वामपंथ की आखिरी उम्मीद था LDF, अब भारत के किसी राज्य में लेफ्ट सरकार नहीं
आजादी के बाद साल 1957 में पहली बार लेफ्ट की सरकार बनी देश के सबसे दक्षिणी राज्य केरल में. तब ईएमएस नंबूदरीपाद लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई दुनिया की पहली मार्क्सवादी सरकार के मुख्यमंत्री बने थे.

भारत में वामपंथी सरकार का आखिरी किला भी ढहने वाला है. केरल चुनाव के रुझान बता रहे हैं कि पिनाराई विजयन की लेफ्ट सरकार जाने वाली है. सीपीएम की अगुआई वाले लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) को सिर्फ 38 सीटों पर जीत मिलती दिख रही है.
विजयन सरकार भारत में वामपंथी विचारधारा वाली आखिरी सरकार थी. इससे पहले पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में लेफ्ट पार्टियों का गढ़ पहले ही ढह चुका है. साल 2011 में ममता बनर्जी के आने के बाद बंगाल से सीपीएम का सूपड़ा साफ हो गया. त्रिपुरा में लेफ्ट के 25 साल के शासन को बीजेपी ने 2018 में खत्म कर दिया. ऐसे में सवाल है कि क्या पहली बार ऐसा होगा जब देश के किसी भी राज्य में कोई भी लेफ्ट पार्टी पावर में नहीं होगी?
पहली कम्युनिस्ट सरकारआजादी के बाद साल 1957 में पहली बार लेफ्ट की सरकार बनी देश के सबसे दक्षिणी राज्य केरल में. तब ईएमएस नंबूदरीपाद लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई दुनिया की पहली मार्क्सवादी सरकार के मुख्यमंत्री बने थे. यह भारत की पहली गैर कांग्रेसी सरकार भी थी. नंबूदरीपाद दो साल यानी 1957 से 1959 तक सीएम रहे. इसके बाद सात साल तक देश में ‘नो लेफ्ट’ काल चला, जब तक 1967 में केरल में ही नंबूदरीपाद दोबारा सीएम नहीं बन गए. केरल की ये लेफ्ट सरकार 1977 तक चली. फिर वहां एक साल के लिए कांग्रेस की सरकार आ गई.
लेकिन, तब तक बंगाल में लेफ्ट ने खाता खोल दिया था. ज्योति बसु के नेतृत्व में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) ने साल 1977 में पहली बार सरकार बनाई. ये सरकार 2011 तक चली. उस साल ममता बनर्जी की टीएमसी ने बंगाल से लेफ्ट पार्टी का किला ढाहकर सत्ता कब्जा ली.
त्रिपुरा में सत्ता में आई सीपीएमइधर 1978 में त्रिपुरा में पहली बार नृपेन चतुर्वेदी के नेतृत्व में सीपीएम की सरकार बनी. 1993 में इसी पार्टी के माणिक सरकार सीएम बने तो 2018 तक लगातार इस कुर्सी पर बने रहे. तकरीबन 25 सालों तक त्रिपुरा वामपंथ का अभेद्य गढ़ बना रहा. लेकिन साल 2018 में बीजेपी ने उसके वर्चस्व को न सिर्फ चुनौती दी बल्कि पहली बार सरकार बनाकर राज्य से सीपीएम की विदाई कर दी.
1977 में बंगाल की सत्ता से लेकर 2018 में त्रिपुरा की सरकार गिरने तक लगातार वामपंथी पार्टी कहीं न कहीं सरकार में बनी रही.
मोर्चा संभाले रहा केरलइसके बाद भी पूरे देश से वामपंथी सरकार का सूपड़ा साफ नहीं हुआ. केरल में सीपीएम के नेतृत्व वाली LDF की सरकार 2016 में आ गई थी. पिनाराई विजयन सीएम बने थे. केरल के चुनावी नतीजों की बदलाव वाली परंपरा में थोड़ा चौंकाते हुए साल 2021 में विजयन के नेतृत्व में लेफ्ट ने दोबारा चुनाव जीता. 2026 तक तो ये सरकार अबाध रूप केरल में बनी रही. लेकिन अब जो रुझान आ रहे हैं, उससे लगता है कि विजयन की मुख्यमंत्री आवास से और LDF की सत्ता से विदाई तय है. वहां LDF को सिर्फ 38 सीटें मिलती दिख रही हैं.
वहीं कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूडीएफ 99 सीटों पर बढ़त बनाए है. इन नतीजों से केरल में कांग्रेस की वापसी का रास्ता क्लियर हो गया है. हालांकि, इस गठबंधन में भी रिवॉल्युशनरी मार्क्सिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया और कम्युनिस्ट मार्क्सिस्ट जैसी कुछ वामपंथी पार्टियां हैं, लेकिन उनका असर न के बराबर है.
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