सियासत में विरासत की लड़ाई बहुत पुरानी है. यादव परिवार में झगड़ा हुआ तो मुलायमभी रोए और अखिलेश भी. लेकिन बाहरी लोगों में कोई सबसे ज्यादा दुखी होगा तो वोहोंगे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह.क्यों?उत्तर प्रदेश चुनाव में सबसे ताजा ओपनियिन पोल इंडिया टुडे-एक्सिस का है. जिसकेमुताबिक, स्थितियां बीजेपी के पक्ष में हैं. ओपिनियिन पोल के मुताबिक, बीजेपी को170 से 183 सीटें मिलती दिख रही और सपा तीसरे नंबर पर है. जब भी कहीं से बीजेपीजीतती है, तो जो तबका सबसे 'भयभीत' माना जाता है, वो है मुसलमान. भारत में वोटगणितका सामान्य सिद्धांत यही कहता है कि बीजेपी के मजबूत होने की स्थिति में मुसलमानएकमुश्त एक पार्टी के साथ जाता है. बीजेपी मुसलमानों की पार्टी नहीं है और उसके लिएआदर्श स्थिति ये है कि मुस्लिम वोट जितने ज्यादा हिस्सों में हो सके, बंट जाए.प्रदेश में 18 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं, जिनका बड़ा हिस्सा सपा के साथ माना जाता है.ओपिनियन पोल बीजेपी के पक्ष में हैं, सपा एक सहज सत्ताविरोधी लहर के साथ अंदरूनीउठापटक से त्रस्त है, इसलिए मुसलमान एक ज्यादा मजबूत विकल्प चाहेगा. वह बसपा केसिवा कोई और पार्टी नहीं दे सकती. बसपा इस बार कुछ अतिरिक्त जोर-शोर से मुसलमानोंको लुभाने में लगी भी हुई है. इस बार वह 100 से ज्यादा मुस्लिम उम्मीदवार उतारने कीतैयारी में है. लखनऊ की रैली में मायावती के भाषण में कई बार मुसलमानों का जिक्रहुआ. बेवजह नहीं है कि वो मुसलमानों को सपा और बीजेपी की पुरानी करीबी याद दिला रहीहै. वो रक्षाबंधन का वो त्योहार याद दिला रही हैं और पूछ रही हैं कि किसने किसकोराखी बांधी थी. कुछ अखबारों ने बसपा के सूत्रों के हवाले से लिखा है कि मायावती 135मुस्लिम उम्मीदवार उतार सकती हैं. बल्कि शुरू में जिन ब्राह्मण उम्मीदवारों को हरीझंडी दे दी गई थी, उनके टिकट काटकर मुसलमानों को दिए जा रहे हैं. मुसलमानों केमोर्चे पर इतनी एग्रेसिव तो बसपा पिछले चुनाव में भी नहीं थी. 2012 में उसनेमुसलमानों को 85 और ब्राह्मणों को 74 टिकट दिए थे. सपा का जैसा हाल है, अगर उसकेपक्ष में बहुत भावनात्मक अपील नहीं बनी तो मुसलमान अपना वोट उस पर खराब नहीं करनाचाहेगा. बसपा के रूप में उसके पास एक बेहतर विकल्प है, जिसे ओपनियन पोल नंबर-2 परदिखा रहे हैं और जिसके 'एक' पर आने की संभावना ज्यादा है. बसपा मूलत: दलितों कीपार्टी मानी जाती है, लेकिन 2007 में उसने सोशल इंजीनियरिंग के सफल प्रयोग से सबकोचौंका दिया था. इस बार दलित तो उसके पाले में ही है, मुसलमानों और ब्राह्मणों इसहालात में प्रदेश का करीब 18 फीसदी मुसलमान अपने वोट को लेकर आशंकित हो सकता है. येआशंका उसे बसपा के करीब ले जा सकती है, क्योंकि इस वक्त माइनॉरिटी वोट को एकजुटरखने का आग्रह होगा. इससे आने वाले चुनाव में वो गठजोड़ बन सकता है, जिससे बीजेपीसबसे ज्यादा डरती है. वो है मुस्लिम-दलित का. अभी जब मैं ये लिख रहा हूं, बगल कीकुर्सी पर बैठे ऋषभ प्रतिपक्ष ने आशंका जाहिर की है कि अखिलेश नई पार्टी बना लेंगेतो वो खुद मजबूत हो जाएंगे, लेकिन बीजेपी इससे राहत की सांस ले सकती है. क्योंकि तबमुस्लिम वोट बंटने की आशंका ज्यादा होगी. अगर आप सोच रहे हैं कि सोमवार वाली बैठकके बाद सब कुछ थम गया है, तो ज़रा दम साधिए. अभी कुछ बड़ा होना बाकी है.