घरों के आगे चबूतरे बने होते हैं. जहां लोग बैठे गपियाते रहते हैं. चबूतरों केअलावा बरगद या नीम का पेड़ या फिर कोई चौक-चौराहा इन लोगों का ठिकाना बना होता है,जहां ये लोग एक खेल अक्सर खेलते हैं. उस खेल का नाम होता है बग्घी-बाघ. पता नहींआपने नाम सुना होगा या नहीं. लेकिन अमरोहा, बिजनौर और मुरादाबाद जिलों में तो मैंनेये खेल खेलते देखा है और खेला भी है. इसमें चार बग्घे. यानी मोटे कंकड़ और 20बग्घियां यानी छोटी कंकड़ियां होती हैं. और जमीन पर चौकोर खाने में टेढ़ी मेढ़ी रेखाएंखिंची होती हैं. जिनपर ये खेल खेला जाता है. इस खेल में बग्घों को बग्घियां जीतनीहोती हैं. और बग्घियों का काम होता है वो बग्घों को बांध दें यानी शतरंज की चालोंकी तरह बग्घों की चाल ख़त्म कर दें, तो वो जीत जाएंगी.कांग्रेस को चुनावी धार लगा रहे प्रशांत किशोर (पीके) अखिलेश यादव से मिलते हैं. औरपीके सपा के चीफ से तीन दौर की लंबी मुलाकात करते हैं. समाजवादी पार्टी का सिल्वरजुबली प्रोग्राम होता है. और जनता परिवार से अलग होकर वजूद में आए दल यानी आरजेडी,आरएलडी और जेडीयू के नेता एक ही मंच पर नजर आते हैं. ये हलचल महागठबंधन की तरफइशारा करती है. अजित सिंह का कहना है कि अगर महागठबंधन हो जाता है तो मुस्लिम वोटकहीं नहीं जाएगा, बल्कि उस तरफ आएगा, जो बीजेपी को हराने की कुव्वत रखता है. औरमहागठबंधन ही बीजेपी को हरा सकता है. इसलिए मुस्लिम वोट महागठबंधन को ही मिलेगा.यूपी में राजनेता ये ही वाला खेल खेल रहे हैं. राजनीति में ये चार बग्घे हैं.मुस्लिम, दलित, ब्राह्मण और यादव. बाकी जो जातियां बचीं, वो बग्घियां हैं. जाति कीचालें चलकर राजनेता इन चार बग्घों से बाकी बग्घियों को जीत लेना चाहते हैं. सभीपार्टियां इन बग्घों को साधकर सत्ता कब्ज़ाना चाहती हैं. इन बग्घों को साधने के लिएही महागठबंधन की सरगर्मियां नजर आने लगी हैं. आरएलडी चीफ अजित सिंह ने इंडियनएक्सप्रेस को दिए इंटरव्यू में महागठबंधन के साफ़ संकेत दिए हैं. अजित सिंह का कहनाहै कि सपा के प्रोग्राम में स्टेज पर मौजूद सभी दल गठबंधन चाहते हैं. मामला गिव एंडटेक का है. लेकिन सभी को अपनी इच्छाओं पर काबू रखना होगा. और ज्यादा देना होगा. तभीमहागठबंधन शक्ल इख़्तियार कर सकता है. मुसलमान वोट खिसकता देख मायावती कांफ्रेंसकरती हैं और कहती हैं, 'अगर सपा गठबंधन कर लेती है तो इसका मतलब होगा कि उसने पहलेसे ही अपनी हार मान ली. अगर उन्होंने काम किया होता तो सहारे की जरूरत नहीं पड़ती.यह पहले से ही हार चुके हैं. हारे लोगों को जनता स्वीकार नहीं करती.' मायावती काकहना है कि अगर महागठबंधन होता है तो इसका फायदा बीजेपी को ही होगा. भले हीउन्होंने बयान जारी कर दिया हो. लेकिन मुसलमानों के वोट खिसकने का डर पूरा है,इसलिए उन्होंने भी 10 नवंबर को मीटिंग बुलाई है, जिसमें पार्टी के जोनल औरडिस्ट्रिक्ट लेवल के नेताओं शामिल होंगे. और पार्टी चुनावी रणनीति का रिव्यू होगा.क्योंकि बसपा दलित और मुसलमान वोट से सत्ता का ख्वाब सजाए हुए है. यूपी विधानसभाचुनाव नज़दीक आएं और सियासी भूचाल न आए. ये तो कोई बात नहीं हुई. कुछ तो जरूर हीपकेगा. आने वाले दिनों में कुछ बड़ा हेरफेर देखने को मिल सकता है. आने वाले दिनोंमें क्या होगा वो बाद में देखना, अभी जो हाल है, वो थोड़ा सा जान लो.सबसे पहले आरएलडीअजित सिंह वेस्ट यूपी में जाटों के सबसे बड़े लीडर. ये ही उनकी यूएसपी है. वोकांग्रेस, बीजेपी और एसपी के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ चुके हैं. सबसे ज्यादा सहीबीजेपी के साथ रहे. बीजेपी के साथ 2009 में पांच सांसद बने. 