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कंगना रनोट जैसे क्रेडिट ले रही हैं वे जल्द ही गुरमीत राम रहीम हो जाएंगी

फिल्म राइटर, गीतकार और तंजकार वरुण ग्रोवर से लेकर फिल्म राइटर्स एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी ज़मा हबीब और अन्य राइटर लोगों से द लल्लनटॉप ने बात की. जानिए अपूर्व असरानी और कंगना रनोट विवाद में इन लोगों की क्या राय है. ये मसला अभी और बढ़ेगा.

सलीम-जावेद शायद भारतीय सिनेमा में अकेले राइटर्स रहे हैं जिनके नाम पोस्टर पर हों तो फिल्में बिकती थीं. लेकिन उन्हें भी अपने हक के लिए हाथ से पोस्टर पर अपने नाम पोतने पड़े. राइटर फिल्म के प्रमुख रचनात्मक लोगों में सबसे महत्वपूर्ण होता है, जो फिल्म की नींव रखता है लेकिन वो गुमनामी में ही रखा जाता है. लगातार ऐसे मामले रहे हैं जहां राइटर्स के हक प्रोड्यूसर्स ने बांटे हैं या मारे हैं, डायरेक्टर्स ने मारे हैं और उन्हें अदालतों का सहारा लेना पड़ा है.

अपूर्व असरानी और हंसल मेहता.
अपूर्व असरानी और हंसल मेहता.

ताजा केस है डायरेक्टर हंसल मेहता की आगामी फिल्म ‘सिमरन’ के राइटिंग क्रेडिट्स का. इसके राइटर हैं अपूर्व असरानी जिन्होंने कहा है कि फिल्म लिखने का श्रेय उनसे छीन लिया गया है और पूरी तरह स्टार कंगना रनोट को दिया जा रहा है. उन्होंने फेसबुक पोस्ट में लिखा कि ‘सिमरन’ के पोस्टर में राइटर के तौर पर कंगना का नाम ऊपर रखा गया और उनका नीचे जो बर्दाश्त के बाहर है. उनका ये भी कहना है कि कंगना प्रमोशनल इंटरव्यूज़ में कह रही हैं कि हंसल वन-लाइन स्क्रिप्ट उनके पास लाए थे जिसे उन्होंने ही डिवेलप किया.

अपूर्व का कहना है कि कंगना जता रही हैं जैसे पूरी फिल्म लिखने वाली वे ही हैं, जबकि उन्हें सिर्फ एडिशनल डायलॉग्स और स्टोरी का क्रेडिट मिला है. उनके मुताबिक ये क्रेडिट भी उन्होंने हंसल और प्रोड्यूसर शैलेष सिंह के दबाव में शेयर किया. उनकी बुधवार की पोस्ट के जवाब में गुरुवार को ऐसी पोस्ट्स की बाढ़ आ गई जिसमें उनकी डिबेट को बिखेर दिया गया. किसी ने कहा कि ‘शाहिद’ फिल्म उसने लिखी थी, क्रेडिट अपूर्व ने छीन लिया था. किसी ने कहा ‘अलीगढ़’ की स्टोरी इशानी बैनर्जी ने लिखी थी लेकिन अपूर्व ने पहले क्रेडिट खुद ले लिए.

हंसल और अपूर्व के बीच हाल ही में इस फिल्म के कारण दरार आ गई. दोनों ने ‘शाहिद’, ‘सिटीलाइट्स’ और ‘अलीगढ़’ जैसी प्रशंसित फिल्मों में साथ काम किया. हंसल डायरेक्टर रहे. अपूर्व ने तीनों फिल्मों की एडिटिंग की और दो की स्क्रीनराइटिंग भी की. हालांकि ‘सिमरन’ की एडिटिंग भी वे कर रहे थे लेकिन प्रोड्यूसर-डायरेक्टर ने उन्हें निकाल दिया. कंगना का कहना है कि उन्होंने निकलवा दिया.

डायरेक्टर हंसल मेहता शुरू से इस मसले पर एकदम चुप हैं. प्रोड्यूसर शैलेष जवाबी मोर्चे आक्रामक रूप से संभाले हुए हैं. द लल्लनटॉप ने शैलेष से खरी बात की है जो जल्द ही पढ़ पाएंगे. इस बीच कंगना ने अपने ताजा इंटरव्यू में अपूर्व को पूरी तरह discredit कर दिया है और उन्हें नाकाबिल बता दिया है जो ठीक नहीं लगता. उन्होंने ये भी कहा कि अगर उनके पास स्टार क्लाउट है तो वे उसका इस्तेमाल करेंगी क्योंकि फिल्म का चेहरा वे हैं.

