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रिश्तेदारों ने तेरहवीं कर दी, पर ये आदमी बनारस से चुनाव लड़ रहा है

बनारस से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सांसद हैं. अभी अपने भाषण में उन्होंने कहा कि बनारस को बिजली नहीं मिलती. इसके जवाब में अखिलेश यादव ने कहा कि बनारस के लोग बताएंगे. ये सारी बातें चल रही हैं. पर उसी बनारस में एक और कहानी हुई है. जिसके बारे में इन लोगों ने कुछ नहीं कहा है.

इस शहर की एक विधानसभा शिवपुर से एक मुर्दा आदमी चुनाव लड़ रहा है. यह मुर्दा खुद को जिंदा साबित करने के लिए चुनाव लड़ रहा है. ये हकीकत है. करीब 40 साल के संतोष सिंह पिछले 13 साल से खुद को जिंदा साबित करने में लगे हुए हैं.

हमने संतोष सिंह से बात की. उन्होंने बताया-

‘जनाब, पिछले कई सालों से यह मुर्दा खुद को जिंदा साबित करने में लगा हुआ है. डीएम, मुख्यमंत्री वगैरह किसी ने मदद नहीं की. जंतर-मंतर पर कई बार धरने पर बैठा हूं. जंतर-मंतर से पुलिस ने उठा कर 15 दिन तिहाड़ में डाल दिया था. 151 और 701 नंबर के कमरों में. मैं अकेला नहीं हूं. मेरे जैसे कई लोग हैं जिन्हें सरकारी आंकड़ों में मुर्दा बताया जाता है. मेरे रिश्तेदारों ने तो मेरी तेरहवीं भी कर दी है. अभी मणिकर्णिका घाट पर ही रहता हूं. उम्मीद है कि इस घाट से सभी को मोक्ष मिलता है, मुझे जिंदगी मिले. कई बार मुझ पर हमला भी हुआ है, डर की वजह से गांव में नहीं रहता हूं. 2012 में दुबारा वोटर आईडी बनवाई संतोष मूरत सिंह के नाम से, छितौनी गांव से.’

इनका ट्वीट देखें :

संतोष

पर हुआ क्या था संतोष के साथ?

संतोष के मुताबिक 2003 में बॉलीवुड एक्टर नाना पाटेकर ‘आंच’ फिल्म की शूटिंग के लिए बनारस आए थे. संतोष उन से मिले और काम मांग लिया. फिर उन्हीं के साथ मुंबई चले गये. वहां उनको रसोइये का काम मिला. जाति से ठाकुर संतोष को मुंबई में ही एक दलित लड़की से प्रेम हो गया. फिर दोनों ने शादी कर ली. पर जब छुट्टियों में वो घर लौटे तो गांव वालों ने इसी वजह से उनका सामजिक बहिष्कार कर दिया. रिश्तेदारों ने भी इस शादी को मानने से इनकार कर दिया. संतोष वापस मुंबई लौट आये. सोचा कि कुछ दिन बाद लोग शांत हो जाएंगे.

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अगस्त 2003 में मुंबई में ब्लास्ट हुआ. संतोष कहते हैं कि गांव में अफवाह उड़ गई कि संतोष ब्लास्ट में मर गया. रिश्तेदारों ने उनको मुर्दा घोषित करवा दिया और उनके नाम की 12 एकड़ जमीन अपने नाम करा ली. संतोष जब दुबारा गांव पहुंचे तो पता चला कि गांव में उनको मुर्दा साबित कर दिया गया है. गांव वालों ने उनको मार-पीट कर भगा दिया. उसी दिन से संतोष खुद को जिंदा साबित करने के लिए भटक रहे हैं.

पर कोई खुद को कैसे जिंदा साबित करे?

इसका कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था. सरकारी रिकॉर्ड में मर चुके हैं संतोष. कोई मान नहीं रहा था. ठीक ऐसी ही स्थिति अक्षय कुमार की जॉली एलएलबी में दिखाई गई थी. इसमें तो अक्षय एफआईआर के माध्यम से अपने क्लाइंट को जिंदा साबित कर देते हैं. पर संतोष के साथ ये नहीं हो पाया. उन्होंने एक तरकीब निकाली. 2012 में राष्ट्रपति चुनाव का फॉर्म भर दिया. पर ‘मरा हुआ’ होने के कारण पर्चा रद्द कर दिया गया.

इसके बाद उस वक्त के बनारस के डीएम ने इनका एक अस्थायी निवास पत्र बनवाया. जिसके बाद संतोष सिंह ने नाम बदलकर संतोष मूरत सिंह के नाम से वोटर आईडी बनवाई और अब विधानसभा चुनाव की तैयारी में लग गए. चुनाव तो हो रहा है. पर इस बार अभी तक उनका नामांकन रद्द नहीं किया गया है. अभी आस है.

ये एक अजीब स्थिति है. ये किसी के साथ भी हो जाए तो कोई क्या करेगा. सिस्टम भी अजीब है. कागज में चढ़ गया तो कोई कुछ नहीं करेगा. कितना भयावह होगा ये विक्टिम के लिए. संतोष ही कह रहे हैं कि ऐसे बहुत लोग हैं. सोचिए कि इन लोगों पर क्या गुजर रही होगी. जीते जी वो लोग मर चुके हैं. रोज मर रहे होंगे.

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