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सरकार ने ऐसा क्या कर दिया है कि SGB निवेशक सरकार पर अपना गुस्सा उतार रहे हैं?

सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड (SGB) में नए बजट नियमों के बाद निवेशकों को सेकेंडरी मार्केट पर कैपिटल गेन टैक्स देना पड़ेगा. जानें SGB की खासियतें, 2.5% ब्याज, मैच्योरिटी, और निवेश नियम, और क्यों सोशल मीडिया पर निवेशक सरकार से नाराज हैं.

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SGB Tax
सरकार से SGB न खरीदने वालों को 12.5% का लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स लगेगा (फोटो क्रेडिट: Business Today)
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प्रदीप यादव
10 फ़रवरी 2026 (पब्लिश्ड: 01:58 PM IST)
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सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड (SGB) को लेकर पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर काफी बहस हो रही है. कुछ मार्केट एक्सपर्ट और निवेशक सरकार की नीति पर सवाल उठा रहे हैं. आइए जानते हैं कि आखिर SGB है क्या और क्यों निवेशक अब नाराज हैं.

क्या है सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड ?

केन्द्र सरकार ने साल 2015 में सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड (SGB) योजना शुरू की थी. इस योजना को शुरू करने का मकसद ये था कि लोग फिजिकल सोना खरीदने के बजाय डिजिटल माध्यम से गोल्ड में निवेश करें. इसका मुख्य उद्देश्य देश में सोने की भौतिक मांग को कम करना था, क्योंकि भारत बड़ी मात्रा में सोना विदेशों से आयात करता है. इससे भारी मात्रा में डॉलर खर्च होते हैं और आयात बिल बढ़ता है. SGB जैसी योजनाओं के जरिए सरकार चाहती थी कि निवेशक सोने में निवेश का विकल्प तो रखें, लेकिन वास्तविक सोने की खरीद कम हो, जिससे विदेशी मुद्रा की बचत हो और चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) पर दबाव कम किया जा सके.

SGB की खासियतें

इन बॉन्ड्स की वैल्यू सोने की बाजार कीमत से जुड़ी होती है और मैच्योरिटी पर निवेशक को उस समय की सोने की कीमत के अनुसार पैसा मिलता है. सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड पर सरकार की तरफ से 2.5% सालाना फिक्स ब्याज दिया जाता है. इनकी कुल अवधि 8 साल की है. हालांकि 5 साल बाद समय से पहले निकलने का विकल्प भी मिलता है. निवेश की न्यूनतम सीमा 1 ग्राम होती है और एक आदमी अधिकतम 4 किलोग्राम तक निवेश कर सकता है.

सरकार ने ये स्कीम कब और क्यों बंद की ?

मनीकंट्रोल की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि सरकार ने फरवरी 2023 में सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड की आखिरी किस्त लांच की थी. इसके बाद से कोई इसकी कोई नई किस्त लांच नहीं हुई. साल 2025 में सरकार ने सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड स्कीम बंद करने का फैसला किया है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इसे बंद करने के पीछे कारण यह था कि इसका सरकारी खजाने पर बोझ पड़ रहा था. सोने की कीमतों में जोरदार तेजी आने से सरकार की लागत बढ़ी थी. मनीकंट्रोल की पत्रकार मेघना मित्तल की रिपोर्ट में एक एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी के हवाले से लिखा गया है कि निवेशकों को एसजीबी पर 9-11% सालाना का रिटर्न मिला है . इसके अतिरिक्त 2.5% का ब्याज भी देना पड़ा है.

हालांकि, सरकार ने साफ किया था कि जिन लोगों ने फरवरी 2023 से पहले सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड (SGB) में निवेश किया है, उनके बॉन्ड पहले की तरह वैध रहेंगे. साथ ही उन्हें तय नियमों के अनुसार ब्याज, मैच्योरिटी और समय से पहले निकलने की सुविधा मिलती रहेगी.

सरकार ने क्या किया कि विरोध होने लगा?

