अखिलेश यादव का मुलायम सिंह यादव को पार्टी अध्यक्ष पद से हटाना भारतीय राजनीतिकइतिहास के सबसे नाटकीय किस्सों में गिना जाएगा. पहलवान को पता ही नहीं चला और बेटेने उसे चित कर दिया. हालांकि, मुलायम चित हुए या नहीं, इसका फैसला चुनाव आयोगकरेगा, लेकिन अखिलेश यादव का फैसला जनता करेगी. वही जनता, जिसकी आंखों पर पट्टीबांधकर अखिलेश पिछले कई महीनों से उसकी पीठ पर धप्पा मार रहे हैं.4 जनवरी को चुनाव आयोग ने यूपी समेत पांच राज्यों में चुनाव की घोषणा की. अखिलेश कोअच्छी तरह पता था कि जनवरी तक चुनाव घोषित हो जाएंगे और चुनाव आचार संहिता लेकरआएंगे, जिसके बाद वो न तो लैपटॉप बांट पाएंगे और न मेट्रो का फीता काट पाएंगे. येसारे काम अखिलेश ने दिसंबर में ही निपटा लिए. आलम ये था कि अकेले 20 दिसंबर कोउन्होंने 5 घंटे में 51 हजार करोड़ रुपए के 51 प्रॉजेक्ट्स का शिलान्यास और उद्घाटनकिया. 'उद्घाटन पॉलिटिक्स' और शिवपाल के सामने 'विक्टिम कार्ड' खेलने की राजनीतिभावातिरेक में वोट देने वालों को जरूर प्रभावित कर सकती है, लेकिन आंकड़े कुछ और हीबयां करते हैं.चुनाव की घोषणा वाले दिन अखिलेश ने हिंदी-अंग्रेजी के लगभग सभी अखबारों में पूरेपन्ने का एक ऐड दिया, जिसमें उन्होंने अपनी दसियों उपलब्धियों का बखान किया. लिखाकि 'इरादा सच्चा हो तो सब हो सकता है.' वाकई अखिलेश जी, इरादा सच्चा हो तो सब होसकता है. आप गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं और जनता गुमराह हो रही है. देखिए येविज्ञापन...समाजवादी युवा रोजगार योजना पर अपनी पीठ ठोंकते हुए अखिलेश ने दावा किया है कि 2012से 2016 के बीच उन्होंने 1,35,228 लोगों को इस योजना का लाभ दिया. इसके लिएउन्होंने 180 लाख रुपए का बजट निकाला था. सुनने-पढ़ने में कितना अच्छा लगता है न.अखिलेश की वजह से 180 लाख का बजट निकल गया. करीब डेढ़ लाख लोगों को फायदा हो गया.लेकिन, एक बार कक्षा दो में पढ़ाई जाने वाली गणित लगा लीजिए.1,35,228 लोगों में जब 180 लाख रुपए बंटेंगे, तो हर एक के हिस्से में कितना आएगा.सिर्फ 133 रुपए. दशमलव वाली गिनती भी लिख दें, तब भी 133.10 रुपए ही होता है. ऊपरसे तुर्रा ये कि 2007-12 के बीच सिर्फ 33 लाख रुपए बांटे गए थे. 51,652 लोगों में.इन्होंने तो तीन गुना लोगों को छह गुना पैसा दे दिया.2007 से 2012 के बीच के आंकड़े बताते हैं कि इस योजना के तहत लाभार्थियों को महज63.88 रुपए मिले. यकीनन अखिलेश के आंकड़े बेहतर हैं. लेकिन, ऐसे तो 10 रुपए के बजाय20 रुपए मुआवजा देने वाली सरकार भी ये कह सकती है कि उसने मुआवजा 100 फीसदी बढ़ादिया. लेकिन इससे लोगों का कुछ भला होगा क्या? नहीं. बिल्कुल नहीं.उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव के बाद से यही हो रहा है. योजनाओं के नाम पर लोगोंको गुमराह किया जा रहा है. अखिलेश जगे हैं, लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में करारीहार झेलने के बाद. वो चुनाव उनके लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं है, जिसे वो कभीयाद नहीं रखना चाहेंगे. फिर भी यूपी के नसीब में कोई सुधार नहीं हुआ था. कैराना,मुजफ्फरनगर दंगा, बुलंदशहर हाइवे गैंगरेप, अखलाक हत्याकांड, रामवृक्ष यादव कीगुंडई... ये सब यूपी ने अखिलेश कार्यकाल में ही देखा है.https://www.youtube.com/watch?v=lt4SVl4_MR0--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ें: आपके इलाके में कब है पोलिंग, यहां जानेंपांच राज्यों में वोटिंग: ये चुनाव आयोग के अहम फैसलों की लिस्ट हैयूपी का पहला चुनावी सर्वे, जिसे पढ़कर सबके तोते उड़ जाएंगेअखिलेश को वो करना चाहिए जो मऊगंज में कन्हैया ड्रेसेज वालों ने किया थामुलायम-अखिलेश के झगड़े की 3 कॉन्सपिरेसी थ्योरीज