जगहजीते. इसी तर्क के तहत 2014 में भी मुलायम दो लोकसभा सीटों से चुनाव लड़े. परंपरागतमैनपुरी सीट के अलावा पूर्वांचल में सपा का ठिया थामने के लिए आजमगढ़ से चुनावलड़े.और मोदी जी का उदाहरण तो सबके सामने है ही. गुजरात की सेफ वडोदरा सीट और यूपी मेंबीजेपी की हनक बनाने के लिए बनारस की सीट.सपा, बसपा और फिर बीजेपी में आए बघेल बहरहाल, 2009 पर लौटते हैं. अखिलेश कन्नौज औरफिरोजाबाद से लड़े. जीते. फिर फिरोजाबाद सीट छोड़ी. चाचा अमर सिंह के कहने पर पत्नीडिंपल को लड़ाया. और उनके सामने उतर गए कभी सपाई रहे कांग्रेस नेता राज बब्बर. राजजीते. अमर सिंह की यादव परिवार में बुराई हुई. और एसपी सिंह बघेल. वो क्या कर रहेथे जब ये सब हो रहा था. उन्होंने पाला बदल लिया था. 2009 में बघेल बसपा के टिकट परअखिलेश यादव के खिलाफ मैदान में थे. हारे तब भी नहीं थमे. उपचुनाव में जब डिंपल औरबब्बर का मुकाबला हो रहा था, तब भी बघेल तीसरा मोर्चा खड़ा करने में लगे थे हाथी कीसवारी कर.कई बार हारे पर चुनाव मैदान में उतरते रहेबघेल ने हार की हैट्रिक बनाई बसपा के टिकट पर. सीट वही फिरोजाबाद. 2014 में वहअखिलेश के नए संरक्षक रामगोपाल यादव के बेटे अक्षय प्रताप से हारे. इस समय डंकाभाजपा का बज रहा था. और भाजपा की नजर थी, पिछड़ा वर्ग से आने वाले उन नेताओं पर,जिनकी अपने इलाकों में पकड़ थी.अमित शाह ने बघेल को मिलने के लिए बुलाया. और फिर बघेल भाजपाई हो गए. साल था 2015.अगर आप खुद एसपी सिंह से ये सवाल पूछें तो वह कहते हैं कि मुझे रामविलास पासवान नेबुलाया. और उसके बाद जो हुआ वो आपके सामने है. बीजेपी ने बघेल को आते ही महत्वदिया. ओबीसी मोर्चे का मुखिया बनाया. इसी मौके पर मेरठ में मीडिया से बात करते हुएबघेल ने कहा था -“हमारी (ओबीसी समुदाय) वजह से ही मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने.हमारी ही भागीदारी की वजह से मायावती भी मुख्यमंत्री बनीं. लेकिन किसी भी सरकार मेंहमें हिस्सेदारी नहीं मिली. लेकिन 2014 के चुनाव देखें तो ओबीसी वोटों की ही मदद सेएक ओबीसी हमारा प्रधानमंत्री है. इससे बड़ी हिस्सेदारी और क्या होगी?”एसपी सिंह बघेल की जाति का मामला कोर्ट में है. कोर्ट को तय करना है कि बघेल एससीहैं या ओबीसी.लिखत साफ थी. बघेल अपनी ओबीसी आइडेंटिटी के आधार पर बीजेपी के पक्ष में तर्क दे रहेथे. लेकिन बकौल बघेल, उन्होंने दो बरस में ही ये पद छोड़ दिया. वजह, उनकी जाति कोलेकर बवाल.टूंडला विधानसभा से जब वे जीते, तभी यहीं के पूर्व बसपा विधायक राकेश बाबू नेइलाहाबाद हाईकोर्ट में बघेल की जाति को लेकर केस कर दिया. कोर्ट ने बघेल को नोटिसभेजा. इस संबंध में बघेल ने मीडिया में तर्क दिया था कि वे मूलतः धनगर समुदाय सेताल्लुक रखते हैं.2016 में इलाहाबाद हाईकोर्ट, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग, और उत्तर प्रदेश सरकारने धनगरों को अनुसूचित जाति का प्रमाण जारी करने का आदेश जारी किया था. इसके पहलेतक बघेल खुद को ओबीसी नेता की तरह पेश करते आ रहे थे. लेकिन अगले साल यानी 2017 मेंहुए चुनाव में एससी नेता बनकर उभरे.