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बीजेपी के गुरु गुड़ ही रहि गए, सपा का चेला सक्कर हुई गवा

रील लाइफ: ‘सर, सीतापुर से टिकट दे दीजिए न.’ प्रकाश झा की फिल्म ‘राजनीति’ का डायलॉग. एक लड़की, जो स्टूडेंट लीडर है, पार्टी आलाकमान के वारिस युवा तुर्क के सामने नेह निमंत्रण कर रही है. पल्लू खिसका रही है. फिर भी टिकट नहीं मिलता. मौत मिलती है.

रियल लाइफ: कोई सीतापुर का टिकट लेकर करेगा भी क्या. यहां बरसों बरस एक ही आदमी पर मतदाताओं की सुई अटकी रहती है. 1977 से 1993 तक लगातार जनसंघ-जनता पार्टी-बीजेपी के नेता राजेंद्र गुप्त जीते. पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और कैबिनेट मंत्री रहे. और फिर 1996 से अब तक लगातार समाजवादी पार्टी के राधेश्याम जायसवाल जीत रहे हैं. इस बार भी सबसे मजबूत वही हैं. राजेंद्र गुप्त और राधेश्याम की कहानी एक सियासी पाठ है. आओ पढ़ें.


राजेंद्र गुप्त वैश्य बिरादरी के नेता थे, इसलिए सदर में किसी मजबूत ब्राह्मण नेता को उभरने नहीं दिया. ऐसा पुराने पत्रकारों ने बताया. बात की ऐवज में अशोक दीक्षित का नाम गिनाया. तेजी से उभर रहे थे. 1995 के नगर पालिका अध्यक्षी के लिए पार्टी के जायज दावेदार थे. मगर राजेंद्र गुप्त ने उनकी जगह एक दरबारी राधेश्याम जायसवाल को टिकट दिलवा दिया. राधेश्याम, जिनका खुद उनके शब्दों में अपनी बिरादरी का महज सवा सौ वोट है, बीजेपी लहर में जीत गए. जीतने से पहले स्टेशन रोड पर चाय की दुकान थी. वहीं से नेतागिरी चालू की. और भी बहुत कुछ चालू किया.

राधे श्याम जायसवाल
राधे श्याम जायसवाल

राजेंद्र गुप्त को लगा कि राधेश्याम से दिक्कत नहीं होगी. मगर सालभर में ही नगर पालिका अध्यक्ष ने अपनी राह चलना शुरू कर दिया. जायसवाल राह बदलने की ट्रैजिक कथा में खुद को नायक की तरह पेश करते हैं. वो बोले, ‘भइया, हम तो सब मान रहे थे उनकी. मगर उनके लोग हमें और जेई को ठेके के लिए गालियां देते. एक दिन तो हम डीएम दफ्तर में फूट-फूटकर रोने लगे. मगर राजेंद्र जी ने अपने लोगों को नहीं समझाया. फिर आया कानपुर में बीजेपी का अधिवेशन. हम गए गाड़ी से. जैसे ही वहां उतरे, सामने वही दो लोग दिख गए, जो हमें गालियां देते थे. हम भइया वापस अपनी कार में बैठ गए. रुके लखनऊ. मिले मुख्तार अनीस से.’

अनीस इलाकाई सपाई नेता थे. उन्होंने जायसवाल की मुलायम सिंह यादव से भेंट कराई और दो रोज बाद राधेश्याम सभी 26 वॉर्ड मेंबर समेत सपा में शामिल हो गए. फिर राजेंद्र गुप्त ने पैचअप की कोशिश की, मगर नतीजा सिफर रहा.

खेल यहां से शुरू हुआ. मुलायम सिंह ने पार्टी में शामिल करते ही राधेश्याम को विधायकी लड़ने की तैयारी के लिए कहा. 1996 में राजेंद्र गुप्त के सामने उनका अपना ही बनाया नेता खड़ा था, साइकल सिंबल से. हालांकि, राधेश्याम कहते हैं कि ‘राजनीति के गुर हमने कांग्रेस नेता रामलाल राही से सीखे.’ जो भी हो, उन्हें राह दिख गई थी. वो अपने पहले ही चुनाव में 6,700 वोटों से जीते. राजेंद्र गुप्त को समझ नहीं आया कि दशकों की जमीन कैसे दरक गई. अशोक दीक्षित वाला प्रकरण बाभन भूले नहीं. और बची-खुची कसर बीजेपी सांसद जनार्दन मिश्र की हार ने पूरी कर दी. मिश्र 1991 में सीतापुर जीते थे, मगर 96 में हार गए. लोकसभा चुनाव के कुछ ही महीनों बाद विधानसभा हुए, तो उनकी लॉबी ने भी राजेंद्र से किनारा कर लिया.

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राधेश्याम का जीतना फ्लूक नहीं था. उन्होंने ‘राजेंद्र स्टाइल’ पॉलिटिक्स ही की. कोई भी आ जाए, तो स्कूटर पर बैठ साथ चल देते. फिर इसमें अपने एलिमेंट जोड़े. मसलन, पब्लिक में अधिकारियों को गरियाते, भीतर हाथ जोड़ काम कर देने को कहते. रेहड़ी-पटरी दुकानदारों के लिए बुलडोजर के सामने लेट जाते. रोने लगते. दुहाई देने लगते. और इसी के दम पर 2002 में वो उन्हीं के मुताबिक लगभग 20 हजार वोटों से जीते. इस बार फिर राजेंद्र गुप्त चेले से हार गए और फिर दोबारा मैदान में नहीं आए. कुछ बरस बाद उनका देहांत भी हो गया.


