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हार्दिक पटेल जेल से छूटेंगे, UP जाएंगे तंबू गाड़ने, वोट काटने

कोर्ट ने उन्हें 6 महीने गुजरात से बाहर रहने को कहा है. अहमदाबाद के पक्षी बता रहे हैं कि हार्दिक उत्तर जाएंगे. उत्तर प्रदेश.

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12 जुलाई 2016 (अपडेटेड: 12 जुलाई 2016, 08:39 AM IST)
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हार्दिक पटेल. Photo: Reuters
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जेल से बाहर आ रहे हैं हार्दिक पटेल. पास आ रहे हैं यूपी के चुनाव. दोनों में रिश्ता? है है है! हार्दिक पटेल को तीन अलग-अलग मामलों में बेल हो गई है. सच अ लकी गाय. शुक्रवार को दो केस में बेल मिली थी, सोमवार को तोड़-फोड़ के एक और केस में जमानत पा गए. 9 महीने से जेल में थे, आज या कल में बाहर आ जाएंगे. देशद्रोह समेत कई धाराओं में आरोप में थे. गुजरात हाईकोर्ट को उन्होंने पिंकी प्रॉमिस किया है कि अगले 6 महीने तक वो गुजरात के बाहर रहेंगे. लेकिन रहेंगे कहां? सारी संभावनाएं उत्तर प्रदेश की तरफ इशारा कर रही हैं. अगले साल वहां चुनाव हैं और बता रहे हैं कि हार्दिक वहां अपने 'सजातीय' वोटरों को प्रभावित कर सकते हैं. कुर्मी, यादव के बाद प्रदेश की दूसरी सबसे बड़ी ओबीसी जाति है. 1954 की जाति जनगणना के मुताबिक, सूबे में 6 फीसदी कुर्मी थे. अब उनकी संख्या 8-9 फीसदी मानी जाती है. इलेक्शन कमिशन के मुताबिक, 403 विधानसभा सीटों पर उकी मौजूदगी है. लेकिन 16 जिलों में उनकी संख्या काफी कुछ तय करती है. ये जिले पूर्वांचल के हैं- संतकबीर नगर, मिर्जापुर, सोनभद्र, बरेली, जालौन, उन्नाव, फतेहपुर, प्रतापगढ़, कौशांबी, इलाहाबाद, सीतापुर, बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर, सिद्धार्थनगर और बस्ती. इन 16 जिलों में 6 से 11 फीसदी कुर्मी वोट हैं, जो जीतते को हराने के लिए काफी हैं. UP में तीन कुर्मी मोर्चे पहले से बने हुए हैं.
1. NDA की तरफ से अनुप्रिया पटेल. 2. अनुप्रिया की मां 'अपना दल' की कृष्णा पटेल और उनके संभावित जोड़ीदार नीतीश कुमार. 3. सपा की तरफ से बेनी प्रसाद वर्मा.
22 साल के हार्दिक पटेल इनमें से किसके पक्ष में माहौल बनाएंगे? गुजरात में पटेलों/पटीदारों को ओबीसी में शामिल करने की मांग को लेकर इन्होंने आंदोलन चलाया था, जिसे भारी समर्थन मिला था. हार्दिक ने खुद को महात्मा गांधी, सरदार पटेल और चंद्रशेखर आजाद से एक साथ प्रेरित बताया था. ये भी कहा था कि मौजूदा नेताओं में उन्होंने अरविंद केजरीवाल और नीतीश कुमार से भी काफी कुछ सीखा है. वह अपने भाषणों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर वादे पूरे न करने का आरोप लगाते रहे हैं.

सरदार के नाम पर सारे पटेलों को जोड़ने की कोशिश

हार्दिक पटेल अपनी रैलियों में 'जय सरदार' का नारा लगाते हैं. हाल के दिनों में देश के अलग-अलग सरनेम वाले पटेलों-कुर्मियों को सरदार पटेल के नाम पर एक करने की कोशिशें हुई हैं. यूपी में बहुत सारे 'निरंजनों' ने राजनीतिक प्रेरणा के बाद 'पटेल' सरनेम अपना लिया है. पटीदारों के हीरो बनने के बाद हार्दिक पटेल दिल्ली के चक्कर भी लगा चुके हैं. यहां कुर्मी और दूसरे ओबीसी नेताओं ने उन्हें हाथोंहाथ लिया था. राजधानी के पक्षी बताते हैं कि उनका एक प्रोग्राम तो RLSP वाले उपेंद्र कुशवाहा के एक करीबी ने करवाया था और बाद में कुशवाहा ने उस बंदे को किनारे कर दिया. उपेंद्र कुशवाहा BJP के पार्टनर हैं.

