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BSP का वो मुस्लिम नेता, जिसने माया के पैरों में सिर रखने से इनकार कर दिया

हरियाणा सीमा पर बसा कैराना शामली जिले का हिस्सा है. ये लोकसभा सीट भी है और शामली की तीन विधानसभा सीटों में से एक है. ये सीटें हैं शामली, कैराना और थानाभवन, जहां मौजूदा वक्त में एक-एक पर सपा, कांग्रेस और भाजपा का कब्जा है. 2012 से पहले कैराना मुजफ्फनगर जिले की एक तहसील थी. 1957 से 1974 तक यहां हर मुकाबले में कांग्रेस ही आगे रहती थी. उसके बाद जब सत्ता हस्तांतरित हुई, तो लोगों ने पार्टी नहीं, बल्कि प्रत्याशी देखकर वोट करना शुरू कर दिया. तब से अब तक यही राजनीति चली आ रही है.

विकास के नाम पर कैराना में कुछ नहीं हुआ है. अलग-अलग मीडिया हाउसेस की ग्राउंड रिपोर्ट में हर किसी ने यही दर्द बयां किया. हिंदू हो या मुस्लिम, नेताओं से किसी को कोई खास उम्मीद नहीं है, लेकिन अपने हालात पर नाउम्मीदी जरूर है. पिछले साल जून में यहां ‘सांप्रदायिक हमलों की वजह से हिंदू परिवारों के पलायन’ का मुद्दा उठा था. ये दावा बीजेपी सांसद हुकुम सिंह ने किया था, जो बाद में गलत साबित हुआ और हुकुम सिंह की खूब भद्द पिटी. यहां के हसन परिवार के नेता कंवर हसन ने वो किस्सा भी बताया, जब उन्होंने मायावती के पैरों में सिर रखने से इनकार कर दिया था और उनका टिकट काट दिया गया.

पिछले चुनाव का हाल (2012)

2012 के विधानसभा चुनाव में यहां से 18 नॉमिनेशन किए गए थे, लेकिन चुनाव लड़ा था 12 लोगों ने.

कैराना में डेढ़ लाख पुरुषों और सवा लाख महिलाओं के साथ कुल लगभग पौने तीन लाख वोटर्स हैं. पिछले चुनाव में 98,769 पुरुषों और 78,875 महिलाओं ने वोट डाला था. कुल वोट 1,77,644 (66.03%) वोट पड़े थे.

कैराना- 2012 विधानसभा चुनाव का हाल

चुनाव जीता था बीजेपी नेता हुकुम सिंह ने. उन्हें 80,293 (45.17%) वोट मिले थे. दूसरे नंबर पर थे बीएसपी के अनवर हसन रहे, जिन्हें 60,724 (34.17%) वोट मिले थे. तीसरे पर एसपी के अयूब जंग रहे, जिन्हें 21,258 (11.96%) वोट मिले थे. चौथे पर अब्दुल अजीज थे, जिन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा और 5,862 (3.30%) वोट हासिल किए. पांचवे नंबर पर फिरोज खान थे, जिन्होंने 4,108 (2.31%) वोट हासिल किए थे. हुकुम सिंह ने ये चुनाव 19543 (कुल वोटों का 10.99%) के अंतर से जीता था.

2007 और उससे पहले के चुनाव

2007 का चुनाव भी हुकुम सिंह ने ही जीता था. उन्हें 53,483 वोट मिले थे, लेकिन इस चुनाव में दूसरे नंबर पर रहा कैंडिडेट रालोद के अरशद थे, जिन्हें 44,981 वोट मिले थे. बीएसपी, एसपी और कांग्रेस क्रमश: तीसरे, चौथे और पांचवे नंबर पर रही. 2002 का चुनाव भी हुकुम सिंह ने ही जीता था.

