हम तो 13 साल से काम कर रहे हैं. काम करने पर मजदूरी मिलना चाहिए न. हमारा मजदूरीयही होगा कि 29 अप्रैल को आप वोट देकर लल्लन बाबू को जिता दीजिए. बोलिए, देंगे नमजदूरी हमको. देंगे न. देखिए, सूरज भगवान के आगे हाथ उठाकर आप कह रहे हैं. कोई भीधरम का लोग हो, सूरज के बिना किसी का काम चलता नहीं है न. तो इसका ध्यान रखिएगा.जिताइएगा लल्लन बाबू को.ये शुरुआत से अंत का क्रम नहीं है. ये दिन के आखिरी प्रोग्राम से शुरुआत है. मुंगेरलोकसभा सीट की हमारी कवरेज वाले दिन का आखिरी कार्यक्रम. नीतीश कुमार की जनसभा. ऊपरजो बयान है, वो उन्हीं का है.तारीख- 23 अप्रैल. जगह, लखीसराय का हलसी. यहां कृषि फार्म के मैदान पर मंच सजा है.हरे रंग का मंच. उसके आगे गेंदे के नारंगी फूलों की माला. सिंबॉलिजम खोजना हो, तोइस मेल में जेडीयू-बीजेपी का गठबंधन देख लीजिएगा. आज नीतीश यहां राजीव रंजन उर्फलल्लन सिंह के लिए वोट मांग रहे हैं. बिहार में सूरज के लिए दीनानाथ, दिनकर शब्दबहुत इस्तेमाल होता है. लोग उन्हें साक्षी मानकर कसम खाते हैं. नीतीश यहां लोगों सेवोट की अपील करते हुए सूरज को साक्षी रख रहे थे. नीतीश के बयान में मोदी भरे थे.मोदी सरकार की योजनाएं. उज्ज्वला. शौचालय. फिर अपनी सरकार की योजनाएं भी गिनवा रहेथे. लोगों को अपने किए काम याद दिला रहे थे. उनकी सरकार कितनी अच्छी है, इसकी मिसालदेने को बार-बार 'पति-पत्नी की सरकार' का भी नाम ले रहे थे. पति-पत्नी माने लालू औररबड़ी. इनका नाम नहीं लिया गया एक बार भी. मगर ज़िक्र कई बार हुआ.नीतीश के भाषण में कांग्रेस राज का भी ज़िक्र था. ताने की तरह. कि कांग्रेस ने क्याही काम किया. जिक्र बिहार के पहले मुख्यमंत्री कृष्ण सिन्हा का भी था. मगर बड़ेसम्मान के साथ. ये अलग बात है कि कृष्ण सिन्हा की पार्टी कांग्रेस ही थी. मगर कृष्णसिन्हा कांग्रेस की प्रॉपर्टी नहीं हैं. वो बेंचमार्क हैं बिहार की राजनीति में.कोई नेता उन्हें फॉलो नहीं करता. इज्जत सभी करते हैं. कृष्ण सिन्हा बेहतरीन नेताथे. प्रशासक थे. उनका दौर बिहार में गवर्नेंस का यादगार दौर था. मगर वो जाति कीराजनीति नहीं करते थे. अब आपको समझ आया होगा कि अब के नेता उनको फॉलो क्यों नहींकरते. क्योंकि इनका तो जाति के बिना कुछ हो ही नहीं सकता.'लल्लन सिंहजाति के खेल में खूब माथापच्ची है. और मुंगेर की पॉलिटिक्स में भूमिहार जाति कादबदबा है. मेन मुकाबला नीलम देवी और लल्लन सिंह में हैं. दोनों भूमिहार हैं. नीलमदेवी की पहचान हैं उनके पति अनंत सिंह. मोकामा से निर्दलीय विधायक. जिन्हें नीलमइसलिए भगवान मानती हैं कि वो उनके पति हैं. और इलाके के लोग इसलिए मानते हैं कि वो'छोटे सरकार' हैं. अनंत सिंह का आपराधिक बैकग्राउंड, उनपर लगने वाले इल्ज़ाम, इससेवोटर को लेना-देना नहीं. कम से कम उनको तो बिल्कुल नहीं, जिनसे हम मिले. फिर चाहेवो सुल्तानपुर गांव की चौपाल में बैठे बुजुर्गों-जवानों का ग्रुप हो. या मरांची केअन्नपूर्णा मंदिर में पूजा करने आईं औरतें.इन लोगों से बात करके लगेगा अनंत सिंह कोई अवतार हैं. कोई मसीहा. लोकल रॉबिन हु़ड.