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ग्राउंड रिपोर्ट सोनभद्र: KBC में इस शहर पर बने एक सवाल की कीमत 50 लाख रुपए थी

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‘कौन बनेगा करोड़पति में ये 50 लाख का सवाल था कि भारत के किस जिले की सीमा चार प्रदेशों से लगती है.’

सोनभद्र में ये बात लोग बड़े गर्व से बताते हैं. यहां तीन पावर प्लांट हैं. एनटीपीसी है. जिसकी वजह से यह ऊर्जांचल कहलाता है. कोयले की खदानें हैं. यहीं ‘डाला’ में एक बड़ी सीमेंट फैक्ट्री है. कनहर में बांध परियोजना का काम चल रहा है. लेकिन इस सबका फिलहाल यहां के लोगों की जिंदगी पर लगभग शून्य असर है. शिक्षा और रोजगार यहां सबसे बड़ी दिक्कतें हैं. उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा आदिवासी इसी जिले में रहते हैं. रांची यहां से 317 किलोमीटर है, लखनऊ 400 और दिल्ली 920. यही इसकी भौगोलिक स्थिति है और यही सांस्कृतिक.

उत्तर प्रदेश के दक्षिण-पूर्व कोने का ये आखिरी जिला है और यहीं पर यूपी विधानसभा की आखिरी सीट है. सीट नंबर 403, जिसका नाम है ‘दुद्धी’. दुद्धी में पर इस बार सारे पुराने समीकरण छितरा गए हैं, क्योंकि चुनाव आयोग ने इस सीट को अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए सुरक्षित कर दिया है.

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उत्तर प्रदेश विधानसभा को पहली बार दो सुरक्षित सीटों से अनुसूचित जनजाति के विधायक मिलेंगे. दोनों सीटें सोनभद्र में ही हैं, एक दुद्धी, दूसरी ओबरा. इस सीट को एससी से एसटी करवाने की लड़ाई यहां से सात बार विधायक रहे विजय सिंह गोंड ने लड़ी थी. जनवरी में इस सीट को एसटी के दर्जे का ऐलान कर दिया गया, तो विजय गोंड की चुकी हुई सियासत को ईंधन मिल गया. MBBS ड्रॉप आउट विजय सिंह गोंड ने पायजामे की तरह पार्टियां बदली हैं. वो पहले कांग्रेस, जनता दल, सपा और भाजपा तीनों पार्टियों में रहे हैं. सिर्फ बसपा बचती थी, वो इस चुनाव से पहले उन्होंने जॉइन कर ली. अब वो हाथी के निशान पर दुद्धी से लड़ रहे हैं और बेटे को ओबरा से टिकट दिलवा दिया है.

इसलिए जनजातीय प्रतिनिधित्व की बात सुखद होकर भी मन की नहीं हो पाई है. बहुत सारे लोग मानते हैं कि अगर विजय सिंह गोंड अपने बेटे समेत जीत गए, तो यूपी विधानसभा को एक क्रीमी लेयर वाला एसटी प्रतिनिधित्व ही मिलेगा.

दुद्धी की एक तस्वीर
दुद्धी की एक तस्वीर

दुद्धी की दूरी जिला हेडक्वार्टर रॉबर्ट्सगंज से दो घंटे की है. यहां चूना पत्थर बहुत होता है, जिसे दूधिया पत्थर भी कहते हैं. शायद इसी वजह से जगह का नाम भी दुद्धी पड़ा हो. पता नहीं. पहले लुम्बिनी स्टेट हाइवे और फिर तेंदु, साल, बबूल और महुआ पेड़ों से घिरी एक खूबसूरत सड़क से होते हुए आप यहां पहुंचते हैं. जनसंख्या घनत्व, छोटे-छोटे पहाड़, घने जंगल, भाषा और जनजातियों की मौजूदगी के चलते यह सांस्कृतिक तौर पर बाकी यूपी से अलग नजर आता है.

