ईरान युद्ध ने भारत के शेयर बाजार को दी तगड़ी चोट, 400 से ज्यादा कंपनियों के शेयर 40% तक लुढ़के
Share Market: कोरोना महामारी के बाद पहली बार किसी महीने में बाजार इतना गिरा है. मार्च की शुरुआत से अब तक बेंचमार्क निफ्टी लगभग 8% गिर चुका है. पिछले 10 साल में यह दूसरा सबसे बड़ा मासिक गिरावट वाला महीना बन गया है.

अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी जंग भारत के शेयर बाजार पर भारी पड़ रही है. बीते कुछ सालों में भारत का शेयर बाजार इतना कभी नहीं गिरा, जितना युद्ध शुरू होने के बाद से गिरा है. जंग शुरू होने के बाद से 400 से ज्यादा कंपनियों के शेयरों में दोहरे अंकों (10%) तक की गिरावट आई है. इस गिरावट की मार से कोई भी अछूता नहीं रहा है. इसकी मार लार्जकैप, मिडकैप या स्मॉलकैप सभी क्षेत्रों की कंपनियों के शेयरों में पड़ी है.
40% तक लुढ़के शेयरइकोनॉमिक टाइम्स की खबर की रिपोर्ट के मुताबिक, इन 400 से ज्यादा कंपनियों में अलग-अलग सेक्टर की कंपनियां शामिल हैं. रिपोर्ट में एस इक्विटी (Ace Equity Data) के हवाले से बताया गया कि ईरान युद्ध के बाद से अब तक इंफोबीन्स टेक्नोलॉजीज, एक्वैलॉन नेक्सस, एसईपीसी, रेन इंडस्ट्रीज और राजेश एक्सपोर्ट्स जैसे शेयरों में 23% से 40% से अधिक की गिरावट आई है. ACE Equity Data फाइनेंशियल डेटाबेस मुहैया कराने वाली कंपनी है.
आंकड़ों के मुताबिक इंफोबीन्स टेक्नोलॉजीज में 40% से अधिक की गिरावट आई है. एक्वैलॉन नेक्सस में 30% से अधिक की गिरावट दर्ज की गई है. इंजीनियरिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर फर्म SEPC में लगभग 29% की गिरावट आई है. रेन इंडस्ट्रीज (Rain Industries) और राजेश एक्सपोर्ट्स (Rajesh Exports) में क्रमशः 24% और 23% से अधिक की गिरावट आई है.
मिडकैप और स्मालकैप शेयर औंधे मुंह गिरेकई मिडकैप और स्मॉलकैप टेक्नोलॉजी और सर्विसेज फर्मों को भी भारी नुकसान हुआ है. केएस स्मार्ट टेक्नोलॉजीज में 23% से अधिक की गिरावट आई है, जबकि नेटवर्क पीपल सर्विसेज टेक्नोलॉजीज में लगभग 23% की गिरावट आई है.
डेक्कन गोल्ड माइंस और कैपेसिट इंफ्राप्रोजेक्ट्स में 21% से अधिक की गिरावट आई है. ऑटोमोबाइल और ऑटो कंपोनेंट कंपनियां भी दबाव में हैं. लुमैक्स इंडस्ट्रीज, रिको ऑटो इंडस्ट्रीज, जमना ऑटो इंडस्ट्रीज और लुमैक्स ऑटो टेक्नोलॉजीज के शेयरों में 18% से 20% तक की गिरावट आई है.
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बैकिंग शेयरों में भारी गिरावटपश्चिम एशिया में जारी लड़ाई से बैकिंग सेक्टर भी मार पड़ी है. आंकड़ों के मुताबिक सिटी यूनियन बैंक, इंडसइंड बैंक, आईडीएफसी फर्स्ट बैंक, बैंक ऑफ इंडिया और यूको बैंक सहित कई बैंकों और वित्तीय संस्थानों को 14% से 18% तक का नुकसान हुआ है.
ब्लूचिप शेयरों तक पहुंची आंचयह गिरावट प्रमुख ब्लू-चिप शेयरों तक भी फैल गई है. अल्ट्राटेक सीमेंट, आयशर मोटर्स, मारुति सुजुकी, गोदरेज कंज्यूमर प्रोडक्ट्स और बजाज फाइनेंस के शेयर 14% से 16% तक गिर गए हैं. इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन, भारत पेट्रोलियम, टाटा स्टील और गेल जैसी मेटल, एनर्जी और कमोडिटी कंपनियों के शेयर भी 13% से 17% तक फिसल गए हैं.
कोरोना के बाद सबसे बड़ी मंथली गिरावटरिपोर्ट बताती है कि कोरोना महामारी के बाद पहली बार किसी महीने में बाजार इतना गिरा है. मार्च की शुरुआत से अब तक बेंचमार्क निफ्टी लगभग 8% गिर चुका है. पिछले 10 साल में यह दूसरा सबसे बड़ा मासिक गिरावट वाला महीना बन गया है. इससे पहले सबसे बड़ी गिरावट मार्च 2020 में हुई थी, जब कोरोना संकट के चरम पर निफ्टी लगभग 23% टूट गया था.
इसके अलावा बंबई शेयर बाजार सेंसेक्स पिछले हफ्ते (9-13 मार्च 2026) में लगभग 4,000 अंक लुढ़क गया. निफ्टी केवल पांच कारोबारी सत्रों में लगभग 5% गिर गया. मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों पर खासा बुरा असर पड़ा है. शुक्रवार को निफ्टी मिडकैप सूचकांक 4.59% और स्मॉलकैप सूचकांक 3.66% गिर गया.
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इतनी बुरी तरह क्यों टूट रहे शेयरभारत के शेयर मार्केट में गिरावट का पहला बड़ा कारण अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी युद्ध है. सप्लाई में कमी से कच्चे तेल की कीमतों में तेजी से उछाल आया है और ब्रेंट क्रूड की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई हैं. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते से आयात में आ रही रुकावटें भारत के लिए काफी मायने रखती हैं. भारत विदेशों से अपनी जरूरत का करीब 85 परसेंट तेल खरीदता है. बड़ी मात्रा में ये तेल इसी रास्ते से आता है. कच्चे तेल के दाम उछलने से महंगाई भड़कने की आशंका बनी हुई है. इस वजह से कंपनियों के मुनाफे पर दबाव पड़ सकता है और चालू खाता घाटा बढ़ सकता है. इसलिए निवेशक बाजार से पैसा निकाल रहे हैं.
इसके अलावा विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) बड़े पैमाने पर भारत के शेयर बाजार से पैसा निकाल रहे हैं. विदेशी निवेशकों ने इस महीने अब तक लगभग 50,000 करोड़ रुपये की कीमत के शेयर बेचे हैं. बढ़ती भू-राजनीतिक अनिश्चितता और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेजी के बीच वैश्विक निवेशक सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं. विदेशी निवेशक अपना पैसा डॉलर में निकालते हैं. इस वजह से डॉलर की मांग बढ़ी तो रुपये में कमजोरी और बढ़ गई है.
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