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मायावती ने अपने भरोसेमंद मुस्लिम नेता, उनके बेटे को पार्टी से बाहर कर दिया

चुनाव से पहले थे प्रचार के लिए ये बड़े चेहरे

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10 मई 2017 (अपडेटेड: 10 मई 2017, 04:34 AM IST)
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फोटो - thelallantop

बहुजन समाज पार्टी ने अपने सीनियर नेता नसीमुद्दीन सिद्दिकी और उनके बेटे अफजल सिद्दिकी को पार्टी से बाहर कर दिया है. एक समय पार्टी के सबसे विश्वसनीय नेताओं में शुमार सिद्दिकी को लोगों से काम के बदले पैसा लेने के आरोप में निष्काषित किया है. पार्टी के जनरल सेक्रेटरी और राज्य सभा सांसद सतीश चंद्र मिश्रा के हवाले से यह खबर आई है. मिश्रा ने यह भी कहा है कि पार्टी में किसी भी तरह की अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं की जाएगी.

पिछले महीने पार्टी में बड़े फेरबदल करते हुए मायावती ने सिद्दीकी को यूपी प्रभारी के पद से हटा दिया था. उसके बाद से इस बड़े मुस्लिम चेहरे को मध्य प्रदेश का इंचार्ज बनाया गया था. पार्टी को हाल ही में हुए चुनावों में बड़ी हार मिली है. 403 सीटों वाली यूपी विधानसभा में मायावती की इस पार्टी को सिर्फ 19 सीटें मिलीं थी. वहीं 2014 के लोक सभा चुनाव में 80 में से एक भी सीट नहीं मिली थी.

'मुस्लिम बहुल इलाक़ों में मुसलमानों और दलितों के वोट मिलने से ही बीएसपी के उम्मीदवार चुनाव जीत जाएंगे. मुसलमान उन सीटों पर अपना वोट सपा और कांग्रेस को देकर मुस्लिम समाज के वोट न बांटें. ऐसा करने से पिछले लोकसभा चुनाव की तरह बीजेपी को ही फ़ायदा होगा.'

28 साल के अफजल सिद्दीकी बैठक में जाते और कहते थे, 'समाजवादियों का असली चेहरा सामने आ गया है. उनके पास मत जाओ. ना भूले हैं, ना भूलने देंगे. आप लोगों को लव जिहाद और गोहत्‍या के नाम पर पीटा गया. अब एक होने का वक्त है. यह आपकी मौजूदगी की लड़ाई है.'

तस्वीर पुरानी है. Source facebook

ये अफज़ल का ही दिमाग था, जो पिछले दिनों बसपा नेताओं ने चुनावी बैठकों में कुरान के हवाले दिए. हदीसों को बयान किया. ताकि मुसलमानों के दिमाग सोचना बंद कर दें और चुनाव में ठप्पा बसपा पर लगाएं. धर्म का इतने सही ढंग से इस्तेमाल चुनाव के लिए शायद ही किसी ने किया हो. अफज़ल रैली या बैठकों के लिए ऐसी जगह चुनते हैं जो मुसलमानों के लिए बेहद अहम हो.

चुनावों से पहले 28 साल के अफजल सिद्दीकी को पार्टी ने काफी प्रमोट किया था. बसपा ने  अपने चुनावी कैंपेन को धर्म की धार लगाई थी. और मायावती ने इसकी जिम्मेदारी सौंपी थी अपने नंबर-2 नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी के बेटे अफज़ल सिद्दीकी को. और इलाका दिया गया था वेस्ट यूपी का. यानी आगरा, अलीगढ़, मेरठ, सहारनपुर, मुरादाबाद और बरेली. इन 6 जोन में अफज़ल ने मुसलमानों को 'मोबिलाइज़' करने की कोशिश भी की थी. इस सबक की शुरुआत खुद मायावती ने की थी. तारीख़ थी 9 अक्टूबर. जगह थी लखनऊ. रैली में उन्होंने कहा था, मुसलमानों को जोड़ने के लिए  बसपा सबसे ज्यादा आक्रामक और बेचैन दिखी थी. वेस्ट यूपी के जिन 6 ज़ोन की जिम्मेदारी अफज़ल सिद्दीकी को सौंपी गई थी, वहां 140 विधानसभा सीटें हैं. ये मुस्लिम बहुल इलाके हैं. यहां कुछ सीटों पर मुस्लिम वोट 70 फीसदी तक है. और इस बार के चुनावों में बसपा ने 125 मुसलमानों को उम्‍मीदवार बनाया था. इन 125 में से आधे तो इन 6 जोन से चुनाव लड़े. बिजनौर जिले की आठ में छह सीटों पर बसपा ने मुसलमानों को खड़ा किया था. जबकि बाकी की दो सीटें आरक्षित थीं. बिजनौर की 4 सीटों पर मुस्लिमों का होना इस बात को भी जाहिर कर रहा था कि वो दंगों का खौफ दिखाकर मुसलमानों को अपने दामन में समेट लेने की कोशिश में थे. अफजल राजनीति में चार साल पहले ही एक्टिव हुए थे. 2012 विधानसभा चुनावों में मायावती की रैलियों की जिम्‍मेदारी उनके ही पास थी. इस चुनाव में भले ही बसपा हारी हो, लेकिन अफजल सिद्दीकी के काम करने की काबिलियत ने मायावती का दिल जीत लिया. अफजल की स्‍कूली पढ़ाई देहरादून के बोर्डिंग स्‍कूल में हुई. इसके बाद नोएडा से लॉ की पढ़ाई की. और फिर मीट सप्लायर बन गए. उन्‍हें सेना से भी सप्‍लाई कॉन्‍ट्रैक्‍ट मिला. उनके यूपी और हरियाणा में स्लाटर हाउस हैं. अफजल अपने भरोसे के 20 लोग साथ रखते हैं. ये सब मिलकर बसपा के लिए सोशल मीडिया पर भी काम करते हैं. अफजल ने 2014 में फतेहपुर सीट से लोकसभा चुनाव लड़ा. लेकिन हार गए. चुनाव प्रचार से पहले 'इंडियन एक्सप्रेस' की एक रिपोर्ट के मुताबिक अफजल के रणनीतिकारों का मानना है कि मुसलमानों ने पहले भी मायावती को वोट किया है लेकिन एक बड़ा हिस्‍सा सपा को गया है. बसपा को यह बात पता है कि यूपी के कुल मतों के 40 प्रतिशत मुसलमान और दलित हैं और अगर ये साथ आ जाएं, तो खेल बदला जा सकता है. इसीलिए मुस्लिमों पर फोकस किया जा रहा है. अमरोहा जिले में अफजल की रैली होने वाली थी. उसके लिए उन्होंने जगह चुनी थी ईदगाह. लेकिन वहां ये रैली नहीं हो पायी. ये कहकर प्रशासन ने मना कर दिया कि ईदगाह की जमीन किसी राजनीतिक काम के लिए नहीं दी जा सकती. रैली के लिए ईदगाह की जगह का चुनाव करके जो मैसेज उन्हें मुसलमानों को देना था, वो दे दिया. भले ही दूसरी जगह रैली करनी पड़ी. https://www.youtube.com/watch?v=xPugbbPSKlc

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