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गाजीपुर ग्राउंड रिपोर्ट: ये अफीम का शहर है, यहां पिछले चुनाव के हर कैंडिडेट ने पार्टी बदल ली है

नरेंद्र मोदी वाली भाजपा ने यूपी की तैयारी पहले से की थी, जब उसने नोएडा सांसद महेश शर्मा को तीन मंत्रालय दिए. गाजीपुर सांसद मनोज सिन्हा को रेल राज्य मंत्री बना दिया और चंदौली सांसद महेंद्रनाथ पांडे को कैबिनेट फेरबदल में एचआरडी का राज्यमंत्री बना दिया.

बीजेपी ने केंद्र में यूपी के ब्राह्मण नेताओं को प्रतिनिधित्व दिया और प्रदेश की कमान केशव प्रसाद मौर्य को सौंप दी. कल्याण सिंह और उमा भारती के असर से लोध वोट पर पार्टी को विश्वास पहले से था. बसपा के बागी स्वामी प्रसाद मौर्य को भी उसने लपक लिया. जब टिकट बांटने की बारी आई, तो बीजेपी ने पिछड़े और अति पिछड़े उम्मीदवारों को खूब टिकट दिए. इस तरह जिस सोशल इंजीनियरिंग के लिए बसपा जानी जाती थी, वैसी तैयारी बीजेपी ने पहले से शुरू कर दी थी.

गाजीपुर में बीजेपी का प्रचार करती गाड़ी
गाजीपुर में बीजेपी का प्रचार करती गाड़ी

हम गाजीपुर सदर सीट इसीलिए गए, क्योंकि ये रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा का इलाका है. इसलिए भी, क्योंकि ये मुख्तार अंसारी के असर वाला इलाका है. इन दोनों नेताओं के असर से उनकी पार्टियों के प्रदर्शन में इस बार उछाल आता दिख रहा है.

मुख़्तार अंसारी के घर में ले चलेंगे आपको, जगह- यूसुफ़पुर, मोहम्मदाबाद, ग़ाज़ीपुर:

14 विधानसभा चुनावों में यहां 14 अलग विधायक चुने गए हैं. यानी कोई भी उम्मीदवार दो बार नहीं जीता है. इसीलिए तीनों बड़ी पार्टियों ने अपने उम्मीदवार बदल दिए हैं. अमित शाह के लिए अच्छी खबर है, क्योंकि इस बार यहां बीजेपी के समीकरण अच्छे हैं और लोग नरेंद्र मोदी के काम के बारे में खूब बातें कर रहे हैं.

यहां से पिछली बार सपा के विजय मिश्र 241 वोटों से जीते थे, जिसके बाद दूसरे नंबर पर रहे बसपा के राजकुमार गौतम कोर्ट चले गए थे. हाई कोर्ट तक बात गई थी, लेकिन आखिर में फैसला यही हुआ कि विजय मिश्र जीते हैं. लेकिन लीड 241 से बस 41 रह गई.

विजय मिश्र के पिता अच्युतानंद मिश्र मुलायम के करीबी थे और किसी जमाने में उन्होंने सपा का मैनिफेस्टो लिखा था. लोग बताते हैं कि इसी की बदौलत विजय यहां से टिकट पा गए थे, लेकिन जीतने के बाद उनके काम-काज से सपा काडर ही खुश नहीं रहा और उन्हें यहां बाहरी भी माना गया. इसलिए इनका टिकट कटना तय था.

विजय मिश्रा
विजय मिश्रा

दिलचस्प ये है कि टिकट कटने से नाराज होकर वो बसपा में चले गए. उधर उनके खिलाफ कोर्ट में लड़ने वाले राजकुमार गौतम को भी बसपा ने दोबारा टिकट नहीं दिया, तो वो पहले भाजपा में गए. वहां कुछ नहीं मिला, तो इसी 26 फरवरी को वो सपा में चले गए. तो अब विजय मिश्र बसपा में हैं और गौतम सपा में. सिचुएशन रिवर्स हो गई है.

तो टिकट मिला किसको है? सपा ने साफ सुथरी छवि वाले वकील और पार्टी के जिलाध्यक्ष राजेश कुशवाहा को मैदान में उतारा है. उनका मुकाबला बीजेपी की संगीता बलवंत बिंद और बसपा के संतोष यादव से है.

