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चीन दो नियमों से भारत को 'ग्लोबल फैक्ट्री हब' बनने से रोक रहा, रास्ता क्या है?

जैसे-जैसे भारत मैन्युफैक्चरिंग पर अपना फोकस बढ़ा रहा है वैसे-वैसे चीन अपनी रणनीति बदल रहा है. चीन के नए स्टेट काउंसिल डिक्रीज 834 और 835 ने भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स और ऑटो सेक्टर में चिंता पैदा कर दी है.

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25 मई 2026 (पब्लिश्ड: 06:48 PM IST)
India China Trade
वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने 4.75 लाख करोड़ रुपये कीमत इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट किया (फोटो क्रेडिट: Business Today)
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कोरोना महामारी के बाद से भारत खुद को चीन के विकल्प के तौर पर तैयार कर रहा है. भारत ने खुद को ‘दुनिया की अगली फैक्ट्री’ के तौर पर पेश किया है. इसका फायदा भी मिलता दिखा. iPhone बनाने वाली कंपनी एपल के सप्लायर ने भारत में अपनी मैन्युफैक्चरिंग बढ़ाई. साथ ही कई सेमीकंडक्टर से जुड़ी स्कीम्स का ऐलान किया गया. नए औद्योगिक केंद्र बनाने का वादा किया गया.

भारत का इलेक्ट्रॉनिक एक्सपोर्ट रिकॉर्ड ऊंचाई पर

एनडीटीवी की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि कोरोना के बाद दुनिया की बड़ी-बड़ी कंपनियों की रणनीति में बदलाव से भारत को फायदा मिला. एपल समेत दूसरी कंपनियों ने भारत में अपना कारोबार बढ़ाया. इसके चलते भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट साल 2025 में पहली बार रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया. वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने 47 अरब डॉलर (करीब 4.75  लाख करोड़ रुपये) मूल्य का इलेक्ट्रॉनिक एक्सपोर्ट किया. साल 2015 में यह 8.6 अरब डॉलर (करीब 82 हजार करोड़ रुपये) था.

आगे भी एक्सपोर्ट और बढ़ने की संभावना बढ़ी है. इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) को उम्मीद है कि साल 2026 के अंत तक इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात 120 अरब डॉलर (करीब 11 लाख 42 हजार 500 करोड़ रुपये) तक पहुंच जाएगा.

चीन का सप्लाई चेन पर तगड़ा नियंत्रण 

जैसे-जैसे भारत मैन्युफैक्चरिंग पर अपना फोकस बढ़ा रहा है वैसे-वैसे चीन अपनी रणनीति बदल रहा है. एनडीटीवी की रिपोर्ट बताती है कि चीन के नए स्टेट काउंसिल डिक्रीज 834 और 835 ने भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स और ऑटो सेक्टर में चिंता पैदा कर दी है. ये असल में दो नए नियम हैं जिनके जरिये चीन ने सप्लाई चेन और औद्योगिक मशीनों के एक्सपोर्ट पर पाबंदियां लगाई हैं. 

मनीकंट्रोल की एक रिपोर्ट बताती है कि इन दोनों नियमों के जरिये चीन की सरकार अपने देश की मल्टीनेशनल कंपनियों की सप्लाई चेन को बाहर ट्रांसफर होने से रोकना चाहती है. ये नियम चीन के बाहर औद्योगिक मशीनरी के एक्सपोर्ट पर प्रतिबंध लगाते हैं.

ऐसे में उद्योग जगत के अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि जरूरी मशीनरी और इन मशीनों के पुर्जों के निर्यात पर चीन के प्रतिबंधों से भारत में फैक्ट्रियां बनाने में मुश्किल आ सकती है. निवेश में देरी हो सकती है. यानी चिंता एकदम साफ है. अगर भारत के पास फैक्ट्रियां बनाने के लिए मशीनें और उपकरण नहीं होंगे तो क्या भारत खुद को मैन्युफैक्चरिंग के मामले में बड़े स्तर पर बढ़ा पाएगा?