कंगना और डायरेक्टर हंसल फिल्म की शूटिंग के दौरान. (फोटोः ट्विटर)
कंगना और डायरेक्टर हंसल फिल्म की शूटिंग के दौरान. (फोटोः ट्विटर)

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अपूर्व भी किसी से बात नहीं कर रहे. द लल्लनटॉप ने उनसे बात करने की कोशिश की. अनिच्छुक होते हुए वे इतना ही बोले कि पांच साल पुराने मामले को सामने लाकर मौजूदा इश्यू से ध्यान हटाने की कोशिश हो रही है. उन्होंने कहा कि अगर किसी राइटर (समीर गौतम, जिनका दावा है कि शाहिद के असली राइटर वे हैं) को पांच साल पहले आपत्ति थी तो उसे मामला डायरेक्टर के पास ले जाना चाहिए था. अपने खिलाफ बढ़ते हमलों पर अपूर्व ने कहा, “सच सामने आएगा.”

बहरहाल ये बात अपूर्व, कंगना और हंसल की ही नहीं है. ये बात राइटर्स के हक की है. ये कोई आखिरी मामला नहीं है. ऐसे बहुत से मसले होते रहेंगे जब तक कि राइटर्स जागरूक नहीं होते और फिल्म उद्योग में उनको उनका पूरा हक नहीं मिलता. इस विषय़ को समझने के लिए हमने कई फिल्म लेखकों और मुंबई की जानी मानी संस्था फिल्म राइटर्स एसोसिएशन के प्रतिनिधि से बात की. जानें उन्होंने क्या कहाः

वरुण ग्रोवर

# उड़ता पंजाब, रमन राघव-2, फैन, आंखों देखी, गैंग्स ऑफ वासेपुर, दैट गर्ल इन यैलो बूट्स जैसी फिल्मों में गीत लिख चुके हैं.
# डायरेक्टर नीरज घैवन की 2015 में आई बेहद प्रशंसित फिल्म ‘मसान’ उन्होंने ही लिखी थी.
# बीते एक दशक से वे टीवी शोज़, स्टैंड अप कॉमेडी और सटायर लिखते रहे हैं.
# साल 2015 रिलीज हुई ‘दम लगाके हईशा’ में वरुण को अपने लिखे गाने ‘मोह मोह’ के लिए नेशनल अवॉर्ड मिला था.

वरुण ग्रोवर.
वरुण ग्रोवर.

सबसे पहले तो मुझे एक तरफ की स्टोरी ही पता है. हंसल ने कुछ बोला नहीं है, कंगना ने स्पष्ट किया नहीं है (वरुण से बातचीत किए जाने तक), डॉक्यूमेंट नहीं हैं. वो तभी संभव है जब अपूर्व स्क्रिप्ट दें. लेकिन ये पक्का है कि कंगना रनोट ने अगर एडिशनल डायलॉग और स्टोरी लिखी भी है तो भी उन्हें पोस्टर पर पहले क्रेडिट नहीं मिलना चाहिए था.

आपने किसी पेशेवर को काम दिया है तो उसका क्रेडिट बनता है और सिर्फ उसी का बनता है. नहीं तो डायरेक्टर (हंसल) और एक्टर (कंगना) तो गुरमीत राम रहीम हो जाएगा. जैसे डायरेक्टर हर डिपार्टमेंट को फीडबैक देता है लेकिन क्रेडिट नहीं ले सकता. मसलन, कास्टिंग में लीड एक्टर्स को डायरेक्टर ही चुनता है. जैसे ‘फैन’ में शाहरुख को मनीष शर्मा ने ही लिया था न! लेकिन क्रेडिट कास्टिंग डायरेक्टर का ही जाता है न? मेरे एक और दोस्त ने इस मामले में बोला है कि फिर जब कंगना इतना कुछ बदल रही थीं एक लिखी हुई स्क्रिप्ट में, तो डायरेक्टर वहां क्या कर रहे थे? ये तो डायरेक्टर का काम होता है. फिर तो कंगना को सहायक निर्देशक का क्रेडिट भी मिलना चाहिए, अगर उन्होंने इतना कुछ बदल दिया तो.

