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अंदर का खुलासा: नरेंद्र मोदी के लिए काम कर रहे हैं प्रशांत किशोर

कांग्रेस के लिए ये यूपी की कुर्सी की लड़ाई नहीं है. ये 'कांग्रेस मुक्त भारत' का प्रतिवाद है.

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विशाल
3 नवंबर 2016 (Updated: 3 नवंबर 2016, 01:33 PM IST)
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कई बार दुश्मन को कमजोर करने के लिए अपने दोस्त को दुश्मन का दोस्त बनाना पड़ता है. नरेंद्र मोदी भी यही कर रहे हैं. प्रशांत किशोर ने 2014 में उनके लोकसभा चुनाव अभियान में खूब मदद की. फिर खबर आई कि अमित शाह के चलते वो मोदी कैंप से टूट गए. फिर वो नीतीश कुमार की तरफ चले गए. मोदी का विजय रथ बिहार में रुक गया. अब पीके यूपी में मोदी विरोधी गठबंधन के लिए तैयारी कर रहे हैं. कांग्रेस की तरफ से सपावालों से पींगें बढ़ा रहे हैं. मगर असल में पीके क्या कर रहे हैं. मोदी के गेम प्लान पर काम. मोदी चाहते हैं कांग्रेस मुक्त भारत. उसके लिए जरूरी है कि सबसे ज्यादा सांसद भेजने वाले दो राज्यों बिहार और यूपी में कांग्रेस खत्म हो जाए. बिहार में कांग्रेस सत्ता में कभी अपने दम नहीं आ सकती थी. पहले मुख्य विपक्ष से गायब हुई, फिर तीसरे, चौथे और पांचवे नंबर पर पहुंची. 2010 के चुनाव में राहुल गांधी बांह समेटे बिहार में घूमे. बोले, 'सब सीटों पर चुनाव लड़ेंगे, किसी से गठजोड़ नहीं करेंगे.' कांग्रेस औंधे मुंह गिरी और 2015 में उसे झक मारकर एक नए गठजोड़ की तीसरी पार्टी बनना पड़ा. rahul-nitish यूपी में कांग्रेस की भद्दी पिटनी 1989 में ही शुरू हो गई थी. एनडी तिवारी सीएम थे. चुनाव हुए तो कांग्रेस विधायकों की संख्या 100 से नीचे पहुंच गई. 1991 में आंकड़ा फिर आधा रह गया. 1993 में ये तीन दर्जन पर अटका और उसके बाद कांग्रेस आलाकमान ने एक ऐसा फैसला लिया, जो उसे अब तक सालता है. 1996 में लोकसभा के चुनावों में यूपी में कांग्रेस और बसपा बुरी तरह हारे. तब नरसिम्हा राव ने बीजेपी को रोकने के लिए बीएसपी के साथ गठजोड़ कर लिया. जून 1996 में इसका ऐलान हो गया. समझौते के मुताबिक 425 में से कांग्रेस 125 सीटों पर चुनाव लड़ेगी. बाकी पर बीएसपी. दोनों ने मिलकर 100 सीटें जीतीं. 67 बीएसपी को मिलीं और 33 कांग्रेस को. विधायकों की दृष्टि से कांग्रेस नुकसान में नहीं रही, मगर हर जिले-तहसील में मौजूद उसके संगठन को तगड़ा झटका लगा. हर जिले में नेता, संभावित प्रत्याशी उस इकलौती सीट की तलाश करने लगे, जहां हाथी या आगे चलकर कोई और साझेदार दावा न करे. महज 7 साल पहले कांग्रेस पूरे सूबे में शासन कर रही थी और अब वो 12 साल पुरानी एक पार्टी की जूनियर पार्टनर थी. narsimha-rao कांग्रेस ने नरसिम्हा राव के इस कदम के लिए उन्हें कभी माफ नहीं किया. प्रणव मुखर्जी ने जब कांग्रेस का इतिहास लिखा, तो इस प्रयोग की असफलता का जिक्र किया. खुद नरसिम्हा राव के ठीक बाद पार्टी अध्यक्ष बने सीताराम केसरी ने भी बीएसपी के साथ दोस्ती को अहमियत नहीं दी और कांशीराम ने भी चुनाव के चंद महीनों बाद ही कांग्रेस को झटका देते हुए बीएसपी संग सरकार बना ली. अब कांग्रेस फिर वही गलती करने जा रही है. अभी कल तक वो सीएम फेस अनाउंस कर रही थी. जब शीला दीक्षित वाला दांव नहीं चला, तो खुद राहुल गांधी खाट सभा के लिए निकल पड़े. लेकिन अब अंदर खाने अखिलेश यादव के साथ सहयोग और समझौते की बातें चल रही हैं. कांग्रेस के प्रदेश स्तरीय नेताओं की प्रतिक्रिया 1996 जैसी ही है. राज बब्बर ने फिर कहा कि प्रशांत किशोर इस भूमिका में नहीं हैं कि राजनीतिक गठजोड़ की बात कर सकें. मगर राज बब्बर की आवाज नक्कारखाने में तूती भर की रह गई है. prashant-kishor

