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सैटेलाइट इंटरनेट में मुकेश अंबानी करने जा रहे बड़ा निवेश, आपको क्या फायदा होगा? जानें जवाब

जियो टेलीकाम की तरह मुकेश अंबानी अब सैटेलाइट इंटरनेट में धूम मचाने की तैयारी में हैं. रिपोर्ट के मुताबिक कंपनी सैटेलाइट क्षेत्र खासतौर से लो अर्थ ऑरबिट (LEO) सेगमेंट में सबसे बड़े खिलाड़ियों में से एक बनना चाहती है.

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6 मई 2026 (अपडेटेड: 6 मई 2026, 03:02 PM IST)
Mukesh Amabani Reliance Industries satellite Internet
LEO यानी लो अर्थ ऑर्बिट में सैटेलाइट धरती के काफी करीब घूमते हैं (फोटो क्रेडिट: Business Today)
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जियो टेलीकाम की तरह मुकेश अंबानी (Mukesh Ambani) अब सैटेलाइट इंटरनेट (Satellite Internet) में धूम मचाने की तैयारी में हैं. इकोनॉमिक टाइम्स की पत्रकार किरण राठी की रिपोर्ट के मुताबिक रिलायंस इंडस्ट्रीज सैटेलाइट संचार क्षेत्र में अरबों डॉलर का निवेश कर सकती है. रिपोर्ट के मुताबिक कंपनी सैटेलाइट क्षेत्र खासतौर से लो अर्थ ऑरबिट (LEO) सेगमेंट में सबसे बड़े खिलाड़ियों में से एक बनना चाहती है. इस मामले की जानकारी रखने वाले एक व्यक्ति ने इकोनॉमिक टाइम्स को बताया कि सैटेलाइट डिवीजन जियो प्लेटफॉर्म्स (JPL) के बैनर तले आएगा. जेपीएल रिलायंस के टेलीकाम और डिजिटल बिजनेस को संभालनी वाली कंपनी है. आम लोगों को इससे क्या फायदा होगा और इंटरनेट कनेक्टिविटी पर इसके असर के बारे में समझते हैं. 

मुकेश अंबानी ने खुद संभाली कमान?

सूत्रों ने बताया कि इस प्रोजेक्ट से जुड़े कामों जैसे सैटेलाइट, लॉन्च, पेलोड और यूजर टर्मिनल पर काम करने के लिए 6 टीमें बना ली गई हैं. खबर के मुताबिक, मुकेश अंबानी इस प्रोजेक्ट को खुद देख रहे हैं. इसके अलावा रिलायंस इंडस्ट्रीज के कई बड़े अधिकारी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. इनमें रिलायंस इंडस्ट्री के प्रेसिडेंट पीके भटनागर, जेपीएल के सीईओ मैथ्यू ओम्मन और जेपीएल के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट आयुष भटनागर शामिल हैं. हालांकि, इस बारे में रिलायंस इंडस्ट्रीज ने ईटी के सवालों का जवाब नहीं दिया.

सैटेलाइट इंटरनेट क्या है ?

सैटेलाइट इंटरनेट ऐसी इंटरनेट सेवा है. इसमें इंटरनेट मोबाइल टावर या फाइबर केबल की बजाय अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट्स के जरिए आपके घर या डिवाइस तक पहुंचता है. आसान शब्दों में कहें, तो आपके घर के पास वाले खंभे तक डिवाइस लगाने और तार दौड़ाने की जरूरत नहीं पड़ेगी. बिना तार और बिना टॉवर के आपके घर पर इंटरनेट मिल सकेगा. चूंकि फिजिकल कनेक्शन की बाध्यता नहीं है, इसलिए दूर-दराज के इलाकों और पहाड़ों में भी इंटरनेट आसानी से चल सकेगा. 

मान लो कि आप एक ट्रैवल ब्लॉगर हैं और आप लद्दाख के दुर्गम इलाकों में घूम रहे हों. जिस इलाके में आप हैं वहां नेटवर्क का नामोनिशान नहीं तो यहीं सैटेलाइट इंटरनेट सबसे ज्यादा काम आता है. सैटेलाइट इंटरनेट में आपको एक छोटा एंटीना लगाते ही बढ़िया स्पीड में इंटरनेट मिलने लगता है.

ये ब्रॉडबैंड के मुकाबले कितना अलग है?

अब तक ज्यादातर टेलीकाम कंपनियां मोबाइल टावर ऑप्टिकल केबल बिछाकर इंटरनेट की सुविधा देती हैं, इसमें मीलों लंबी केबल बिछाने की जरूरत पड़ती है. स्टारलिंक ये लोअर अर्थ ऑर्बिट  उपग्रहों के जरिये इंटरनेट सेवा देती है. बीबीसी की एक रिपोर्ट बताती है कि नार्मल सैटेलाइट धरती से कम से कम 1000 किलोमीटर की दूरी पर घूमते हैं, स्टारलिंक के सैटेलाइट धरती से 500-550 किलोमीटर की दूरी पर घूमते रहते हैं.

क्या है लो अर्थ ऑर्बिट ? 

LEO यानी लो अर्थ ऑर्बिट में सैटेलाइट धरती के काफी करीब घूमते हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक लो अर्थ आर्बिट में उपग्रह पृथ्वी की सतह से लगभग 160 से 2,000 किलोमीटर की ऊंचाई के आसपास घूमते रहते हैं. सैटेलाइट धरती के पास होने से सैटेलाइट इंटरनेट सिग्नल काफी तेजी से पहुंचता है. यानी देरी (latency) कम होती है और वीडियो कॉल, ऑनलाइन गेमिंग या रियल-टाइम सेवाएं बेहतर चलती हैं.

