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आखिर क्या है मायावती का जादू कि पचास कोस दूर की भीड़ का रेला जुटता है

मायावती आईं. आगे की तरफ रखे सफेद सोफे पर अपना हैंडबैग रखा. शॉल संभालते हुए जनता की तरफ दो तीन बार हाथ हिलाया. फिर सोफे पर बैठ गईं. सभी प्रत्याशी आठ फीट पीछे रखी कुर्सियों के पास जाकर खड़े हो गए. फिर मंच के बायीं तरफ आए तो एक एक करके मायावती के पैर छूने के लिए आगे बढ़े. मायावती के ठीक पीछे खड़े दो चुस्त सुरक्षा अधिकारियों में से एक भी आगे बढ़ा और इन लोगों को पीछे करने लगा. ये प्रत्य़ाशी सोफे से एक फीट दूर झुकते. घुटनों के बल बैठते, आगे की तरफ झुकते. फिर हाथ आगे बढ़ाते. पैर छूने के लिए. मायावती उनकी तरफ उचटती नजर से देखतीं. आशीर्वाद के लिए हाथ उठातीं. और फिर सामने देखने लगतीं. एक बार फिर सिक्योरिटी अफसर आगे बढ़ते. नेताओं को पीछे करने के लिए. सारे कैंडिडेट्स ने जब बीएसपी सुप्रीमो से इस तरह से आशीर्वाद ले लिया, तब मायावती उठीं. उनका लिखा हुआ भाषण पहले ही डायस पर रखा है. डायस अब तक बोल रहे नेताओं से अलग है. यहां भी सफेद कपड़ा लिपटा हुआ है. पीछे की तरफ एक प्लेटफॉर्म भी बना है छोटा सा. चौकीनुमा कुछ. जिस पर बीएसपी की बहन जी खड़ी होकर बोलना शुरू करती हैं.
मायावती की रैली से


जिला एटा, शहर एटा का ये फौजी पड़ाव मैदान है. अब आप सौरभ द्विवेदी से 3 फरवरी 2017 को हुई मायावती की रैली का आंखों देखा हाल पढ़िए.

E-rickshaw driver

मैं एक ऐसे जिले से आता हूं, जहां बीएसपी ने अपना खाता खोला था. जिला जालौन और साल 1989. चैनसुख भारती और अकबर अली के नाम हमें ‘उपकार कौन क्या है?’ वाली कुंजी के किसी सवाल से याद थे. राजनीति में दिलचस्पी बढ़ी तो बीएसपी के बारे में खोज खोजकर पढ़ा. उन सब लोगों को ये जरूर पढ़ना चाहिए जो मायावती या बीएसपी को झटके में खारिज कर देते हैं. पर आज बात किताबों की नहीं. आज बात एक नए अनुभव की. पहली मर्तबा मायावती की रैली में होने का अनुभव.

Mayawati Waving Hand

मैदान में पीछे की तरफ एक कंक्रीट का स्टेज बना है. सत्ता में रहने के दौरान मायावती यहीं से रैली करती थीं. अब स्टेज कुछ आगे कर दिया गया है. एक स्थानीय पत्रकार के मुताबिक ये टेक्नीक है. मैदान को ज्यादा भरा दिखाने की. अखबारों में इश्तेहार छपे हैं कि मायावती की रैली 11 बजे है. पत्रकार बताते हैं 1 बजे से. पुलिस वाले ज्यादा एक्यूरेट बताते हैं कि 2 बजे तक आएंगी. मायावती 3 बजे आती हैं. मगर हम तो वहां 1 बजे ही पहुंच गए हैं. तो दो घंटे बहुजन समाज पार्टी की इस काडर ताकत को समझने में खर्च किए जाएं. आप भी साथ आएं.

Patrakar ki Jagah

 

पुलिस वाले मानते हैं कि मायावती की रैली में सबसे कम सर दर्द है. भीड़ को संभालने के लिए बहुत कंट्रोल नहीं करना पड़ता. हालांकि ड्यूटी तो पूरी है. प्रतापगढ़ से यहां ट्रांसफर होकर आए सीओ सलानिया के मुताबिक, ‘ये ठीक है. बहुजन वॉलंटियर फोर्स के लोग जब जनता को बैठने के लिए या पीछे हटने को कहते हैं तो कोई बुरा नहीं मानता. हमारे कहने पर बिदक जाते हैं.’