कैराना की राजनीति

हुकुम सिंह

कैराना में लंबे समय से राजनीतिक लड़ाई हुकुम सिंह और हसन परिवार के बीच रही है. गुर्जर समुदाय से आने वाले हुकुम सिंह की इलाके में अच्छी पैठ है और बड़े राजनीतिक दलों के मुखियों से भी उनका अच्छा परिचय है. इलाके में उन्हें ‘बाबूजी’ कहा जाता है और मुस्लिम गुर्जर भी उन्हें वोट देते हैं. 2012 के चुनाव में हुकुम के चारों विरोधी कैंडिडेट मुस्लिम थे, जिनके बीच मुस्लिम वोट बंटने की वजह से हुकुम सिंह 20 हजार वोटों से चुनाव जीत गए. कैराना से सात बार विधायक रह चुके हुकुम 2014 लोकसभा चुनाव में बीजेपी के टिकट पर यहीं से चुनाव जीते थे. सीट खाली होने पर 2014 में उपचुनाव हुआ और सपा के नाहिद हसन जीतकर विधायक बन गए.

hukum-singh
हुकुम सिंह

हुकुम सिंह सेना में थे और 1965 में पाकिस्तान के साथ युद्ध के दौरान जम्मू-कश्मीर के पूंछ सेक्टर में बतौर कैप्टन तैनात थे, मगर 1969 में उन्होंने रिटायरमेंट ले लिया. 1974 में वो कांग्रेस से विधायक बने और इमरजेंसी के वक्त और उसके बाद भी इंदिरा गांधी का साथ नहीं छोड़ा. हालांकि, 1980 में हुकुम जनता पार्टी में आ गए, लेकिन जब चौधरी चरण सिंह ने जनता पार्टी छोड़ी, तो हुकुम उनके साथ हो लिए, क्योंकि उन्हें पता था कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राजनीति करने के लिए उन्हें चरण सिंह की जरूरत पड़ेगी. 1977 में जनता पार्टी के बशीर अहमद ने उन्हें हराया. 1980 में वो जनता पार्टी के टिकट पर जीते.

हुकुम सिंह राजनीति

1980 के पांच साल बाद हुकुम सिंह की कांग्रेस में वापसी हुई. 1985 में वो कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीते. 1989 में निर्दलीय राजेश्वर बंसल के हाथों हारे हुकुम सिंह उत्तर प्रदेश में वीर बहादुर सिंह और एनडी तिवारी की कैबिनेट में मंत्री भी रहे. जब नरसिंहा राव के समय कांग्रेस टूटी और तिवारी कांग्रेस बनी, तो हुकुम तिवारी कांग्रेस में आ गए. फिर वो मुलायम के साथ अपनी जगह तलाशते रहे, मगर 1994 में उत्तराखंड बनाने के लिए हुए रामपुर तिराहा कांड के बाद हुकुम ने बीजेपी का दामन थामा और ये करने की वजह साफ थी. रामपुर तिराहा मुजफ्फरनगर जिले में था और उस वक्त हुए गोलीबारी में 6 लोगों की जान गई थी. माहौल भांपते हुए हुकुम सिंह बीजेपी में चले गए. 1996 से लेकर मई 2014 तक बीजेपी विधायक रहे और अब बीजेपी सांसद हैं. हुकुम यूपी में कल्याण सिंह और राजनाथ सिंह सरकार में भी मंत्री रहे.

हसन परिवार

नाहिद हसन
नाहिद हसन

2014 के उपचुनाव में जीतने वाले नाहिद हसन हुकुम के कट्टर विरोधी हसन परिवार के हैं, जिसकी नींव अख्तर हसन ने रखी थी. अख्तर  ने 1984 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर कैराना में जीत दर्ज की थी. उस चुनाव में मायावती भी थीं और वो तीसरे नंबर पर रहीं. नाहिद सपा नेता हैं और सपा-कांग्रेस ने उन पर एक बार फिर भरोसा जताया है.

अख्तर हसन के बेटे मनव्वर हसन लंबे समय बीएसपी नेता रहे. 2007 विधानसभा चुनाव में वो सपा में शामिल हो गए. जनता दल के वक्त से वो मुलायम के करीबी माने जाते रहे. मनव्वर विधायक, सांसद, MLC और राज्यसभा सांसद रह चुके हैं. 2008 में एक सड़क हादसे में उनकी मौत हो गई थी. नाहिद मनव्वर के बेटे हैं. अनवर और कंवर हसन मनव्वर के भाई हैं. हसन परिवार हमेशा सपा और बसपा के बीच राजनीति साधता रहा है और परिवार के सदस्य दोनों पार्टियों में अंदर-बाहर होते रहे हैं.