राजधानी दिल्ली के एक कमरे में मंगलवार को तीन लोग बैठे थे. मुलायम सिंह यादव, अमर सिंह और कांग्रेस के रणनीतिकार प्रशांत किशोर. तब से उत्तर प्रदेश में गठबंधन की सुगबुगाहट है. बिहार चुनाव में महागठबंधन की कामयाबी अभी पुरानी नहीं हुई है. क्या यूपी में भी महागठबंधन बनेगा. गुरुवार को अखिलेश ने कहा, 'नेताजी तय करेंगे.'

फिलवक्त के समीकरण किसी पुख्ता अंजाम की ओर इशारा नहीं करते. इसलिए कांग्रेस को छोड़कर तीनों बड़ी पार्टियां खुद को नंबर-एक की रेस में मान रही हैं. कांग्रेस इकलौती पार्टी है जो इस वक्त जीतने से ज्यादा हराने के लिए खेल रही है. उसकी रणनीति से लगता है कि वो 'सी पार्टी' के तौर पर अपनी स्थिति स्वीकार कर चुकी है. अब दो ही रास्ते शेष हैं. अकेले लड़कर वीरगति को प्राप्त हो जाएं या किसी मजबूत पार्टी का पिछलग्गू बनकर बीजेपी को हराया जाए. कांग्रेस का बीजेपी से वैचारिक और भावनात्मक विरोध है, इसलिए उसने 'दूसरी' लीक पकड़ी है. कांग्रेस के लिए ये यूपी की कुर्सी की लड़ाई नहीं है. ये 'कांग्रेस मुक्त भारत' का प्रतिवाद है.

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देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के सामने इस समय दो लक्ष्य हैं. बीजेपी को हराना और खुद को जड़ता से बाहर निकालना. लेकिन 2014 के बाद से आत्ममंथन, रणनीति और नया हौसला हासिल करने के स्तर पर उसका कोई कदम कारगर नहीं रहा. इसलिए पार्टी लोकसभा चुनावों के बाद जहां खड़ी थी, आज भी वहीं नजर आती है.

कांग्रेस भारतीय लोकतंत्र के अभिन्न हिस्से की तरह मौजूद रही है. लेकिन इतिहास ये भी बताता है कि वो कभी 'फाइटर' पार्टी नहीं रही. जिन प्रदेशों में उसने जनाधार खोया है, उसे वापस पाना उसके लिए कभी आसान नहीं रहा. उत्तर प्रदेश में तो दशकों से उसकी हालत लचर है. इसलिए किसी भी संभावित महागठबंधन में उसे 'बड़े भाई' जैसी हैसियत और सम्मान नहीं मिलेगा. बिहार का उदाहरण हम देख चुके हैं. पार्टियां अपनी जीती गई सीटों से बड़ी होती हैं.

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लेकिन कांग्रेस यहां महागठबंधन को एग्जीक्यूट करने के लिए एक सूत्र जरूर बन सकती. एक पुल.  इसकी बड़ी वजह है, आंशिक वैचारिक साम्य. या यूं कह लीजिए कि धर्मनिरपेक्षता के नाम का एका. इसीलिए जब नीतीश कुमार से यूपी में महागठबंधन के बारे में पूछा गया तो वो बोले कि कांग्रेस बड़ी पार्टी है, उसे ही पहल करनी चाहिए.