हमारी इंडस्ट्री में राइटर सबसे कम जरूरी और सबसे ज्यादा जरूरी है. जिस दिन स्क्रिप्ट लिखकर खत्म कर दे वो, उसी दिन सबसे कम जरूरी हो जाता है. जबकि सबसे पहले आता है वो फिल्म में. अकेला राइटर ही होता है जिसके दिमाग में फिल्म शुरू हो जाती है, कई साल चलती है. फिर डायरेक्टर प्रवेश करता है. लेकिन सबसे लास्ट में राइटर को पेमेंट मिलता है. हमारे कॉन्ट्रैक्ट में ही लिखा होता है कि शूट खत्म होगा, एडिट खत्म होगा, रिलीज डेट निकाल देंगे तब पैसा मिलेगा.

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ये पूरा प्रोसेस इतना लंबा है न कि बहुत वक्त लगता है. मान लो राइटर ने डायरेक्टर के साथ स्क्रिप्ट फाइनल की है. एक साल दोनों अच्छे से साथ रहे. फिल्म बनने में दो साल और लग गए. फिर डायरेक्टर के दिमाग में राइटर के इनपुट कम होते जाते हैं. इसे मनौवैज्ञानिक ढंग से समझ सकते हैं. डायरेक्टर के तीन पति या पत्नियां होती हैं. पहला राइटर, दूसरा सिनेमैटोग्राफर, तीसरा एडिटर. तीसरी शादी तक आप पहले को भूल जाते हैं. उस चक्कर में राइटर मार खा जाता है. उसने काम कर दिया, अब धीरे-धीरे हर कोई उसमें कुछ बताता जाता है. एक्टर अपने हिसाब से भी बदलता है. वो रेडियो नहीं सुन रहा है न कि बस पढ़कर बोल दे. उसका काम है अपने तरीके से इंटरप्रेट करे. ये सिनेमैटोग्राफर भी करता है, एडिटर तो बहुत ज्यादा करता है. हमारी फिल्म ‘मसान’ थी, उसमें एडिटर नितिन बैद ने फिल्म को नया नजरिया दिया है. कई बार सीन हटाकर, जोड़कर. एक तरह से फिल्म को लिखा गया है दोबारा. ये हर इंसान का काम है.

जाने भी दो यारों के दृश्य में ओम पुरी और नसीरुद्दीन शाह.
जाने भी दो यारों के दृश्य में ओम पुरी और नसीरुद्दीन शाह.

एक्टर हैं तो आपका काम ही है उसकी नई व्याख्या करना. आप उसको ये नहीं कह सकते कि अपने mandate से ज्यादा किया है. ये गलत है. इसका मतलब ये कि कंगना चार कपड़े घर लाईं हैं और उनमें कुछ किया है तो कहेंगी कि क़ॉस्ट्यूम डिजाइनर का क्रेडिट भी लेंगी. लेकिन आप नहीं लेंगी. सेट पर कॉस्टूयम वाला हमेशा होता है तो आप नहीं ले सकते. राइटर गुजर चुका है तो ऐसा कर गुजरते हैं आप. राइटर गुजरा हुआ ख़याल है उससे छुटकारा पाना आसान है क्योंकि वो सामने है ही नहीं. मैकेनिक्स ऑफ ह्यूमन माइंड  ऐसा ही है कि सामने है उसे थप्पड़ नहीं मार सकते, पीछे है तो गाली भी दे सकते हैं. आउट ऑफ साइट, आउट ऑफ माइंड.

जिस वन लाइन स्क्रिप्ट की बात हो रही है जिसे लेकर हंसल कंगना से मिले थे और कंगना ने कथित तौर पर उसे डिवेलप किया वो एक लाइन की नहीं बल्कि करीब 30-40 पेज की स्क्रिप्ट होती है. ये राइटिंग की दुनिया का टेक्नीकल लिंगो है. वन लाइन का मतलब ये है कि पूरी स्क्रिप्ट के सारे सीन उसमें होंगे. अगर 100 सीन हैं तो 100 लाइन में लिखे होंगे या 100 पैरेग्राफ में लिखे होंगे. वो मिनिमम 20 पेज का ट्रीटमेंट होता ही है. कंगना भी कह रही हैं, अपूर्व भी कह रहे हैं ऐसा लेकिन उसका मतलब ये नहीं है कि वो सिर्फ एक लाइन का आइडिया लेकर गए थे.