अनवर और कंवर हसन

सपा में शामिल होते समय अनवर हसन
सपा में शामिल होते समय अनवर हसन

अनवर और कंवर हसन की कहानी ये है कि 2014 का उपचुनाव हारने के बाद बीएसपी ने दोनों भाइयों को पार्टी से निष्कासित कर दिया था, लेकिन 2015 में पार्टी में वापस ले लिया था. 2015 में बीएसपी ने अनवर को कैराना से पार्टी प्रभारी बनाया था. पिछले दिनों उन्होंने सपा जॉइन कर ली. बीएसपी छोड़ते समय कंवर ने आरोप लगाया कि मायावती ने टिकट के लिए उनसे चार करोड़ रुपए मांगे थे और पैरों में सिर रखने के लिए कहा था. अनवर के मुताबिक वो सच्चे मुस्लिम हैं और अल्लाह के अलावा किसी को सजदा नहीं कर सकते, इसलिए उन्होंने माया के पैरों में सिर रखने से इनकार कर दिया और माया ने टिकट देने से. माया ने कहा था कि चार करोड़ देने वाले तो बहुत हैं और तुम्हें सिर झुकाने में दिक्कत है. कंवर का टिकट बुढ़ाना से काटा गया था, जबकि उनका दावा है कि वो पूरी तैयारी कर चुके थे.

कैराना के पॉलिटिकल किस्से

कैराना का सबसे बड़ा लतीफा/किस्सा तो पलायन ही है. पिछले साल जून में हुकुम सिंह ने शिगूफा फैलाया कि मुस्लिमों के अत्याचार की वजह से यहां के हिंदू परिवार पलायन कर रहे हैं, जबकि पलायन की असली वजह गुंडई है, कम्युनल वायलेंस नहीं. यहां के लोग दो बातों पर सहमत हैं. पहली, यहां क्राइम बहुत ज्यादा है और दूसरी, लोग अपना घर छोड़कर जा रहे हैं. ये सच है कि यहां के अधिकांश गुंडे मुस्लिम हैं और पलायन करने वाले अधिकांश लोग हिंदु. मर्डर और धमकियों में इन्हीं गुंडों के नाम सामने आते रहे हैं. यहां सबसे बदनाम मुकीम काला गैंग है, जिसके किस्से कैराना में आम हैं.

kairana

मुकीम अभी जेल में है, लेकिन वहीं से अपना गैंग चलाता है. उसकी शह पर गुंडे रंगदारी वसूलते हैं. मुकीम जैसे कई संगठन हैं, जो छोटी-छोटी बातों पर लोगों को मौत के घाट उतार देते हैं. कैराना में इस गैंग के 109 लिस्टेड हिस्ट्रीशीटर हैं. इनमें से एक इकबाल काना पाकिस्तान जा चुका है. फुरकान गैंग की भी काफी दहशत है. नकली नोट, अवैध हथियार, ड्रग्स तस्करी और कई क्रिमिनल्स के पाकिस्तान से रिश्तों की बातें यहां आम हैं. यहां हिंदुओं में सबसे ज्यादा गुर्जर और फिर कश्यप हैं. अधिकांश व्यापारी हैं, क्योंकि रोजगार है नहीं. मुस्लिम गुंडे इन्हीं से रंगदारी वसूलते हैं और इनकी सुनने वाला कोई नहीं. 2014 में रंगदारी न देने पर व्यापारी शिवकुमार, विनोद और राजेंद्र की हत्या हुई थी.

मनव्वर हसन और हुकुम सिंह की राजनीतिक लड़ाई के ढेरों किस्से

कैराना में हुकुम सिंह और मनव्वर हसन की राजनीतिक लड़ाई के ढेरों किस्से सुनाई देते हैं. मनव्वर हसन के पिता अख्तर का इस इलाके में काफी बोलबाला था. यही वजह रही कि हुकुम सिंह के सांसद बनने के बाद कैराना सीट बीजेपी के हाथ से फिसल गई. हुकुम सिंह की पत्नी की 2010 में घर में हत्या हो गई थी और इससे दो साल पहले 2008 में सांसद रहते हुए मनव्वर हसन की सड़क दुर्घटना में मौत हुई थी. दोनों की रंजिश पुरानी बताई जाती है. लोगों को इस बात से अचंभा होता है कि हुकुम सिंह न तो संघ से जुड़े रहे और न राम मंदिर आंदोलन से. ऐसे में वो कैराना को सांप्रदायिक रंग क्यों दे रहे हैं.

