E20 पेट्रोल के बाद सरकार सीधा E85 फ्यूल क्यों ले आई? E22, E30 का क्या हुआ?
सरकार ने E20 फ्यूल अनिवार्य करने के बाद E22 से लेकर E30 फ्यूल के लिए नोटिफिकेशन जारी किया था. मगर उसके पहले फ्लेक्स फ्यूल लॉन्च (Can flex fuel cut your petrol bill) कर दिया. E20 के बाद भी देश में पेट्रोल 100 के ऊपर है जबकि फ्लेक्स फ्यूल तकरीबन 20 रुपये सस्ता है. मतलब 20 फीसदी कम. क्या ये ब्राजील मॉडल है?

आखिरकार देश में E85 फ्यूल, बोले तो फ्लेक्स फ्यूल लॉन्च हो गया. बीती 6 जून की शाम सरकार ने देश का पहला E85 फ्यूल पंप ओपन किया. दिल्ली में खुले इंडियन ऑइल के इस पंप पर मिलने वाले पेट्रोल का दाम 82.12 लीटर है. लेकिन सरकार तो E22 से लेकर E27 और E30 फ्यूल के लिए नोटिफिकेशन जारी कर चुकी है, तो फिर सीधे E85 पर (Can flex fuel cut your petrol bill) डुबकी क्यों?
फ्लेक्स फ्यूल के पीछे क्यों है सरकार?फ्लेक्स फ्यूल, पेट्रोल और मेथनॉल या इथेनॉल के मिश्रण से बना एक वैकल्पिक ईंधन है. फ्लेक्स-फ्यूल वाली गाड़ियों के इंजन (flex-fuel vehicle (FFV) एक से ज्यादा तरह के ईंधन पर चलने के लिए डिजाइन किए जाते हैं. ऐसे इंजन E20 से लेकर E85 ब्लेन्ड वाले फ्यूल को सपोर्ट करते हैं. ऐसे इंजन E100 माने सिर्फ इथेनाल वाले फ्यूल पर भी रन कर सकते हैं.
ये तो वो जानकारी है जो हम लगातार बता रहे. लेकिन जैसे सरकार ने पहले E5, फिर E10 फ्यूल लॉन्च किया और फिर E20 अनिवार्य किया, तो उस हिसाब से अब E22 और E30 आना चाहिए था. लेकिन लॉन्च E85 हुआ.
ब्राजील में मिलेगा उत्तरसरकार फ्लेक्स फ्यूल के पीछे क्यों पड़ी है उसका जवाब हमें फुटबॉल और कार्निवाल के देश ब्राजील में मिलेगा. ब्राजील फ्लेक्स फ्यूल की सफलता का सबसे बड़ा उदाहरण हैं. इस देश में साल 2003 से ही इस फ्यूल वाली गाड़ियां चल रही हैं. ब्राजील का जिक्र इसलिए भी क्योंकि हमारे मंत्री भी जब तब इसी देश का उदाहरण देते हैं. लेकिन असल कहानी उसके पहले की है.
चीनी वाकई कम हो गई
70 के दशक के मध्य की बात है, जब दुनिया भर में फ्यूल सप्लाई का संकट आया था. ब्राजील ने इससे निपटने के लिए National Alcohol Program या Pró-Álcool प्रोग्राम लॉन्च किया. गन्ने की खेती देश में बहुत थी तो जल्द ही देश में पहली Fiat model 147 कार भी आ गई, जो E25 पेट्रोल से चलती थी. अगले दो दशक में अलग-अलग इथेनॉल वाली गाड़ियां देश में चलने लगीं. बाहर से सब ठीक था, मगर फ्यूल में इथेनॉल की मिलावट का असर चीनी के उत्पादन पर पड़ने लगा.
देश में चीनी भयंकर तरीके से महंगी हो गई. दूसरी तरफ अलग-अलग इथेनॉल वाली गाड़ियों में भी टूटफूट से लेकर कई और दिक्कतें आने लगीं. क्योंकि पुरानी गाड़ियों में भी नया फ्यूल ही डलता था. ये एकदम वैसा है जैसा अभी हमारे यहां 2023 से पहली की गाड़ियों में हो रहा है. वे E20 फ्यूल के हिसाब से बनी ही नहीं हैं.
सरकार जब चारों तरफ से परेशान हो गई तो उसने 2003 में फ्लेक्स फ्यूल और उसके हिसाब की गाड़ियां लॉन्च कीं. अब दो दशक से ज्यादा समय बीत जाने के बाद वहां यही फ्यूल और इससे चलने वाली गाड़ियों का बोलबाला है. वैसे वहां ग्राहकों को नॉर्मल से लेकर अलग-अलग इथेनॉल वाले फ्यूल भरवाने का भी ऑप्शन मिलता है. हमारी सरकार को भी पता है कि E22, E30 से तो और दिक्कत होगी, इसलिए सबसे अच्छा यही होगा कि फ्लेक्स फ्यूल लाया जाए. फिर गाड़ी कोई सी हो, टेंशन नहीं होगी.
गणित भी फ्लेक्स फ्यूल के पक्ष मेंऐसा माना जा रहा था कि पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने से पेट्रोल का दाम कम होगा, मगर ऐसा हुआ नहीं. E20 के बाद भी देश में पेट्रोल 100 के ऊपर है जबकि फ्लेक्स फ्यूल तकरीबन 20 रुपये सस्ता है. मतलब 20 फीसदी कम. लेकिन बाजार के एक्सपर्ट का कहना है कि इथेनॉल फ्यूल से चलने वाली गाड़ियां काम माइलेज देती हैं तो ये फर्क 30 फीसदी होना चाहिए, तभी इसका फायदा होगा. माने फ्लेक्स फ्यूल 70 रुपये के अल्ले-पल्ले मिलेगा तो बात बनेगी.
यहां भी ब्राजील ही ट्रेंड सेटर है. वहां अभी नॉर्मल पेट्रोल Brazilian real में R$6.30 (करीब 116 रुपये) प्रति लीटर है तो इथेनॉल मिक्स फ्यूल R$4.70 (86 रुपये) प्रति लीटर. यानी अगर माइलेज कम मिलने के चक्कर में ज्यादा फ्यूल जलाना भी पड़ा तो जेब पर असर नहीं पड़ेगा. भारत में भी सरकार 2027 के अंत तक 5000 फ्लेक्स फ्यूल पंप लगाने का इरादा रखती है. हो सकता है इसके बाद अंतर वाकई 30 फीसदी के आसपास का हो.
संभवतः इसलिए हमारी सरकार का फोकस भी फ्लेक्स फ्यूल है. लेकिन बड़ा सवाल है कि नई किस्म की कारों को आने में समय कितना लगेगा? देशभर की सड़कों पर इस समय करोड़ों गाड़ियां दौड़ रही हैं, जो फ्लेक्स फ्यूल फ्रेंडली नहीं हैं. उन्हें रिप्लेस होने में दशकों का समय लग सकता है. तब तक सरकार और कंपनियां क्या वैकल्पिक समाधान लेकर आएंगी, देखना होगा.
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