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ग्राउंड रिपोर्ट पडरौना: जहां के लोगों को याद है कि पीएम ने ढाई साल पुराना वादा पूरा नहीं किया

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अप्पमादरता होथ स, चित्तमनुरक्खथ।
दुग्गा उद्धरथ-त्तानं पंके सत्तो व कुंजरो।।

जागरूक रहो, अपने मन को संभाल कर रक्खो. पंक में फंसे हाथी की तरह अपने आप को गड्ढे में से निकालो.
– नागवग्गो, धम्मपद (बुद्ध के उपदेशों का संकलन)


कुशीनगर में बुद्ध की मौत हुई थी, जिसे महापरिनिर्वाण कहा जाता है. इस जिले के मुख्यालय पडरौना में चाय की एक ढापली में हमें निर्दलीय प्रत्याशी विजय चौरसिया मिले. उनका नारा है, ‘सभी दलों में दलदल, सबसे अच्छा निर्दल.’ चुनाव चिह्न है टॉर्च. हाथ में टॉर्च लेकर चलते हैं और दिन में भी ऑन रखते हैं. कहते हैं कि कहीं कोई सांप निकल आए, तो इसी टॉर्च से मार दूंगा.

सभी दलों में दलदल सबसे अच्छा निर्दल का नारा देने वाले टॉर्च नेता:

पडरौना से भाजपा के कैंडिडेट स्वामी प्रसाद मौर्या हैं. सपा के साथ गठबंधन के बाद कांग्रेस से शिवकुमारी हैं. बसपा से जावेद इकबाल हैं. पीस पार्टी से राजेंद्र उर्फ मुन्ना यादव हैं. और कई निर्दलीय प्रत्याशी हैं, जो वोटकटवा की भूमिका निभा सकते हैं.

स्वामी प्रसाद मौर्या के चुनावी ऑफिस में गंभीर छपरा के संतलाल कुशवाहा मिले. एक कोने में कुर्सी पर चुपचाप बैठे हुए. चुनाव प्रचार कर रहे थे, मोटरसाइकिल में तेल खत्म हो गया, तो तेल भराने आ गए हैं. लेकिन उनसे कहा गया कि ऑफिस हेड अभी बाजार गए हैं कुछ सामान लाने, तो उनके आने पर बात करेंगे. घड़ी की ओर देखकर कहते हैं कि तेल मिल जाता, तो अभी कम से कम 3-4 घंटे और प्रचार कर लेते. एक बोर्ड पर स्वामी प्रसाद मौर्या के दिन भर के प्रोग्राम की डीटेल लिखी हुई है.

वहीं पर थोड़ा ज्यादा ऐक्टिव नजर आ रहे वीके कुशवाहा से बात शुरू की, तो उन्होंने थोड़ा अलग चलकर बात करने को कहा. हम बाकी लोगों से थोड़ी दूर आ गए. तब उन्होंने कहा, ‘स्वामी प्रसाद मौर्य पहले जितना मजबूत नहीं रह गए हैं. उनसे अच्छा चुनाव कांग्रेस लड़ रही है. बसपा में उनकी जितनी इज्जत थी, उतनी भाजपा में नहीं है. पार्टी बदलने से लोगों पर भी असर पड़ा है. लोगों को भी उनका कद घटता दिख रहा है. पहले कहा गया था कि 70 सीटें स्वामी प्रसाद मौर्य के कहने पर दी जाएंगी. फिर 55 हुआ. फिर 50. फिर 30 और अंत में 3 मिलीं.’ भाजपा की तरफ से स्वामी प्रसाद मौर्या का प्रचार कर रहे वीके कुशवाहा कहते हैं कि वो तीसरे नंबर पर जा सकते हैं.