इसके अलावा स्क्रिप्ट हर स्टेज पर रजिस्टर होती है. हम लोग हर स्टेज पर अपनी स्क्रिप्ट रजिस्टर करवाते हैं. 20 पेज की होगी तब भी कराई होगी, 60 पेज का ड्राफ्ट है तो वो भी कराया होगा. हर मौके पर कराते रहते हैं. उम्मीद है अपूर्व के पास सारे ड्राफ्ट होंगे. उन्होंने लड़ाई शुरू की है और कोई उनको पलटकर बोले तो उनके पास कागज होने चाहिए, नहीं तो बात बिखर जाएगी.

वासन बाला

# उन्होंने ‘रमन राघव 2.0’ (2016) और ‘बॉम्बे वेलवेट’ (2015) जैसी चर्चित फिल्में अनुराग कश्यप के साथ लिखी हैं.
# बतौर डायरेक्टर उनकी पहली फिल्म ‘पैडलर्स’ 2012 में फ्रांस के केन फिल्म फेस्ट में गई थी.
# वासन 2013 में आई रितेश बत्रा की फिल्म ‘द लंचबॉक्स’ में हिंदी संवादों के सलाहकार भी रहे हैं.
# वर्ल्ड सिनेमा के जाने-माने डायरेक्टर माइकल विंटरबॉटम की भारत में शूट हुई फिल्म तृष्णा में वे सहयोगी निर्देशक थे.

वासन बाला. (फोटोः वासन बाला)
वासन बाला. (फोटोः वासन बाला)

पहले पुबाली चक्रवर्ती का मामला भी हो चुका है (उन्होंने रॉक ऑन-2 लिखी थी लेकिन पहली फिल्म के राइटर-डायरेक्टर अभिषेक कपूर क्रेडिट न दिए जाने पर कोर्ट चले गए थे). अब ये है. हालांकि इस मामले में मैं अभी अपूर्व का साथ नहीं दे रहा. लेकिन आम मामलों की बात करूं तो अगर आप एक फिल्म राइटर हैं, काम किया हो लेकिन क्रेडिट न मिले तो हर्ट होना जायज है. इसमें डायरेक्टर की बड़ी भूमिका होती है कि वो कैसे सबके क्रेडिट सुनिश्चित करता है. कुछ बार आप फॉर्चुनेट होते हो कि अच्छे लोगों के साथ काम करते हो. जैसे अगर आप अनुराग कश्यप को लें तो वो राइटिंग क्रेडिट में अपना नाम सबसे आखिर में डालते हैं. तो मुझे अब तक ऐसी कोई दिक्कत नहीं हुई है.

मुझे अभी भी याद है मैं कास्टिंग असिस्टेंट था ‘देव डी’ (2009) में. तो भी मेरे कास्टिंग डायरेक्टर (गौतम किशनचंदानी) ने मुझे अपने साथ क्रेडिट दिया था. ये बहुत बड़ी बात थी मेरे लिए. ये एथिक्स का मामला भी है. साथ ही साथ इमोशनल चीज भी है. इमोशन वाली बात और भी महत्वपूर्ण हो जाती है राइटर के साथ जिसको वैसे भी पैसे मिलते नहीं है. उसे एक साइनिंग अमाउंट दिया जाता है उसके बाद शायद ही कोई पलटकर देखता है. उसका काम हो जाता है लेकिन उसे फिल्म की रिलीज तक रुकना पड़ता है. एक बार आपका काम हो जाए तो आपका पेमेंट हो जाता है लेकिन यहां वो इंतजार करता रहता है. सेट पर यूं ही घूमता रहता है. एडिट पर भी बैठा रहता है. अंत तक रुका रहता है.

इंटरनेशनल स्तर पर इन चीजों की बहुत अहमियत है जो हम अपने यहां नहीं देते. जो शायद 70 के दशक में सलीम-जावेद रखते थे. उन्होंने अपनी अलग लड़ाई लड़ी. पर वो अंततः उनकी निजी लड़ाई ही रही. इससे राइटर कम्युनिटी को कोई असर नहीं हुआ. क्योंकि आपकी आवाज सुनी जाए इसके लिए आपको सुपर सक्सेसफुल होना पड़ता है. एक एनिमेटेड हॉलीवुड फिल्म आई थी – ‘अलादीन’ (1992). कहा जाता है कि उसमें रॉबिन विलियम्स ने स्क्रिप्ट को इतना इम्प्रोवाइज कर दिया था कि उसे ऑस्कर के लिए कंसीडर नहीं किया गया. ये यूनिवर्सल मसला है. आमतौर पर कॉन्ट्रीब्यूट सब करते हैं, प्रोड्यूसर डीओपी तक बोल देते हैं. जायज क्या है, ये ट्रिकी बात है. फेसबुक ट्विटर की दिक्कत ये है कि सब आंख बंद करके पढ़ते हैं.