और राधेश्याम का राजनीतिक जीवन बदस्तूर जारी है. उन दिनों नियम था कि विधायक नगर पालिका अध्यक्ष भी रह सकता था, तो राधेश्याम अध्यक्षी भी फिर लड़े और जीते. फिर आगे चलकर पत्नी को ब्लॉक प्रमुख बनवाया. इस वक्त उनकी बहू रश्मि जायसवाल नगर पालिका अध्यक्ष हैं. आर्यनगर में उनकी आलीशान कोठी बनी है. मगर जायसवाल यहां नहीं मिलते. वे मिलते हैं अपने तख्ते पर, जहां चाय की दुकान थी. और जहां बीस बरस से उनका दफ्तर है. मुंह पान से सना और अंदाज अति विनम्रता से भरा.

राधे श्याम के तख्ते के अंदर की एक तस्वीर
राधे श्याम के तख्ते के अंदर की एक तस्वीर

‘राधेश्याम जी, इतने बरस से विधायक हैं. अब तक लाल बत्ती क्यों नहीं मिली?’ इस पर नेता जी का जवाब. ‘हम भइया अपने क्षेत्र में रहते हैं. लखनऊ में किसी की दरबारी नहीं करते. सबके सेवक हैं.’ और इसका प्रमाण: शिवपाल और अखिलेश, दोनों की लिस्ट में राधेश्याम का नाम था. चुनाव सिर पर हैं, मगर सदर विधायक सुकून से बैठे हैं, क्योंकि इस बार प्रत्याशी हल्के हैं.

बीजेपी की तरफ से पिछली बार लड़े थे साकेत मिश्रा. उनकी यहां तेज तर्रार नेता की छवि है. 2012 में भी 44 हजार वोट पाए थे, मगर इस बार पार्टी ने उन्हें टिकट नहीं दिया. दिया बीएसपी से एक चुनाव लड़ चुके राकेश राठौर को. उनके लिए अमित शाह रैली करने आए. भीड़ आई 6-7 हजार की. यहां के वकील पत्रकार अरविंद मिश्र के मुताबिक अध्यक्ष रैली में बोलकर आए, ‘इतने लोगों के दम पर कैसे होगा परिवर्तन’. उस दिन के बाद से बीजेपी का चुनाव और बैठ गया.

बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह
बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह

बीएसपी ने अशफाक खान को टिकट दिया है. पिछली बार उनके ससूर अयूब खान लड़े थे. दूसरे पर रहे थे. उनका चुनाव कमजोर किया था कांग्रेस के जलीस अंसारी ने. इस बार कांग्रेस नहीं है. मुस्लिम वोट दो खांचों में बंटा है. अंसारी सपा के साथ दिख रहे हैं, तो खान-पठान बसपा के. और राधेश्याम जायसवाल इस पर खुश हो रहे हैं, क्योंकि अंसारी ज्यादातर रहते हैं खैराबाद कस्बे में, जो पिछली बार ही नए परिसीमन में सदर सीट से जुड़ा है. यहां मुस्लिम हिंदू आबादी का 70-30 का रेश्यो है. और अंसारियों और खैराबाद से इस बार कोई कैंडिडेट नहीं है. यहां हमने फील्ड विजिट की तो सपा का जोर दिखा.

जोर का जिक्र आया, तो एक मलबे को भी देख लीजिए. जिले के एक सपा विधायक रामपाल यादव हैं. उन्होंने लखनऊ रोड पर होटल बनवाया. रेल की पटरी के बगल में. अवैध जमीन पर. आलीशान होटल. कोर्ट-कचहरी तक मामला जाता, उसके पहले ही अखिलेश यादव ने बुलडोजर चलवा दिया. खटर-पटर वाली टूट से काम नहीं चला. एक भाई साहब ने खालिस अवधी अंदाज में बताया, ‘भइया डीएम अमृत त्रिपाठी को सीधे नखलऊ से फोन आया था अकलेस का. तब बड़ी वाली मशीन लाई गई और एक ही डज्ज में बिल्डिंग भरभराके नीचे.’

रामपाल यादव
रामपाल यादव

रामपाल को ये सजा क्यों मिली? क्योंकि वो शिवपाल का नारा बुलंद करते थे और अखिलेश के लिए लूज टॉक कर दी थी. अब वो चुनाव लड़ रहे हैं. अपनी पिछली सीट सिसवां से नहीं, बगल की सेउता सीट से. यहां भी सपा के सिटिंग विधायक थे. झीन बाबू, जो गोवा कांड से मशहूर हुए. अब वो बइठे हैं रामपाल को अपनी जगह खड़ाकर. हैंडपंप के चुनाव निशान पर. मकसद एक ही. रामपाल खूब पानी उलीचें और सपा की जमीन पर कीचड़ कर दें. इस पर चाहे कमल खिले या हाथी आगे बढ़े, उन्हें फर्क नहीं पड़ता.

क्या ये हार की जीत का उत्तर आधुनिक संस्करण है!


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