वीके कुशवाहा
वीके कुशवाहा

ऊपरी तौर पर ये बात है कि भीतर ही भीतर भाजपा के नेता स्वामी प्रसाद मौर्या के पिछले बयानों से नाराज हैं, जो उन्होंने बसपा में रहते हुए दिए थे. उन्होंने कहा था, ‘शादियों में गौरी-गणेश की पूजा नहीं करनी चाहिए. यह मनुवादी व्यवस्था में दलितों और पिछड़ों को गुमराह कर उनको शासक से गुलाम बनाने की साजिश है. हिंदू धर्म में सुअर को वराह भगवान कहकर सम्मान दे सकते हैं. गधे को भवानी, चूहे को गणेश और उल्लू को लक्ष्मी की सवारी कहकर पूजा की जाती है, लेकिन शूद्र को सम्मान नहीं दिया जाता.’

लेकिन भीतर की बात में माना जाता है कि अगर स्वामी प्रसाद मौर्या जीत गए, तो इस इलाके में भाजपा की तरफ से सिर्फ उनकी चलेगी, बाकी पुराने भाजपाई नेताओं की नेतागीरी बंद हो जाएगी. माना जाता है कि इसी वजह से भाजपा के पुराने नेता ये नहीं चाहते कि स्वामी प्रसाद मौर्या जीतें.

अभी एबीपी पर खबर आई है कि हिंदू जागरण मंच की तरफ से गौरी-गणेश वाले बयान का जिक्र करते हुए पर्चे बांटे जा रहे हैं कि स्वामी प्रसाद मौर्या ने धर्म का अपमान किया है. हिंदू जागरण मंच का कहना है कि उन्होंने ऐसा नहीं किया है. स्वामी प्रसाद मौर्या का कहना है कि उन्होंने वो कहा ही नहीं था, एक अखबार ने मनगढ़ंत छाप दिया.

पूर्वांचल में राहुल गांधी के कमांडर से मुलाक़ात

हम कस्बे की तंग सड़कों से आरपीएन सिंह के घर पहुंचे. कांग्रेस की शिवकुमारी के पीछे आरपीएन सिंह की ताकत है. पुराने राजा होने की वजह से लोग उन्हें कुंवर साब कहते हैं. महलनुमा घर. विशाल गेट. पुताई न होने की वजह से गेट के ऊपर बने दो बाघ बदरंग हो चुके हैं. गेट के सामने बाहर की तरफ एक फव्वारा बनाया जा रहा है. गेट से घुसते ही परिसर में बहुत बड़ा स्पेस दिखता है, जहां लोग तमाम झुंडों में हैं.

आरपीएन सिंह के घर में अखिलेश की टीशर्ट पहने कांग्रेसी झंडा संभाले युवक
आरपीएन सिंह के घर में अखिलेश की टीशर्ट पहने कांग्रेसी झंडा संभाले डुमई

एक आदमी राहुल गांधी का पोस्टर हाथ में लिए, कांग्रेस की टोपी, अखिलेश की टीशर्ट पहने और तमाम झंडे संभालते दिखता है. लोग बताते हैं कि उनका नाम डुमई है. डुमई आरपीएन सिंह के बहुत बड़े फैन हैं. दारू की लत है. परिवहन निगम में ड्राइवर की सरकारी नौकरी है. 2-3 बार सस्पेंड हो चुके हैं. आरपीएन सिंह ने बहाल करवाया. पता चलता है कि आरपीएन सिंह आ रहे हैं, तो गाड़ी वहीं रोककर खड़े होकर नारे लगाने लगते हैं. लखनऊ में बस ले जा रहे हों और पता चल जाए कि आरपीएन सिंह किसी इलाके में हैं, तो बस उधर ही मोड़ देते हैं. डुमई कुछ कहना शुरू करते हैं और मैं मोबाइल से उनकी फोटो लेने लगता हूं. डुमई कहते हैं कि अब आप रेकॉर्ड कर रहे हैं और चले जाते हैं. इससे पहले उन्हें किसी ने 50 रुपए दे दिए थे.