बहन जी की अपनी फोर्स 

बीवीएफ बीएसपी से जुड़े काडरों का एक अस्थायी संगठन है. चुनावी रैलियों में इनकी ड्यूटी लगती है. काले रंग के जूते. नीली पैंट. सफेद रंग की कमीज. और नीली टोपी. जिस पर धातु जड़ी है और बीएसपी का नाम लिखा है. एक चिह्न भी है, जैसे पूरे भारत के नक्शे में मुट्ठियां नजर आ रही हों.

Bahujan Volunteer Force
बहुजन वालंटियर फ़ोर्स (बीवीएफ)

कई बीवीएफ वॉलंटियर्स से बात की. ज्यादातर के लिए ये पहला अनुभव है. इन्हें क्राउंड कंट्रोल की कोई ट्रेनिंग नहीं है. मगर काडर अपना, ये भी अपने वाला हिसाब काम करता है. पुलिस के साथ हर बैरिकेडिंग के किनारे ये वॉलंटियर तैनात रहते हैं. मैदान में सबसे आगे स्टेज. उसके दायीं तरफ हैलिपैड. उसके चारों तरफ रेलिंग. यहां बहन जी आसमान से उतरेंगी. उनके इंतजार में एक अच्छा खासा हुजूम यहां भी तैनात है. बाकी प्रोटोकॉल के तहत एंबुलेंस जैसी सब चीजें हैं. एक गाड़ी भी है, जो मैडम को 100 मीटर दूर स्टेज तक ले जाएगी.

Bahujan Volunteer Force (BVF)
बीवीएफ

स्टेज के ठीक सामने एक डी एरिया है. उसके बाद डबल बैरिकेडिंग. इन दोनों के बीच बीएसपी के वॉलंटियर खड़े हैं. मंच की तरफ पीठ और मैदान की तरफ मुंह करके. उसके बाद सामने के एरिया में पत्रकार. उनके लिए ऊंची मचान. बुफे सिस्टम में डोंगे रखने के लिए जो फोल्डिंग मेज आती हैं, उससे तैयार.

पत्रकार, बहनजी, मोदी और सेल्फी

बहन जी की सभा को कवर करने के लिए पत्रकार भी तैयार हैं. दर्जनों की संख्या में. अखबारों और टीवी चैनलों के ऐसे-ऐसे नाम कि इन्हें याद करना भी एक बड़ा काम हो सकता है. मगर ये दिल्ली का नजरिया है. लोकल में सबके अपने हिसाब किताब हैं. और उसी के तहत सब यहां पहुंचे हैं. चूंकि मायावती के आने में अभी देर है. तो आपस में हंसी ठिठोली का दौर चलता है. कोई किसी के माइक आईडी के रंग पर तंज करता है, तो कोई पूछ लेता है. बताओ तुम्हारा चैनल कित्ते नंबर पर आता है. इन बातों के अलावा देश की सर्वग्रासी बीमारी सेल्फी का भी नंबर आता है. पत्रकार भी इसी धरा के जीव हैं, तो इससे अछूते कैसे हों. इससे तो दिल्ली वाले भी मुक्त नहीं. नरेंद्र मोदी जब एक त्योहार के बहाने पत्रकारों से मिले तो सवाल नहीं पूछे गए. सेल्फी के लिए पूछा गया.

Women

बहरहाल, पत्रकारों वाले इस गलियारे के दाएं बाएं महिलाओं के लिए रिजर्व एरिया है. यहां कई महिलाएं नीली साड़ी में भी नजर आती हैं. ये भीड़ को नारे सिखाती हैं, साथ में उन्हें संभालने का भी काम करती हैं. ऐसे ही एक आंगनबाड़ी में काम करने वाली महिला सुनीता से हमने बात की. उन्होंने कहा, बहन जी के राज में रात-बिरात निकलने में भी डर नहीं लगता. बताने लगीं, ”मेरी चेन खिंच गई, पुलिस चौकी में कोई सुनवाई नहीं हुई.” लॉ एंड ऑर्डर मायावती के मिथक का एक तथ्य है. जिसे बार बार काडर दोहराता है. और उनके पास इसकी अपनी अपनी वजहें हैं.