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लखनऊ और बरेली में बैठकर लोग इस पर आंखें चौड़ी करेंगे, लेकिन जश्न के मौकों पर यहां के आदिवासी भी अपना मशहूरा कर्मा (डांस) करते हैं. वो बड़ी-बड़ी तिकोनी टोपियां भी खास मौकों पर पहनते हैं, जिन्हें आपने अब तक टीवी और तस्वीरों में ही देखा है. बहुत अंदरूनी इलाकों में मिट्टी के बर्तनों का इस्तेमाल भी होता है. ज्यादातर घर दूर-दूर हैं और कच्चे हैं. आपके सड़क से गुजरने के दौरान पुरुष लकड़ी काटते दिखते हैं और महिलाएं अपने कच्चे घर लीपती रहती हैं.

दुद्धी में कुछ बच्चे
दुद्धी में कुछ बच्चे

पिछली बार यहां से रूबी प्रसाद, विजय सिंह गोंड के समर्थन से निर्दलीय लड़कर जीत गई थीं, लेकिन दो साल बाद ही वो सपा में चली गईं. अब जब सीट ‘एसटी कोटे में चली गई है, रूबी प्रसाद और उनके जैसे कई दलित नेताओं की पॉलिटिक्स पर पलीता लग गया है. उन्होंने अपनी राजनीति सेट करने के लिए बरसों तक मेहनत की, लेकिन चुनाव आयोग के फैसले से पूरा करियर चौपट हो गया. इसलिए सारे प्रत्याशी आयोग के फैसले के खिलाफ कोर्ट चले गए. 22 तारीख को इस पर आखिरी फैसला आ सकता है. अगर कोर्ट ने आयोग का फैसला पलटा, तो यहां दोबारा चुनाव होंगे. फिलहाल कोई फैसला नहीं आना है. इसलिए एक समय जो ‘एससी बनाम एसटी’ का अंडर-करंट बन रहा था, वो फिलहाल थम सा गया है.

एक बीजेपी समर्थक
एक बीजेपी समर्थक

इसकी एक वजह ये भी है कि विजय सिंह गोंड सही समय पर बसपा से टिकट ले आए. अगर वो भाजपा या सपा से लड़ रहे होते, तो उन्हें हराने वालों में 35 हजार दलित वोट भी जुड़ जाते. विजय सिंह गोंड 1980 से 2002 तक लगातार सात चुनाव जीते. दो बार कांग्रेस, एक बार निर्दलीय, दो बार जनता दल और दो बार सपा से. लोग यहां उनका नाम लगातार जीतों के रिकॉर्डधारी कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी के साथ लेते हैं. वे गोंड जनजाति से आते हैं, जिनकी 2002 से पहले SC में गिनती होती थी. फिर उन्हें ST का दर्जा दे दिया गया, लेकिन गोंड बहुल दुद्धी सीट को SC के लिए ही सुरक्षित रखा गया. इस वजह से विजय सिंह गोंड 2007 और 2012 का चुनाव नहीं लड़ पाए.

एक पत्रकार के मुताबिक, ‘सीट को एसटी स्टेटस मिलने के बाद विजय गोंड अचानक नायक बन गए थे. कोई भी पार्टी उन्हें लपक लेती. लेकिन उनके लिए बसपा का चुनाव ही बेहतर था. इससे दलित, गोंड, कुछ मुस्लिम और बाकी विजय गोंड समर्थक आदिवासियों का एक अजेय वोट बैंक बन गया.’

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सरकारी स्कूल में खेलते बच्चे

अमवार बाजार में ग्रेजुएशन के एक छात्र ने कहा, ‘दुद्धी को अगर ST सीट का दर्जा न मिलता, तो विजय सिंह गोंड की राजनीति तो कब की खत्म हो चुकी थी. तो ऐसा नहीं है कि उन्होंने आदिवासियों के लिए दर्जा दिलाया. वो अपने लिए लड़ रहे थे, ताकि ये सीट मेरे और मेरे परिवार के नाम लिख उठे. उन्होंने किसी दूसरे आदिवासी को क्यों नहीं खड़ा किया. इस उम्र में खुद भी लड़ रहे हैं और ओबरा से अपने बेटे को भी लड़वा रहे हैं. शायद जीत भी जाएंगे, लेकिन आम आदिवासी को इस रिजर्वेशन का क्या फायदा मिलेगा.’

