बाप को कैद कर या मारकर सिंहासन पर बैठने वालों का हिंदुस्तान में कभी ज्यादासम्मान नहीं हुआ. औरंगजेब को सबसे ज्यादा इसी बात के लिए कोसा जाता है. भले वो अपनेखर्चे के लिए कुरान लिखकर या टोपी सिलकर पैसे कमाता रहा. भले वो मुगल परचम सबसेज्यादा बड़े जमीन के टुकड़े पर फहराने के लिए पचासों बरस फौजी लश्करों में रहा, महलके सुख छोड़.--------------------------------------------------------------------------------अखिलेश यादव को बार-बार औरंगजेब याद दिलाएंगे. उनकी पार्टी के बुजुर्ग. उनकेविरोधी. क्योंकि अखिलेश यादव को साइकिल मिल गई है. और पैदल हो गए हैं मुलायम सिंहयादव. अब मुलायम सिंह और शिवपाल के पास खोने को क्या बचा है? खुद मुलायम बोले थे,'मेरा तो सब कुछ जो था, बेटे को सौंप दिया. पार्टी, सत्ता, सब कुछ. अब बस आपकार्यकर्ता बचे हैं.' कार्यकर्ताओं के सामने विकट संकट. सत्ता सुख के मोह मेंअखिलेश की तरफ जाएंगे, मगर नेताजी के मान का क्या! और अगर कहीं किसी कैमरे के सामनेमुलायम सिंह यादव रो दिए, तो 'काम बोलता है' फुस्स हो जाएगा. ये सात नुकसान होंगेअखिलेश को साइकल की इस लड़ाई को जीतने से.1. शिवपाल को कौन संभालेगाशिवपाल यादव को मीडिया न्यूजरूम में बैठकर खारिज करना आसान है. जमीन पर नहीं. बीससाल तक संगठन संभाला. हर जिले, ब्लॉक, तहसील में नाम से लोगों को जानते हैं. सपा काएक बड़ा तबका अखिलेश सरकार से नाराज था. जब शिवपाल अध्यक्ष बने, तो उन्हें लगा किसुनवाई का वक्त आ गया है. मगर उसके बाद कुकरझांव शुरू हो गई. वैसे ही हर सीट पर कईदावेदार हैं. एक को टिकट मिलेगा. बाकी सब उसे हराने में लगे रहेंगे. शिवपाल को इसचुनाव में जीतना नहीं है. बस अखिलेश यादव की हार तय करनी है. और इसके लिए वह पूरीताकत से जुटेंगे. वह भी और जिला पंचायतों और कोऑपरेटिव कमेटियों में बैठे उनके साथीभी.https://www.youtube.com/watch?v=AJCmImuMRM8&t=2s2. काडर कहां से लाएंगेअखिलेश यादव के पास करिश्मा है. प्रचार तंत्र का. जिसके दम पर एक बरस में उन्होंनेअपनी साढ़े पांच सीएम से काम करने वाले मुख्यमंत्री की छवि बना ली. लैपटॉप से लेकरसड़क तक, सब पर बात होने लगी. मगर क्या उनके पास बूथ लेवल का कैडर तंत्र है.क्योंकि जिससे मुकाबला है, वो दोनों विरोधी इस माइक्रो मैनेजमेंट में माहिर हैं.बीएसपी दो साल से मीटिंग करने में लगी है. बीजेपी के पास हर बूथ पर 20 सक्रियकार्यकर्ताओँ की कुंडली तैयार है. अखिलेश का चेहरा और शिवपाल का ब्रूट फोर्स विनिंगकॉम्बिनेशन हो सकता था. अब नहीं होगा.https://www.youtube.com/watch?v=93EoXr-FFII3. साथ कौन देगाअखिलेश लड़ेंगे 290 सीटों पर. 100-120 सीटें सहयोगी दलों को. मान लिया कि अखिलेश केपक्ष में लहर चली. स्ट्राइक रेट रहा 50 फीसदी. तो सीटें जीतेंगे 145-150. बाकीसीटों पर सहयोगी भी जीत गए. सरकार बन गई. मगर ये कठपुतली सरकार होगी. जिसे कांग्रेसऔर अजीत सिंह अपने हिसाब से नचाने की कोशिश करेंगे. कांग्रेस की तो फिर भी मजबूरीरहेगी, क्योंकि बीजेपी और 2019 का डर है. मगर अजीत सिंह की निष्ठा कब बदल जाए, येखुद अजीत सिंह भी नहीं जानते. अखिलेश के मुकाबले जयंत चौधरी अपना कद काढ़ने कीकोशिश करेंगे. अखिलेश के पास फ्री हैंड नहीं रहेगा, क्योंकि अब परिवार की मर्यादाका हवाला दे कोई रोकेगा-टोकेगा नहीं.https://www.youtube.com/watch?v=pmkfZaOFtaU&t=41s4. और मुलायम की फजीहतयुवाओँ का बड़ा जोर और हल्ला है. मगर हर घर में बुजुर्ग हैं. 50 से ऊपर के लोग.