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ऑनलाइन मिल रहा सामान असली है या नकली, इन तरीकों से पहचानिए

जरूरत से ज्यादा डिस्काउंट, मतलब झोल है! इसलिए कुछ जरूरी बातें जान लें.

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13 अगस्त 2023 (अपडेटेड: 13 अगस्त 2023, 03:11 PM IST)
Online products being offered at 70-80 percent discount have greater probability of being fake.
ऑनलाइन शॉपिंग में अगर 70-80 फीसदी का डिस्काउंट नजर आए तो समझ लें कि कुछ तो गड़बड़ है. (तस्वीर साभार- Freepik)
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पिछले कुछ समय से ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर नकली सामानों की बिक्री की शिकायत काफी बढ़ी है. बड़े-बड़े इंफ्लुएंसर, सेलिब्रिटी से लेकर आम लोग इसका शिकार हो रहे हैं. नकली सामानों की बिक्री पर रिपोर्ट्स देने वाले संगठन इकॉनमिक को-ऑपरेशन एंड डेवेलपमेंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया भर में कुल सामानों में से 3.3 फीसदी नकली होते हैं. इन सामानों की कीमत 509 अरब डॉलर के आसपास बैठती है. हालांकि, कुछ आदतें अपनाकर कस्टमर आसानी से पहचान सकते हैं कि सामान असली है या नकली.

1. जरूरत से ज्यादा डिस्काउंट, मतलब झोल है!

सबसे पहला तरीका है, शक की बू. जो सामान खरीद रहे हैं अगर उसका दाम जरूरत से ज्यादा सस्ता मिल रहा है तो चौकन्ना हो जाएं. कई बार सामानों पर 70 फीसदी तक का डिस्काउंट भी दिख जाता है. अगर ये सामान रिफर्बिश्ड है, यानी दोबारा दुरुस्त करके बेचा जा रहा है तब तो भारी डिस्काउंट पचाया जा सकता है. मगर नए सामानों पर ही 70-80 फीसदी का डिस्काउंट दिखे तो इस पर शक जरूर करें.

इससे बचने का तरीका है अन्य साइट्स पर उसी सामान का दाम चेक कर लें. अगर वहां भी उसी दाम के आसपास सामान मिल रहा है, तब भरोसा किया जा सकता है. मगर सिर्फ एक ही वेबसाइट पर ज्यादा डिस्काउंट मिल रहा है तो सामान खरीदने से बचें.

2. सामान बेचने वाले की प्रोफाइल

एमेजॉन, फ्लिपकार्ट जैसी कंपनियां दुकानदारों और कस्टमर्स के बीच पुल भर हैं. विक्रेता अपने सामान लिस्ट करते हैं और ग्राहक उनसे सामान खरीदते हैं. आपने देखा होगा कि एक ही सामान के आगे तीन-चार दाम लिखे होते हैं. ये दाम अलग-अलग दुकानदारों की तरफ से दिए होते हैं. ज्यादातर लोग कम दाम वाले विक्रेता से सामान खरीदना पसंद करते हैं. लेकिन दाम के आधार पर सेलर चुनने से पहले उसके बारे में जानकारी जुटा लें.

कई ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स भरोसेमंद सेलर को वेरिफाई करते हैं. ओरिजनल सेलर्स के पास रजिस्टर्ड ट्रेडमार्क भी होता है. फिल्टर सेट कर उन सेलर्स को छांट सकते हैं जो वेरिफाइड हैं. कई बार सेलर का नाम देखकर भी फर्जी दुकानदार की पहचान कर सकते हैं. अगर सेलर का नाम XYZ… 123 टाइप दिखे तो बिना जांच पड़ताल के बिल्कुल न खरीदें.

3. सेलर के बारे में कैसे करें एन्क्वायरी

जिस सेलर से सामान खरीद रहे हैं, गूगल पर जाकर उस सेलर की आधिकारिक वेबसाइट चेक करें. अगर वेबसाइट नहीं है तो यही सबसे बड़ा लाल निशान है. अगर वेबसाइट दिख रही है, तो वहां कस्टमर केयर के कॉन्टैक्ट नंबर पर फोन करें. नकली वेबसाइट पर फोन नंबर तो दिए होते हैं मगर उन पर फोन नहीं जाता. इस तरह आप पहचान सकते हैं सेलर असली है या नकली.

4. रिव्यू भी फेक होते हैं

कोई भी सामान खरीदते समय रिव्यू चेक करना न भूलें. हालांकि, मार्केट में पैसों के बदले 5 स्टार रेटिंग पाने का भी उपाय मौजूद है. मगर ढेर सारे लिखे हुए रिव्यू खरीदना मुश्किल है. इसलिए रेटिंग की बजाय लिखे हुए रिव्यू को चेक करें. अगर कुछ ही दिनों के अंदर बहुत सारे पॉजिटिव रिव्यू दिए गए हैं तो इस पर शक जरूर करें. रिव्यू पोस्ट करने वाला असली यूजर है तो उसका नाम हम-आप जैसों से मिलता जुलता होगा.

