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असम में 34% मुसलमान, बीजेपी ने एक को भी टिकट नहीं दिया, बाकी पार्टियों का हाल भी जानें

असम में 34 फीसदी आबादी मुसलमानों की है. ऐसे राज्य की सत्ता संभालने वाली भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने चुनाव में एक भी मुस्लिम को टिकट नहीं दिया है.

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3 अप्रैल 2026 (अपडेटेड: 3 अप्रैल 2026, 09:26 PM IST)
Assam Election 2026
असम में बीजेपी ने एक भी मुस्लिम कैंडिडेट नहीं उतारा है. (फोटो- India Today)
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Assam Election 2026: असम में बीजेपी ने एक भी मुस्लिम कैंडिडेट को टिकट नहीं दिया है. यहां 9 अप्रैल को होने वाले चुनाव में पार्टी ने 90 कैंडिडेट्स उतारे हैं. इनमें से एक भी मुस्लिम नहीं है. ये हैरानी की बात इसलिए भी है क्योंकि असम की आबादी में 34 फीसदी मुसलमान रहते हैं. 

पार्टी ने मुस्लिम उम्मीदवारों का सारा बोझ गठबंधन की अन्य पार्टियों पर लाद दिया है. जिस NEDA-नॉर्थ-ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस के साथ बीजेपी मैदान में उतरी है, उसके पास कुल 13 उम्मीदवार ऐसे हैं, जो मुस्लिम हैं. इनमें भी 12 अकेले असम गण परिषद (AGP) से हैं. NEDA में AGP के अलावा सिर्फ एक मुस्लिम उम्मीदवार बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट का है.

इंडिया टुडे ने असम चुनाव में उतरने वाले सभी उम्मीदवारों का विश्लेषण किया है. इस एनालिसिस में उनके नाम के आधार पर धर्म की पहचान की गई है क्योंकि चुनाव आयोग उम्मीदवारों का धार्मिक डेटा नहीं जुटाता है. इस विश्लेषण से पता चला कि असम की 126 सीटों पर 9 अप्रैल को चुनाव में 722 उम्मीदवार खड़े हो रहे हैं. इनमें 188 यानी 26 प्रतिशत ही मुस्लिम उम्मीदवार हैं जबकि राज्य की तकरीबन 34 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है. हैरान होने वाली बात सिर्फ यही नहीं है. इन उम्मीदवारों का पूरे प्रदेश में वितरण देखेंगे तो और चौकेंगे. 

मतलब, ऐसा नहीं है कि प्रदेश के हर हिस्से में मुस्लिम उम्मीदवार उतारे गए हैं. असम में 66 फीसदी यानी 83 सीटें ऐसी हैं जहां एक भी मुस्लिम कैंडिडेट नहीं है. वहीं, 4 सीटें गौरीपुर, जलेश्वर, चमरिया और चेंगा ऐसी हैं, जहां के सारे उम्मीदवार ही मुस्लिम हैं. ये चारों सीटें लोअर असम के धुबरी और बरपेटा में हैं. इसके अलावा, पाकाबेटबाड़ी और अल्गापुर-कटलीचेड़ा में भी 80 और 94 प्रतिशत उम्मीदवार मुस्लिम हैं. जिन 83 सीटों पर एक भी उम्मीदवार मुस्लिम नहीं हैं, वो अपर असम के जनजातीय, चाय बागान इलाकों और बोडोलैंड टेरिटोरियल रीजन में हैं. ये तिनसुकिया और डिब्रूगढ़ से लेकर कोकराझार और तमुलपुर तक फैले हैं.

Assam
असम की 83 सीटों पर कोई मुस्लिम उम्मीदवार नहीं है. (फोटो- India Today)

मुस्लिमों को टिकट न देने के मामले में बीजेपी सबसे ‘फिसड्डी’ है. पार्टी प्रदेश की सत्ता पर काबिज है, लेकिन मुस्लिमों को उम्मीदवार बनाने से साफ परहेज किया है. 90 उम्मीदवारों में से एक भी मुस्लिम को टिकट न देना सामान्य नहीं है. वो भी उस राज्य में जहां एक तिहाई आबादी मुसलमानों की है. पार्टी जिस गठबंधन (NEDA) की अगुआ है, उसमें अगर असम गण परिषद को हटा दें तो मुस्लिम कैंडिडेट्स का हिस्सा एक फीसदी से भी कम है. इस हालत में 101 उम्मीदवारों में से गठबंधन के पास सिर्फ एक मुसलमान कैंडिडेट बचता है. वो भी बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट का.

बाकी पार्टियों का हाल क्या है?

बीजेपी की पॉलिटिकल स्ट्रैटेजी जगजाहिर है. उनके मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के कई सार्वजनिक बयान ऐसे हैं, जो मुस्लिमों को लेकर उनकी मंशा पर सवाल खड़ा करते हैं. ‘मियां मुस्लिमों को परेशान करो, ताकि वो असम छोड़कर चले जाएं’, ये बयान किसी और का नहीं, हिमंता बिस्वा सरमा का है. वह 34 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले राज्य के सीएम हैं. ऐसे में अगर उनकी पार्टी एक भी मुस्लिम को टिकट नहीं देती तो हो सकता है कि लोग कम हैरान हों. लेकिन प्रदेश की अन्य पार्टियों की इस पर क्या नीति है? मुस्लिमों को टिकट देने के मामले में वो कहां हैं?

टिकट बंटवारे के लिहाज से इसके एनालिसिस से पता लगता है कि यहां भी मुस्लिम उम्मीदवारों पर दांव लगाने का उत्साह कम है. इंडिया टुडे के नामों के आधार पर किए गए विश्लेषण के मुताबिक, कांग्रेस के नेतृत्व वाले असम महाजोत (ASM) के उम्मीदवारों की संख्या 128 है. लेकिन मुस्लिम प्रतिनिधित्व में बड़ा अंतर है. महाजोत के पास 22 मुस्लिम उम्मीदवार हैं. यानी इस गठबंधन ने 17 फीसदी टिकट मुस्लिमों को दिया है. इनमें कांग्रेस का हिस्सा सिर्फ 18 फीसदी है. सबसे ज्यादा मुस्लिम उम्मीदवार ‘ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट’ (AIUDF) ने उतारे हैं, जो असम में अकेले चुनाव लड़ रही है. उसके 87 फीसदी से ज्यादा उम्मीदवार मुस्लिम हैं.

ऐसा भी नहीं है कि मुसलमान चुनावों में हिस्सा ही नहीं लेना चाहते. बस उन्हें पार्टियों में जगह नहीं मिल रही है. उन्हें टिकट नहीं मिल रहा है. इसकी तस्दीक आंकड़े भी करते हैं. अब देखिए कि असम में 126 सीटों पर 257 निर्दलीय उम्मीदवार खड़े हैं. इनमें से 88 यानी 34 फीसदी मुस्लिम हैं. इससे यही संकेत मिलता है कि कई मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव तो लड़ना चाहते हैं, लेकिन बड़ी पार्टियों ने उन्हें दरकिनार कर दिया. इसलिए वो अकेले दम पर खुद चुनाव लड़ रहे हैं.

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