एलआर समुदाय

मिलिए ब्रजेश से. ये ‘एलआर’ हैं. ये एब्रीविशन मैंने यहीं आकर सीखा. एलआर मतलब लोध राजपूत. पॉलिटिक्स की परंपरागत समझ कहती है कि भाजपाई होंगे. एटा से सांसद राजवीर सिंह कल्याण सिंह के बेटे हैं और कल्याण सिंह लोधियों के सबसे बड़े नेता हुए हैं. मगर यहां समझ को ठसक लगाने की बारी है. ब्रजेश ने बताया. लोकसभा में तो कमल का बटन दबाया था, मगर अभी यहा हूं. बहुत कुरेदने पर अपनी कहानी सुनाई. गांव अमरीली रतनपुर की कहानी. ब्रजेश के पास जमीन थी. उनकी ही बिरादरी के एक दबंग राजेश प्रधान ने जगह घेर ली. राजेश प्रधान सपा से जुड़े हैं. ऐसे में ब्रजेश की थाने में सुनवाई नहीं हुई. बचा विकल्प कोर्ट का. जहां मामला घिसट रहा है. और जमीन पर प्रधान का ट्रैक्टर घिसट रहा है. फसल और मुनाफा कमा रहा है. ऐसे में ब्रजेश को बीएसपी वालों ने दिलासा दिया. बहन जी को आने दो. नतीजतन वो यहां आ गए हैं. अगर आप भी हमारे साथ यहां तक आ गए हैं तो आगे का हाल भी सुनिए.

Women in Rally

महिलाओं के एरिया के बाद मैदान में तीन तरफ तीन और बैरिकेड किए एरिया हैं. यहां लाल रंग की कुर्सियां कतार से लगी हैं. सब मंच से बोल रहे विधायकी के दावेदारों की बात सुन रहे हैं. कितनी सुन रहे हैं, इसे यूं समझ लें कि मैंने तीन बार औचक ढंग से तीन अलग अलग आयु वर्ग के लोगों से पूछा, मंच पर कौन बोल रहा है. बोले, पता नहीं भइया, हम तो बहिन जी को सुनने आए हैं. ये है बीएसपी की सियासत.

समझने का अचूक मंतर है. काडर को कैंडिडेट से नहीं मायावती से जुड़ाव है. मन मेरा भी जुड़ गया. विधायकी के लिए खम ठोंक रहे नेताओं से. एक नेता जी. जिनका नाम चूंकि जनता को नहीं पता इसलिए मुझे भी नहीं पता एक दिलचस्प गणित लेकर आए. उन्होंने नरेंद्र मोदी की पूरी वार्डरोब का हिसाब बता दिया. इतने करोड़ के कपड़े खरीदे. ढाई साल में इतने दिन. तो हर दिन के हिसाब से इतने हजार रुपया कपड़ा बैठा. शहरों में बैठे लोग कह सकते हैं कि देश का प्रधानमंत्री अगर इतने के कपड़े पहनता है तो क्या हर्ज है. मगर पिरामिड में सबसे निचली पायदान के व्यक्ति के लिए ये शायद महीने भर की आमदनी भी नहीं.