हालांकि, विजय सिंह गोंड ने एक लंबी और मुश्किल लड़ाई लड़ी है. उनके तमाम निजी हितों के बावजूद उत्तर प्रदेश विधानसभा में जनजातियों को प्रतिनिधित्व मिलने की अपनी अहमियत है. ये बात सही है कि एसटी सीट घोषित होने के बाद विजय गोंड के आने से बसपा को फायदा हो गया, लेकिन बाकी पार्टियों को तजुर्बेकार उम्मीदवार ही नहीं मिले. बीजेपी यहां से कोई कैंडिडेट नहीं खोज पाई, तो ये सीट उसने अपना दल की झोली में डाल दी. अपना दल से हरीराम चेरो को टिकट मिला है. यहां चेरो जनजाति के 10 हजार वोट हैं. चेरो जनजाति अपनी उत्पत्ति नाग वंश से बताती है और राजा मेदनीराय से खुद को जोड़ती है.

दीवारों पर ही सही, पर बातें हैं
दीवारों पर ही सही, पर बातें हैं

दुद्धी तहसील में एक पत्रकार ने बताया, ‘हरीराम चेरो पर 22 मुकदमे हैं, जिनमें से 10 में वो बरी हो चुके हैं और 12 अभी चल रहे हैं. उन पर गोकशी का भी इल्जाम है. 20-30 साल पहले सिर पर लकड़ी का गट्ठर रखकर दुद्धी में बेचने आते थे. आरोप है कि यहां से जो लोग गोकशी के लिए गायें ले जाते थे, ये उनसे कमीशन लेने लगे. गो-तस्करी में इनका नाम भी आया था. पहले भी वो विजय गोंड के खिलाफ लड़ चुके थे. तो विजय गोंड ने विधायक रहते हुए अपने असर से इनके खिलाफ मुकदमे भी कुछ ज्यादा ही करवा दिए. लेकिन यहां लोग कहते हैं कि ये वही गाय का कमाया हुआ पैसा है, जो अब ये चुनाव में लग रहा है.’

दुद्धी में कोई भी बता देता है कि हरीराम चेरो पहले दूसरी पार्टियों में भी टिकट मांगने गए थे, लेकिन जैसे ही उन्हें पता चला कि बीजेपी ने ये सीट अपना दल को दे दी है, तो ये अनुप्रिया पटेल से मिल आए और अनुप्रिया ने उन्हें स्वीकार कर लिया. यहां चेरो जनजाति के 10 हजार वोट हैं. ये रॉबर्ट्सगंज लोकसभा है, जहां से बीजेपी के छोटेलाल खरवार सांसद हैं. एक स्थानीय पत्रकार के मुताबिक, ‘वो बेसिकली सिंगर आदमी हैं. किसी जमाने में राजनाथ की प्रचार रैलियों में बिरहा वगैरह गाते थे. मोदी लहर में जीत गए. आज भी वो मंचों पर अक्सर गाते हुए दिख जाते हैं.’

वोटर बदहाल पद यात्रा: यहां न बिजली है न सड़क न पानी:

छोटेलाल खरवार क्षेत्र में बहुत दिखाई नहीं देते, लेकिन उनके सांसद बनने से खरवार वोट बीजेपी की तरफ मुड़ गया है. इस बार गणित ऐसा ही था कि खरवार, चेरों और अति पिछड़ा और सवर्ण वोट के सहारे बीजेपी-अपना दल गठबंधन यहां से लड़े. लेकिन अपना दल के खाते में टिकट जाने से ये संकट पैदा हो गया है कि ‘कप प्लेट’ के निशान को गांव के निरक्षर लोग कितना पहचानेंगे और कितना याद रखेंगे. सांसद आदर्श ग्राम नगवा के मोहन सिंह खरवार ने कहा, ‘इस बार तो हम लोग भाजपा को ही वोट डालना चाहते थे. मोदी जी और हमारे सांसद जी की वजह से, लेकिन कप प्लेट की वजह से हमें सोचना पड़ रहा है. हो सकता है कि खरवारों के कुछ वोट इधर-उधर चले जाएं.’

