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यूपी चुनाव से पहले सबके 'फेवरेट' बने गुर्जर, अखिलेश की रैली के बाद क्या करेगी बीजेपी?

दादरी में हुई अखिलेश यादव की रैली ने बीजेपी की टेंशन बढ़ा दी है. अखिलेश यादव ने सम्राट मिहिर भोज के जरिए भावनात्मक रूप से गुर्जर समुदाय को अपने साथ जोड़ने की कोशिश की है. उनके इस कदम के बाद बीजेपी गुर्जर समुदाय को साधने के लिए नई रणनीति पर काम कर रही है.

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1 अप्रैल 2026 (अपडेटेड: 1 अप्रैल 2026, 06:55 PM IST)
akhilesh yadav gurjar mihir bhoj bjp yogi adityanath
दादरी में हुई सपा की रैली ने बीजेपी की परेशानी बढ़ा दी है. (इंडिया टुडे, फाइल फोटो)
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22 सितंबर 2021. उत्तर प्रदेश के दादरी का बालिका इंटर कॉलेज. सम्राट मिहिर भोज की प्रतिमा का अनावरण होना था. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित थे. अनावरण के दौरान मुख्यमंत्री के सामने ही विवाद शुरू हो गया. दरअसल शिलापट्ट पर लिखे 'गुर्जर प्रतिहार सम्राट मिहिर भोज' में से 'गुर्जर' शब्द पर किसी ने कालिख पोत दी. इसको लेकर राजपूत और गुर्जर समुदाय आमने-सामने आ गए.

कट टू 2026. 29 मार्च को दादरी में अखिलेश यादव की 'समाजवादी समानता भाईचारा रैली'. जगह मिहिर भोज डिग्री कॉलेज. मंच से अखिलेश यादव का ऐलान. लखनऊ में गोमती किनारे सम्राट मिहिर भोज की मूर्ति लगाएंगे. राजनीति में प्रतीकों का बड़ा महत्व होता है. अखिलेश यादव ने इस ऐलान के जरिए गुर्जरों को पीडीए के फोल्ड में जोड़ने की अपनी मंशा साफ कर दी है.

अखिलेश यादव का ये ऐलान बीजेपी की मुश्किल बढ़ाने वाला है. गुर्जर मिहिर भोज की विरासत पर अपना दावा करते हैं. वही राजपूत उनको क्षत्रिय बताकर इसका विरोध करते हैं. ऐसे में बीजेपी के लिए कोई स्पष्ट लाइन लेना आसान नहीं होगा. वहीं दूसरी तरफ अखिलेश यादव ने गुर्जरों के दावों पर लगभग अपनी सहमति दे दी है.

इस रैली के जरिए अखिलेश यादव ने संकेत दिया है कि उनकी राजनीति अब केवल पारंपरिक यादव-मुस्लिम समीकरण तक सीमित नहीं रहने वाली. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यादव वोट तुलनात्मक रूप से कम हैं. जाट वोटों के सबसे बड़े दावेदार जयंत चौधरी बीजेपी के साथ हैं. ऐसे में सपा को नए सामाजिक आधार की जरूरत है. इसलिए पार्टी गुर्जरों पर फोकस कर रही है.

समाजवादी पार्टी की बदली हुई रणनीति ने बीजेपी खेमे की चिंता बढ़ा दी है. सूत्रों की मानें तो पार्टी का थिंक टैंक स्थानीय निकायों में गुर्जर प्रतिनिधित्व बढ़ाने की तैयारी में हैं. खासकर जिला पंचायत चुनाव में जोकि इस साल के अंत में होने हैं.

टाइम्स ऑफ इंडिया कि रिपोर्ट के मुताबिक, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गुर्जर आबादी 7 से 10 फीसदी के बीच मानी जाती है. गौतम बुद्ध नगर, गाजियाबाद, मेरठ, सहारनपुर, बागपत, शामली और बिजनौर जैसे जिलों की तीन दर्जन से अधिक सीटों पर गुर्जर वोट निर्णायक साबित होते हैं. बीजेपी के पश्चिमी उत्तर प्रदेश अध्यक्ष सत्येंद्र सिसोदिया ने दावा किया, 

गुर्जर समुदाय मजबूती से बीजेपी से जुड़ा था, है और रहेगा. विपक्ष उनको गुमराह करने की कोशिश कर रहा है. हम ऐसा नहीं होने देंगे.

