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गूगल के पास अरबों का कैश, फिर भी बाजार से क्यों उठा रहा भारी कर्ज? उदय कोटक के ट्वीट ने खोला बड़ा राज

Google के पास 12,000 करोड़ रुपये का कैश रिजर्व है. कंपनी बंपर मुनाफा कमा रही है. फिर भी बाजार से 8000 करोड़ रुपये डॉलर का नया फंड जुटाने की तैयारी हो रही है. दिग्गज बैंकर Uday Kotak के एक्स पोस्ट के मुताबिक ये फैसला भारतीय कंपनियों के लिए एक बड़ा वेक अप कॉल है.

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3 जून 2026 (अपडेटेड: 3 जून 2026, 11:37 AM IST)
google raising capital 2026
अरबों के मुनाफे के बाद भी गूगल कर रहा कैपिटल रेज (फोटो- Alphabet Inc)
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आपके पास दुनिया की सबसे अमीर कंपनियों में से एक हो. तिजोरी में इतना नकद पैसा (बोले तो कैश) पड़ा हो कि छोटे-मोटे देशों की जीडीपी (GDP) भी फीकी पड़ जाए. मुनाफा हर साल रिकॉर्ड तोड़ रहा हो. लेकिन फिर भी वो कंपनी बाजार से नया फंड या कैपिटल रेज करने निकल पड़े. तो सुनने में थोड़ा अजीब लगता है न? लेकिन ये कोई कहानी नहीं, बल्कि इस दौर की सबसे बड़ी टेक कंपनी गूगल (Google) यानी अल्फाबेट इंक (Alphabet Inc) का एकदम ताजा और कड़वा सच है.

गजब है भाई! आम आदमी सोचता है कि कर्ज तो वो लेता है जिसके पास पैसे की तंगी हो. लेकिन कॉर्पोरेट की दुनिया का खेला तो एकदम अलग ही होता है रे बाबा. अभी क्या है कि देश के दिग्गज बैंकर उदय कोटक ने सोशल मीडिया पर एक ऐसा ट्वीट दाग दिया है, जिसने पूरी बिजनेस की दुनिया में खलबली मचा दी.

अपने इस एक्स पोस्ट में कोटक साहब फरमाते हैं कि गूगल जैसी कैश सरप्लस कंपनी, जिसके पास पहले से ही अरबों डॉलर का कैश रिजर्व पड़ा है, वो अचानक 80 बिलियन डॉलर (करीब 8000 करोड़ रुपये) का नया कैपिटल रेज करने की घोषणा कर चुकी है. इससे पहले कि बात निकले और दूर तलक जा पहुंचे, जरा उदय कोटक का वो एक्स पोस्ट देख लेते हैं, जिसकी वजह से हम ये चर्चा कर रहे हैं.

ऐसे में सवाल उठता है गुरु कि सुंदर पिचाई साहब की कंपनी को इस समय इतने भारी-भरकम फंड की क्या जरूरत पड़ गई? जब खुद उनकी तिजोरी में 125 बिलियन डॉलर (करीब 12000 करोड़ रुपये) से ज्यादा का कैश रिजर्व पहले से ही सेफ पड़ा है, तो फिर बाजार से नया पैसा क्यों उठाया जा रहा है?

लल्लनटॉप के इस एक्सप्लेनर में हम इस पूरे खेल का एक-एक पुर्जा अलग करके समझाएंगे. आइए, देखते हैं कि सिलिकॉन वैली के इस फैसले के पीछे असली कहानी क्या है.

उदय कोटक के वो आंकड़े जो भारतीय कंपनियों के लिए हैं वेक-अप कॉल

हम तो कह रहे हैं कि जब उदय कोटक जैसे बड़े बैंकर कोई आंकड़ा सामने रखते हैं, तो उसे हल्के में नहीं लिया जा सकता. उन्होंने अपने एक्स पोस्ट में गूगल की ताकत का जो लेखा-जोखा दिया, वो किसी के भी होश उड़ाने के लिए काफी है. गूगल का सालाना मुनाफा करीब 160 बिलियन डॉलर (करीब 13,312 करोड़ रुपये) तक पहुंच चुका है.