आरपीएन सिंह का घर
आरपीएन सिंह का घर

कांग्रेस के सपोर्टर बताते हैं, ‘2-3 दिन पहले अमित शाह की सभा थी. सभा के बाद माइक ऑफ नहीं था और अमित शाह ने स्वामी प्रसाद मौर्या से कहा कि इसी भीड़ के दम पर चुनाव जीतोगे और इसे सबने सुन लिया.’ मैंने उन लोगों से पूछा कि इसकी कोई रेकॉर्डिंग है, तो उन्होंने कहा कि सभा खत्म हो चुकी थी, उस वक्त कौन रेकॉर्डिंग करता है. पता नहीं, उनकी ये बात सच है या झूठ.

उस परिसर में महिलाएं भी काफी संख्या में दिखीं. वो कहती हैं कि उन्हें प्रचार करने के लिए कुछ खर्चा-पानी नहीं मिला, लेकिन वो आरपीएन सिंह को मानती हैं, जब चाहे तब उनसे मिल सकती हैं, इसलिए अपने घर-बार का काम छोड़कर उनका प्रचार कर रही हैं. दिन में कुछ खाने-पीने का इंतजाम? वो कहती हैं कि इंतजाम कुछ नहीं है, घर से खाकर आते हैं.

आरपीएन सिंह के घर के परिसर में महिलाएं
आरपीएन सिंह के घर के परिसर में महिलाएं

वहां से बाहर निकलकर बाजार की तरफ चलने पर सड़क किनारे कुछ ई-रिक्शा दिखे. उन पर एक स्टीकर लगा हुआ था- ‘समाजवादी ई-रिक्शा योजना’. प्रह्लाद वर्मा बताते हैं कि वो पहले रिक्शा चलाते थे. फिर ये योजना आई. उन्होंने फॉर्म भरा 2013 में और 2016 में रिक्शा मिला. पुराना रिक्शा नगर पालिका ने जमा करा लिया.

पडरौना में केवल 15 लोगों ने फॉर्म भरा था, सबको मिल गया. बिना जाति-धर्म के भेदभाव के. बिना घूस-पात के. कई जगह पर ज्यादा रिक्शा मिले हैं. कप्तानगंज में 49. लेकिन एक दिक्कत है. कुछ लोगों के पास रिक्शे को चार्ज करने की सुविधा नहीं है. उन्हें 100 रुपए चार्जिंग के देने पड़ते हैं. बगल में एक नॉर्मल रिक्शा खड़ा है. उसे चलाने वाले भी हमारी बातचीत में शामिल थे. मैंने पूछा कि उन्हें क्यों नहीं मिला, तो पता चला कि फॉर्म नहीं भरा था. फॉर्म क्यों नहीं भरा था? फॉर्म भरने में कई प्रमाण-पत्र और नोटरी लगती. 400-500 खर्च होते, इसलिए नहीं भरा.

समाजवादी ई-रिक्शा योजना के तहत मिला ई-रिक्शा
समाजवादी ई-रिक्शा योजना के तहत मिला ई-रिक्शा

सड़क पर ही बिल्लौरी आंखों वाले अधेड़ नंदू मिलते हैं. मैं कहता हूं कि आपकी आंखें बहुत खूबसूरत हैं, तो शरमाकर हंसते हैं. कहते हैं कि अगर कांग्रेस अलग होकर लड़ती, तो पक्का जीत जाती. एक साथ होने से दिक्कत है. मैं पूछता हूं कि क्या दिक्कत है, तो कहते हैं कि यहां बाप-बेटे में साथ निभता नहीं, भाई को भाई का साथ पसंद नहीं और ये कहते हैं कि यूपी को ये साथ पसंद है.

आगे एक मुस्लिम बुजुर्ग मिलते हैं. नाम पूछने पर कहते हैं कि लोग पैगंबर नेता कहते हैं. ये नाम कहां से पड़ गया? तो बस ऐसे ही के अंदाज में हवा में हाथ उठाते हैं. ये पूछने पर कि लोगों ने इस नाम पर आपत्ति नहीं की, जोर से हंसते हैं. बताते हैं कि मुकाबला त्रिकोणीय है भाजपा, कांग्रेस और बसपा में. कहते हैं कि मुस्लिम अभी असमंजस में हैं कि किसे वोट दें, आज की तारीख में मुस्लिमों का वोट बराबर बंट रहा है, लेकिन ये बदल भी सकता है.