2002 में विधानसभाचुनाव में 14 विधायक बने. इसकी ख़ास वजह वेस्ट यूपी में जो बीजेपी का वोट बैंक था,जिसकी जाट वोटरों के साथ ट्यूनिंग बैठ जाती थी और उन्हें एक पाले में खड़े होने मेंकोई ऐतराज नहीं होता था. लेकिन मुजफ्फरनगर दंगों के बाद हालात बदल चुके हैं. जाटवोटर बीजेपी के पाले में शिफ्ट हो गया है. यानी अजित सिंह की चमक ख़त्म हो चुकी है.दंगों की वजह से जाट और मुस्लिम के बीच दूरी बढ़ी है. और अजित का साथ आना गठबंधन केलिए कितना फायदेमंद होगा, ये इससे अंदाजा लगाया जा सकता है.कांग्रेस यूपी में कहां है?यूपी में कांग्रेस के लिए प्रशांत किशोर जमीन तलाश रहे हैं. मगर कहां है, ये उनकोअभी तक नहीं पता चला. कांग्रेस ने पिछले विधानसभा चुनाव में राहुल गांधी को चुनावप्रचार में उतारा. राहुल गांधी ने तमाम रोड शो के अलावा तकरीबन 200 से ज्यादा जनसभाएं कीं, लेकिन नतीजा वो नहीं मिला. अब यूपी में रीता बहुगुणा भी कांग्रेस कादामन छोड़कर बीजेपी में शामिल हो चुकी हैं. फर्क तो पड़ेगा ही बॉस.सपा की खटपटाहटसपा खानदान में खूब राजनीतिक ड्रामा हुआ. वो रचा हुआ था या सब खुद ब खुद होता गया,इसका तो पता नहीं. लेकिन इस ड्रामे का असर चुनाव पर ज़रूर पड़ेगा. मौजूदा हालात येहैं कि सपा से मुस्लिम वोट छिटका है. इसकी वजह सपा सरकार के दौरान हुए दंगे भी है.महागठबंधन होने पर क्या फायदा मिलेगा, इसके बारे में अटकलें लगाने से बेहतर ये जानलेना सही है कि ये वही सपा है जो बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन में शामिल हुईऔर फिर अलग हो गई. हालांकि सपा ने उम्मीद के मुताबिक सीटें न मिलने की बात कहकर कदमपीछे हटाये थे, लेकिन मुस्लिमों में ये ही मैसेज गया कि सपा बीजेपी से मिली है. इसशक को और गहराकर मायावती मुसलमानों को अपने पाले में लेने के लिए लगी हैं. एक प्रेसकांफ्रेंस में उन्होंने कहा था कि सपा और बीजेपी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं.बसपा और बीजेपीबीजेपी वो ही खेल करना चाहती है, जो लोकसभा में किया. ओबीसी के साथ दलित वोट को भीखींच लेना. बसपा भले ही मुस्लिम वोट अपने साथ होने का दावा कर रही हो, अगरमहागठबंधन हो जाता है तो इसका एक ये मैसेज जाएगा कि बाकी पार्टियां बीजेपी को हरानेके लिए लामबंद हो रही हैं. इसके कई नतीजे हो सकते हैं. बीजेपी अगर हिंदुत्व परदलितों के वोट बटोर पाई, तो बसपा मुस्लिम वोट बटोरने के चक्कर में दलित वोट भी खोबैठेगी. प्रशांत किशोर और सपा की मुलाकातें. सपा के स्टेज पर आरजेडी, आरएलडी,जेडीयू का एक साथ आना क्या गुल खिलाता है और मायावती क्या रणनीति अपनाती हैं औरबीजेपी क्या सियासी भूचाल लाती है. इसके लिए आने वाले दिनों का ही इंतजार कीजिए. वोक्या है न कि ऊंट किस करवट बैठेगा. कुछ नहीं पता होता वैसे ही सियासत का कुछ नहींपता. बस अटकलें ही लगाई जा सकती हैं.--------------------------------------------------------------------------------https://www.youtube.com/watch?v=xPugbbPSKlc&index-------------------------------------------------------------------------------- ये भी पढ़ेंमायावती के लिए मुस्लिम वोट बटोरेगा 28 साल का ये लड़काबसपा ने कुरान पढ़ना शुरू कर दिया हैअटल बिहारी ने सुनाया मौलवी साब का अजीब किस्साक्या इंदिरा गांधी को 'दुर्गा' कह कर पलट गए थे अटल बिहारी?