शत्रुघ्न सिन्हा अच्छे दिन का इंतजार कर रहे हैं या फिर मामला कुछ और है?
जानिए बिहार के उन नौ सीटों के बारे में जहां अभी भी महागठबंधन का पेंच फंसा है
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राहुल गांधी के साथ शत्रुघ्न सिन्हा (फाइल फोटो)
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28 मार्च 2019. सबको एक टीवी मोमेंट का इंतजार था. शत्रुघ्न सिन्हा. बीजेपी के प्रचारक शत्रुघ्न सिन्हा. 1991 में आडवाणी की खाली की नई दिल्ली सीट से चुनाव लड़ पूरे नेता बनने वाले शत्रुघ्न सिन्हा. अटल सरकार में आडवाणी कोटे से राज्यसभा सांसद और मंत्री बनने वाले शत्रुघ्न सिन्हा. पिछले 5 साल से रिसाए फिर रहे शत्रुघ्न सिन्हा. कांग्रेस ज्वाइन करेंगे. मगर ऐसा नहीं हुआ. मिला इंतजार और ये जुमला. कि नवरात्र के शुभ दिनों में पार्टी जॉइन करूंगा.
सोचना तो पड़ेगा. कि नवरात्र की बात थी तो पहले कांग्रेस की तरफ से ऐलान क्यों आया था कि आज ज्वाइन करेंगे. सोचना तो पड़ेगा कि कल जब बिहार के पत्रकारों को महागठबंधन की प्रेस कॉन्फ्रेंस का न्योता चला गया था, तो वह आज कैंसल क्यों हुई? या फिर ये बात कि चुनावी बखत में तेजस्वी यादव दिल्ली में डेरा डालने को मजबूर क्यों हैं?
कारण हम बता रहे हैं
बिहार में महागठबंधन का पेंच फंसा है. पहले दो चरण के लिए कैंडिडेट्स के नाम और साझेदारी के ऐलान के बाद भी. और ये घमासान है मुख्यतः कांग्रेस और आरजेडी के बीच.
1 पटना साहिब- शत्रु यहीं से दावा ठोंके हैं. इसीलिए यहीं से शुरू करते हैं. आरजेडी के एक धड़े ने शत्रुघ्न का विरोध किया है. उनका तर्क है कि सिन्हा तो 2014 में ही हार जाते अगर मोदी लहर नहीं होती. पटना के 4 लाख कायस्थ वोटर उन्हें अपना नेता नहीं मानते. टिकट ऐसे को दिया जाए जो यहीं रहता हो, मिलता जुलता हो. शत्रु का क्या है. बड़े नेता हैं, कहीं से भी लड़ा सकती है कांग्रेस. कुछ ने सुरगा छोड़ा, फिर दिल्ली क्यों नहीं लौटते शत्रु.
2 दरभंगा- इस सीट पर पहला दावा ठोंका मुकेश सहनी ने. सियासी पंडितों को गणित समझ नहीं आई. मैथिल ब्राह्मण, मुस्लिम और यादव बाहुल्य इस सीट पर सन ऑफ मल्लाह का दावा क्यों. फिर सामने आए राजद से अब्दुल बारी सिद्दीकी. लालू के खास. इतने कि चारा घोटाले में जब लालू की कुर्सी जाने को थी, तो राबड़ी से पहले उनका ही नाम चल रहा था. मगर कांग्रेस कसमसा रही थी. क्योंकि उसके पाले में आ गए थे कीर्ति आजाद. सिटिंग एमपी दरभंगा. बीजेपी छोड़कर आए आजाद को टिकट प्रॉमिस किया गया था. पुराने दिन याद किए गए थे. जब एक सुबह गुटबाजी से जूझते बिहार को संभालने के लिए उनके पिता भगवत झा आजाद को राहुल गांधी के पिता राजीव गांधी ने मुख्यमंत्री बना भेजा था.