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राजेश कुशवाहा को पहले मोहम्मदाबाद से टिकट मिला था. बीच में जब मुलायम ने अंसारी बंधुओं से हाथ मिलाया, तो उन्हें गाजीपुर सदर भेज दिया गया, ताकि मोहम्मदाबाद में सिबकतुल्लाह की जगह बन सके. लेकिन फिर अखिलेश यादव ने कौमी एकता दल का विलय सपा में नहीं होने दिया और सपा-कांग्रेस गठबंधन फाइनल हो गया. गठबंधन में मोहम्मदाबाद सीट कांग्रेस को चली गई और राजेश कुशवाहा के हिस्से में सदर सीट ही आई. राजेश जगदीश कुशवाहा के करीबी बताए जाते हैं. जगदीश लोकदल में होते थे. उसके टूटने पर पूर्वांचल के लोकदल नेताओं सहित सपा में आए और इस तरह मुलायम के करीबी हुए. नौजवान राजेश की अखिलेश से ‘अच्छी बातचीत’ बताई जाती है.

बीजेपी यहां से एक ही बार जीती है, 1991 में. संगीता बलवंत बिंद बीजेपी की पुरानी नेता रहीं ओम कला की करीबी मानी जाती हैं. पिछले चुनाव में ओम कला बागी हो गई थीं और इसी सीट से अंसारी बंधुओं की पार्टी कौमी एकता दल से चुनाव लड़ी थीं. संगीता भी पहले कौमी एकता दल में थीं.

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बसपा उम्मीदवार संतोष यादव सैदपुर ब्लॉक प्रमुख रहे हैं. पहले यहां के प्रभारी बनाए गए, फिर टिकट भी मिल गया. बसपा में मंत्री रहे कैलाशनाथ यादव के करीबी हैं. उनका टिकट पहले से ही फाइनल था, इसलिए एक साल से प्रचार कर रहे हैं.

गाजीपुर कचहरी के पास लोगों से बात की, तो लगा कि विजय मिश्र से नाराजगी यहां सपा से नाराजगी में तब्दील हो गई है. अंसारी बंधुओं के असर से मुसलमान यहां बसपा में जाता दिख रहा है. इस तरह बसपा के पास 48 हजार दलित और 28 हजार मुसलमान हैं और सपा के पास 50 हजार यादव. सपा को राजेश कुशवाहा के नाम पर गैरयादव पिछड़े के आने की भी उम्मीद है, लेकिन इसके संकेत फिलहाल नहीं मिल रहे. यहां गैरयादव पिछड़ा और अतिपिछड़ा इस बार नरेंद्र मोदी के नाम पर वोट डालने की तैयारी कर रहा है.

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यहां के एक पत्रकार ने कहा, ‘सपा का मजबूत बनाने वाला मुस्लिम-यादव गठजोड़ ही उसकी कमजोरी भी है. जहां मुस्लिम टूटता है, वहां वो बेसहारा हो जाती है.’

बीजेपी ने संगीता बिंद को टिकट देकर इक्का मारा है. इस सीट पर 49 हजार बिंद वोट हैं और 25 हजार क्षत्रिय, 13 हजार ब्राह्मण, 28 हजार वैश्य और 10 हजार भूमिहारों के वोट के बड़े हिस्से की उसे उम्मीद है. लेकिन बिंद वोट एकमुश्त पड़ेगा, इसके बहुत साफ संकेत नहीं मिलते. बिंद समाज में यहां कई नेता हैं. कचहरी के सामने ही एक शख्स ने कहा, ‘राजकुमार गौतम जो बसपा से सपा में चले गए, वो राजपूत हैं, लेकिन बिंद वोटरों में उनकी अच्छी लोकप्रियता है.’

मनोज सिन्हा के आने से क्षेत्र का नहीं, लेकिन गाजीपुर रेलवे स्टेशन का विकास हुआ है. राह चलते बहुत लोगों ने उनकी तारीफ की, लेकिन उनके काम नहीं बता पाए. सबने सिर्फ ट्रेनों और स्टेशन की बात कही. यहां रोजगार के साधन नहीं हैं. कांग्रेस के समय बनी कताई मिल और चीनी मिल भी बंद पड़ी है. यहां सरकारी अफीम फैक्ट्री भी है, लेकिन उसकी हालत भी बहुत अच्छी नहीं है. देश में दो सरकारी अफीम फैक्ट्री हैं, एक नीमच में और एक गाजीपुर में. यहां दवाओं के लिए मॉर्फीन बनाया जाता है. लेकिन इस फैक्ट्री का भी खास फायदा स्थानीय लोगों को नहीं मिलता. चुनिंदा बड़े किसान हैं, जिनके पास अफीम उगाने का लाइसेंस है और प्राइवेट लेबर वो लेते नहीं. गाजीपुर के TERI पीजी कॉलेज के पास के मैदान में 4 बजे के करीब पचासियों लड़के दौड़ लगाते और कसरत करते मिले. एक पत्रकार ने कहा, ‘नौकरी तो है नहीं, इसलिए ये सीमा पर जाकर गोली खाने की तैयारी कर रहे हैं.’