यही नहीं सिर्फ एक तिमाही का प्रॉफिट ही 62 बिलियन डॉलर (करीब 5146 करोड़ रुपये) रहा है. कंपनी का कुल मार्केट कैप 4.5 ट्रिलियन डॉलर के आसपास मंडरा रहा है. भारतीय मुद्रा में बात करें तो ये रकम करीब-करीब 3 लाख 75 हजार करोड़ रुपये बैठती है.

ये आंकड़े कितने खौफनाक हैं, इसका अंदाजा आप इस बात से लगाइए कि गूगल का ये मुनाफा और मार्केट कैप भारत की सभी लिस्टेड कंपनियों को एक साथ मिला देने के बाद बनने वाले कुल मुनाफे और मार्केट कैप के बिल्कुल बराबर बैठता है. यानी एक तरफ पूरे इंडिया का कॉरपोरेट जगत और दूसरी तरफ अकेले गूगल का साम्राज्य.

उदय कोटक ने साफ कहा कि आईपीएल का तमाशा अब खत्म हो चुका है, और अब भारत के लिए 'बिजनेस ऑफ बिजनेस' पर फोकस करने का असली समय आ गया है. वैसे उदय भाई को IPL का नाम बीच में नहीं घसीटना था. बहुत सारे क्रिकेट प्रेमियों को झटका लग गया कि भईया, हमें काहे मारा…
 

Google
IPL बीच में कहां से आ गया ‘उदय (कोटक) भाई’

वैसे आईपीएल वाली बात को इग्नोर कर दें तो उदय भाई की बाकी बातें उन सभी कंपनियों के लिए एक बहुत बड़ी चेतावनी या वेक-अप कॉल है, जो आज के मुनाफे में खुश होकर बैठ जाती हैं. गूगल जैसी महाबली कंपनी हमें सिखा रही है कि चाहे आपका आज कितना भी शानदार क्यों न हो, भविष्य में टिके रहने के लिए लगातार भारी निवेश करना ही पड़ेगा.

AI का खौफनाक चक्रव्यूह जो निगल रहा है अरबों डॉलर

अब असली मुद्दे पर आते हैं कि आखिर गूगल को ये पैसा चाहिए क्यों? इसका सीधा और इकलौता जवाब है- आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई. ये इस दौर का सबसे महंगा और खर्चीला प्रोजेक्ट साबित हो रहा है. गूगल का अपना एआई मॉडल जेमिनी (Gemini) इस समय पूरी दुनिया में छाया हुआ है, लेकिन इसे बैकएंड पर जिंदा रखने की कीमत बहुत भारी है. फेमेक्स (Phemex) की रिपोर्ट कहती है कि गूगल बाबा अपने इनवेस्टमेंट का बड़ा हिस्सा AI में लगा रहे हैं.

एआई को चलाने के लिए सिर्फ एक लैपटॉप या कुछ कोडिंग की जरूरत नहीं होती. इसके लिए पूरी दुनिया में फैले बड़े-बड़े जंबो डेटा सेंटर्स चौबीसों घंटे काम करते हैं. इन डेटा सेंटर्स को ठंडा रखने और चलाने के लिए इतनी भारी बिजली की खपत होती है कि बड़े-बड़े शहरों की बिजली भी कम पड़ जाएं.

ऊपर से एआई के लिए इस्तेमाल होने वाली चिप्स, जैसे एनवीडिया की जीपीयू चिप्स, इस समय सोने के भाव बिक रही हैं. एक-एक चिप की कीमत लाखों-करोड़ों में है, और इनकी डिमांड इतनी ज्यादा है कि कंपनियों को लाइन में लगना पड़ रहा है.