हमसे बातचीत में याचिका दायर करने वाले राकेश बाबू कहते हैं -"बघेल जी ने फर्जी जाति प्रमाणपत्र बनवाया है. उनके बारे में बात करते हुए तो एससीशब्द का इस्तेमाल ही नहीं करना चाहिए. वे ओबीसी थे और ओबीसी ही रहेंगे."क्या है जाति को लेकर विवादबघेल मूलतः गड़रिया समुदाय में गिने जाते हैं. और उत्तर प्रदेश में गड़रिया पिछड़ीजातियों में गिनी जाती है. अनुसूचित जाति के वर्ग धनगर में बघेलों को शामिल करने कीबहुत समय से कोशिशें होती रही हैं, लेकिन हर बार अदालत के साथ-साथ पंचायतों ने भीइस पर अपनी असहमति जतायी है. इन संस्थाओं ने कहा है कि बघेल गड़रिया ही रहेंगे.गड़रिया समुदाय उत्तर प्रदेश की पिछड़ी जातियों की पहली अनुसूची के 19वें स्थान परमौजूद है. ऐसे में टूंडला (सुरक्षित) सीट के साथ-साथ आगरा (सुरक्षित) सीट पर बघेलका नामांकन संदेहों के घेरे में आ जाता है.इसी साल 11 फरवरी को आगरा के जिला पंचायत अध्यक्ष राकेश बघेल ने प्रेस कांफ्रेसकरके भी एसपी सिंह बघेल की जाति प्रमाणपत्र पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि नौकरीकरने के लिए बघेल ओबीसी थे, लेकिन राजनीतिक लाभ के लिए अब एससी बन गए हैं. इस समयभाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष महेश बघेल भी मौजूद थे. महेश बघेल ने कहा कि एसपी सिंहबघेल धनगर समाज को गुमराह कर रहे हैं. अपनी पार्टी के खिलाफ कोई क्यों प्रेसकांफ्रेंस करेगा. इसके लिए बघेल तर्क देते हैं कि उनकी जाति को लेकर सवाल उठानेवाले लोग यहां के मौजूदा सांसद रामशंकर कठेरिया से जुड़े लोग हैं, जिनका टिकट काटदिया गया है.क्या है बघेल की सफाईहमसे बातचीत में बघेल दावा करते हैं कि बघेल अनुसूचित जाति में ही आते हैं. लेकिनहमारे पूछने पर कि क्या वे ख़ुद को अनुसूचित जाति का मानते हैं, बघेल कहते हैं —“मामला अभी अदालत में विचाराधीन है.”बघेल कहते हैं कि उनके पास अनुसूचित जाति का प्रमाणपत्र है. लेकिन उनकी इसी जातिप्रमाणपत्र पर अदालत में केस चल रहा है. बक़ौल बघेल, वे अब भाजपा के ओबीसी मोर्चाके अध्यक्ष नहीं हैं. वे कहते हैं कि रामविलास पासवान (जो खुद पिछड़ों के नेता हैं)के बुलावे पर भाजपा में शामिल हुए थे. लेकिन पहले ही वे ओबीसी मोर्चा से क्योंजुड़े? इस पर बघेल कहते हैं —“ओबीसी नेता की तरह नहीं, मैं एक राजनेता की तरह पार्टी से जुड़ा था. मुझे पासवानजी ने बुलाया था. मामला कोर्ट में गया तो मैंने मोर्चे के अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ादे दिया.”--------------------------------------------------------------------------------रामपुर में काम तो जया प्रदा ने भी नहीं कराया लेकिन दावा है कि जीत जाएंगी