ईरान युद्ध के बावजूद क्यों नहीं बढ़ी सोने की कीमत? इस वक्त खरीदना फायदा करेगा?
जंग के बावजूद सोने की कीमतें चढ़ नहीं रही हैं. जबकि आमतौर पर दुनिया के किसी भी हिस्से में जब कोई प्राकृतिक आपदा आती है, युद्ध होता है तो लोग सोने की खरीद बढ़ा देते हैं. इसे सोने की सुरक्षित निवेश मांग (Safe Heaven Demand) बढ़ना कहते हैं. मांग बढ़ने से सोने का भाव उछल जाता है.
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बीते ढाई हफ्तों से पश्चिम एशिया में जंग जारी है. ईरान में सत्ता बदलने की कसम खा चुके अमेरिका-इजरायल ताबड़तोड़ हवाई हमले कर रहे हैं. ईरान ने भी अपने मिसाइलों से मुंहतोड़ जवाब दिया है. साथ ही स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद कर तेल और गैस की वैश्विक सप्लाई रोक दी है. नतीजा, हर तरफ चीजों के दाम बढ़ रहे हैं. लेकिन ये सोने को क्या हो गया है? इसकी चाल काहे ठहर गई है?
जंग के बावजूद सोने की कीमतें चढ़ नहीं रही हैं. जबकि आमतौर पर दुनिया के किसी भी हिस्से में जब कोई प्राकृतिक आपदा आती है, युद्ध होता है तो लोग सोने की खरीद बढ़ा देते हैं. इसे सोने की सुरक्षित निवेश मांग (Safe Heaven Demand) बढ़ना कहते हैं. मांग बढ़ने से सोने का भाव उछल जाता है.
लेकिन इस बार ऐसा होता नहीं दिख रहा है. ईरान -इजरायल-अमेरिका युद्ध जारी रहने के बाद भी सोने की कीमतों में कोई खास उछाल नहीं आया है. इंडिया टुडे की एक खबर के मुताबिक मंगलवार 17 मार्च को सोने की कीमतें 1.6-1.62 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के आसपास थीं. सवाल खड़ा होता है कि जंग के समय भी सोने की कीमत बढ़ने के बजाय गिर क्यों रही हैं?
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सोने का भाव क्यों नहीं बढ़ रहा है?जंग की वजह से कच्चे तेल का दाम काफी उछल चुका है. इसने इस आशंका को फिर से जिंदा कर दिया है कि आने वाले वक्त में महंगाई लंबे समय तक सता सकती है. जब महंगाई उच्च स्तर पर बनी रहती है, तो आरबीआई समेत दुनियाभर के केंद्रीय बैंकों की तरफ से ब्याज दरों में कटौती की संभावना कम हो जाती है. महंगाई काबू में रहे इसके लिए केन्द्रीय बैंक ब्याज दरें नहीं घटाते हैं.
फिलहाल इसी तरह का माहौल बनता दिख रहा है. खासतौर से अमेरिका में ब्याज दरें हाल फिलहाल नहीं घटने वाली हैं. वहां के केन्द्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ने हाल ही में हुई मीटिंग में इसके संकेत भी दिए हैं.
अमेरिका में कर्ज सस्ता न होने से पूरी दुनिया पर असर पड़ता है. आमतौर पर दुनिया के सभी बड़े केन्द्रीय बैंक फेडरल रिजर्व का अनुसरण करते हैं. ब्याज दरें ऊंची रहने से इसका सीधा असर सोने पर पड़ता है. सोने से कोई निश्चित आय प्राप्त नहीं होती. यह बॉन्ड की तरह ब्याज नहीं देता और न ही फिक्स डिपॉजिट्स की तरह रिटर्न मिलता है. इसीलिए जब ब्याज दरें ऊंची रहती हैं, तो निवेशक स्थिर आय देने वाली संपत्तियों (एसेट्स) को प्राथमिकता देते हैं. इसके चलते सोने के प्रति निवेशकों का आकर्षण कम हो जाता है.
लोग कर रहे मुनाफा वसूलीसोने के दाम क्यों नहीं चढ़े हैं, इसके पीछे एक टेक्निकल फैक्टर भी है. पिछले कुछ महीनों में सोने की कीमतों में तेजी से उछाल आया और यह 5,300 डॉलर प्रति औंस से ऊपर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया. इस तेज़ी के बाद, कुछ निवेशक अब प्रॉफिट बुक कर रहे हैं. इस वजह से सोना गिर रहा है.
इस तरह से देखें तो बाजार युद्ध को नजरअंदाज नहीं कर रहा है. लेकिन वह भू-राजनीतिक जोखिम के बरक्स ब्याज दरों को तरजीह दे रहा है. महंगाई और ब्याज दरों के अलावा, अमेरिकी डॉलर भी सोने के लिए विलेन बनकर उभरा है. जब बाजार में अनिश्चितता होती है तो सोना और डॉलर दोनों को सुरक्षित निवेश माना जाता है.
हालांकि, मौजूदा माहौल में डॉलर की ओर निवेशकों का रुझान बढ़ रहा है. डॉलर के मजबूत होने से अन्य मुद्राओं का इस्तेमाल करने वाले खरीदारों के लिए सोना महंगा हो जाता है, जिससे दुनिया में सोने की मांग घट जाती है. वहीं, एक अन्य कारक ये है कि कई संस्थागत निवेशकों ने ब्याज दरों में कटौती और वैश्विक अनिश्चितता की आशंका में पहले ही सोने में अपना निवेश बढ़ा दिया था. अब उनमें से कुछ निवेश घटा रहे हैं.
क्या आपको अभी भी सोना खरीदना चाहिए?सुरक्षित निवेश के रूप में सोने का महत्व अभी भी बरकरार है. फिलहाल, जियो पॉलिटिकल टेंशन की तुलना में ब्याज दरें, महंगाई को लेकर अनुमान और रुपये- डॉलर की विनिमय दरें महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं. यही कारण है कि पश्चिम एशिया में बड़े युद्ध के बावजूद, सोने की कीमतों में उस तरह की तेजी नहीं देखी जा रही है.
इंडिया टुडे की रिपोर्ट में बताया गया है कि जब तक ब्याज दरों को लेकर साफ संकेत नहीं मिलते, तब तक गोल्ड का दाम ज्यादा ऊपर-नीचे नहीं होगा. आने वाले समय में सोने की कीमत एक सीमित दायरे में ही रह सकती हैं.
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