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भारतीय रुपया गिरावट के नए 'आसमान' पर, एक डॉलर के मुकाबले 96 रुपये, टेंशन लेने का या नहीं?

इंटरनेशनल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतें 110 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गईं. भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का 85% से अधिक आयात करता है. कच्चे तेल की खरीद अमेरिकी डॉलर में होती है. इसलिए तेल महंगा होने का सीधा असर देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ता है.

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15 मई 2026 (पब्लिश्ड: 04:39 PM IST)
Dollor Vs Rupee
कच्चे तेल में तेजी का रुपये पर असर पड़ा है (फोटो क्रेडिट: Business Today)
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भारतीय रुपये ने गिरावट का एक और 'आसमान' छू लिया है. शुक्रवार, 15 मई को भारतीय रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया. समाचार एजेंसी रॉयटर्स की एक रिपोर्ट बताती है कि दिन कारोबार के दौरान अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया 0.3% गिरकर 96.05 पर आ गया. हालांकि कारोबार के आखिर में 30 पैसे टूटकर 95.94 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले बंद स्तर पर बंद हुआ.

रुपये में तेज गिरावट के क्या कारण हैं?

रिपोर्ट के मुताबिक इंटरनेशनल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतें 110 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गईं. भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का 85% से अधिक आयात करता है. कच्चे तेल की खरीद अमेरिकी डॉलर में होती है. इसलिए तेल महंगा होने का सीधा असर देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ता है. साथ ही रुपये के कमजोर होने से विदेशों से रोजाना की जरूरतों से जुड़ा सामान आयात करना भी महंगा हो जाता है और भारत को अपने भंडार से डॉलर खर्च करने पड़ते हैं.

स्वास्तिका इन्वेस्टमार्ट लिमिटेड के सीनियर टेक्नीकल एनालिस्ट प्रवेश गौर ने इंडिया टुडे से कहा कि अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये का 96.06 रुपये के नए रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचना दुनिया में बढ़की अनिश्चितता और डॉलर की लगातार बढ़ती मांग को दिखाता है. उन्होंने आगे कहा, 

“कच्चे तेल की ऊंची कीमतों से भारत की आयात लागत बढ़ रही है, जबकि अमेरिका में ब्याज दरें ऊंची रहने से और विदेशी निवेशकों की तरफ से भारत के बाजार से पैसा निकालने से रुपये पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है.”

ये भी पढ़ें: ईरान युद्ध से भारत का विदेशी मुद्रा भंडार क्यों लुढ़का? अब कितना बचा है?

रुपये में गिरावट से आपकी जेब पर कितना असर?

रुपये की कमजोरी से कच्चा तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स आइटम समेत विदेशों से आयात होने वाली चीजों के दाम बढ़ सकते हैं. इसके चलते आम आदमी को महंगाई का सामना करना पड़ सकता है. खाने का तेल, गैस समेत कई और जरूरी चीजें महंगी हो जाती हैं. इसके अलावा जब रुपया कमजोर होता है तो विदेश में पढ़ाई करना, रहना और खाना-पीना और विदेश में छुट्टियां मनाना महंगा हो जाता है.

प्रवेश गौर का कहना है, "रुपये के कमजोर होने से भारत में महंगाई का दबाव बढ़ सकता है, क्योंकि ईंधन, इलेक्ट्रॉनिक्स और औद्योगिक कच्चे माल जैसे आयात महंगे हो जाते हैं. दूसरी ओर, आईटी और दवा कंपनियों को बेहतर कमाई होने से कुछ लाभ मिल सकता है. इन कंपनियों को अपनी उत्पाद और सेवाओं का पेमेंट डॉलर में  मिलता है."

रुपये की कमजोरी देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी परेशानी पैदा करती है. रुपये का गिरना भारत के व्यापार घाटे, विदेशी मुद्रा भंडार और चालू खाता घाटे (Current Account Deficit) जैसे बड़े आर्थिक संकेतकों पर भी दिखाई दे सकता है. 

कुल मिलाकर रुपये का गिरना भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बाहरी मोर्चे पर चुनौती बढ़ा रही है. जब किसी देश का आयात (खरीद) उसके निर्यात (बिक्री) से ज्यादा होता है, तो उसे व्यापार घाटा कहते हैं. वहीं, जब किसी देश से बाहर जाने वाला कुल विदेशी मुद्रा भुगतान (आयात, सेवाएं, ब्याज आदि) उसकी कुल विदेशी कमाई (निर्यात, सेवाएं, रेमिटेंस आदि) से ज्यादा हो जाता है, तो उसे चालू खाता घाटा कहते हैं.

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