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रामनगर ग्राउंड रिपोर्ट: एक-एक बनारसी की पॉलिटिक्स मोदी-अखिलेश की पॉलिटिक्स से कहीं आगे है

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* मोदी के शो के बाद उस पार के बनारस में हवा बदली है या नहीं?

नरेंद्र मोदी के रोड शो के बाद क्या उस पार के बनारस में ‘रुझान’ बदला है?

                                ये सवाल लेकर उस पार के बनारस गया था.


बनारस में दो बनारस हैं. एक गंगा के इस पार, जिधर सारे मशहूर घाट हैं. अस्सी से लेकर दशाश्वमेध और मणिकर्णिका. इसी तरफ ही ख्याति प्राप्त विश्वनाथ मंदिर है, जहां नारियल फोड़ने छोटमनई लाइन लगाते हैं और बड़मनई हेलिकॉप्टर से आते हैं.

लेकिन गंगा पार करिए, तो दूसरी तरफ का बनारस आता है. रामनगर. यहीं पर वो किला है, जिसे 1750 ईसवी में काशी नरेश ने बनवाया था. लोग बताते हैं कि गंगा पार इसलिए किला बनवाया, क्योंकि उस पार के राजा बाबा विश्वनाथ हैं.

रामनगर किले के बाहर तट पर नाव
रामनगर किले के बाहर तट पर नाव

रामनगर और बाकी बनारस में एक वर्गभेद है. पड़ोस के जिलों से बनारस में आकर बसे कामगार रामनगर में कमरा लेकर रहते हैं और उस पार नौकरी करते हैं. रामनगर सस्ता पड़ता है. बनारस पर तमाम ‘फोकस लाइट्स’ रहती हैं, लेकिन रामनगर को वीआईपी दर्शन बहुत कम नसीब होता है. ये हिस्सा वाराणसी की कैंट विधानसभा में आता है, जहां बीजेपी ने विधायक ज्योत्सना श्रीवास्तव के पुत्र सौरभ श्रीवास्तव को टिकट दिया है. गठबंधन की तरफ से ये सीट कांग्रेस के खाते में गई है. पिछला चुनाव हारने वाले अनिल श्रीवास्तव गठबंधन के उम्मीदवार हैं और बसपा से रिजवान अहमद लड़ रहे हैं.

अबकी बार प्रधानमंत्री तीन दिन बनारस में थे, तो 6 तारीख को वो रामनगर भी हो आए. वो लाल बहादुर शास्त्री के स्मारक भी गए. बहुत सारे लोगों ने बताया कि जीतने के बाद तीन साल में पहली बार प्रधानमंत्री रामनगर आए थे. उनके आने से दो दिन पहले उस सड़क के गड्ढे भरे गए, जिससे होकर प्रधानमंत्री को गुजरना था. खंभों से ढीले पड़े हुए बिजली के तार कसे गए.

मोदी के आने से पहले चमकाई गईं सड़कें
मोदी के आने से पहले चमकाई गईं सड़कें

सवाल ये है कि इस बात से लोग खुश होंगे या नाराज? कुछ वोटर इससे खुश दिखे कि मोदी के बहाने सड़क सुधर गई, लेकिन कुछ अतिरिक्त नाराज दिखे कि वोट मांगने आए, तो सड़क बन गई, इससे पहले सुध नहीं ली. ऐसे समय में जब एक दिन बाद लोगों को अपने एकमात्र ताकतवर अधिकार का इस्तेमाल करना हो, आश्चर्य नहीं कि वे इसे बड़े परिप्रेक्ष्य में देख सकते हैं.

पहली दुकान जहां हम रुके, वो एक इलेक्ट्रीशियन की थी. वह मुसलमान नहीं था. उसने कहा, ‘आपको सच बताएं तो चुनाव के समय प्रधानमंत्री रामनगर आए हैं. और प्रधानमंत्री आए हैं, इसीलिए सड़क पर चिप्पी लग गई है. न उनका आना स्थायी है और न ये चिप्पियां. हम लोगों की भैया नोटबंदी के बाद आमदनी आधी हो गई थी. भूलेंगे नहीं. और बाकी आपको दूसरे टाइप का माहौल लेना हो, तो सामने पान की दुकान पर चले जाइए.’