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हंसल मेहता पर्सनली मुझे बहुत पसंद है. मेरे बहुत अच्छे दोस्त हैं. शायद बाद में वे बताएं कि पूरी स्थिति क्या है. एक डायरेक्टर भी न जाने किन-किन हालातों से गुजरकर अपनी फिल्म बना पाता है. न जाने कितने लोगों के अहंकार झेलकर वो अपनी फिल्म पूरी करता है. हंसल को बोलना चाहिए.

रामकुमार सिंह

# ‘सरकार-3’ के डायलॉन्ग्स उन्होंने लिखे हैं. 2014 में पोलिटिकल सटायर ‘ज़ेड प्लस’ की कहानी और स्क्रीनप्ले लिखी थी.

रामकुमार सिंह.

रामकुमार सिंह.

बहुत बार एक्टर अपनी सुविधा से भी डायलॉग बदलता है. क्योंकि शब्द जरूरी कभी नहीं होते, किसी भी दृश्य में भाव क्या है वो जरूरी होता है. अगर एक्टर या कोई और फिल्म के बेसिक आइडिया को ही चैलेंज कर रहा तो ठीक है वो श्रेय ले सकता है, लेकिन वो लाइन चेंज कर रहा है तो उसका हक नहीं बनता.

आप आईएमडीबी का प्रोफाइल देखिए. वो फॉर्मेट हॉलीवुड से प्रेरित है तो उसमें लेखक की अपनी इज्जत है. यहां हर फिल्म की प्रोफाइल में सबसे ऊपर दो ही नाम होते हैं – डायरेक्टर का और राइटर का. फिर उसके नीचे आती है फुल कास्ट एंड क्रू की सूची जिसमें एक्टर ऊपर होता है. यही फॉर्मेट इंडिया ने बनाया होता तो सबसे ऊपर एक्टर को डालते, उसके बाद डायरेक्टर को. हॉलीवुड में तो शायद नियम भी है कि शायद 30 परसेंट से ज्यादा कोई चेंज कर दिया है तो सह-लेखन का क्रेडिट दूसरे को मिल सकता है.

मैं ये नहीं कहता कि कंगना लिख नहीं सकतीं. कोई भी लिख सकता है. जो उनका जायज हक है उनको मिलना चाहिए, जैसे कि कंगना स्वयं लड़ रही होती हैं कि मैं बाहर से आई हूं. लेकिन अगर वे गलत कर रही हैं तो उन्हें सोचना चाहिए कि वो किसका हक मार रही है. अगर कंगना ने वाकई में लिखा है और अपूर्व उसका हक मार रहे हैं तो वो गलत है.

ऑनीर

# उनकी 2011 में रिलीज हुई फिल्म ‘आई एम’ को बेस्ट हिंदी फिल्म का नेशनल अवॉर्ड मिला.
# वे ‘माई ब्रदर निखिल’, ‘बस एक पल’ जैसी प्रशंसित फिल्में भी डायरेक्ट कर चुके हैं.
# अगले महीने उनकी फिल्म ‘शब’ रिलीज हो रही है जिसका टीज़र हाल ही में आया है.
# इसके अलावा ऑनीर ‘दमन’ और ‘राहुल’ (2001) जैसी फिल्मों के एडिटर भी रहे हैं.

ऑनीर. (फोटोः ऑनीर)
ऑनीर. (फोटोः ऑनीर)

मेरे लिए राइटर सबसे जरूरी आदमी है. मैंने कुछ स्क्रिप्ट पर काम किया है जो खुद नहीं लिखीं. कई बार चीजें बदलती हैं जब आप अपने एक्टर के साथ काम करते हैं, उनकी तरफ से शानदार सुझाव भी आते हैं, आप उसे यूज़ करते भी हैं. मैं अपने राइटर की मंजूरी लेता हूं कि कुछ चेंज कर दूं क्या? अगर कोई कुछ चेंज करता हूं तो सहमति से. फिल्ममेकिंग मिलकर किया जाने वाला काम है. हाल ही में मैंने एक फिल्म पर काम किया जिसके प्रोड्यूसर ने मुझे कहा कि राइटर ही स्क्रिप्ट का पिता होता है. अगर किसी ने लिखा है, डिवेलप किया है तो ये उसकी प्रॉपर्टी है.