वहीं, जानी-मानी इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के अधिकारियों ने कहा कि नए नियमों से मशीनरी और इसके उपकरणों की खेप पर पड़ने वाले प्रभावों को समझने के लिए चीनी सप्लायर के साथ पहले से ही बातचीत चल रही है. घरेलू उद्योग ने भी सरकार से संपर्क कर इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी पर पड़ने वाले संभावित नुकसानों के बारे में चिंता जताई है.

भारत के लिए ये बुरा समय

चीन की तरफ से क्रिटिकल मिनरल्स, रेयर अर्थ मैग्नेट्स और नई मैन्युफैक्चरिंग टेक्नोलॉजी के एक्सपोर्ट पर अंकुश लगाने का फैसला ऐसे समय में आया है जब भारत अपना एक्सपोर्ट बढ़ाने  और मेड इन इंडिया प्रोडक्ट्स को बड़े पैमाने पर बढ़ावा दे रहा है. इसी समय देश ईरान युद्ध के साइड इफेक्ट भी झेल रहा है. इसके अलावा अल नीनो की संभावना के चलते भारत में कृषि उत्पादन और इससे होने वाली कमाई पर बुरा असर पड़ने की आशंका है. 

हालांकि भारत सरकार ईरान युद्ध की वजह से हो रहे नुकसान से निपटने के लिए योजना बना रही है. इंडस्ट्रियल इंफ्रास्ट्रक्चर पर बड़ा दांव लगाया जा रहा है. 33,660 करोड़ रुपये की लागत से तैयार होने वाली भारत औद्योगिक विकास योजना (भव्या) के तहत, सरकार अगले तीन साल में 50 औद्योगिक पार्कों को चालू करने की तैयारी कर रही है. इसके अलावा भी कई उपाय किये जा रहे हैं. लेकिन चीन के हालिया कदमों (मशीनरी एक्सपोर्ट में पाबंदी) ने भारत को मुश्किल में फंसा दिया है. 

चीन के नए निर्यात नियमों से सभी सेक्टर पर दबाव

भारत स्मार्टफोन से लेकर इलेक्ट्रिक वाहनों तक के लिए आज भी काफी हद तक चीन से आने वाली मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स आइटम्स और कच्चे माल पर निर्भर है. अकेले ऑटो सेक्टर की बात करें तो वित्त वर्ष 2024-2025 में भारत में जितने भी गाड़ियों के पुर्जे आयात हुए उनमें करीब 26 पर्सेंट चीन से आयात हुए हैं. 

कार्स अनलिमिटेड के फाउंडर मुस्तफा सिंगापुरवाला ने एनडीटीवी से कहा, "भारत की ऑटोमोटिव कहानी को शोरूम में ही नहीं, बल्कि सप्लाई चेन में भी नए सिरे से लिखा जा रहा है. आज की कारों में 3,000 तक सेमीकंडक्टर्स (चिप्स) हो सकते हैं. सप्लाई कम होने पर न केवल कीमतें बढ़ती हैं, बल्कि इन गाड़ियों की लॉन्चिंग में देरी होती है. गाड़ियों का वेटिंग पीरियड लंबा होता है और सुविधाओं में भी कमी आती है."

मुस्तफा ने चेतावनी दी कि चीन के नए नियम अब केवल ट्रेड में रुकावट खड़ी नहीं कर रहे बल्कि कई और तरह के नुकसान कर रहे हैं. उन्होंने कहा, “चीन के नए सप्लाई चेन संबंधी फरमानों के तहत नियामक कंपनियों और यहां तक ​​कि उनके अधिकारियों को भी चीन से बाहर उत्पादन ट्रांसफर करने पर व्यक्तिगत रूप से दंडित कर सकते हैं. यह कोई बातचीत की रणनीति नहीं है. यह एक ढांचागत खतरा है.” 

इस दबाव का असर पहले से ही सभी क्षेत्रों में महसूस किया जा रहा है. NXTCELL Mobility के सीईओ अतुल विवेक ने एनडीटीवी कहा कि ये प्रतिबंध इस बात की याद दिलाते हैं कि भारत को मजबूत घरेलू  सप्लायर नेटवर्क और ज्यादा सुविधाजनक सप्लाई चेन की जरूरत है. एलईडीएक्स टेक्नोलॉजी और एक्सट्रीम मीडिया के एमडी संकेत रामभिया कहते हैं कि किसी एक मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर अत्यधिक निर्भरता अब टिकाऊ नहीं है.

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