क्या अशोक गहलोत ने मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए अपनी गोटी सेट कर ली है
लेकिन सचिन पायलट का एक दाव अशोक गहलोत को चित्त कर सकता है.

राजस्थान में जैसे-तैसे करके कांग्रेस को बहुमत मिल ही गया. कांग्रेस के अंदरखाने यह बहस तेज है कि सीटों की गिनती 99 पर ही क्यों रुक गई. इस बीच एक आदमी है जिसे यह आंकड़ा सुकून दे रहा है. नाम अशोक गहलोत. दो बार के मुख्यमंत्री और कांग्रेस के सबसे ताकतवर महासचिव अशोक गहलोत. 99 के फेर में फंसी कांग्रेस गहलोत के मुख्यमंत्री पद पर दावे को मजबूत कर रही है.
2008 के चुनाव में कांग्रेस को कमजोर जनादेश मिला था. उस चुनाव में कांग्रेस के खाते में आई थीं 96 सीटें. बहुमत के लिए जरूरी थीं 101 सीटें. अशोक गहलोत ने पहले BSP के साथ गठबंधन किया. बाद में BSP के सभी छह विधायकों ने कांग्रेस की सदस्यता ले ली थी. अशोक गहलोत को जोड़-तोड़ के इसी हुनर की वजह से राजस्थान की राजनीति का जादूगर भी कहा जाता है.
इस बार भी अशोक गहलोत ने चुनाव से पहले ही मुख्यमंत्री पद के लिए अपनी गोटी बैठाना शुरू कर दिया था. सचिन पायलट सूबे में कांग्रेस के अध्यक्ष थे. इस लिहाज से उम्मीदवार चुनने का पहला अख्तियार उनका था. उनकी पसंद पर अंतिम फैसला स्क्रीनिंग कमिटी को लेना था. कायदे से स्क्रीनिंग कमिटी में चुनावी राज्य का कोई सदस्य नहीं होना चाहिए. अशोक गहलोत ने AICC के महासचिव होने का फायदा उठाया और स्क्रीनिंग कमिटी में घुस गए. आखिरी टिकट बंटवारे में अशोक गहलोत के खेमे के पास गई 88 टिकट और सचिन पायलट को मिली 65 सीट.

2018 का राजस्थान विधानसभा चुनाव जीतने के बाद विधायक दल की पहली बैठक में सचिन पायलट और अशोक गहलोत.
यह पहला मोर्चा था जहां उन्होंने सचिन पायलट की मजबूत घेरेबंदी कर दी. लेकिन गहलोत बचकर निकलने का कोई रास्ता पायलट के लिए छोड़ना नहीं चाहते थे. कई सीटों पर सचिन पायलट की जिद के चलते अशोक गहलोत के खेमे के आदमियों के टिकट काटे गए. ऐसी कुल 12 सीटें थीं जहां गहलोत के खेमे के आदमी निर्दलीय मैदान में थे. इनमें से 8 उम्मीदवार चुनाव जीतने में कामयाब रहे.
11 दिसंबर को राजस्थान विधानसभा चुनाव के नतीजे आए. 13 तारीख को नए मुख्यमंत्री को शपथ लेनी हैं. बीच में पड़ती है 12 तारीख. आलाकमान ने 11 की रात को ही केरल के आलेपुड़ा (Alappuzha) से कांग्रेस के सांसद के.सी. वेणुगोपाल को जयपुर भेज दिया था. 12 तारीख की सुबह 1 बजे कांग्रेस के नए चुने गए विधायक दल की बैठक बुलाई गई. इसमें रस्मी तौर पर एक लाइन का प्रस्ताव पारित कर दिया. प्रस्ताव कि सभी विधायक नया मुख्यमंत्री चुनने का अधिकार कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष को देते हैं. लेकिन खेल इससे पहले ही शुरू हो चुका था.

कांग्रेस के केन्द्रीय पर्यवेक्षक के. सी. वेणुगोपाल, सचिन पायलट और अशोक गहलोत (बाएं से दाएं).
अशोक गहलोत ने अपने पक्ष के निर्दलीय विधायकों को केन्द्रीय पर्यवेक्षक के पास भेज दिया. ये विधायक थे.
1. महादेव खंडेला - खंडेला (सीकर) 2. रामकेश मीणा - गंगापुर सिटी 3. कांति मीणा - थानागाजी 4. लक्ष्मण मीणा - बस्सी 5. बाबूलाल नागर - दुदू 6. अलोक बेनीवाल - शाहपुर 7. राजेंद्र गुढ़ा - उदयपुरवाटी (बसपा)
अशोक गहलोत अपने पक्ष में दो तर्क दे रहे हैं. पहला कि बहुमत और अल्पमत की बारीक रेखा पर खड़ी कांग्रेस को वो बेहतर संभाल सकते हैं. दूसरा कि कांग्रेस विधायकदल के भीतर और बाहर उनके पास मजबूत समर्थन हासिल है. तीसरा गुर्जर समुदाय से आने वाले पायलट को अगर मुख्यमंत्री बनाया जाता है तो मीणा समाज कांग्रेस से नाराज हो सकता है. तीन निर्दलीय विधायकों को केन्द्रीय पर्यवेक्षक के पास भेजने के पीछे भी यही समीकरण काम कर रहा था.
सचिन पायलट के पक्ष में एक तर्क ही काम कर रहा है. यह वो तर्क है जिसने दशकों तक कांग्रेस में नेताओं का करियर बनाया और बिगाड़ा है. तर्क गांधी परिवार से करीबी का. सचिन पायलट राहुल गांधी के अच्छे दोस्त है. हालांकि गहलोत भी गांधी परिवार के करीबी हैं लेकिन उनके और राहुल के बीच एक पीढ़ी का फर्क है. इसके उलट राहुल गांधी और सचिन पायलट के बीच मालिक और मातहत जैसा संबंध नहीं है. दोनों में अच्छी दोस्ती है. दोनों बचपन के साथी रहे हैं. 2004 में एक साथ संसद पहुंचे. सचिन की राहुल के साथ ये नजदीकी अशोक गहलोत की सारे तिकड़मों पर भारी पड़ सकती है.
Watch Video: राजस्थान इलेक्शन में अशोक गहलोत की सरदारपुरा सीट का रिजल्ट क्या रहा?