अब आप सोच रहे होंगे कि सब तो बढ़िया ही चल रहा था तो अचानक से दिक्कत क्या पैदा हो गई. दरअसल सरकार ने 1 फरवरी 2026 को पेश हुए बजट में एसजीबी से जुड़ा एक नियम बदल दिया है.  केंद्रीय बजट में प्रस्ताव किया गया है कि सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड पर कैपिटल गेन टैक्स से छूट केवल उसी स्थिति में मिलेगी, जब किसी व्यक्ति ने इन बॉन्ड्स को उनके मूल इश्यू के समय खरीदा हो . साथ ही इन बॉन्ड्स को बिना बेचे मैच्योरिटी तक होल्ड रखा हो. सरकार का कहना है कि सेकेंडरी मार्केट से खरीदे गए SGB या मैच्योरिटी से पहले बेचे गए बॉन्ड पर अब कैपिटल गेन टैक्स देना होगा. इस तरह से अभी तक SGB को मैच्योरिटी तक रखने पर कैपिटल गेन पूरी तरह टैक्स-फ्री माना जाता था. लेकिन अब यह छूट केवल उन निवेशकों तक सीमित कर दी गई है. 

सेकेंडरी मार्केट क्या है?

जब सरकार पहली बार सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड जारी करती है और निवेशक सीधे उसी इश्यू में बॉन्ड खरीदते हैं, तो उसे प्राइमरी मार्केट कहा जाता है। इसके बाद वही बॉन्ड जब स्टॉक एक्सचेंज (NSE/BSE) पर निवेशकों के बीच आपस में खरीदे-बेचे जाते हैं, तो इसे सेकेंडरी मार्केट कहा जाता है। इसी तरह, जब कोई कंपनी आईपीओ लाती है और निवेशक सीधे कंपनी से शेयर खरीदते हैं, तो वे प्राइमरी मार्केट के निवेशक होते हैं। लेकिन जैसे ही ये शेयर स्टॉक एक्सचेंज में लिस्ट हो जाते हैं और निवेशक आपस में उनकी खरीद-फरोख्त करते हैं, उस प्रक्रिया को सेकेंडरी मार्केट कहा जाता है।

कैपिटल गेन टैक्स क्या है?

कैपिटल गेन टैक्स वह टैक्स है जो आपको किसी निवेश जैसे कि शेयर, म्यूचुअल फंड, प्रॉपर्टी, सोना, SGB आदि को बेचकर मुनाफा कमाने पर देना पड़ता है. 
इसे और अच्छे से समझने के लिए हमने टैक्स एक्सपर्ट विनोद रावल से बातचीत की. विनोद रावल ने लल्लनटॉप को बताया कि मान लीजिए आपने इसमें से किसी निवेश साधन में 1 लाख रुपये का निवेश किया और बाद में 1.5 लाख रुपये में बेच दिया तो जो 50 हजार रुपये का फायदा हुआ. इसी 50 हजार पर सरकार टैक्स लेती है, इसे ही कैपिटल गेन टैक्स कहते हैं. कैपिटल गेन टैक्स दो तरह के होते हैं. पहला है शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन (STCG) यानी दूसरा लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन (LTCG).

सेकेंडरी मार्केट से SGB खरीदने वालों पर बढ़ा टैक्स बोझ

नए नियमों के तहत सेकेंडरी मार्केट से सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड (SGB) खरीदने वाले निवेशकों को अब ज्यादा टैक्स देना पड़ सकता है. अगर निवेशक बॉन्ड को 12 महीने से अधिक समय तक होल्ड करने के बाद बेचते हैं, तो उन पर 12.5% का लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स लगेगा. वहीं, 12 महीने से कम अवधि में बेचने पर होने वाला लाभ उनकी आयकर स्लैब के अनुसार टैक्सेबल होगा. कुल मिलाकर, जिन निवेशकों ने सरकार के मूल इश्यू से सीधे SGB नहीं खरीदे हैं, उन्हें बॉन्ड भुनाने या बेचने पर अब 12.5% तक कैपिटल गेन टैक्स देना पड़ेगा. इसी बदलाव को लेकर कई निवेशक सोशल मीडिया पर नाराजगी जता रहे हैं और सरकार की नीति की आलोचना कर रहे हैं.

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