Old Man

शायद के इस्तेमाल पर गौर करें क्योंकि बीएसपी नेता ने वार्डरोब का हाल कैसे जाना, ये किसी को नहीं पता. एक और नेता ने नरेंद्र मोदी की वैवाहिक जिंदगी का जिक्र किया. उन्हें झूठा बताते हुए ओलंपिक से इस झूठ खेल में गोल्ड मेडल लाने का संदेश दिया. संदेश मंच से लगातार दिए गए. कि बहन जी आने को हैं. इस बीच एक और नेता जी आते हैं. गजेंदर चौहान बबलू. सदर सीट से कैंडिडेट. पिछली मर्तबा दूसरे नंबर पर रहे. तीन हजार से ज्यादा वोटों से चुनाव हारे. मगर कैमरे के सामने कहते हैं कि सात सौ कुछ वोटों का ही फासला था, वो भी प्रशासन की गड़बड़ी की वजह से. अब बबलू माइक पर हैं. चूंकि शहर के कैंडिडेट हैं, तो सबसे ज्यादा भीड़ भी उन्हीं की लाई होगी. रुटीन बातें करते हैं और फिर जिक्र करते हैं. सपा के नेता जुगेंद्र सिंह के इल्जाम का. बबलू बोले, हम तो क्षत्रिय हैं. विजया दशमी को फायरिंग करते हैं. वह भी हर्ष में. मगर जोगिंदर सिंह जब फायरिंग करता है, तो किसी की जान जाती है. और तब उसे बद्दुआ लगती है. सार्वजनिक मंचों पर इल्जाम का ये नया सबक है. इसे केजरीवाल और जेटली भी समझें. अगर लोकल लेवल पर लगाए गए इल्जाम मानहानि के वाद में तब्दील हो जाएं, तो देश में हजारों फास्ट ट्रैक कोर्ट सिर्फ इसी के लिए बनाने होंगे.

बहन जी आने को हैं

मायावती आने को हैं, एक बार फिर ये शोर बरपता है. लोग आसमान की तरफ देखने लगते हैं. पता नहीं कैसे पूरी भीड़ को पता है कि हेलिकॉप्टर किस दिशा से आएगा. हालांकि बाद में ये अंदाजा गलत साबित होता है. मगर उसमें अभी वक्त है. फिलवक्त तो भीड़ को नारे लगाने का रिहर्सल करना है. और नारेबाजी होते ही एक तरंग दौड़ जाती है. जो ढलके से कुर्सी पर बैठे थे, वो आंदोलित हो गए. महिलाएं कुर्सियों पर चढ़ने लगीं. एक बुजुर्ग महिला के पास झंडा नहीं था. डंडा था. अपना. वो लाठी, जिसे टेक वह यहां तक आईं. तो उन्होंने अपने डंडे पर शॉल लटकाया और उसी को लहराकर नाचने लगीं. चुनाव यहीं आकर उत्सव लगने लगता है.

BSP Fan

मुझे लगने लगता है कि मायावती को मुजफ्फरनगर की रैली से आने में कुछ और वक्त है. तो गला तर कर लिया जाए. बाहर आने के क्रम में बीवीएफ का एक और लड़का मिलता है. जलेसर से आया है. रवि कुमार नाम है. उससे बातचीत होने लगती है. अखिलेश के लैपटॉप का जिक्र आता है. रवि कुमार का कहना है, लैपटॉप के लिए उस लेवल तक पहुंचना भी तो जरूरी है. फिर उसने मार्के की बात कही. बहन जी लैपटॉप नहीं देतीं, कद्र देती हैं. हमारी सरकार आती है, तो थाने में सुनवाई होती है. इस कमेंट को ऐसे भी देखें. कि जनता को, खासकर गरीब दलित जनता को विकास से पहले भी स्वाभिमान की जरूरत है. न्याय के भरोसे की जरूरत है. उसे खडंजे और नाली से पहले चौकी में घुसने की हिम्मत चाहिए. जो ज्यादातर दशकों तक उसके लिए खौफ का केंद्र रहे हैं. मायावती के राज में दलित थानाध्यक्षों की नियुक्ति और एससी एक्ट पर कड़ी कार्रवाई से ये बदलाव आया है. हालांकि बाद में इसके मिसयूज के मामले भी सामने आए. मगर ये बात हर कानून पर लागू होती है. दहेज विरोधी कानून को ही ले लीजिए. इसलिए सिर्फ इस बिना पर इसे खारिज नहीं किया जाना चाहिए.

