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कोरोना के बाद कम काम क्यों कर रहे भारतीय? रिपोर्ट में सामने आए चौंकाने वाले फैक्ट्स

अलग-अलग आंकड़ों से यह भी सामने आया है कि साप्ताहिक काम के घंटों में गिरावट पुरुषों और महिलाओं दोनों में दर्ज की गई है. पुरुषों की बात करें तो उन्होंने साल 2025 में औसतन 45.9 घंटे प्रति सप्ताह काम किया. साल 2019 में यह आंकड़ा 48.9 घंटे था.

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20 अप्रैल 2026 (पब्लिश्ड: 06:34 PM IST)
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कोरोना के बाद हफ्ते में औसतन 7 घंटे कम काम हुआ है (फोटो क्रेडिट: Business Today) 
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भारत में कामकाजी लोग (Indian workers) पहले की तुलना में कम घंटे काम कर रहे हैं. टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी एक रिपोर्ट में पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) के हवाले से जानकारी दी गई है. इन आंकड़ों से पता चलता है कि भारत के काम करने वाले लोग साल 2025 में एक हफ्ते में कोरोना महामारी से पहले की तुलना में कम घंटे काम किया. कोरोना महामारी से पहले यानी जुलाई 2018 से जून 2019 के दौरान भारत में काम करने वाले लोग औसतन हफ्ते में करीब 46.6 घंटे काम करते थे.

समय के साथ यह औसत घटता गया और जनवरी 2025 से दिसंबर 2025 के बीच यह घटकर 39.6 घंटे प्रति सप्ताह रह गया. यानी साफतौर पर देखा जाए तो कोरोना के बाद काम के औसत घंटों में लगभग 7 घंटे प्रति हफ्ते की गिरावट आई. अलग-अलग आंकड़ों से यह भी सामने आया कि साप्ताहिक काम के घंटों में गिरावट पुरुषों और महिलाओं दोनों में दर्ज की गई है. पुरुषों की बात करें तो उन्होंने साल 2025 में औसतन 45.9 घंटे प्रति सप्ताह काम किया. साल 2019 में यह आंकड़ा 48.9 घंटे था. 

वहीं, महिलाओं के काम के घंटे में और ज्यादा गिरावट देखने को मिली है. 2025 में महिलाओं ने औसतन 34.1 घंटे प्रति सप्ताह काम किया, जो 2018-19 में 39.4 घंटे था.

क्या है Periodic Labour Force Survey?

भारत सरकार का National Statistical Office यह सर्वे कराता है. इसका मकसद देश में रोजगार की स्थिति का पता लगाना है. इस सर्वे के जरिये देश में रोजगार और बेरोजगारी का डेटा इकट्ठा किया जाता है जैसे कि लोग कितने घंटे काम कर रहे हैं. किस सेक्टर में (खेती, फैक्ट्रियों और सर्विस ) काम कर रहे हैं. वगैरा-वगैरा. यह सर्वे नियमित अंतराल के बाद होता है इसीलिए इसे पीरियोडिक सर्वे कहते हैं. यह सर्वे सिर्फ सरकारी नौकरी वालों तक सीमित नहीं है. यह पूरे लेबर फोर्स को कवर करता है. इसमें सरकारी कर्मचारी, प्राइवेट सेक्टर कर्मचारी और दिहाड़ी मजदूर, गिग वर्कर (जैसे डिलीवरी ब्यॉय) वगैरा शामिल होते हैं. इसके अलावा स्वरोजगार करने वाले लोग भी शामिल होते हैं.

स्वरोजगार करने वालों ने सबसे कम काम किया

स्वरोजगार करने वाले लोगों (जिनमें स्वरोजगार करने वाले और घरेलू उद्यमों में काम करने वाले लोग ) के साप्ताहिक कार्य घंटों में सबसे ज्यादा गिरावट देखी गई. आंकड़ों के अनुसार स्वरोजगार के काम में लगे लोगों ने जनवरी से दिसंबर 2025 के बीच 39.6 घंटे काम किया. जुलाई 2018 से जून 2019 के दौरान यह 46.6 घंटे काम किया था. इस अवधि के दौरान दिहाड़ी (casual) और वेतनभोगी (salaried) दोनों तरह के कामगारों के साप्ताहिक काम के घंटों में भी गिरावट दर्ज की गई. घरेलू उद्यमों का मतलब है ऐसे छोटे बिजनेस या काम, जो घर से या परिवार के स्तर पर चलाए जाते हैं. मसलन सिलाई की दुकान/बुटीक, किराने की छोटी दुकान वगैरा.

जानकारों का कहना है कि काम के घंटों में यह गिरावट महामारी के बाद अर्थव्यवस्था में कुल मांग में कमी को दर्शाती है. अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अमित बसोले ने टाइम्स ऑफ इंडिया से कहा, 

हाल के वर्षों में बड़ी संख्या में स्वरोजगार उद्यमों की मांग में गिरावट आई है, जिससे उनकी आय कम हो गई है और इसलिए उनके पास अधिक घंटे काम करने का कोई प्रोत्साहन नहीं है. 

उन्होंने कहा कि यह एक दुष्चक्र है. अगर हम दिहाड़ी मजदूरों को भी देखें तो उन्हें भी ज्यादा ग्राहक नहीं मिल रहे हैं. इससे पता चलता है कि लेबर मार्केट में सुधार बेरोजगारी दर के अनुरूप नहीं है, जो लगातार गिरावट का संकेत दे रही है.

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