गंगा के पार का बनारस
गंगा के पार का बनारस

पान की दुकान पर माहौल बिलाशक अलग था. ‘पत्रकार बंधु आए हैं, आप लोग भी बताएं’, पान वाले ने अपनी दुकान पर आए दो ग्राहकों से कहा. फिर खुद ही कहने लगा, ‘माहौल तो भइया भाजपामय है. पहले से भी भाजपा का था और मोदी जी के यहां आने के बाद से हम सब उन्हें ही सोचकर वोट दे रहे हैं.’

पान वाले ने पत्ते पर कत्था छुआते हुए दावा किया कि कैंट ही नहीं, समूचे उत्तर प्रदेश में पिछड़ा और अपरकास्ट का पूरा वोट बीजेपी खींच रही है. दलित बसपा को और यादव सपा को. मुसलमान आधा-आधा बंटा है. मैंने पूछा कि प्रधानमंत्री के आने से माहौल कितना बदला है, तो बोला, ‘पहले भी भाजपा प्लस में थी. अब सेवंटी-थट्टी हो गया है.’

इसी दुकान पर पान बंधवाने एक अधेड़ उम्र का शख्स आया और मुझसे धीमे से कहने लगा कि इस बार सपा यहां से जीत सकती है और मेरे घर के आस-पास लोग अखिलेश यादव के काम की बात कर रहे हैं. पान वाले ने उसे टोका, ‘एक काम बतावा. एक काम बतावा.’ इस आक्रामक प्रहार से वो आदमी थोड़ा बैकफुट पर आ गया. वो बहस नहीं चाहता था. उसने मुझसे इतना धीमे कहा कि पान वाला न सुन सके, ‘विधवा पेंशन दिया है. 108 नंबर एंबुलेंस दिया है. ई-रिक्शा दिया है. हम उसे वोट क्यों देंगे, जिसने हमारा ही पैसा हमें नहीं निकालने दिया.’

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झंडा सबका बुलंद है

कैंट विधानसभा पर 1991 से लेकर अब तक बीजेपी काबिज रही है. यहां कायस्थों की खासी तादाद है. बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने कायस्थ उम्मीदवार उतारे हैं. बसपा ने मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट दिया है.

आगे बढ़े तो एक दुकानदार मिला, जो भाषाई दृष्टि से खांटी बनारसिया था. शब्दश: उसकी बात मैंने नोट नहीं की, लेकिन जो कहा, उसका मतलब ये था कि उसने पिछली बार फूल पर वोट दिया था, इस बार वह ‘लोटू’ पर वोट डालेगा.

‘लोटू?’
‘हां वो होता नहीं है, जिसमें किसी को वोट नहीं जाता.’
‘अच्छा नोटा.’

ये आदमी पहले खुल नहीं रहा था, लेकिन उसके करीब आकर जब कुछ सवाल धीमे स्वर में किए, तो उसे लगा कि मैं उसकी बात गोपनीय रखूंगा. फिर उसने कहा कि उसे नहीं लगता कि मोदी (बीजेपी) यहां से जीतने वाले हैं. उसके घर के आस-पास रहने वालों में कांग्रेस-सपा का जोर है, लेकिन बीजेपी यहां हमेशा जीतती है, तो जीत भी सकती है. लेकिन हमको इस बार उनका चांस कमजोर लग रहा है.

बनारस का एक चौराहा
बनारस का एक चौराहा

मैंने पूछा कि आस-पास के घरों में तो सिर्फ भाजपा के झंडे नजर आ रहे हैं. इस पर उसने जो बोला, उसे अंडरलाइन किया जाए. उसने कहा, ‘मोदी जी तो ठीक घोषणा करते हैं, लेकिन उनके नीचे के लोग सब बेकार हैं. सब सुनते हैं कि ई मिली अउर ऊ मिली, लेकिन कुछ मिलता नहीं है. तो जैसे 2014 में ये लोग राजनीति किए थे, अबकी बार जनता इनसे राजनीति करेगी. झंडा इनका लगाएगी और वोट देगी दूसरे को.’

इसी दुकान पर खड़े थे कि वो सपा समर्थक भागता हुआ आया, जिससे पिछली पान की दुकान पर मुलाकात हुई थी. उसने धीमे से पूछा, ‘आप लोग किसकी तरफ से हो?’ मैंने उसे आश्वस्त किया कि हम मीडिया से हैं, दिल्ली से आए हैं, किसी पार्टी से नहीं है, इसलिए उसने जो बातें कही हैं, उस पर उसे डरने की जरूरत नहीं है.