मायावती आ गईं

अब इंतजार को खत्म करना होगा. हेलिकॉप्टर. नीले रंग का, रैली मैदान की तरफ आ रहा है. मैदान पार करता है. एक गोल चक्कर और फिर हैलिपैड पर. भीड़ चीखते हुए नारे लगा रही है. मगर कुछ ही देर में वॉलंटियर आगे की तरफ बैठे और अब खड़े हो गए समर्थकों को दोबारा बैठा देते हैं. मायावती मंच पर नमूदार होती हैं. उसके बाद का उपक्रम आपने बिलकुल शुरुआत में पढ़ा. अब तक हम भी अपना मोर्चा संभाल चुके हैं. पत्रकारों वाली मचान पर कई कैमरे हैं, कई मोबाइल हैं. इसलिए हमने उससे कुछ दूर एक बैरिकेड किए कॉरिडोर में पनाह ली. यहां से नजारा साफ है. नजर आ रही हैं बहन मायावती. सूबे की चार बार मुख्यमंत्री रही. अभी राज्यसभा की सांसद. बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष. अब आगे उनकी बात. बिंदुवार ढंग से.

Mayawati with her leaders

1. सबसे पहले उन्हें धन्यवाद, जो अपने छोटे संसाधनों से यहां तक आए. ( मुझे मुकेश याद आ गया. गुस्से में था. रैली में था. बोला कैंडिडेट ने कहा था, गाड़ी भिजवाएंगे, पर नहीं आई. तो अपनी बाइक से आ गए. नेता से गुस्सा है, बसपा के लिए प्यार है, ये वोटिंग का त्योहार है)

2. मायावती का पहला राजनीतिक हमला सपा-कांग्रेस पर नहीं. भाजपा पर हुआ. फिर लॉ एंड ऑर्डर का जिक्र आया. मगर अखिलेश का नाम नहीं लिया. नाम लिया कांग्रेस का. कहा सेकुलर बताने वाली कांग्रेस ने 37 साल यूपी में और 54 साल सेंटर में राज किया, पर काम कुछ नहीं किया.

3. सपा को बीजेपी के इशारों पर चलने वाली पार्टी बताया. और अल्पसंख्यकों को याद दिलाया. मुजफ्फरनगर दंगा, दादरी का अखलाक कांड. उसके बाद मथुरा कांड और बुलंदशहर रेप का जिक्र किया.

4. मायावती ने कहा कि सपा सरकार ने उनकी योजनाओं को ही नाम बदल चलाया. मसलन, महामाया गरीब आर्थिक योजना का नाम समाजवादी पेंशन स्कीम कर दिया.

5. अब बारी आई यादव परिवार की. मायावती बोलीं. मुलायम सिंह यादव ने शिवपाल यादव का अपमान किया है. अब शिवपाल के लोग सपा को सबक सिखाएंगे. उनका बेस वोट दो खेमों में बंट जाए. अगर अल्पसंख्यक समाज ने भी उन्हें वोट दिया तो फायदा बीजेपी को होगा.

6. नरेंद्र मोदी और उनकी नोटबंदी का जिक्र हुआ. फिर ललित मोदी और विजय माल्या को बचाने की बात कही. मगर पंच अभी बाकी था. आरक्षण. जिसने दलितों को समाज में हैसियत दी. बराबरी की. मायावती बोलीं कि आरएसएस का एजेंडा है रिजर्वेशन खत्म करने का. दलित स्वाभिमान के क्रम में रोहित वेमुला, ऊना और दयाशंकर सिंह कांड का भी जिक्र किया.

7. एक बार फिर टोन अल्पसंख्यक मोड में आई. अलीगढ़-जामिया यूनिवर्सिटी का माइनॉरिटी स्टेटस और ट्रिपल तलाक पर बात हुई. और जब ये बात आगे बढ़ी, तो लव जेहाद और गोरखा पर आकर रुकी. अब तक आपने जो बातें पढ़ीं, उनका जनता पर ज्यादा असर नहीं हो रहा था. बीच बीच में छिटपुट तालियां. ऐसा लगा कि रैली नहीं प्रेस कॉन्फ्रेंस चल रही है. पढ़ा हुआ भाषण भी शायद वो जादू नहीं जगा रहा था, जिसकी प्रत्य़ाशा थी. मगर मायावती का यही स्टाइल है. इसके कुछ शेड्स आगे नजर आए.