हालांकि मुझे नहीं पता कि ‘सिमरन’ के साथ क्या हुआ और कितना चेंज किया गया गया? कई बार स्क्रिप्ट में बहुत ज्यादा बदलाव हो जाता है ऑफिशियली, इसलिए मैं कॉन्ट्रैक्ट रखता हूं. हमारे यहां राइटर्स की बड़ी मजबूत यूनियन है तो पता नहीं क्यों ये मसला खड़ा हुआ? कई फिल्में रही हैं जहां एडिशनल राइटर आते हैं. सलीम-जावेद ने साथ लिखा है. तो इस मामले में मैं राइटर को संदेह लाभ देना चाहूंगा. आधारभूत रूप से ये उसका हक है.

हालांकि फाइनली मेरे लिए कुछ भी कहना ठीक नहीं होगा. इस स्टेज पर हर कोई जानता है कि ये अपूर्व की स्क्रिप्ट है. ये कॉन्ट्रैक्ट का हिस्सा होता है. कोई विवाद हो तो राइटर्स की यूनियन के पास जाना चाहिए. वो अच्छे लोग हैं. जैसे दबावों की बात इस मामले में राइटर कर रहा है, मैंने उनका सामना नहीं किया है. मैंने उन लोगों के साथ ही काम नहीं किया है जो ऐसा करते हों. बहुत शर्म की बात होगी अगर किसी ने ऐसा किया है तो.

ज़मा हबीब

# भारत में फिल्म लेखकों की प्रतिष्ठित संस्था फिल्म राइटर्स एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी हैं.
# ससुराल गेंदा फूल, ये रिश्ता क्या कहलाता है, सास बिना ससुराल और एक हजारों में मेरी बहना है जैसे सीरियल लिखे.
# बताया जाता है कि उन्होंने हिंदी और बंगाली टीवी सीरियल्स के 5000 से ज्यादा एपिसोड लिखे हैं.

ज़मा हबीब.
ज़मा हबीब.

लिखने और सुझाव देने में फर्क हैं. फिल्में बनाना एक collaborative art है जिसमें हम एक-दूजे को सुझाव देते हैं. एक एक्टर उसमें बढ़ोतरी करता है. लेकिन अगर वो हर चीज में क्रेडिट लेना शुरू कर दे तो? म्यूजिक डायरेक्टर भी चार-पांच गाने चुनता है तो वो भी कहे मेरा क्रेडिट दो? कॉस्ट्यूम डिजाइनर भी एक्टर को सुझाव दे कि इस रंग की जगह ग्रीन पहनोगे तो ऐसा भाव पैदा होगा, तो? डायरेक्टर तो एक्टर को उसकी एक्टिंग के अंतिम सिरे तक लीड करता है फिर वो एक्टिंग में क्यों नहीं मांगता श्रेय? यहां जो हो रहा है वो स्टूपिड है. कोई भी फिल्म बनती है तो मूल स्क्रिप्ट से ऊपर ही जाती है, वरना वो डायरेक्टर किस काम का है. वो एक पायदान ऊंचा ही लेकर जाएगा. नहीं तो ये भी हो सकता है कि पहले ड्राफ्ट वाली स्क्रिप्ट पर फिल्म बनती तो ज्यादा अच्छी बन जाती.

एक बात ये कि जिस कहानी को लेकर आप फिल्म बनाना शुरू कर चुके हो उसे शूट के बीच में बदल कैसे सकते हैं? डायरेक्टर मूर्ख है अगर उसे आधे रास्ते लगता है कि कहानी को फिर लिखा जाना चाहिए. ऐसा नहीं है कि कंगना या कोई एक्टर लिख नहीं सकता है. एक्टर भी राइटर हो सकते हैं, लेकिन आधे रास्ते आप क्रेडिट लें वो कितना सही है. सलीम-जावेद ने गब्बर डिजाइन कर दिया था कि उसकी चाल-ढाल ऐसी होगी तो क्या एक्टिंग का क्रेडिट लिया था क्या?

फिल्म थेवर मगन में कमल हसन और नासर.
फिल्म थेवर मगन में कमल हसन और नासर.