जिन्हें बुढ़ापे में मुलायम सिंह की ये छीछालेदर पसंद नहीं आएगी. बूढ़ा आदमी डराहोता है, चुका नहीं. वो पूरा दम लगाएगा. ऐसे में अखिलेश का गुबार बैठ सकता है.https://www.youtube.com/watch?v=-SNYbzFvWdQ5. पापा का मूड बदल गया तोसबसे बड़ी चोट. जो मुलायम सिंह ने फैसला आने के कुछ ही घंटों पहले अखिलेश पर कर दी.अखिलेश यादव को मुस्लिम विरोधी बताया जा रहा है. पापा बोले, 'जनता में मैसेज जा रहाहै कि अखिलेश ने मुसलमानों को कम टिकट दिए.' जब मुलायम सिंह ही ऐसा बोल रहे हैं, तोइसे दोहराने से मायावती को कौन रोक सकता है. मायावती बोलेंगी और मुजफ्फरनगर दंगोंकी याद दिलाएंगी. बीजेपी भी यही चाहेगी कि हिंदी-मुस्लिम ध्रुवीकरण हो. ऐसे में सपासे मुस्लिम खिसका, तो अखिलेश का तिलिस्म ढह जाएगा, क्योंकि मायावती के पास तो 18%कोर वोटर है. मगर अखिलेश के पास कोर वोटर के नाम पर अगर यादव मान भी लें, तो 7-8%ही है. मायावती रात-दिन मुसलमानों को दुलारने में लगी है.मुलायम का बयान उनकी मदद करेगा. इसमें छेपक भी जुड़ेंगे. मसलन, अतीक अहमद की मंच परकी अखिलेश ने बेइज्जती. अंसारी बंधुओं को सपा में शामिल करने से किया इनकार. और भीकई ऐसी ही बातें. अखिलेश यादव अपनी राजनीति को तुष्टीकरण के ब्रैंड पर नहीं टिकानाचाहते. यह स्वागतयोग्य है. मगर उन्हें ध्यान रखना होगा कि मुलायम सिंह ने मुल्ला कातमगा सहज अपना ये वोट पाए थे. ये गए, तो सपा का शिराजा बिखर जाएगा.https://www.youtube.com/watch?v=lS7TtlBBXZU&t=109s6. कांग्रेस से नाराजगी कौन झेलेगाकांग्रेस के साथ से सपा के मजबूत होने की बात कही जा रही है. पहली बात तो ये किकांग्रेस यूपी में सबसे कमजोर हालत में है. अगर अपने दम पर चुनाव लड़ती, तो खटियाखड़ी हो जाती. चुर जाती. जैसे राहुल की खाट सभा में चुरी. इसीलिए कांग्रेस केसिटिंग विधायक आलाकमान के सामने गठबंधन की चिरौरी कर रहे थे. ये विधायक जीत भी गए,मगर देश में कांग्रेस के प्रति जो नाराजगी का भाव है, जो अभी तक गया नहीं है. जोचिढ़ है, वो अब अखिलेश के मत्थे भी मल दी जाएगी. ऐसे में अखिलेश को किस बात काफायदा होगा. अखिलेश याद रखें. कांग्रेस को जो विधानसभाओं में वोट मिलता आया है, वोसिर्फ कांग्रेस का वोटर नहीं, प्रत्य़ाशी का अपना हिस्सा भी है. ज्यादातर जगहों पर50 फीसदी से ज्यादा. कांग्रेस के भरोसे रहे तो हाथ मलते भी रह जा सकते हैं.https://www.youtube.com/watch?time_continue=39&v=byNdhmK_t4E7. भगदड़ क्यों मची हैआखिरी मगर दीगर बात. अगर समाजवादी पार्टी और इसके नेताओं को इस बात का भरोसा था किअखिलेश के नेतृत्व में वो चुनाव जीत लेंगे, वो फिर पार्टी में भगदड़ क्यों मच गई.सपा के दंगल के दौरान कई नेता पार्टी छोड़ गए. नेता छोड़िए, आगरा के महेंद्र अरिदमनसिंह और उन्नाव के कुलदीप सेंगर जैसे सिटिंग विधायकों ने भी पार्टी को बाय-बाय कहदिया. ऐसे में अखिलेश के नाम पर किसके भरोसे ताल ठोंकी जा रही है. अगर पार्टी सेजीते हुए नेता ही पार्टी के साथ नहीं रहेंगे, तो वोट कौन लाएगा!--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढें:वेस्ट यूपी में बीजेपी का खेल बिगाड़ने में जुटे खाप नेतानोटबंदी के बाद अलग तरह से अपना जन्मदिन मना रही हैं मायावतीUP के उस ज़िले से ग्राउंड रिपोर्ट, जहां चारों विधायक समाजवादी पार्टी के हैंयूपी का वो आदमी जिसके कंधे पर बंदूक रख अखिलेश यादव हीरो बन गएकिस्सा महेंद्र सिंह भाटी के कत्ल का, जिसने UP की सियासत में अपराध घोल दिया