उधर सपा-कांग्रेस गठबंधन ने गोंड उम्मीदवार उतारकर विजय सिंह के लिए कुछ मुश्किलें पैदा कर दी हैं. अनिल सिंह गोंड को 17 हजार यादव और 18 हजार मुसलमानों के अलावा विजय गोंड विरोधी वोटों की भी आस है. एक ग्राम प्रधान ने कहा, ‘चुनाव में कोई जीतता नहीं है. सब लोग मिलकर किसी को हरा देते हैं. इस बार काफी लोग विजय सिंह गोंड को हराने में लगे हैं. खास तौर से ऊंची जाति के लोग. कुछ अनिल गोंड, तो कुछ हरीराम चेरो को समर्थन दे रहे हैं. देखना यही है कि समय रहते विजय सिंह गोंड उन्हें मना पाते हैं या नहीं.’

धीरे-धीरे ही सही, काम चल रहा है
धीरे-धीरे ही सही, काम चल रहा है

विजय सिंह गोंड बुजुर्ग हो चले हैं और उनके लिए अपार समर्थन के बावजूद कुछ लोगों में एक किस्म का पुरातन भाव भी है. 27 साल दुद्धी में राज करने वाले कद्दावर आदिवासी नेता के बावजूद आदिवासियों की स्थिति बहुत नहीं बदली हैं और अब कुछ लोग दबी जुबान से उनसे तौबा करने लगे हैं. हालांकि, आदिवासियों के बीच एक समय इनकी जबरदस्त पकड़ मानी जाती थी, लेकिन अब वो 15 साल बाद विधायकी का चुनाव लड़ रहे हैं. तब तक वोट देने का पैटर्न काफी बदल चुका है.

गोंड वोटरों में जो लोग नई शुरुआत की बात कर रहे हैं, वे अनिल गोंड के साथ जा रहे हैं. दूसरा, रूबी प्रसाद ने पिछले पांच साल में बहुत अच्छा तो नहीं, पर इतना काम करा लिया है कि गांवों के भोले लोग उसे ‘ठीक-ठाक’ मान सकें. रूबी अब सपा में हैं और उन्होंने अनिल गोंड को समर्थन दिया है. राहुल गांधी भी दुद्धी में अनिल गोंड के समर्थन में सभा कर चुके हैं.

दुद्धी में एक घर
दुद्धी में एक घर

अपना दल का यहां कोई काडर नहीं है. प्रचार के लिए उनके पदाधिकारी रॉबर्ट्सगंज से आकर होटल में रुके हुए हैं. उन्हीं में से एक ने कहा, ‘देखिए हमारा सीधा गणित है. प्रत्याशी जी के असर से सॉलिड चेरो वोट. सांसद जी के असर से सॉलिड खरवार वोट. 18 हजार ब्राह्मण और 30 हजार वैश्य वोट. 9 हजार क्षत्रिय वोट. बाकी और पिछड़ा वोट, जैसे हमारे कनौजिया और विश्वकर्मा भाई. बसपा के एक पासवान नेता सपा में चले गए थे, अब वो हमारे साथ हैं. इसलिए पासवान भी बसपा में नहीं जाएगा. गोंड वोटों का कुछ हिस्सा सपा वाले ले जाएंगे. सपा कैंडिडेट जितना मजबूत लड़ेगा, उतना हमारा चांस बनेगा. और वो मजबूत लड़ रहा है, क्योंकि विजय गोंड को हराने वाले सब लोग अनिल गोंड को समर्थन दे रहे हैं.’