इसके बाद इसी सड़क पर कुछ प्रखर मोदी समर्थक मिले, जिन्होंने जोर देकर कहा कि बीजेपी को जीतने में कहीं कोई समस्या नहीं है. बात करते हुए उन्होंने वहां से गुजरते हुए एक बाइकसवार को रोका और हमसे कहा कि हमारी बात पर भरोसा न हो, तो इनसे पूछ लीजिए. जाहिरा तौर पर वे आपस में परिचित थे.

विश्व सुंदरी पुल: काम हो रहा है
विश्व सुंदरी पुल: काम हो रहा है

रामनगर किले के पास एक लस्सी वाले ने कहा कि दुनिया भाजपा को वोट देगी, तो देने को मैं भी दे दूं, लेकिन कोई मानेगा नहीं कि मैंने वोट दिया है. इसलिए मैं सपाई हूं और रहूंगा. अब तक एक भी मुसलमान से बात नहीं हुई थी, सो एक सलून में हो गई. चचा ने बताया कि वो जिस इलाके में रहते हैं, वहां सपा और भाजपा की ही बात होती है. बसपा लड़ाई में नहीं है और बसपा का मुस्लिम उम्मीदवार होने के बावजूद उसे मुस्लिम वोट नहीं जा रहा है.

बनारस: दो छत और सारे झंडे
बनारस: दो छत और सारे झंडे

उनसे पूछा कि सवर्ण और पिछड़ा तो पूरा बीजेपी में है, तो बोले, ‘नहीं ‘अपर कास्ट’ नहीं है. उनमें से बहुत लोग यहां के पुराने कांग्रेसी नेता हैं, इसलिए उनका वोट बंटेगा. पिछली बार कांग्रेस को यहां से 45 हजार वोट मिला था. इस बार सपा का वोट जुड़कर उनके जीतने का चांस है, इसलिए कांग्रेस को खूब सपोर्ट है.’

मैंने पूछा कि आखिरी समय में क्या मुस्लिम वोटों के बंटवारे के लिए किसी तरह की अफवाह फैली जाती है, तो वो आश्चर्य से मुस्कुराने लगे और हामी भरी. बोले, ‘बस यही काम नहीं होना चाहिए, जो आप बता रहे हैं.’

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बीजेपी ने वाराणसी में टिकट बांटने में जो गलतियां की थीं, नरेंद्र मोदी उन्हें भरने आए थे. कैंट से भाजपा उम्मीदवार सौरभ श्रीवास्तव की छवि इलाके में बहुत अच्छी नहीं है. ऐसे ही दक्षिणी सीट पर श्यामदेव राय चौधरी का टिकट काटकर उम्मीदवार बनाए गए नीलकंठ तिवारी को तो कई भाजपाई ही नापसंद करते हैं. प्रधानमंत्री की कोशिश थी कि उन पर पर्दा डालकर ऐसा माहौल बनाया जाए कि वाराणसी की हर विधानसभा को वोट सीधे उन्हीं को जा रहा है और जनता यही समझकर वोट दे.

कुछ नजरबट्टू ऐसे भी होते हैं
कुछ नजरबट्टू ऐसे भी होते हैं

किला रोड बाजार में एक शख्स ने कहा, ‘प्रधानमंत्री को बोलने की अनुमति नहीं मिली, वरना उनका भाषण आप हमसे पूछ लीजिए. वो कहते कि हमारी तरफ से कहीं कोई चूक रही होगी, तो माफ करें. मैं उसकी भरपाई करूंगा. पर बनारस के साथ अन्याय नहीं होने दूंगा.’

ये बनारस है
ये बनारस हैं

बातचीत के इस छोटे सैंपल साइज से लगा कि मोदी के रोड शो के बाद जो भाजपाई थे, वो भाजपाई बने हुए हैं. जो सपाई थे, वो सपाई बने हुए हैं. ऐसा मानने के कारण हैं कि जो न्यूट्रल वोट था, उसमें जरूर कुछ बदलाव हुआ होगा. कितना हुआ होगा, इसका कोई ओर-छोर 7 तारीख की शाम तक नहीं मिला. एक दिन पहले वोटर अतिरिक्त साइलेंट हो जाता है.

ये जरूर है कि मोदी के वाराणसी भ्रमण के बाद भाजपा कार्यकर्ताओं में पहले से अधिक उत्साह है. वे बूथ पर अधिक सक्रिय होकर जुटेंगे. इस नगर में भाजपा का बहुत कुछ दांव पर लगा है.

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अरे हां! बनारस से याद आया…

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