थोड़ी सी हार्दिक हिस्ट्री

25 अगस्त 2015 को अहमदाबाद के GMDC मैदान पर पटीदारों की रैली थी. हार्दिक पटेल ने इसे 'पटीदार क्रांति दिवस' घोषित कर दिया. रैली की इजाजत नहीं थी, भीड़ को तितर-बितर कर दिया गया. शाम को हार्दिक पटेल धरने पर बैठ गए और अहमदाबाद पुलिस ने उन्हें उठा लिया. उन पर धारा 151 लगाई गई. इसके बाद उनके समर्थकों का विरोध तोड़फोड़ और हिंसा में बदल गया. सरकार को कर्फ्यू लगाना पड़ा. सेना बुलानी पड़ी.
31 अगस्त को वो सभा हुई, जिससे पहली बार लगा कि हार्दिक पूरे देश में असर डालने की नीयत रखते हैं. इस दिन एक सभा हुई, जिसमें उन्हें यूपी, मध्य प्रदेश और राजस्थान के गुर्जर और कुर्मी समुदाय से मिलवाया गया. यहां हार्दिक की लीडरशिप और संगठन बनाने के हुनर की तारीफ की गई, 'भूरि-भूरि' वाली भाषा में. इस आयोजन के पीछे कौन था, सिर्फ पक्षी जानते हैं. लेकिन जो भी था, यूपी चुनावों में उसका हित जरूर था.
बीच में हार्दिक पटेल गायब हो गए. 23 सितंबर को सामने आए और कहा कि हथियारबंद लोगों ने उन्हें अगवा कर लिया था. सारी चीजें थोड़ी संगठित रहें, इसके लिए 9 सितंबर 2015 को हार्दिक पटेल ने पटेल नवनिर्माण सेना बना ली. इसका एक ही मकसद है, देश भर के पटीदारों और उनसे जुड़ी जातियों (जैसे कुर्मी, गुर्जर आदि) को एक छतरी के नीचे लाना और गुजरात में इन सबको सरकारी नौकरियों और शिक्षा में रिजर्वेशन दिलवाना. 18 अक्टूबर को हार्दिक के खिलाफ तिरंगे के अपमान का केस दर्ज हो गया. इंडिया-साउथ अफ्रीका के बीच क्रिकेट मैच में अड़चन डालना चाह रहे. पुलिस ने कुछ देर के लिए धर लिया. अक्टूबर में उन्होंने जोश में कह दिया कि नौजवानों के सुसाइड करने से अच्छा है कि दो-चार पुलिस वालों को मारकर मरो. इसके बाद उनके खिलाफ राष्ट्रद्रोह का केस दर्ज हो गया. यूपी में कुर्मी कई नामों से जाने जाते हैं, जिनमें निरंजन, सचान, गंगवार, वर्मा और पटेल भी हैं. गुजरात में हार्दिक की अगुवाई वाले आंदोलन में जमकर हिंसा हुई थी. इससे पहले गुजरात के पटेल बीजेपी के पारंपरिक वोटर माने जाते थे, लेकिन इस भीड़जुटान से वो बीजेपी के खिलाफ हो गए. आनंदीबेन पटेल सरकार ने बाद के दिनों में पटीदारों को मक्खन लगाने की कोशिशें भी कीं, लेकिन तब तक हार्दिक का असर फैल चुका था.

कृष्णा पटेल को हार्दिक मुबारक?

हार्दिक पटेल एनडीए का प्रचार तो करेंगे नहीं, बल्कि उनके नुकसान की कोशिश ही करेंगे. बेनी प्रसाद वर्मा से हाथ मिलाने की फिलहाल कोई वजह नजर नहीं आती. इसलिए किसी को हैरत न हो अगर वह 21 अगस्त को वाराणसी में कृष्णा दल के साथ मंच साझा करते नजर आएं. कृष्णा पटेल ने अपनी बेटी अनुप्रिया को पिछले साल ही पार्टी से निकाल दिया था. बीजेपी ने मां-बेटी में से बेटी का पक्ष चुना और अनुप्रिया को केंद्र में मंत्री बना दिया. इसके बाद कृष्णा ने बीजेपी से 'अपना दल' को अलग कर लिया. बताते हैं कि आज कल उनकी नीतीश कुमार से बातचीत चल रही है जो यूपी के कुर्मी वोटरों को लुभाना चाह रहे हैं. गुजरात में पटीदार लंबे समय से हीरा व्यापार में रहे हैं. हालांकि हाल के सालों में उनकी समृद्धि कुछ कम हुई है. उसी के बाद हार्दिक पटेल की राजनीति की जगह बनी. यूपी में भी कुर्मियों के सामाजिक-आर्थिक हालात अच्छे ही कहे जाएंगे. उनके पास जमीनें रही हैं, उनमें व्यापारी भी हैं और सरकारी नौकर भी.
बता रहे हैं कि 6 महीने हार्दिक पटेल का बसेरा यूपी में ही रहेगा. सोम-मंगल को जब भी वो जेल से बाहर आएंगे, गाजे-बाजे के साथ उन्हें वेलकम किया जाएगा. पाटीदार-बहुल वरछा इलाके में खुले ट्रक में घूम-घूमकर वो अपनी बेल को उपलब्धि की तरह सेलिब्रेट करेंगे.
पटीदार अनामत आंदोलन समिति की सूरत यूनिट के सह-संयोजक धार्मिक मालवीय का बयान काबिले-जिक्र है. उन्होंने दो दिन पहले इंडियन एक्सप्रेस से कहा, 'बाहर आने के बाद हार्दिक पटेल यहां एक रात रहेंगे, फिर निकल जाएंगे. वे 6 महीनों के लिए महाराष्ट्र या उत्तर प्रदेश जा सकते हैं. 2017 में वहां चुनाव होने हैं और वो वहां कुर्मी समाज के लोगों और नेताओं से मिलेंगे और अपने आंदोलन के लिए समर्थन मांगेंगे.' हार्दिक पटेल नौजवान नेता हैं. ऊर्जावान हैं. लेकिन बाद के दिनों में उन्होंने अपनी भद्द ज्यादा पिटवाई है. बल्कि टीवी इंटरव्यूज में उनके जवाब सुनकर समझदार लोगों ने उनसे किनारा कर लिया है. लेकिन चुनावों में ये सब कहां देखा जाता है. अगर 6 महीने वो यूपी में रहे तो कुछ असर तो डालेंगे ही. उनके आने से कुर्मी वोटों के दावेदारों की भीड़ भी बढ़ेगी. इतने हो गए हैं कि कहीं प्रदेश में 8-9 फीसदी वोटों का वजूद ही नाकुच ही ना हो जाए!
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