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ईरान युद्ध टलने से शेयर मार्केट में बहार, लेकिन पैसे लगाना सेफ है या नहीं?

बुधवार, 8 अप्रैल को बीएसई सेंसेक्स 2946 अंक उछलकर करीब 77,563 अंक पर बंद हुआ. ट्रंप ने ट्रूथ सोशल पर लिखा है कि ईरान दो सप्ताह के लिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से सुरक्षित आवागमन की अनुमति देने पर सहमत हो गया है.

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8 अप्रैल 2026 (पब्लिश्ड: 09:17 PM IST)
Share market rally
8 अप्रैल को बीएसई सेंसेक्स 2946 अंक उछलकर करीब 77, 563 अंक पर बंद हुआ (फोटो क्रेडिट: Business Today)
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ईरान युद्ध 2 हफ्तों के लिए क्या टला भारत के शेयर बाजार में बहार लौट आई. बुधवार, 8 अप्रैल को बीएसई सेंसेक्स 2946 अंक उछलकर करीब 77,563 अंक पर बंद हुआ. ट्रंप ने ट्रूथ सोशल पर लिखा है कि ईरान दो सप्ताह के लिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से सुरक्षित आवागमन की अनुमति देने पर सहमत हो गया है. ईरान ने भी इस शर्त पर सीजफायर किया है कि अगले दो हफ्ते उस पर कोई हमला नहीं किया जाएगा. 

इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस घोषणा से तेल की कीमतें गिर गईं. बुधवार को दोपहर 3:40 बजे (भारतीय समयानुसार) ब्रेंट क्रूड वायदा लगभग 14% गिरकर 94.36 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया, जबकि डब्ल्यूटीआई क्रूड 18% से अधिक गिरकर 94.69 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया.

लेकिन क्या केवल युद्ध रुकने से शेयर मार्केट के अच्छे दिन आ गए या अभी और चुनौतियों से जूझना बाकी है?

युद्ध टलने से बाजार को कितना फायदा?

ब्रोकरेज फर्म अविनाश मेंटर के रिसर्च फाउंडर और रिसर्च हेड अविनाश गोरक्षकर ने लल्लनटॉप से बातचीत में कहा कि जब भी जियो-पॉलिटिकल तनाव कम होता है, तो निवेशकों का डर घटता है और वे फिर से खरीदारी शुरू करते हैं. यही इस बार भी हुआ है. युद्ध के रुकने से सबसे बड़ा असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ा है. कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गया है. भारत के लिए यह काफी राहत की बात है जो अपनी जरूरत का करीब 85-89 परसेंट कच्चा तेल विदेश से खरीदता है. 

अविनाश का कहना है कि कच्चे तेल का भाव गिरने से महंगाई कम रहने का अनुमान है. साथ ही चालू खाता घाटे को काबू रखने में मदद मिलने की संभावना है. लेकिन अभी यह राहत स्थायी नहीं है, क्योंकि युद्ध पूरी तरह खत्म नहीं हुआ.

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दिक्कत अभी खत्म क्यों नहीं हुई?

पीएचडी कैपिटल के फाउंडर और सीईओ प्रदीप हल्दर ने लल्लनटॉप से कहा कि डॉनल्ड ट्रंप पहले ही कई देशों पर टैरिफ लगा चुके हैं. अगर वे इन टैरिफ को नहीं हटाते हैं तो भारतीय एक्सपोर्टर पर दबाव बना रह सकता है. इससे कंपनियों की कमाई पर असर पड़ने की आशंका है. 

प्रदीप हल्दर आगे कहते हैं, “भारत की आईटी कंपनियों जैसे इंफोसिस (Infosys), टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज  (TCS) अमेरिका जैसे प्रमुख बाजार पर काफी निर्भर हैं. अगर H1B वीजा नियम सख्त बने रहते हैं तो इन कंपनियों को अमेरिका में लोकल कर्मचारियों को ज्यादा सैलरी पर रखना पड़ेगा, जिससे उनकी लागत बढ़ेगी और मुनाफा घट सकता है. इसका सीधा असर शेयर प्राइस पर दिखेगा. शेयर बाजार में IT सेक्टर इंडेक्स का बड़ा वेटेज है.”

वहीं अविनाश गोरक्षकर का कहना है कि पिछले कुछ महीनों से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने भारतीय शेयर बाजार से काफी पैसा निकाला है. वैश्विक अनिश्चितता बढ़ते ही ये निवेशक फिर से पैसा निकाल सकते हैं, जिससे बाजार में उतार-चढ़ाव बना रहेगा. उनके मुताबिक बाजार की मौजूदा तेजी को 'बुल रन' की शुरुआत मानना जल्दबाजी होगी.

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निवेशकों को क्या करना चाहिए ?

पीएचडी कैपिटल के फाउंडर प्रदीप हल्दर का मानना है कि ट्रंप की बातों पर भरोसा करना जल्दबाजी होगी. अतीत में देखें तो वे अपनी बातों से हमेशा पलटते रहे हैं. हालांकि दो हफ्ते युद्ध टलने की खबर बाजार के लिए अच्छा संकेत है, लेकिन रिटेल इन्वेस्टर्स को अभी सतर्क रुख रखना चाहिए.

अगर युद्ध पूरी तरह थमता है तो ही शेयर बाजार में निवेश की सलाह है. प्रदीप कहते हैं, “ब्रेंट क्रूड 80 डॉलर के आसपास आता है तो बाजार में तेजी का दौर लौटेगा. वहीं जो निवेशक बाजार में निवेश करना चाहते हैं वह बैंक निफ्टी में स्टॉपलास के साथ रणनीति बना सकते हैं.”

ब्रोकरेज फर्म एचडीएफसी सिक्योरिटीज के एमडी और सीईओ धीरज रेली ने इकोनॉमिक टाइम्स के एक प्रोग्राम में कहा कि कच्चे तेल की कीमतें शेयर बाजारों और पूरी अर्थव्यवस्था के लिए एक प्रमुख रिस्क फैक्टर के रूप में उभर रही हैं. इससे निकट भविष्य में वैश्विक अनिश्चितता बनी रहने की संभावना है.

वीडियो: अमेरिका और ईरान के बीच 14 दिनों तक हमले रुके, ट्रंप ने क्या कहा?

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