8. मुझे खास सूत्रों से पता चला है कि बीजेपी अपनी सरकार बनते ही प्रदेश में आरक्षण खत्म करवा सकती है.

9. अब वो बात, जिस पर तालियां पिटनी शुरू हुईं. मेरी सरकार बनते ही विशेष अभियान चलाकर जिन गरीबों की एफआईआर नहीं लिखी गईं, उन्हें लिखा जाएगा, कार्रवाई होगी.

10. अखिलेश समाजवादी स्मार्ट फोन दे रहे हैं, बीजेपी लैपटॉप और डेटा. मगर मायावती ने कहा कि हम ये सब चीजें नहीं देंगे. सीधे आर्थिक मदद देंगे, जिसका जो मन हो, वो अपनी जरूरत मुताबिक खरीदे. मिड डे मील पर उन्होंने कहा कि पका हुआ घटिया खाना बंद होगा, इसकी जगह दूध-बिस्कुट, अंडा, चना, केक और फल होंगे.

11. तालियों की फिर बरसात हुई. जब बीएसपी लीडर ने कहा, 1 लाख तक का कर्जा माफ होगा गरीबों का और भू-माफियाओं के पट्टों पर से कब्जे खत्म किए जाएंगे.

12. आखिरी बात. मायावती ने कहा कि अब सरकार बनी तो पार्क और संग्रहालय नहीं बनेंगे. ये मायावती हर रैली में कह रही हैं. अपने काडर से ज्यादा शायद बाकी वोटरों से कह रही हैं. अखिलेश भी कह रहे हैं. पत्थर वाली सरकार भूल तो नहीं गए. जनता अपनी मर्जी से भूल याद तय करती है.

आखिर में बिना किसी इशारे के जैसे पीछे वाले कैंडिडेट्स जान जाते हैं. रैली खत्म होने को है. सब हाथ बांधे आगे आ जाते हैं. बहन जी के डायस से एक फीट पीछे. मायावती बोलती हैं, इनको जिताइए. किसी का नाम नहीं लेतीं. किसी की विधानसभा का जिक्र नहीं करतीं. कैंडिडेट्स हाथ जोड़ लेते हैं. अवध पाल सिंह सरीखे पुराने विधायक और मंत्री रहे नेता अपने समर्थकों की तरफ हाथ हिलाते हैं. जनता भी हाथ हिलाती है. बहन जी को जवाब देने के लिए. मायावती के स्टेज से नीचे उतरते ही तेज आवाज में गाना बजने लगता है. शादी वाली आर्केस्ट्रा पार्टी की याद दिलाता. इसके बोल हैं,

“एक रास्ता है बस यही
बसपा को आगे लाइए.”

बसपा की रैली में करण जौहर का स्टाइल

आगे बीवीएफ के वॉलंटियर भी आते हैं. हमसे कहते हैं. फोटो खींचिए. बाकायदा पोज देते हैं. फिर आकर स्क्रीन पर शॉट चेक करते हैं. हाथ मिलाते हैं. सीधा वाला नहीं. दो उंगलियां आगे कर घुमाने वाला. करण जौहर की फिल्मों ने जैसे दिखाया. ये बदलता भारत है. यहां एक ही मैदान पर सब मिलते हैं. मगर अब बिछड़ने की बारी है. सब को बाहर की तरफ जाने चाहिए. मगर नहीं, अभी इंतजार हो रहा है. क्योंकि बहन जी का हेलिकॉप्टर अभी उड़ा नहीं है. शायद 11 फरवरी की पोलिंग के लिए प्रत्य़ाशियों को जाते जाते कुछ हिदायत दी जा रही है. उधर जनता कुर्सियों पर चढ़ी, हेलिपैड से धूल उड़ने का इंतजार कर रही है.
इंतजार. उम्मीद. उम्मीदों का प्रदेश. उत्तर प्रदेश. जिसके प्रश्न निराले हैं.

जय भीम, जय भारत.



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