लोग बोले, जिस बात की कहीं सुनवाई नहीं होती वो अनंत सिंह के दरबार में सुनी जातीहै. एक फोन से काम करवा दिया जाता है. किसी ने कहा, रात-बिरात कभी भी चले जाइए उनकेयहां. एकदम कुटुंब की तरह मिलते हैं. एक बुजुर्ग बोले, अनंत सिंह के रहतेकोर्ट-कचहरी की कोई ज़रूरत नहीं. ये बात शिकायत नहीं, गद्गद् होने के स्टाइल मेंकही गई थी. बोले, फरियाद लेकर जाने वालों के 'कष्ट' दूर करते हैं. उनके यहां भंडाराभी चलता है सबके लिए. हरदम. अनंत सिंह की ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाइए कि नीतीशकुमार लल्लन सिंह के लिए वोट मांगते हुए इतिहास-पुराण सब बोल गए, मगर एक बार भीअनंतसिंह या उनकी पत्नी नीलम देवी का नाम नहीं लिया. ये अंदाज ऐसा था कि लड़ाई जीतनी तोहै, लेकिन विरोधी पर हथियार नहीं उठाना.नीलम सिंह (दी लल्लनटॉप)नीतीश और अनंत के चक्कर में मरांची की औरतों का जिक्र रह ही गया. उनमें से एक काचेहरा मुझे हमेशा याद रहेगा. उनकी बिटिया 14-15 साल की है. कह रही थीं कि अभी लड़कामिल जाए, तो अभी शादी कर देंगी उसकी. क्यों? क्योंकि लड़कियां बड़ी हो जाती हैं तोलड़के के साथ भाग जाती हैं. बोलीं, इज्जत उड़े इससे अच्छा बियाह करके अपने घर चलीजाए. एक लड़की भी थी वहां. पास के एक कॉलेज में पढ़ती है. बीए पार्ट वन में. बोली,रोज कॉलेज जानाकहां से पार लगेगा. परीक्षा देने जाते हैं बस.मंदिर के बाहर काजल देवी की दुकान है. वो प्रसाद बेचती हैं. पति उनके बंबई रहतेहैं. वहां मजदूरी करते हैं. पति की कमाई कम है. सो काजल देवी तीन शिफ्ट में कामकरती हैं. सुबह 7 बजे दुकान खोलती हैं. दिन में 2 से 4 दुकान बंद करती हैं. उस टाइममें घर पर बच्चों को भजन सिखाती हैं. चार-पांच के करीब बच्चे आते हैं. एक का फीस200 रुपया. फिर 4 बजे दोबारा दुकान चालू. शाम 7-8 बजे तक. फिर खाना-पीना. और फिरपास के एक आवासीय विद्यालय में लेडी गार्ड की ड्यूटी. मैंने पहली बार कोई इंसानदेखा, जिसकी दिनचर्या में सोने की कोई जगह नहीं. काजल देवी के चार बच्चे. दो बेटे.दो बेटियां. बेटे पढ़ रहे हैं. एक बेटी बियाह दी. इंटर में पढ़ते हुए. उस लड़की नेशादी के बाद पढ़ाई जारी रखी. अभी पार्ट वन में है. छोटी वाली भी पढ़ती है. काजलदेवी कहती हैं कि पति की कमाई ठीक होती, तो उन्हें दुकान नहीं चलानी पड़ती. यानी येकाम-काज मजबूरी है उनकी. मगर यही काजल देवी बेटियों के लिए सरकार से नौकरी भीमांगती हैं.हलसी का रास्ता. हमारी गाड़ी का मुंह उत्तर से दक्षिण की तरफ है. बाईं तरफ एक खेतमें थ्रेसर चल रहा है. कुछ आदमी-औरत काम करते दिखते हैं. ये बंटाई पर खेती करतेहैं. खेत का मालिक कहीं बंगाल में रहता है. पानीपटाने के लिए जब पंप चलता है, उसमेंडीजल का पैसा देता है. बाकी पैसा और मेहनत बंटाई पर खेती करने वाले की. फसल का 50पैसा खेत मालिक का. बाकी 50 बंटाई वाले का. खेतिहर मजदूर भी मिले यहां. ये बार्टरसिस्टम पर खटते हैं. 12 बोझा ढोते हैं, तो मजूरी में एक बोझा पाते हैं. एक बोझाबराबर मोटा-मोटी पांच किलो गेहूं.मुझे खेत में गेहूं की बालियां बिखरी दिखीं. इसको गांव के बच्चे चुनकर ले जाएंगे.इन बालियों के बदले चना-चबेना पाएंगे. यहां हमें रेनु मिली. स्कूल से आकर मां केसाथ बोझा ढोने जा रही थी. मां खेतिहर मजदूर है. सॉरी, पूरा परिवार खेतिहर मजदूर है.पिता, भाई, मां सब. रेनु स्कूल जाती है. घर के सारे काम करती है. मजदूरी भी करतीहै. फिर रात तीन बजे उठकर सुबह सात बजे तक पढ़ाई करती है. उसको बड़े होकर बैंकमैनेजर बनने का मन है. शर्त ये है कि उसको पढ़ाई के लिए पैसा मिले. उसकी सहेलीकरीना 9वीं में है. उसका भी सेम-टू-सेम परिवार. सेम-टू-सेम दिनचर्या. करीना को बड़ेहोकर SP बनना है. करीना और रेनु बताती हैं. शौचालय बनवाए हैं सरकार ने. पहले दिक्कतहोती थी. दिन में शौच आता, तो रोकना पड़ता. रात को जातीं, तो कई बार लड़के छेड़ते.