यहां मुर्गों को कंकड़ वाले चावल खिलाए जाते थे, जो बाद में इगो का मसला बन गया
यहां मुर्गों को कंकड़ वाले चावल खिलाए जाते थे, जो बाद में इगो का मसला बन गया

जो लोग विजय सिंह गोंड को हराने में लगे हैं, उनके पीछे आर्थिक शक्ति यहां के वैश्यों की हैं. एक पत्रकार ने कहा, ‘एक चीज होती है- खुद्दी. कंकड़ों-कीड़ों से भरा छोटा-छोटा चावल का दाना होता है. हम लोग उसे मुर्गी दाना कहते हैं. मुर्गियों का चारा होता है. यहां बड़े पैमाने पर चावलों का वेस्ट मटीरियल बेचा जाता था. गरीब आदिवासी उसे ले जाते थे और पकाकर खा लेते थे. लेकिन विजय गोंड ने इसका विरोध किया और 2005 में उस वक्त के डीएम ने इस पर बैन लगा दिया. इससे वैश्यों का व्यापार तो इतना प्रभावित नहीं हुआ, लेकिन उन्होंने इसे ईगो इशू बना लिया.’

दुद्धी में सांसद का आदर्श गांव जहां अभी तक कोई प्रचार के लिए भी नहीं पहुंचा:

पारंपरिक वोटों में बड़ी सेंधमारी न हो, तो विजय गोंड के लिए ये सीट आसान नजर आती है. लेकिन सेंधमारी के आसार हैं, क्योंकि एसटी कोटा मिलने के बाद अपने हितों को लेकर वोटर भी थोड़ा कंफ्यूज है. हालांकि, विजय गोंड इतने आत्मविश्वास से भरे हैं कि वो क्षेत्र में बहुत प्रचार भी नहीं कर रहे. हम दुद्धी से और 20 किलोमीटर आगे तक गए, लेकिन एक जगह भी बसपा का झंडा नहीं मिला. लोगों ने कहा कि विजय गोंड प्रचार के लिए आए ही नहीं. एक पत्रकार ने बताया, ‘वो मानकर चल रहे हैं कि पूरा दलित और गोंड वोट उनको ही आ रहा है, इसलिए जीत निश्चित है. 8 मार्च को यहां चुनाव है और वो 2 मार्च को पहली बार प्रचार के लिए निकले थे.’

दुद्धी से करीब दस किलोमीटर दूर नगवा गांव है, जिसे सांसद आदर्श ग्राम घोषित किया गया है. यहां खेती का काम करने वाले शिवकुमार खरवार को अपना जन्मदिन याद नहीं, लेकिन ये जानते हैं कि ये ‘आदरस गांव’ है. उनके घर में बिजली नहीं है. वो और उनकी पत्नी मायावती, नरेंद्र मोदी, छोटेलाल खरवार और विजय सिंह गोंड का नाम जानते हैं. एससी और एसटी का मतलब क्या होता है, उन्हें नहीं पता.

यूपी की आखिरी विधानसभा सीट दुद्धी से लाइव:

18 हजार मुसलमानों में से कुछ अभी सपा-कांग्रेस गठबंधन के साथ भी दिख रहे हैं. कुछ बसपा के साथ भी हैं. आखिरी समय में अगर बीजेपी मजबूत दिखी, तो पूरा मुस्लिम वोट बसपा में जा सकता है. इसके अलावा यहां 9 हजार अगरिया, 14 हजार वैसवार, 14 हजार बिंद और बियार, 12 हजार धरकार और 5,500 पाल वोट है, जिसके बारे में हर पार्टी का अपना-अपना दावा है.