पुरानी राजनीति के बारे में वो एक दिलचस्प बात बताते हैं. भाजपा से राम नगीना मिश्र छह बार सांसद बने, जिसमें से पडरौना से लगातार चार बार सांसदी जीते. इलाके के ब्राह्मणों के बीच नारा चलता था, ‘राम नगीना बड़ा कमीना, फिर भी वोट उसी को देना’.

पैगंबर नेता
पैगंबर नेता

इन्हीं राम नगीना के बेटे परशुराम मिश्र निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं. बीजेपी के एक और बागी कन्हैया उर्फ पप्पू पांडे रालोद के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं. ये लोग जो भी वोट पाएंगे, वो बीजेपी का नुकसान होगा. कन्हैया का दावा है कि अमित शाह ने उन्हें फोन किया था और पर्चा वापस लेने पर आगे चलकर बहुत फायदे का वादा किया, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया.

बगल की सीट तमकुहीराज पर पूर्व विधायक नंदकिशोर मिश्र को टिकट देने के बजाय जगदीश मिश्र उर्फ बाल्टी बाबा को टिकट दिया गया है. नंदकिशोर मिश्र का ठीक-ठाक जनाधार है, इस वजह से वहां नाराजगी है और उसका कुछ असर इस सीट पर भी है.

जूस बेचने वाले राम लच्छन कुछ साफ नहीं बताते. कहते हैं कि त्रिकोणीय मामला है, उन्होंने अभी तय नहीं किया कि किसे वोट देना है. राजेश के ठेले से 3-4 लोग भाव पूछकर चले गए. 30 रुपए किलो में भरवां वाली लाल मिर्च नहीं खरीदी. राजेश भी शुरू में नहीं खुलते हैं, लेकिन बाद में पंजा कहते हैं.

राम लच्छन का ठेला
राजेश का ठेला

पडरौना के मुस्लिम बहुल इलाके छावनी में कुछ लोग बात चुनावी चर्चा करते मिलते हैं. अख्तर हुसैन और अनिल चौबे. अख्तर कहते हैं कि यहां का चुनाव वोटिंग के दिन 12 बजे के बाद तय होगा. मुसलमान 12 बजे तक देखेंगे कि कांग्रेस की शिवकुमारी और बसपा के जावेद इकबाल में से कौन आगे लगता है. जो आगे दिखेगा, उसी को वोट करेंगे. अनिल कहते हैं कि शुक्रवार को मस्जिद में सब तय हो जाएगा. अख्तर कहते हैं कि ऐसा कुछ नहीं होता. वो मुझसे कहते हैं कि आपकी तो दाढ़ी अच्छी खासी है, टोपी लगाकर मस्जिद चले जाइए और देख लीजिए.

मैं पूछता हूं कि जावेद इकबाल के बाहरी होने का मुद्दा नहीं है क्या. जावेद प्रतापगढ़ के हैं. हालांकि, पिछला चुनाव बगल की सीट से लड़े हैं. अख्तर कहते हैं कि यहां एक-आध को छोड़कर सभी नेता बाहर के ही हैं, पहले से रहे हैं. यहां के लोग यहां के नेताओं को पसंद नहीं करते, वो बाहरी को ही चुनते हैं. इसके अलावा तीनों तो एक ही साथ में थे. स्वामी प्रसाद मौर्या, शिवकुमारी और जावेद इकबाल तीनों बसपा में थे.