मगर आरजेडी अड़ गई. कि दरभंगा नहीं छोड़ेंगे. ऐसे में कांग्रेस के हिस्से आई बाल्मीकिनगर सीट. ब्राह्मण बाहुल्य. कहा गया कि यहां से इस बिरादरी का कैंडिडेट दे भरपाई की जाएगी. फिर खबर चली कि कीर्ति को धनबाद भेजा जा सकता है. वहां उनके पिता की गुडविल है और महागठबंधन तो है ही. फिर बेतिया का नाम भी चला. मगर बेतिया तो उपेंद्र कुशवाहा की रालोसपा के हिस्से है. और वहां से राजन तिवारी दावेदार हैं. आखिरी खबर ये आई कि राजन का टिकट कटा तो वह निर्दलीय उतरेंगे. कुल मिलाकर मामला अधर में है.
3 मधुबनी- मिथलांचल की ही एक औऱ सीट मधुबनी पर भी खलबली है. आरजेडी के महात्वाकांक्षी नेता अली अशरफ फातमी की यहां दावेदारी थी. मगर कोटा आवंटन में सीट वीआईपी के पास चली गई. उन्होंने अभी पत्ते नहीं खोले. कांग्रेस की मुश्किल ये है कि उसकी समयावधि में मैथिल ब्राह्मणों का वर्चस्व रहा. विनोदानंद झा, ललित नारायण मिश्र, जगन्नाथ मिश्र, नागेन्द्र झा, भागवत झा आजाद इत्यादि बिहार कांग्रेस की रीढ़ रहे. मौजूदा कांग्रेस अध्यक्ष मदन मोहन झा नागेंद्र झा के बेटे हैं. और इन सबकी सियासी धुरी ये दो जिले हैं. मगर आरजेडी यहां कांग्रेस को पांव भी नहीं धरने दे रही. और इसी से सीन छिछिया रहा है.
4 मुंगेर- यहां से कांग्रेस की तरफ से ताल ठोके थे दबंग विधायक अनंत सिंह. राहुल की पटना रैली में वह खूब सक्रिय दिखे. मगर आरजेडी ने उनके नाम पर वीटो कर दिया. ऐसे में बीच का रास्ता निकला. बताया गया कि अनंत की पत्नी नीलम देवी कांग्रेस कैंडिडेट होंगी.
5 गोपालगंज- गोपालगंज की सुरक्षित सीट महागठबंधन में सब बेमन से ले रहे हैं. वजह, यहां से किसी की तैयारी नहीं थी. तेजस्वी का प्लान था कि बसपा को साथ लाएंगे और यूपी से सटी ये सीट उन्हें दे देंगे. मायावती को पीएम बनाने का नारा लगाएंगे, एक साझा रैली करवाएंगे और सब दलितों को लुभाएंगे. मगर ऐसा हो न सका.
6 औरंगाबाद- औरंगाबाद को लेकर भी खिचखिच रही. यहां से कांग्रेस से पूर्व आईपीएस निखिल कुमार लड़ते थे. उनके पिता छोटे साहब उर्फ सतेंद्र नारायण सिंह बिहार के मुख्यमंत्री रहे. निखिल के साले एनके सिंह 15 वें वित्त आयोग के अध्यक्ष रहे. मतलब तगड़ा पलिटिकल परिवार. निखिल के एक और साले और एनके के भाई उदय सिंह उर्फ पप्पू पूर्णिया से टिकट पा चुके हैं. मगर खुद निखिल का मामला लटक गया क्योंकि महागठबंधन में ये सीट जीतन राम मांझी के पास चली गई.
8 काराकाट- यहां से सिटिंग एमपी हैं रालोसपा के उपेंद्र कुशवाहा. लेकिन उन्हें खतरा दिख रहा है. क्योंकि एनडीए की तरफ से जेडीयू का कुशवाहा कैंडिडेट मैदान में है. और निखिल का टिकट कटने से राजपूत नाराज हैं. चर्चा है कि रालोसपा उजियारपुर जाना चाहती है और ये सीट छोड़ना. उजियारपुर क्यों. क्योंकि वहां राजपूत, यादव-मुसलमान का विनिंग कॉम्बिनेशन दिख रहा है. भूमिहार वोटों का भी आसरा है. क्योंकि उजियारपुर से सटा है बेगूसराय और चकल्लबाज कहते हैं कि गिरिराज सिंह को मिले ट्रीटमेंट से बिरादरी नाराज है. गिरिराज सिंह समर्थक दबी जुबान नेता जी को नवादा से बेगूसराय भेजे जाने के लिए बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष और उजियारपुर प्रत्याशी नित्यानंद राय को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं. राय को सजातीय यादव वोटों के अलावा परंपरागत भूमिहार वोटों का भरोसा है और इन्हीं पर उपेंद्र की नजर है. कहा जा रहा है कि इस समुदाय के बीच पकड़ बनाने के लिए उपेंद्र कुशवाहा ने मोतीहारी में भी बीजेपी नेता, सांसद और मोदी सरकार में मंत्री राधामोहन सिंह के सामने माधव आनंद को उतारा है.
