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2019 फतह करने के लिए पीएम मोदी को तोड़ना होगा इस नेता का तिलिस्म

ऐसा माना जा रहा था कि पीएम नरेंद्र मोदी के खिलाफ 2019 तक कोई विपक्ष खड़ा ही नहीं होगा.

पर एक नाम सामने आ रहा है. 2014 के बेंच पर के प्रधानमंत्री उम्मीदवार नीतीश कुमार ने बेहद सधी हुई शुरुआत कर दी है. राष्ट्रपति चुनाव को लेकर जद यू नेता नीतीश गांधी परिवार के घर 10 जनपथ जाकर सोनिया गांधी से मिले हैं. पर ये मीटिंग सिर्फ इसी चुनाव को लेकर नहीं है. कुछ बातें हुई हैं. हाल के दिनों में भाजपा के विजय-रथ के सामने विपक्ष औंधे मुंह लेटा हुआ नजर आ रहा है. पर नीतीश एक तगड़ी उम्मीद जगा रहे हैं.

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ये रही 5 वजहें जो बताती हैं क्यों 2019 में नीतीश कुमार एक तगड़ी चुनौती पेश करेंगे:

1. नीतीश कुमार ने वो गलती नहीं की है, जो अरविंद केजरीवाल समेत बाकी नेता कर चुके हैं

एक दूर की कौड़ी के तौर पर अरविंद केजरीवाल को भविष्य में विपक्ष के पीएम उम्मीदवार के रूप में देखा जा रहा था. पर लगातार नरेंद्र मोदी पर हमले कर के अरविंद पीछे हो गए हैं. फिर पंजाब और गोवा में करारी हार के बाद उनकी राजनीति पर निशान लग गया है. राजौरी गार्डन के उपविधानसभा चुनाव में आप पार्टी की जमानत जब्त हो गई. पर नीतीश कुमार ने बुद्धिमता का परिचय दिया है. नरेंद्र मोदी के कामों की बड़ाई कर उन्होंने जनता को अपने खिलाफ नहीं होने दिया है. वो बार-बार ये दिखाते रहते हैं कि विकास को लेकर वो चिंतित हैं.

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डिमॉनीटाइजेशन के मुद्दे पर भी उन्होंने नरेंद्र मोदी की बड़ाई की. बाकी नेताओं ने आलोचना कर जनता को अपने खिलाफ कर लिया. नीतीश कुमार जनता के मूड को भांपने में कामयाब रहे हैं.

2. विपक्ष के पास ऐसा कोई नेता नहीं है, जो भाजपा के एजेंडे का सामना कर सके

विपक्ष ने अपना ध्यान मोदी पर ही रखा है. वहीं मोदी लगातार फैसले लेकर विपक्ष को पीछे धकेल देते हैं. सोनिया गांधी से अपनी मुलाकात के बाद नीतीश कुमार ने ये कहा कि विपक्ष को अपना एजेंडा बदलना चाहिए. भाजपा की ताकत को नीतीश बखूबी समझते हैं. वो समझते हैं कि विपक्ष को अपने मुद्दे अलग करने चाहिए. सेक्युलर राजनीति की परंपरागत परिभाषा से विपक्ष को घाटा हुआ है. नीतीश कुमार सोशल इंजीनियरिंग के मास्टर हैं. वहीं अगर विपक्ष के बाकी नेताओं को देखें तो अखिलेश यादव, मायावती, ममता बनर्जी और राहुल गांधी अपनी पार्टी में तो ऊपर हैं, लेकिन बाकी पार्टियां उनको लेकर संशय में हैं. नीतीश पर विपक्ष तैयार हो सकता है.

3. नीतीश एजेंडा तय करना जानते हैं

लालू प्रसाद यादव को हराने के लिए नीतीश ने विकास का मॉडल गढ़ा था. विकास का मॉडल लेकर नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन गए. पर नीतीश के तीसरे कार्यकाल में विकास का शब्द थोड़ा पीछे हो गया है. पर उन्होंने शराबबंदी को अपनी सफलता में शामिल कर लिया है. इस चीज को नरेंद्र मोदी ने भी मुख्यमंत्री रहते हुए खूब भुनाया था. नीतीश ने तो दूसरे राज्यों में भी इसका प्रचार किया है. एक तरफ शराब पीना किसी व्यक्ति की चॉइस है, पर ये भी सच है कि समाज का एक बड़ा तबका शराब की समस्या से ग्रसित है. खास तौर से कामगार समाज में महिलाएं मर्दों की शराब की आदतों से त्रस्त रहती हैं. उनके लिए शराबबंदी काफी राहत देने वाली चीज है.

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4. नीतीश कुमार ने अपनी योग्यता को साबित किया है

बिहार चुनाव से पहले ऐसा लग रहा था कि नरेंद्र मोदी को रोक सकना असंभव है. पर नीतीश ने एक असंभव सा कदम उठाकर लालू प्रसाद यादव के साथ हाथ मिला लिया. ये भले उनकी राजनीतिक विचारधारा के खिलाफ गया, पर राजनीति के हिसाब से बेहद चतुर कदम था. भाजपा लगातार अपनी धुर विरोधी कांग्रेस के नेताओं को पार्टी में शामिल करती जा रही है. ना सिर्फ शामिल किया है, बल्कि असम, उत्तराखंड के चुनावों में जीत भी हासिल की है. यहां तक कि बूढ़े नेता एस एम कृष्णा को भी शामिल कर लिया. इस राजनीति को नीतीश खूब समझते हैं. यूपी के चुनाव में अखिलेश यादव और मायावती यही काम नहीं कर पाए. पर अब दोनों ही विपक्ष के गठबंधन में शामिल होने के हिंट देते रहते हैं.

5. सबसे बड़ी चीज है नीतीश का अंदाज

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अभी राजनीति में तेज बोलने वाले लोग खूब छा रहे हैं. हर नेता चिल्लाना चाहता है. अगर आप दिल्ली एमसीडी चुनावों के प्रचार को देख लें तो ये पता चल जाता है कि लगभग हर दूसरा नेता नरेंद्र मोदी की तरह बोलना चाह रहा है. अरविंद केजरीवाल भी इसी तरह बोलते हैं. पर कम शब्दों में आराम से बात करने वाले नेता बहुत कम हैं. नीतीश कुमार इन चीजों में आगे हैं. उनका अंदाज भरोसा जताने वाला है. गंभीरता से अपनी बात रखना जानते हैं. पॉलिटिकली करेक्ट नेता हैं. उन पर फालतू बोलने का कोई आरोप नहीं लगा है. पीएम उम्मीदवार के रूप में उनकी बिहार वाली स्ट्रैटजी काम कर सकती है कि बाकी नेता अंधाधुंध हमले करें और नीतीश अपने अंदाज में क्रेडिबिलिटी बढ़ाते जाएं.

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