5. रिटर्न की पॉलिसी चेक कर लें

अगर नकली सामान का शिकार बनने से बचना चाहते हैं, तो ऑर्डर देने से पहले रिटर्न पॉलिसी खंगाल कर देख लें. रिटर्न पॉलिसी चेक नहीं करना बाद में भारी पड़ सकता है. नियम शर्तें चेक करने से ये फायदा होगा कि गलती से नकली प्रोडक्ट खरीद लेने पर उसे वापस करने में दिक्कत नहीं होगी. वरना बाद में मालूम पड़ता है कि उस साइट ने तो रिटर्न या रिफंड की व्यवस्था नहीं दी है. ऐसे में जरा सी अनदेखी आपका अच्छा खासा नुकसान करा सकती है.

6. फोटो में छिपे होते हैं सबूत

अलग-अलग तकनीक का इस्तेमाल कर नकली फोटो बनवाना कोई बड़ी बात नहीं है. फर्जी सेलर किसी सामान की नकली फोटो डालकर लोगों को बेवकूफ बनाते हैं. अगर कस्टमर ने पहले पैसे दे दिए तो पेमेंट मिलते ही फर्जी कंपनियां जवाब देना बंद कर देती हैं. अगर किसी कस्टमर ने कैश ऑन डिलीवरी चुना है तो फर्जी दुकानदार पैकेट में कोई भी सस्ता सामान भरकर भेज देते हैं. सामान मिलते ही कस्टमर पैसे दे देता है. बाद में पैकेट खोलने पर पता चलता है कि सामान तो नकली है. इसलिए प्रोडक्ट्स की फोटो पर आंख मूंद कर भरोसा न करें. अगर थोड़ा भी शक हो तो सेलर को मेल या फोन करके और फोटो मांग सकते हैं. अगर उनकी तरफ से जवाब नहीं आता है तो उस प्रोडक्ट को डिलिवरी के बाद चेक करके ही पैसे दें.

7. पैकेजिंग भी चेक कर लें

जैसे ही सामान की डिलीवरी हो सबसे पहले उसकी पैकेजिंग चेक करें. अगर पैकेज फटा हुआ या पुराना दिखे तो हो सकता है आपको नकली माल चिपकाया जा रहा है. पैकेट पर लेबल की स्पेलिंग उल्टी सीधी लिखी हो तो भी डाउट करें. प्रोडक्ट नकली होने की आशंका दिख रही है तो सीधे रिटर्न की शिकायत दे दें.

8. सरकारी ऐप आएगा काम

इलेक्ट्रॉनिक्स सामानों के मामले में नकली सामानों का कारोबार तो काफी तेजी से बढ़ रहा है. फ्रिज से लेकर टीवी और स्मार्टफोन से लेकर हेडफोन तक के डुप्लिकेट मार्केट में खूब बेचे जाते हैं. ऐसे में असली और नकली का खेल प्रोडक्ट खरीदते समय ही पता चल जाए तो बला टले. इस काम में अंग्रेजी का R अक्षर आपकी खूब मदद कर सकता है. अंग्रेजी का R और कुछ नंबर्स, और पल भर में प्रोडक्ट की कुंडली आपके सामने.

BIS मतलब "भारतीय मानक ब्यूरो" (Bureau of Indian Standards). एक सरकारी संस्था जहां देश में बनने वाले और बिकने वाले प्रोडक्ट का पंजीकरण होना अनिवार्य है. BIS उपभोक्ता मामलों, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के अंदर काम करती है. यह ब्यूरो कई तरह के उत्पादों के लैब टेस्ट से लेकर हॉलमार्किंग का काम करता है. आसान भाषा में कहें तो अगर प्रोडक्ट पर BIS का ठप्पा लगा है, इसका मतलब है प्रोडक्ट असली है. यही ब्यूरो अब आपकी मदद करेगा असली और नकली प्रोडक्ट की पहचान करने में.

दरअसल, भारत में बिकने वाले प्रोडक्ट्स के बॉक्स पर BIS के लोगो के साथ आठ अंकों वाले (R-12345678) नंबर अंकित होते ही हैं. R मतलब प्रोडक्ट के रजिस्ट्रेशन से है. ये नंबर इस बात का प्रूफ है कि फलां प्रोडक्ट भारतीय मानक ब्यूरो से सर्टिफाइड है. इसलिए जब भी कोई उत्पाद खरीदें तो सबसे पहले लोगो और नंबर्स चेक करें. अगर ये नहीं तो उस प्रोडक्ट से दूरी भली. लेकिन जैसा हमने पहले कहा कि नकली प्रोडक्ट बनाने वाले तो ये लोगो भी लगा सकते हैं. ऐसे में आपके काम आएगा BIS का ऐप. इस पर प्रोडक्ट से जुड़े तमाम डिटेल्स चुटकियों में मिल जाते हैं. BIS Care App गूगल प्ले स्टोर और ऐप स्टोर पर डाउनलोड के लिए उपलब्ध है.

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