पिछले कुछ चुनावों में गुर्जर समुदाय का बड़ा हिस्सा बीजेपी के साथ जाता रहा है. पार्टी ने उनको अलग-अलग सदनों में प्रतिनिधित्व भी दिया है. लोकसभा में अमरोहा सीट से सांसद कुंवर सिंह तंवर हैं. वहीं राज्यसभा में पार्टी ने गुर्जर समुदाय से सुरेंद्र सिंह नागर को मौका दिया है. उत्तर प्रदेश में गुर्जर समुदाय के 9 विधायक हैं. इनमें पांच बीजेपी से हैं. नंद किशोर गुर्जर (लोनी), तेजपाल नागर (दादरी), किरत सिंह गुर्जर (गंगोह), सोमेंद्र तोमर (मेरठ दक्षिण) और मुकेश चौधरी (नकुड़). इनमें सोमेंद्र तोमर को योगी मंत्रिमंडल में जगह मिली है.

इसके अलावा विरेंद्र सिंह पार्टी से विधान परिषद सदस्य हैं. बीजेपी की सहयोगी राष्ट्रीय लोक दल में भी गुर्जरों की ठीक-ठाक हिस्सेदारी है. लोकसभा में पार्टी सांसद चंदन चौहान इसी समुदाय से हैं. वहीं पार्टी के दो विधायक मदन सिंह कसाना उर्फ मदन भैया और प्रदीप चौधरी इसी समुदाय से हैं. इन दोनों ने रालोद के सपा गठबंधन में रहते जीत दर्ज की थी.

हालांकि गुर्जर समुदाय के नेता आबादी के अनुपात में अपने समुदाय को कम प्रतिनिधित्व मिलने का आरोप लगा रहे हैं. उनका दावा है कि बराबर आबादी होने के बावजूद जाट समुदाय को तुलनात्मक रूप से सरकार में ज्यादा हिस्सेदारी मिलती है. राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो सत्ता में पर्याप्त भागीदारी नहीं मिलने को लेकर गुर्जर समुदाय बीजेपी से नाराज हैं. वहीं सपा उनको सम्मान और हिस्सेदारी का भरोसा देकर अपने पाले में करने की तैयारी में है.

बीजेपी सपा के इस दांव की काट निकालने की तैयारी में है. पार्टी गुर्जर समुदाय को साधने के लिए बड़े कदम उठा सकती है. सूत्रों के मुताबिक, पार्टी पश्चिमी यूपी से किसी बड़े गुर्जर चेहरे को योगी मंत्रिमंडल में जगह दे सकती है या संगठन में अहम भूमिका सौंप सकती है.

राज्य में गैर-यादव ओबीसी के बीच पार्टी की मजबूती ही उनकी सत्ता का आधार है. पिछले चुनाव में सपा की सीटें जरूर बढ़ी थी, लेकिन बीजेपी के जनाधार में बड़ी सेंध लगती नजर नहीं आई. ये परिस्थितियां लोकसभा चुनाव में बदल गईं. सपा पीडीए (पिछड़ा, दलित,अल्पसंख्यक) फॉर्मूले से राज्य में सबसे ज्यादा सीट जीतने वाली पार्टी बन गई.

इसके बाद से बीजेपी ने नई रणनीति पर काम करना शुरू किया है. पार्टी अपने गैर-यादव ओबीसी आधार को इन्टैक्ट रखना चाहती है. आने वाले दिनों में सरकार और संगठन में इसको ध्यान में रखते हुए बड़े बदलाव भी दिखने वाले हैं.

वीडियो: 'धुरंधर 2' पर भड़के अखिलेश यादव ने BJP को लपेटा, क्या कहा?

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