9 सुपौल- मामला यहां पर भी फंसा है. ये सीट कांग्रेस कोटे में हैं. सिटिंग सांसद कांग्रेस की रंजीता रंजन हैं. मगर उनके पति पप्पू यादव के नाम पर आरजेडी ने वीटो कर दिया. पप्पू वेट करते रहे, फिर खीझकर ऐलान कर दिया, कि जिस मधेपुरा से पिछली दफा आरजेडी के टिकट पर जीते थे, वहां से इस बार अपनी पार्टी के बैनर तले ताल ठोंकेगे. इससे चिंता के बल आ गए शरद यादव के माथे पर. जिनकी कहने को तो अपनी पार्टी है, मगर आरजेडी कोटे से मधेपुरा से कैंडिडेट हैं.
पप्पू के ऐलान से बिफरे लालू और उनके पुत्र ने कह दिया कि ऐसा हुआ तो कांग्रेस को सुपौल कैंडिडेट बदलना होगा. वर्ना आरजेडी रंजीता रंजन के खिलाफ प्रत्याशी उतारेगी. इस पर कांग्रेस बोली कि आप नहीं बताएंगे कि हम किसे टिकट दें. दिल्ली वाली मीटिंग में चतरा का मामला भी उठा. झारखंड की ये सीट महागठबंधन के बंटवारे में कांग्रेस के हिस्से गई है. मगर आरजेडी ने यहां से अपने कैंडिडेट सुभाष यादव को सिंबल दे दिया.
कुछ और भी सुरगा है
तो मामला क्या सिर्फ कुछ सीटों का हैं? नहीं, पटना में एक उड़ती खबर चलती है. कि अगर दिल्ली में मोदी सरकार नहीं बनती है, तो नीतीश फिर पाला बदल सकते हैं. और इस दफा विधानसभा चुनाव में वह राजद नहीं सिर्फ कांग्रेस से दोस्ती करेंगे. लालू के लाल पर लगे दागों और इसके चलते पिछली बार हुई कट्टी पर नीतीश को सफाई भी नहीं देनी पड़ेगी. इन सबके लिए प्रशांत किशोर मध्यस्थ बनेंगे. जिनके दोनों पक्षों में संबंध है. और यहीं लालू यादव अपना सियासी अनुभव दिखाते हैं. आरजेडी संस्थापक को लगता है कि अगर सवर्णों के वर्चस्व वाले इलाके में कांग्रेस के सब दावे मान लिए गए, तो फिर मुस्लिम भी उनकी तरफ चले जाएंगे. और अगर एक बार कांग्रेस बिना बैसाखी बिहार में पनप गई, तो अगड़ों पर उसका दावा मजबूत हो जाएगा. और फिर नीतीश और कांग्रेस एक दुरुस्त कॉम्बिनेशन हो सकता है. कहते हैं कि ये लालू ही थे, जिन्होंने कन्हैया कुमार के नाम पर भी वीटो किया और कहा, ''आज मोदी को कोस रहा है, कल तुम्हें कोसेगा, तो क्यों नेता बना रहे हो.''
नेता बनने की सब लड़ाई है. भाजपा पिछली विनर है, पत्ते संभलकर फेंक रही है. उसने अगड़ों पर ज्यादा दांव खेला. अति पिछड़ों पर जेडीयू को तैनात किया और दलितों पर एलजेपी को. उधर आरजेडी मुकेश सहनी की पार्टी के जरिए निषादों पर, मांझी के चलते महादलितों पर और उपेंद्र के चलते कुशवाहा वोटरों पर दावा ठोंक रही है. आखिरी में आप पब्लिक हैं. किसे ठोंकेंगे और किसे राज तिलक करने को रोंकेगे, हम जानने आएंगे, आपके बीच, दी लल्लनटॉप चुनाव यात्रा के दौरान.
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