अख्तर और अनिल दोनों कहते हैं कि अगर स्वामी प्रसाद मौर्या निर्दलीय चुनाव लड़ जाते, तो आधे से ज्यादा वोट अकेले पा जाते. अख्तर कब्रिस्तान-श्मशान और ईद-दिवाली वाले बयान का जिक्र करते हुए कहते हैं कि ये भारत का सबसे झुट्ठा पीएम है. अनिल इतने कड़े शब्द इस्तेमाल नहीं करते, लेकिन कहते हैं कि प्रधानमंत्री को ऐसा नहीं कहना चाहिए था. तब तक बातचीत में रविकिशन जायसवाल जुड़ जाते हैं. छोटे ठेकेदार हैं. नोटबंदी पर बात भी नहीं हो रही थी, लेकिन आते ही कहते हैं कि नोटबंदी से बड़ी दिक्कत हुई. मैंने पूछा कि क्या दिक्कत हुई, तो बोले कि मजदूरों को पैसा नहीं दे पाया, भाग गए, काम रुक गया.

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यहां 2007 में बड़ा दंगा हुआ था. उस बारे में पूछने पर पता चलता है कि उसमें अनिल फंस गए थे. वो रविकिशन के घर के पास थे, वहां पहुंचे तो लोहे का चैनल बंद मिला. अब क्या करें? साथ में पढ़े हुए मोइनुद्दीन के घर पहुंच गए. घरवालों ने उन्हें बिठाया और कहा कि कुछ बोलना मत. बाद में खुद साइकिल पर बिठाकर उनके घर छोड़ा. ऐसे ही अख्तर ने अपने एक कुशवाहा दोस्त को अपने घर में छिपा लिया था.

स्वामी प्रसाद मौर्या यहां कुशवाहा, दलित और मुस्लिम वोटरों के बल पर जीतते रहे हैं. जब आरपीएन सिंह केंद्र में मंत्री थे, तब स्वामी प्रसाद मौर्या ने विधानसभा के चुनाव में नारा दिया था कि ऊपर मंत्री, नीचे मंत्री. यानी इस इलाके से केंद्र में भी मंत्री और राज्य में भी मंत्री. लेकिन इस बार उनके पास केवल कुशवाहा बचे हैं और पूरी तरह से भाजपा के लोग मिले नहीं हैं. इससे उनके लिए थोड़ी मुश्किल है. शिवकुमारी के साथ आरपीएन सिंह की पूरी फौज है, लेकिन बसपा से मुस्लिम कैंडीडेट और याकूब की पीस पार्टी से मुन्ना यादव के होने की वजह से थोड़ी मुश्किल उनके लिए भी है. बसपा से जावेद इकबाल हैं, जिन्हें कुछ लोग बाहरी कहते हैं.

आरपीएन सिंह की छवि यहां बहुत अच्छी है. वो लोगों के लिए सहज सुलभ हैं. यहां तो वो लोगों से मिलते ही हैं, इलाके का कोई लखनऊ-दिल्ली भी पहुंच जाए, तो उससे तुरंत मिलते हैं, भले ही कोई मीटिंग चल रही हो.

यहां के लोग कहते हैं कि प्रधानमंत्री ने 2014 में यहां बंद चीनी मिल को सरकार बनने पर 100 दिन में फिर से चलवाने का वादा किया था. लोगों को उम्मीद भी थी, लेकिन चीनी मिल अभी तक नहीं चली. राहुल गांधी ने यहां हुई सभा में इस बात पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर चुटकी लेते हुए कहा कि लगता है कि प्रधानमंत्री का साल 30 दिन का होता है.

इस चीनी मिल को चलवाने का वादा करके बालेश्वर यादव नेशनल लोकतांत्रिक पार्टी से 2004 का चुनाव जीत गए थे. उन्होंने तो चीनी मिल चलवा भी दी थी, लेकिन जिस आदमी के जरिए चलवाई, उससे बाद में मैनेज न हुआ, तो फिर बंद हो गई. भाजपा के जिलाध्यक्ष चीनी मिल के अब भी न चल पाने के पीछे टेक्निकल रीजन बताते हैं और कहते हैं कि उसके लिए बैंक लोन में 100 करोड़ की गारंटी चाहिए, वो कौन देगा.

याद रखिए, राजनीति के हर वादे में टर्म्स ऐंड कंडिशंस छिपी होती हैं.


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