दुद्धी तहसील से 14 किलोमीटर दूर कनहर बांध परियोजना है. 1976 में नारायण दत्त तिवारी के समय इसे हरी झंडी दी गई थी, लेकिन राजनातिक वजहों से काम ठप्प हो गया. अखिलेश यादव सरकार ने 2014 में अचानक काम शुरू कर दिया. शुरू में यह ‘कनहर बांध रोको, पानी को बहने दो’ के आंदोलन में तब्दील हुआ, लेकिन अब यह बांध विरोधी आंदोलन के बजाय विस्थापितों की मांगों का आंदोलन ज्यादा हो गया है.

दुद्धी की एक तस्वीर
दुद्धी की एक तस्वीर

अमवारा में कोई भी बांध-विरोधी नहीं मिला. उन्हें समझा दिया गया है कि बांध बनने से पानी का लेवल बढ़ जाएगा और यह खेतों के लिए फायदेमंद रहेगा. लेकिन ये लोग 1976 में जो वादे किए गए थे, उन्हें पूरा करने की मांग कर रहे हैं. सुंदरी, अमवारा और कुछ गांवों के प्रभावितों को 7 लाख 11 हजार रुपए का मुआवजा मिला है, जिससे वे बहुत खुश नहीं हैं. कुछ लोगों का कहना है कि उनको अज्ञात वजह से दो लाख का ही मुआवजा मिला है. बांध प्रभावित 11 गांवों की एक कनहर विस्थापित समिति बन गई है, जो इस चुनाव में अपना राजनीतिक रुझान अगले चार-पांच दिन में तय करने वाली है.

कनहर बांध के निर्माण की एक तस्वीर

रॉबर्ट्सगंज से दुद्धी के रास्ते में सोन नदी का पुल मिलता है. सोन नदी की बालू बहुत मशहूर है और मुंबई तक जाती है. यहां के एक व्यापारी ने बड़े गर्व से बताया, ‘वहां लोग एक बोरी हमारा बालू, 6 बोरी पतला बालू और एक बोरी सीमेंट मिलाकर यूज करते हैं. इतना मोटा बालू हमारा होता है. गंगा का बालू बहुत महीन होता है.’

यहां धौरा का गोंद होता है, जिसे एशियन पेंट्स वाले काफी महंगा खरीदते हैं. लेकिन यहां के भोले आदिवासी उसे सौ-पचास रुपये में दे देते हैं और कई बार उसके बदले छोटा-मोटा सामान ले लेते हैं.

सोनभद्र और दुद्धी के बारे में गूगल आपको बताएगा कि यह नक्सल प्रभावित इलाका रहा है, लेकिन यहां जितने गांव वालों से बात हुई, किसी ने नक्सलवादियों को देखा ही नहीं. हम भी खूब अंदरूनी इलाकों में गए और कहीं कोई खतरा नहीं लगा. जिनसे इसका जिक्र किया वे हंसने लगे और कहने लगे कि ये सब फैलाई हुई बातें हैं.

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इलाके के एक पत्रकार ने कहा, ‘यहां बहुत भोले लोग हैं भाई. बस एकमात्र बात ये है कि आदिवासी लोग दिन में शराब पी लेते हैं और उसके असर से थोड़ा-बहुत बद्तमीजी कर सकते हैं. यहां लोग बेरोजगार हैं, बेईमान नहीं. जो अफसर और सरकारी कर्मचारी यहां पोस्टिंग पर आते हैं, उनकी फैमिली सोचती हैं कि वो नक्सल प्रभावित इलाके में हैं. थोड़ा सुनसान, खुला-खुला और जंगल तो है, लेकिन डकैती नहीं होती. मैं उनको ईद पर अपने यहां ले जाकर सेवइयां खिलाता हूं, तब जाकर वो कहते हैं कि वाह भाई हजरतगंज लखनऊ की याद आ गई.’

विकास से तेज यहां जियो चलता है. जिन लड़कों के पास 4जी स्मार्टफोन है, उनके पास जियो का सिम पहुंच गया है, लेकिन बहुत सारे घरों में बिजली नहीं पहुंची है. गरीबी ऐसी है कि लोग कहते हैं, ‘लेकर क्या करेंगे. जरूरत ही नहीं है. बिल कौन भरेगा?’


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