इस बार के कैंडिडेट

बीजेपी

मृगांका सिंह
मृगांका सिंह

बीजेपी ने इस बार कैराना से हुकुम सिंह की बेटी मृगांका को टिकट दिया है. उनकी पढ़ाई देश के बाहर हुई है, इसलिए स्थानीय लोगों से उनका परिचय बहुत ज्यादा नहीं है. फिलहाल वो एक स्कूल चला रही हैं. 57 साल की मृगांका लोगों के बीच कहती हैं कि उन्हें राजनीति से वंचित रखा गया. उनके सोशल मीडिया पेज पर मोदी, शाह, मौर्या, राजनाथ और हुकुम की फोटो है. बीजेपी के युवा कार्यकर्ता उन्हें बुआ बुलाते हैं. संपत्ति इनकी करोड़ों में है, लेकिन कार एक भी नहीं.

सपा-कांग्रेस

सपा-कांग्रेस गठबंधन की ओर से हसन परिवार के नाहिद हसन को टिकट दिया गया है, जो इस सीट के मौजूदा विधायक हैं. 28 साल के नाहिद की पढ़ाई सिडनी में हुई है. उनके पास बैचलर ऑफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन की डिग्री है. पिछले एफिडेविट के मुताबिक ये भी करोड़ों की संपत्ति के मालिक हैं. इनके पास ढाई करोड़ से ज्यादा की संपत्ति है, लेकिन कार एक भी नहीं है. नाहिद पर कांधला कांड में रेलवे संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और बलवा की विभिन्न धाराओं में मुकदमें दर्ज हैं. कांधला रेलवे स्टेशन और थाने पर हुए बवाल में इनकी भूमिका मानी जाती है. हंगामा कर रही भीड़ के बीच नाहिद ने भाषण दिया था और कैराना से पलायन के मुद्दे पर चुप रहे.

बीएसपी

बीएसपी की ओर से कैराना में दिवाकर देशवाल को उतारा गया है. दिवाकर ने एफिडेविट में दिखाया है कि उनके पास सिर्फ एक लाख रुपए हैं और कार नहीं है. उनकी पत्नी पूनम के नाम पर हापुड़ के विजया बैंक में 50 हजार रुपए का कर्ज है. खुद के पास एक लाख के अलावा इनकी पत्नी के पास ढाई लाख नकद, तीन लाख के 100 ग्राम सोने के जेवर समेत कुल 5,67,369 की संपत्ति है.

रालोद

रालोद में शामिल होते समय अनिल चौहान (बीच में)
रालोद में शामिल होते समय अनिल चौहान (बीच में)

रालोद ने कैराना में अनिल चौहान को उतारा है, जो मृगांका के चचेरे भाई और हुकुम सिंह के भतीजे हैं. अनिल बड़े जोर-शोर से कैराना में कैंपेनिंग कर रहे थे और अपना टिकट पक्का मानकर चल रहे थे, लेकिन बीजेपी ने उन्हें टिकट नहीं दिया. इससे नाराज होकर पिछले दिनों वो रालोद में शामिल हो गए, जहां से उन्हें टिकट मिल गया. हुकुम के फार्म हाउस पर चल रही मृगांका की मौजूदगी वाली एक मीटिंग में अनिल ने खुलेआम कहा था, ‘उपचुनाव में मैं सिर्फ हजार वोटों से हारा था. मैंने क्षेत्र में मेहनत की है और कोई गलत काम नहीं किया. मैं पल्ला पसारकर कहता हूं कि सांसदजी, आप वरिष्ठ नेता हैं. मुझे टिकट दिलवा दीजिए.’

कैराना में वोटों का जाति प्रतिशत

कैराना में मुस्लिम ज्यादा हैं. इनमें गुर्जर भी हैं. इनके बाद कश्यप और जाट वगैरह आते हैं. ब्राह्मण यहां लगभग निल हैं. अगर मुस्लिम वोट आपस में नहीं बंटते, तो मुस्लिम कैंडिडेट आसानी से जीत जाते हैं, भले ही वो किसी भी पार्टी से हों. वोट बंटने पर हिंदू कैंडिडेट जीतता है. बीजेपी की यहां यही कोशिश रहती है कि किसी भी तरह गुर्जर, कश्यप और जाटों को एक करके चुनाव निकाला जाए. जानिए बाकी वोटर्स के बारे में:

कुल वोटर: 2,99,980
ब्राह्मण: 11 हजार (3.5%)
क्षत्रिय: 4,800
वैश्य: सात हजार
मुस्लिम: 1,24,120 (42.19%)
गुर्जर: 25 हजार (11%)
कश्यप: 34 हजार (11.65%)
एससी: 36 हजार (12.15%)


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