अब आराम है. बस घर दे दे सरकार, तो चैन आ जाए. करीन ने बताया, फूस की छप्पर झड़ रहीहै. उससे गिरा गंदा कई बार खाने में पड़ जाता है, तो खाना कच-कच हो जाता है. करीनाने घर में कदीमा की सब्जी और भात बना था आज. रेनु ने भात और बेसन का झोर बनाया था.दोनों ने खाने के लिए बुलाया. उनके शब्द थे-हमारे घर आइएगा तो अनाज न रहने पर भी खाली पेट नहीं जाने देंगे. कम से कम साग-भाततो खिलाएंगे ही.खिलाने से फिर नीतीश बाबू याद आए. वही उनकी चुनावी सभा. औरतों का, लड़कियों का बड़ाजिक्र कर रहे थे. बोले- मैं महिलाओं से कहना चाहता हूं. आपके घर में लोग (इशारापति) अगर वोट देने में आपका बात मानें, तो चाय-जलपान कराइएगा. वोट देकर आने परअच्छा खाना बनाकर खिलाइएगा. लेकिन अगर आपका बात नहीं मानें (मतलब अगर जेडीयू को वोटन दें) तो दिनभर भूखे रखिएगा.बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार2014 के चुनाव में नीतीश बाबू ईर घाट थे. बीजेपी बीर घाट. मेरे पापा ने मां से कहा.बीजेपी को ही वोट दीजिएगा. मां ने कहा, अरे ये भी कोई कहने वाला बात है. फिर वोट कादिन आया. मां का फोन आया. बोली-तुम्हारे पप्पा को लग रहा है हम मोदी को वोट दिए हैं. जानती हो, हम उनको झूठ बोले.नीतीश को वोट दिए. बोलने का क्या काम. अंदर किसका बटन दबाना है, ये तो बस हमको पताचलेगा.मैंने तब समझने की कोशिश की थी. कि बिहार की महिलाओं में नीतीश को लेकर इतना चार्मक्यों है. आज नीतीश की जनसभा देखकर ये बात समझ आई. मैंने शायदही किसी नेता कोमहिलाओं और लड़कियों के बारे में इतना बोलते सुना हो. वो जितना महिलाओं की बात करतेहैं, उनसे संवाद करते हैं, उतना तो शायद महिला नेताएं भी नहीं करतीं. उनके भाषणोंमें लड़के 'भी' का पात्र हैं. संयोग देखिए. इन्हीं नीतीश के लल्लन 2014 में इसीमुंगेर सीट पर एक महिला से हारे थे. लोक जनशक्ति पार्टी की वीणा देवी से. इस बार भीउनके मुकाबले महिला ही खड़ी हैं. क्या होगा, इसका जवाब तो 29 अप्रैल को बक्सों मेंबंद होगा.जाते-जातेनीतीश के भाषण का एक हिस्सा मेरा भोगा सच है. उन्होंने कहा, मैंने लड़कियों कोसाइकिल दी. उसके बाद गांव-गांव में लड़कियां साइकिल चलाने लगीं. वरना पहलेगांव-देहात क्या, पटना तक में लड़की लोग साइकिल नहीं चला पाती थी. नीतीश ने जो कहा,बिल्कुल सच कहा. मेरा और मां-पापा का सबसे बड़ा अफसोस यही है. कि मैं बचपन मेंसाइकिल नहीं चला पाई. वो खरीदना चाहते थे. मगर माहौल अच्छा नहीं था. चौथी में पूरेस्कूल में टॉप किया मैंने. मां-पापा ने पूछा क्या चाहिए. मुझे बस साइकिल चाहिए थी.पैरंट्स को आज भी मलाल है. कि उन्होंने मुझे साइकिल नहीं दिलाई. छोटी-छोटी बच्चियांछेड़ दी जाती थीं. बस स्कूल से घर. घर से स्कूल. इसीलिए मैं जानती हूं. किगांव-देहात की लड़कियों को साइकिल उड़ाते हुए सड़कों पर देखना, इस सीन की खूबसूरतीक्या है. साइकिल चलाने की वो ख्वाहिश कितनी गहरी थी सोचिए. कि मैंने अपनी पहलीतनख्वाह से साइकिल खरीदी. साइकिल तो आ गई, मगर अफ़सोस कि अब उसको चलाने का टाइमनहीं था.(यह रिपोर्ट 23 अप्रैल को लिखी गई और 29 अप्रैल को पब्लिश की गई है.)--------------------------------------------------------------------------------वीडियो- अनंत सिंह की लोकप्रियता से डरकर नीतीश कुमार ने कराया फर्जी केस: नीलमदेवी