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क्या खत्म हो जाएगी यूरेनियम पर निर्भरता? न्यूक्लियर एनर्जी पर साथ आई NTPC और अमेरिकी कंपनी

India-America Nuclear Energy: संभावना है कि अमेरिकी कंपनी से NTPC को मिलने वाला नया न्यूक्लियर फ्यूल भारत के मौजूदा PHWR रिएक्टरों में काम कर सकेगा. इससे देश को Thorium के लिए नए रिएक्टर बनाने की शायद ही जरूरत पड़े. इससे Uranium पर भी निर्भरता कम होगी.

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गुजरात का काकरापार एटॉमिक पावर स्टेशन. (फोटो-इंडिया टुडे)
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रितिका
1 जनवरी 2026 (Updated: 1 जनवरी 2026, 09:46 PM IST)
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न्यूक्लियर एनर्जी पर नया कानून (SHANTI Act) आने के बाद भारत की न्यूक्लियर कैपेसिटी को नई ताकत मिलने वाली है. बिजली बनाने वाली सरकारी कंपनी नेशनल थर्मल पावर प्लांट लिमिटेड (NTPC) एक अमेरिकी न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी कंपनी क्लीन कोर थोरियम एनर्जी (CCTE) में सीमित हिस्सेदारी खरीद रही है. इस साझेदारी से न केवल भारत की न्यूक्लियर एनर्जी की क्षमता बेहतर होगी, बल्कि यूरेनियम पर से निर्भरता भी घटेगी.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, शिकागो बेस्ड CCTE बीते करीब दो दशकों में दूसरी अमेरिकी कंपनी है, जिसे अमेरिकी ऊर्जा विभाग से भारत को न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी बेचने के लिए एक्सपोर्ट लाइसेंस मिला है. हालांकि, केंद्रीय उर्जा मंत्रालय की मंजूरी के बाद ही NTPC अमेरिकी कंपनी में हिस्सेदारी खरीद सकेगी.

ये निवेश NTPC के उस लक्ष्य के अनुरूप है, जिसके तहत वो 2047 तक 30 गीगावाट न्यूक्लियर एनर्जी कैपेसिटी बनाना चाहती है. यह भारत के खास रणनीतिक मकसद न्यूक्लियर फ्यूल साइकल में एंट्री करने की संभावना को भी मजबूत करता है. आने वाले समय में भारत न्यूक्लियर एनर्जी के लिए यूरेनियम की बजाय थोरियम पर ध्यान देना चाहता है.

इस कदम से मौजूदा प्रेशराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टरों (PHWRs) के बेड़े में थोरियम-बेस्ड फ्यूल की संभावनाओं का पता लग पाएगा. इससे यूरेनियम की निर्भरता कम होगी और थोरियम के लिए मौजूदा थर्म प्लांट ही काम कर सकेंगे. इससे देश की ऊर्जा और फ्यूल सेफ्टी को मजबूत करने में मदद मिल सकती है.

परमाणु क्षेत्र में निजी कंपनी की एंट्री

दिसंबर 2025 में संसद ने सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (SHANTI) अधिनियम, 2025 पारित किया था. ये कानून निजी कंपनियों को परमाणु ऊर्जा क्षेत्र के संचालन में प्रवेश करने की अनुमति देता है.

इसके आने के बाद भविष्य में विदेशी भागीदारी की संभावना भी जताई जा रही है. CCTE अमेरिका से थोरियम फ्यूल भारत भेजा जा सकता है. यह PHWRs में संभावित रूप से सीधे लोड किया जा सकता है. भारत के पास यूरेनियम के भंडार कम है, लेकिन थोरियम का भंडार अच्छी मात्रा में है.

दशकों से थोरियम को देश की एनर्जी सेफ्टी का फ्यूचर माना जाता रहा है. थोरियम से बिजली उत्पादन न सिर्फ और भरोसेमंद हो सकता है, बल्कि इससे न्यूक्लियर कचरा भी कम पैदा होने की संभावना है. CCTE के फाउंडर और CEO मेहुल शाह भारतीय मूल के हैं. थोरियम के इस्तेमाल का विचार भारत के 3-स्टेज न्यूक्लियर प्रोग्राम के आखिरी चरण में इस फ्यूल पर चलने वाले नए रिएक्टरों को डिजाइन करने पर आधारित था. इसमें देश के न्यूक्लियर पावर प्लांट्स को नए सिरे से दोबारा बनाना पड़ सकता था.

हालांकि, शाह और उनकी कंपनी ने एक नए तरह का फ्यूल बनाया, जिसका नाम ANEEL (एडवांस्ड न्यूक्लियर एनर्जी फॉर एनरिच्ड लाइफ) है. इसे PHWR रिएक्टरों में बड़े पैमाने पर संभावित रूप से इस्तेमाल किया जा सकता है.

यानी देश के मौजूदा और नए PHWR रिएक्टर में थोरियम के साथ एनरिच यूरेनियम की थोड़ी मात्रा का कॉम्बिनेशन इस्तेमाल हो सकता है. इससे भारत देश में ही मौजूद थोरियम का बेहतर इस्तेमाल कर सकेगा, जिससे यूरेनियम इंपोर्ट करने की जरूरत भी कम हो सकेगी. 

थोरियम संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल के जरिए ऊर्जा सुरक्षा बढ़ाने, सुरक्षा मानकों में सुधार करने और परमाणु प्रसार प्रतिरोध को मजबूत करने में भी मदद कर सकता है. रिपोर्ट के मुताबिक, परमाणु वैज्ञानिक अनिल काकोडकर ने बताया,

“भारत इंपोर्टेड यूरेनियम को फ्यूल के तौर पर इस्तेमाल करके बड़ी PHWR क्षमता बनाने में सक्षम है, इसलिए देश के पास इस रिएक्टर क्षमता का इस्तेमाल करके देश के PHWRs में बड़े पैमाने पर HALEU (हाई-एसी लो-एनरिच यूरेनियम) यूरेनियम फ्यूल कॉम्बिनेशन के साथ थोरियम को रेडिएशन देकर उसे फिसाइल यूरेनियम में बदलने की संभावना है.”

अगर ये प्लानिंग सफल होती है, तो भारत अपने 3-स्टेज न्यूक्लियर प्रोग्राम के तहत थोरियम चरण को पहले शुरू कर पाएगा. इसके लिए देश को दूसरे चरण में फास्ट ब्रीडर रिएक्टरों की पूरी कैपेसिटी बनाने का इंतजार नहीं करना होगा. भारत के इस प्रोग्राम में PHWR रिएक्टर पहला चरण हैं.

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