पहली बार रुपया 92 तक गिरा, भारत की इकोनॉमी से लेकर आपकी जेब पर बड़ा असर पड़ेगा!
इस महीने अब तक रुपया करीब 2.3% गिर चुका है सितंबर 2022 के बाद यह पहला मौका है कि किसी एक महीने में रुपया इतना गिरा है.

भारतीय रुपया लगातार गिर रहा है. द हिंदू की एक रिपोर्ट के मुताबिक 29 जनवरी 2026 को डॉलर के मुकाबले पहली बार रुपया 92 तक लुढ़क गया. इंडिया टुडे की एक खबर के मुताबिक इस महीने अब तक रुपया करीब 2.3% गिर चुका है. सितंबर 2022 के बाद यह पहला मौका है कि किसी एक महीने में रुपया इतना गिरा है. अब ये ताजा आंकड़ा चिंता पैदा कर रहा है. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या यह गिरावट गहरे आर्थिक संकट का संकेत है या फिर दुनिया में जो आर्थिक हालात चल रहे हैं उसका असर है. रुपये की कमजोरी ऐसे समय में आई है जब दुनियाभर में राजनैतिक अनिश्चितता बनी हुई है. भारत जैसे उभरते शेयर बाजारों से विदेशी निवेशक पैसा निकाल रहे हैं. नया निवेश घट रहा है. अमेरिका और यूरोप के विकसित देशों में ऊंची ब्याज दरों ने विदेशी निवेश पर रिटर्न बढ़ा दिया है. इससे निवेशक यह तय करने में अधिक सावधानी बरत रहे हैं कि वे अपना पैसा कहां लगाएं. इसके अलावा भारत का चालू खाता घाटा भी रुपये पर दबाव बढ़ा सकता है.
आर्थिक सर्वेक्षण में रुपये पर क्या बोली सरकार?आर्थिक सर्वेक्षण 2026 की प्रेस ब्रीफिंग में मुख्य आर्थिक सलाहकार वी अनंथा नागेश्वरन ने बार-बार कहा कि रुपये की गिरावट को समझने के लिए इस वैश्विक पृष्ठभूमि को ध्यान में रखना जरूरी है. उन्होंने कहा, “आज जो मुद्रा अवमूल्यन हम देख रहे हैं, वह सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है. जिन देशों में चालू खाता घाटा है, उनकी मुद्राएं भी कमजोर हुई हैं.” हालांकि उन्होंने मीडिया कवरेज के तरीके पर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि भारतीय रुपये को लेकर जो सनसनीखेज सुर्खियां बन रही हैं उसे सही नजरिये से देखने की जरूरत है. उनके अनुसार, हालिया कमजोरी भारत की आर्थिक बुनियाद में तनाव का संकेत नहीं है. उनका कहना है कि इसका मैक्रो इकोनॉमिक तस्वीर से कोई लेना-देना नहीं है.
मुख्य आर्थिक सलाहकार ने इस मौके पर विदेशी निवेश रुझानों पर भी विस्तार से बात की. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) में गिरावट की चिंता पर उन्होंने कहा कि आंकड़ों को सही तरीके से पढ़ने की जरूरत है. उन्होंने कहा, “भारत का ग्रॉस FDI काफी अच्छी दर से बढ़ रहा है. वित्त वर्ष 2025-26 में यह पिछले साल से कम से कम 10% ज्यादा है. नेट FDI कमजोर इसलिए दिख रहा है क्योंकि पुराने निवेशक मुनाफावसूली कर रहे हैं. भारतीय कंपनियां भी विदेशों में ज्यादा निवेश कर रही हैं. उन्होंने कहा कि विदेशी निवेशकों के पैसे निकालने की पीछे वैश्विक ब्याज दरों की भूमिका है. “पहले विकसित देशों में ब्याज दरें लगभग शून्य थीं. अब वे 4% से 5% के बीच हैं, इसलिए विदेश में निवेश करना फायदे का सौदा हो गया है.”
गिरते रुपये का आम लोगों पर क्या असर होगा?इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि ज्यादातर परिवारों के रोजमर्रा के खर्चों पर रुपये की गिरावट का तुरंत असर नहीं पड़ता. इसका प्रभाव धीरे-धीरे दिखता है. खासतौर पर उन लोगों पर ज्यादा पड़ता है जो लोग विदेशी मुद्रा में खर्च या कमाई करते हैं. उदाहरण के लिए अगर किसी का बेटा, बेटी वगैरह विदेश में पढ़ रहे हैं.
विदेश यात्रा करने वाले लोगों और विदेश से सामान खरीदने जैसे कच्चा तेल, सोना या और कोई जरूरत का सामान. इन सबकी लागत बढ़ने वाली है यानी पहले से ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ेगा. तेल जैसे आयात महंगे होने से समय के साथ महंगाई बढ़ सकती है. हालांकि एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड सेक्टर को फायदा हो सकता है. मतलब ये कि जो भारत के कारोबारी अपना सामान विदेशों में बेचते हैं उनकी कमाई बढ़ सकती है.
बता दें कि शुक्रवार 30 जनवरी को शुरुआती कारोबार में डॉलर के मुकाबले रुपया कुछ संभला है लेकिन अब भी 92 के बेहद करीब कारोबार कर रहा है. शुरुआती कारोबार में रुपया 9 पैसे बढ़कर अमेरिकन करेंसी के मुकाबले 91.90 पर ट्रेड कर रहा था. इसके पीछे बड़ा कारण ये बताया गया है कि इंटरनेशनल मार्केट में कच्चे तेल के दाम घटने से रुपये को सपोर्ट मिला है.
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