रिलायंस का सेटैलाइट इंटरनेट कितना सस्ता-महंगा पड़ेगा और स्पीड क्या होगी?

रिलायंस का सैटेलाइट इंटरनेट कितना सस्ता-महंगा पड़ेगा. इसे समझने के लिए एलन मस्क की सैटेलाइट इंटरनेट सेवा स्टारलिंक (Starlink) की इंटरनेट स्पीड और कीमत के बारे में जानना जरूरी है. भारत में स्टारलिंक की सेवाएं अभी तक देशभर में शुरू नहीं हुई हैं. लेकिन कंपनी की सेवाएं धीरे-धीरे शुरू हो सकती हैं.

 इंडिया टुडे के पत्रकार ओम गुप्ता की एक रिपोर्ट के मुताबिक मेघालय सरकार ने राज्य के दूरदराज इलाकों में कनेक्टिविटी सुधारने के लिए स्टारलिंक इंडिया के साथ एक समझौता किया है. समझौते से संकेत मिलता है कि स्टारलिंक की सेवाएं जल्द ही देश में शुरू हो सकती हैं, क्योंकि कंपनी को भारत सरकार को पहले ही लाइसेंस मिल चुका है. हालांकि, सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं की शुरुआत अभी नहीं हो पाई है.  इसकी वजह है कि टेलीकॉम रेगुलेटर अथॉरिटी ऑफ इंडिया यानी TRAI ने अभी तक सैटेलाइट इंटरनेट के लिए स्पेक्ट्रम की कीमत और दूरसंचार विभाग द्वारा स्पेक्ट्रम आवंटन को अंतिम रूप नहीं दिया है.

इंडिया टुडे की रिपोर्ट बताती है कि पिछले साल दिसंबर में स्टारलिंक इंडिया ने छोटी सी प्राइस लिस्ट साझा की थी. कंपनी की भारत से जुड़ी इस बेबसाइट में दावा किया गया था कि स्टारलिंक के मंथली इंटरनेट प्लान की कीमत 8,600 रुपये प्रति महीने होगी. साथ ही, हार्डवेयर के लिए एकमुश्त 34,000 रुपये का भुगतान करना होगा. हालांकि, स्टारलिंक ने बाद में सफाई दी थी कि ये प्राइस लिस्ट तकनीकी खराबी के कारण डमी लिस्ट थी . कंपनी ने कहा कि वह अंतिम सरकारी मंजूरी मिलने के बाद ही प्राइस लिस्ट का खुलासा करेगी. 

वहीं, स्पीड की बात करें तो मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक स्टारलिंक की शुरुआती स्पीड लगभग 25 Mbps से 220 Mbps तक हो सकती है. इस तरह से हम स्टारलिंक के आधार पर कयास ला सकते हैं कि रिलायंस इंडस्ट्रीज की सैटेलाइट इंटरनेट सेवाएं कितनी महंगी-सस्ती होंगी और इंटरनेट की स्पीड क्या रहेगी. ऐसा इसलिए है क्योंकि रिलायंस की सैटेलाइट इंटरनेट सेवाएं अभी शुरुआती चरण में हैं. कंपनी ने अब तक किसी तरह की सैटेलाइनट इंटरनेट प्लान और स्पीड का खुलासा नहीं किया है. 

आम लोगों के क्या फायदा होगा?

अगर रिलायंस इंडस्ट्रीज भारत में सैटेलाइट इंटरनेट लॉन्च करते हैं तो आम लोगों को सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि दूर-दराज गांवों और पहाड़ी इलाकों में भी तेज इंटरनेट पहुंच सकता है. जहां आज मोबाइल टावर या फाइबर पहुंचाना मुश्किल है. इससे ऑनलाइन पढ़ाई, टेलीमेडिसिन, डिजिटल पेमेंट, खेती से जुड़ी जानकारी और छोटे कारोबारियों को काफी लाभ हो सकता है. साथ ही, घरेलू विकल्प होने से विदेशी सेवाओं पर निर्भरता कम हो सकती है. प्रतिस्पर्धा बढ़ने से सैटेलाइट इंटरनेट सस्ता भी हो सकता है.

Starlink और Amazon Leo से कड़ी टक्कर 

एक अधिकारी ने इकोनॉमिक टाइम्स से बातचीत में कहा कि जियो को इस क्षेत्र में कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना होगा क्योंकि फिलहाल इस सेगमेंट में स्टारलिंक का दबदबा है.  साथ ही अमेजन लियो एक दावेदार के रूप में उभर रहा है. अन्य प्रतिद्वंद्वियों में यूटेलसैट वनवेब, एएसटी स्पेसमोबाइल और सैटेलाइट शामिल हैं. सुनील मित्तल के नेतृत्व वाला भारती समूह यूटेलसैट में दूसरा सबसे बड़ा शेयरधारक है, जिसका अधिकांश स्वामित्व फ्रांसीसी सरकार के पास है.

चीन लो अर्थ आर्बिट में भेजेगा 2 लाख सैटेलाइट 

चीन ने अंतर्राष्ट्रीय दूरसंचार संघ (आईटीयू) में कई लो अर्थ आर्बिट में  2 लाख सैटेलाइट उपग्रहों की स्थापना के लिए आवेदन किया है. कई अन्य देश भी अपने हितों की रक्षा के लिए अंतरिक्ष क्षेत्र, विशेष रूप से LEOs में निवेश कर रहे हैं. रिलायंस ने भी आईटीयू में आर्बिटल स्लॉट्स के लिए आवेदन करने में सुविधा देने के लिए दूरसंचार विभाग (DoT) के साथ भी बातचीत शुरू कर दी है. 

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