अखिलेश और राहुल पिछले कई दिनों से एक-दूसरे की विनोदपूर्ण प्रशंसा कर रहे हैं. अभी अनुमान ही लगाया जा सकता है पर संभावना यही है कि प्रशांत किशोर अपना प्रस्ताव लेकर 'नेताजी' से मिले होंगे. मुख्य फैसला सपा को ही करना है. उसके बाद जेडीयू और आरएलडी जैसी छोटी पार्टियां साथ लाई जा सकती हैं.

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कांग्रेस के लिए ये महागठबंधन हर सूरत में संजीवनी होगा. उसे दो प्रकट लाभ हैं. एक, बीजेपी के हारने की संभावना बढ़ेगी. दो, खुद की खराब आंशिक तौर पर बेहतर होगी. बल्कि वह महागठबंधन की संभावित अच्छी परफॉर्मेंस से दब जाएगी. फिल्म 'भूलभुलैया' में परेश रावल जब डरे होते हैं तो नाहक ही नहीं कहते, 'सब लोग झुंड बनाकर चलो. मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं कि मैं डरा हुआ हूं.'

सपा का बिहार में महागठबंधन का तजुर्बा बुरा रहा था. वो गठबंधन में शामिल हुई और फिर रामगोपाल यादव की सलाह पर अलग हो गई. अभी चुनाव में वक्त है और इस बार ये फैसला सपा के लिए सिर्फ दो लोग लेंगे. मुलायम और मुलायम पुत्र.

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कांग्रेस के डेस्पेरेशन को आप उसके दोबारा उभर आए 'ब्राह्मण प्रेम' से भी समझ सकते हैं. जहां बसपा नहीं है, वहां कांग्रेस दलितों के खासे वोट लेती है. लेकिन यूपी में उसने शीला दीक्षित को लगभग रिटायरमेंट से वापस बुलाकर मुख्यमंत्री कैंडिडेट बना दिया है. कांग्रेस ब्राह्मण वोटों में सेंध लगाने की फिराक में है, जो उत्तर प्रदेश में बीजेपी का प्रतिबद्ध वोटर है. जबकि नए सियासी हालात में बीजेपी को छोड़ कोई पार्टी ब्राह्मण मुख्यमंत्री कैंडिडेट उतारने का जोखिम नहीं ले सकती. यह सरेंडर जैसा है. बल्कि नंबर-एक की रेस में शामिल किसी पार्टी के लिए आत्मघाती भी हो सकता है.

उत्तर प्रदेश में दलित, मुस्लिम और ओबीसी वोट सबसे अहम हैं. ब्राह्मण इस पाले और उस पाले में होता रहा है और सरकार बनवाने में अपना योगदान जरूर देता है. कांग्रेस ने ब्राह्मण कैंडिडेट पर दांव लगाया है तो उसकी प्राथमिकता में बीजेपी को घायल करना सबसे ऊपर है.

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2014 लोकसभा चुनावों के बाद 2017 का यूपी विधानसभा चुनाव दूसरा बड़ा युद्ध है. ये वो प्रदेश है जहां सबसे ज्यादा लोकसभा सीटें हैं और दलितों-मुस्लिमों की ठीक-ठाक आबादी है. बिहार में मात खाने वाली बीजेपी के लिए यह बड़ा इम्तेहान होगा. उधर अगर महागठबंधन बना और जीता तो मुलायम बीजेपी विरोधी अलायंस का चेहरा बन जाएंगे.

महागठबंधन हुआ तो बीजेपी क्या करेगी? एक थ्योरी ये है कि महागठबंधन के मजबूत होने से असल नुकसान मायावती की बसपा को होगा. क्योंकि इस बार मुस्लिम वोटों पर उसने जोर-शोर से दावा ठोंका है और किसी भी तरह का महागठबंधन उसी के वोट काटेगा. ऐसी स्थिति में बहुत संभावना है कि बीजेपी गैर-यादव ओबीसी और दलितों को 'हिंदू' होने का भान करा के लुभाएगी. 2 साल पहले वो इसकी कामयाब मिसाल दे चुकी है. सर्जिकल स्ट्राइक के बाद से माहौल गरम है.
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