गूगल बहुत अच्छे से जानता है कि अगर वो इस समय एआई की रेस में माइक्रोसॉफ्ट या चैटजीपीटी बनाने वाली ओपनएआई से पीछे छूट गया, तो उसका पूरा सर्च इंजन का धंधा एक झटके में चौपट हो सकता है. इस रेस में बने रहने के लिए हर महीने अरबों डॉलर पानी की तरह बहाने पड़ रहे हैं. ये कोई साधारण खर्च नहीं है, बल्कि ये भविष्य के अस्तित्व की लड़ाई है.

तिजोरी का कैश बचाकर बाजार से पैसा उठाने की असली चालाकी

अब आप सोचेंगे कि भाई जब पैसे खर्च ही करने हैं, तो अपनी तिजोरी में रखे 125 बिलियन डॉलर में से क्यों नहीं कर देते? बाजार से 80 बिलियन डॉलर का नया कैपिटल रेज करने की क्या तुक है? तो गुरु, यहीं पर कॉर्पोरेट फाइनेंस की असली चालाकी समझ में आती है.

बिजनेस का एक पुराना नियम है- मंदी या अनिश्चितता के दौर में अपनी जेब का नकद पैसा कभी खत्म नहीं करना चाहिए. मीडियम (Medium) की रिपोर्ट कहती है कि गूगल भी अपना कैश रिजर्व किसी भी संभावित आर्थिक मंदी, तकनीकी बदलाव या बाजार की अनिश्चितताओं से निपटने के लिए बचा कर रख रहा है. एक तरह से कंपनी इस पूंजी को एक वित्तीय सुरक्षा कवच के तौर पर इस्तेमाल करने के मूड में है.

गूगल अपने मुख्य कैश रिजर्व को पूरी तरह से सुरक्षित रखना चाहता है ताकि कल को अगर मार्केट में कोई बड़ा क्रैश आए या कोई नई कंपनी अचानक उनके सामने चुनौती बनकर खड़ी हो जाए, तो उनके पास तुरंत एक्शन लेने के लिए 'लिक्विड कैश' मौजूद रहे. इसे कॉर्पोरेट की भाषा में 'वार चेस्ट' यानी युद्ध की तिजोरी कहा जाता है.

टाइम्स ऑफ इंडिया की मानें तो Google भविष्य की तकनीकों, नए स्टार्टअप्स के रणनीतिक अधिग्रहण और रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) के लिए भारी मात्रा में लिक्विड फंड तैयार रख रही है.

टैक्स बचाने का जुगाड़

ऐसा नहीं है कि हम मीडिल क्लास वाले ही टैक्स बचाने की निंजा टेक्नीक खोजते रहते हैं. बड़ी-बड़ी कंपनियों को भी जहां मौका मिलता है, टैक्स का पइसा बचाने से नहीं चूकती. गूगल का अपने कैश रिजर्व को हाथ ना लगाने के पीछे दूसरा बड़ा फैक्टर भी टैक्स और ब्याज दरों का गणित है.

कई बार अपनी तिजोरी से पैसा निकालने पर कंपनियों को भारी टैक्स चुकाना पड़ता है, जबकि बाजार से कैपिटल रेज करना या बॉन्ड जारी करना वित्तीय रूप से ज्यादा फायदेमंद साबित होता है. दुनिया भर के बड़े निवेशक गूगल जैसी मजबूत कंपनी पर आंख बंद करके पैसा लगाने को तैयार बैठे हैं. जब बाजार आपको बेहद आसान शर्तों पर पैसा देने के लिए लाइन लगाकर खड़ा हो, तो अपनी जेब का पैसा फंसाने की बेवकूफी कोई बड़ी कंपनी नहीं करती. गूगल इसी रणनीति के तहत अपनी तिजोरी को हाथ लगाए बिना एआई के मैदान में अपनी बादशाहत कायम रखने के लिए फंड जुटा रहा है.

वीडियो: ओपन AI और गूगल gemini में कौन आगे? जॉर्ज नोबल ने सब बता दिया

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