लहुरी काशी ‘ग़ाज़ीपुर’ के TERI पीजी कॉलेज से फेसबुक लाइव

गाजीपुर से बड़े स्तर पर पलायन और ट्रेनों से आवागमन होता है. मनोज सिन्हा के असर से कुछ नई ट्रेनें गाजीपुर को मिलीं. दोहरीकरण और इलेक्ट्रिफिकेशन का काम हुआ, इसलिए स्टेशन पर कराए काम का फायदा बीजेपी को मिलने के आसार हैं.

गाजीपुर में 400 से ज्यादा स्कूल-कॉलेज हैं, इसलिए शिक्षा माफिया जबरदस्त सक्रिय है. डिग्री मिलना आसान है. क्वालिटी खराब है. एक पत्रकार ने दावा किया, ‘यहां कई प्रदेशों के लड़के सिर्फ परीक्षा देने आते हैं, ताकि जहां वो सुपरवाइजर टाइप की छोटी-मोटी नौकरियां कर रहे हैं, वहां उनकी तरक्की हो सके.’

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पूर्वांचल में सबसे ज्यादा खराब सड़कें अब तक हमें गाजीपुर की ही मिलीं. सड़कों में गड्ढे और गड्ढों में सड़कें वाली बात है. जाहिर है गाजीपुर शहर की बात नहीं कर रहे, उसके आस-पास 5 किलोमीटर के इलाके में ही सड़कों की हालत का अंदाजा लग जाता है. रेलवे स्टेशन के पास एक लड़के ने कहा, ‘यहां बहुत सड़क ऐसा है कि स्कॉर्पियो सब भी नीचे से लड़ जाता है.’

गाजीपुर का एक बाजार
गाजीपुर का एक बाजार

इन सब समीकरणों ने यहां बदलाव के भाव को तेज कर दिया है. यहां 25 हजार ठाकुर वोट हैं. बीजेपी में ठाकुरों की डिमांड थी कि सदर सीट उन्हें दे दी जाए, लेकिन यहां से संगीता बिंद को उम्मीदवार बनाया गया. इसके बदले बीजेपी ने जमानियां से ठाकुर उम्मीदवार सुनीता परीक्षित सिंह को टिकट दे दिया, लेकिन इससे ठाकुर और नाराज हो गए, क्योंकि वहां सपा के ओमप्रकाश सिंह सिटिंग विधायक हैं.

यहां ठाकुरों को लगता है कि बीजेपी ने जमानियां में राजपूत बनाम राजपूत की लड़ाई करवा के अच्छा नहीं किया. लेकिन यहां के एक टीवी पत्रकार के मुताबिक, ‘बाद के दिनों में बीजेपी ने ठाकुर समाज से बैठक करके मामला हल करने की कोशिश की है. ऐसा लगता है कि अब शायद ये किस्सा खत्म हो जाएगा.’

फ्रीलांस पत्रकार अनिल पटेल गाजीपुरिया से कचहरी के पास ही इत्तेफाक से मुलाकात हो गई. उनसे पूछा तो बोले कि इस बार बीजेपी को बढ़त है और उससे थोड़ा ही पीछे बसपा दिख रही है. सपा यहां तीसरे नंबर पर है. ओबीसी वोटों पर उनका कहना है कि वो 12 बजे की वोटिंग के बाद फैसला लेता है. जो जीतता है उसी को वोट करता है.

कार्य प्रगति पर है
कार्य प्रगति पर है (सभी तस्वीरें: अमितेष सिन्हा)

बीजेपी यहां से अभी तक मजबूत दिख रही है, लेकिन उसकी एक ही चिंता है. यहां बसपा और सपा दोनों के कोर वोट बैंक हैं, जो हर हालत में उसके साथ रहते हैं. जो अभी बीजेपी के साथ दिख रहा वोटर कभी उसका समर्पित समर्थक नहीं रहा. उसके इधर-उधर भटकने का इतिहास रहा है.

यहां आखिरी चरण में चुनाव है. उतने समय में समीकरण बहुत बदल सकते हैं.


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