ये बहुत ही गलत नज़ीर कायम हुई है ‘सिमरन’ वाले मामले में. ये सीधा सीधा आर्म ट्विस्टिंग वाला मामला है. हंसल साहब एकदम चुप हैं. कुछ नहीं बोल रहे हैं.

मुझे अपूर्व असरानी से नाखुशी है कि वे सोशल मीडिया पर क्यों लड़ रहे हैं? वो कानूनी तौर पर लड़ सकते हैं. उनकी गलती ये भी है कि जिस पोस्टर में कंगना को राइटिंग क्रेडिट ऊपर लिखने और उनका नीचे लिखने की बात हो रही है उसे खुद अपूर्व ने ही पहले शेयर किया था. तो फिर उन्हीं को तीन दिन बाद क्यों ऐतराज हो रहा है? इसके अलावा उन्होंने खुद कहा कि राइटिंग क्रेडिट्स शेयर करने को लेकर उन्हें ऐतराज नहीं. लेकिन ऐतराज क्यों नहीं हो सकता? कंगना अब कहीं इंटरव्यू दे रही हैं कि वन लाइन स्क्रीनप्ले था जिसे मैंने ठीक किया तो वे बिफर रहे हैं. अपूर्व इतने बरस से काम कर रहे हैं. कामयाब राइटर हैं. इतने बरस से फिल्म इंडस्ट्री में हैं और इसके बाद भी ये हालत है कि अगर वो हथियार डाल रहे हैं तो नए राइटर भला क्या प्रेरणा लेंगे? ऐसे मामलों में राइटर फिल्म रिलीज होने के बाद अपने हक के लिए कुछ भी नहीं कर सकता है. सितंबर में ये फिल्म रिलीज होने वाली है. अभी मई चल रही है. पोस्टर ही रिलीज हुआ है. अगर आप खुद ही कुछ करना नहीं चाहते तो कोई फायदा नहीं. वैसे हम राइटर को सपोर्ट करते हैं.

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जैसे दो साल पहले ज्योति कपूर और कुणाल कोहली वाला मामला हुआ था. जिसमें कुणाल कोहली की निर्माणाधीन फिल्म ‘फिर से’ की कहानी और ज्योति की ‘आरएसवीपी’ नाम की स्क्रिप्ट में बहुत समानताएं सुप्रीम कोर्ट ने पाईं और कोहली को आदेश दिया कि वे हर्जाने में ज्योति को 25 लाख रुपये दें. हम इस सिलसिले में लेखकों की जागरूकता बढ़ाने के लिए कई काम कर रहे हैं. अभी 29 अप्रैल को फिल्म राइटर्स एसोसिएशन ने contracts पर पूरे दिन की वर्कशॉप आयोजित की थी. इसमें हमने बताया कि राइटर लोग प्रोड्यूसर्स के बनाए अनुबंधों को कैसे पढ़ें?

इनके साथ शुरू में होता ये है कि निर्माता लोग दोस्त होते हैं और मूर्खता में साइनिंग अमाउंट लेकर दस्तख़त कर देते हैं और अपने सारे हक निर्माता को दे देते हैं.

मैं उन सब फिल्म राइटर्स से अनुरोध करता हूं कि प्लीज़ अपने अनुबंध को जरूर पढ़ें. ऐसे ही साइन न करें. हमने लीगल सेल शुरू किया है, वकील रखे हैं. आप आ सकते हैं, वहां पूछ सकते हैं, वो आपको गाइड करेंगे. सभी राइटर्स को ये करना चाहिए. हम एसोसिएशन के तौर पर उनकी मदद करने को तैयार हैं. समस्या ये है कि राइटर्स बहुत कम चिंता करते हैं. राइटर्स के लिए बेहतर ये भी है कि अपनी कोई कहानी लिखी है तो उसे रजिस्टर करवा लो. स्क्रीनप्ले लिख रहे हो तो वो भी रजिस्टर करवा लो. उसमें डायलॉग लिखे हैं तो उसे भी करवा लो. एक जमाने में सलीम-जावेद का नाम नहीं था पोस्टर पर तो उन्होंने खुद ही लिख दिया था अपने हाथ से. आपको अपने हक के लिए लड़ना होगा. अपनी वैल्यू को समझो. आप खुद ही नहीं समझ रहे. मैं अपनी कहानी दोस्ती में दे दूं क्या?

सिमरन का टीज़रः

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