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मोहम्मदाबाद ग्राउंड रिपोर्ट: जानिए 40 अपराधों के आरोपी अंसारी परिवार की राजनीति कैसे चलती है

29 नवंबर, 2005. गाजीपुर-बक्सर बॉर्डर.

2002 के चुनाव में मोहम्मदाबाद सीट से अफजाल अंसारी को हराकर कृष्णानंद राय मशहूर हो गए थे. अंसारी परिवार से लोहा लेने के लिए उन्हें भी एक ‘शस्त्र-कुशल’ शख्स की जरूरत थी, इसलिए उन्होंने माफिया डॉन ब्रजेश सिंह को कथित संरक्षण दिया. क्षेत्र के सबसे ताकतवर परिवार को ये बात पसंद नहीं आई थी.

कृष्णानंद राय
कृष्णानंद राय

तो उस दिन कृष्णानंद राय एक पारिवारिक शादी समारोह से लौट रहे थे, जब उन पर एके-47 से ताबड़तोड़ गोलियां चलाई गईं. राय समेत उनके 6 लोगों की मौत हो गई. बताते हैं कि सातों लोगों के शरीर से 67 गोलियां बरामद की गई थीं. इस हमले का एक गवाह था, शशिकांत राय. उसने राय के काफिले पर हमला करने वालों में अंसारी के निशानेबाजों को पहचान लिया था. लेकिन, 2006 में शशिकांत की लाश संदिग्ध हालात में बरामद हुई. बताया जाता है कि राय की हत्या के बाद ब्रजेश सिंह गाजीपुर-मऊ क्षेत्र से भाग निकला था. ये केस अभी तक चल रहा है. मुख्तार अब तक जेल में हैं.


हत्याकांड सियासत को पलटने की ताकत रखते हैं, लेकिन मोहम्मदाबाद में ये हो न सका.

2006 का उपचुनाव हुआ, जिसमें बीजेपी ने कृष्णानंद राय की विधवा अलका राय को टिकट दिया. इस चुनाव में उनके खिलाफ अंसारी बंधुओं में से कोई नहीं खड़ा हुआ और वह जीत गईं. लेकिन एक साल बाद ही सियासत लौटकर वहीं आ गई. 2007 के विधानसभा चुनाव आए तो अंसारी बंधुओं में सबसे बड़े सिबकतुल्लाह ने यहां से पर्चा भर दिया और कांटे के मुकाबले में अलका राय को करीब 3 हजार वोटों से हरा दिया. तब से ये सीट सिबकतुल्लाह के पास ही है. अलका के इर्द-गिर्द सहानुभूति तो बनी, लेकिन इतनी नहीं कि वह अंसारी के पक्के वोटरों को तोड़ सके.

अल्का राय
अलका राय

सिकबतुल्लाह 2007 में सपा के टिकट से जीते थे और 2012 में कौमी एकता दल से. इस बार अंसारी परिवार बसपा में चला गया है. सिबकतुल्लाह का मुकाबला इस बार भी बीजेपी की अलका राय से है. अलका 2012 में चुनाव नहीं लड़ी थीं, तो इस सीट पर बीजेपी टॉप-2 की लड़ाई से भी बाहर हो गई थी. एक पत्रकार ने बताया कि इस बार भी वो खुद लड़ना नहीं चाहती थीं, बल्कि भतीजे के लिए टिकट चाहती थीं. लेकिन पार्टी ने इन्हीं को उतारा, ये सोच कर कि सहानुभूति जमा मोदी फैक्टर उन्हें जीत दिला सकता है.

इस सीट पर भासपा ने भी अपना कैंडडिेट उतारा है
इस सीट पर भासपा ने भी अपना कैंडडिेट उतारा है

सपा कांग्रेस गठबंधन में ये सीट कांग्रेस के हिस्से आई है और उसने पेशे से प्राइवेट टीचर जनक कुशवाहा को टिकट दिया है. थ्योरी ये भी है कि अखिलेश के प्रभाव में गठबंधन ने जानबूझकर यहां से डमी कैंडिडेट खड़ा किया है. ताकि बीजेपी को जा रहे वोटों का बंटवारा न हो. एक पत्रकार के मुताबिक, ‘पार्टी लाइन से इतर, अंसारियों की हार अखिलेश यादव का मिशन बन गई है.’

डॉ. जनक कुशवाहा का प्रचार करती एक गाड़ी
डॉ. जनक कुशवाहा का प्रचार करती एक गाड़ी

मोहम्मदाबाद विधानसभा गाजीपुर जिले में लगती है. इसकी तहसील है यूसुफपुर. यहीं पर अंसारी बंधुओं का पुश्तैनी मकान है. यूसुफपुर कस्बे से दो सौ मीटर पहले चाय पीने उतरे, तो नीला गमछा पहने मोहम्मद इफराज और पारस राम से मुलाकात हुई. दोनों ने कहा कि वो अफजाल अंसारी के समर्थक हैं, क्योंकि वो वाकई गरीबों के मसीहा हैं. लोग उन्हें बाहुबली कहते हैं, पर यहां उनकी छवि अलग है.

नीला गमछा पहने मोहम्मद इफराज और साथ में पारस राम
नीला गमछा पहने मोहम्मद इफराज और साथ में पारस राम

आगे बढ़ा तो एक मेडिकल स्टोर के सामने सतेंद्र और उनके दोस्त मिले. उन लोगों ने कहा कि सीधी बात ये है कि इस बार सिकबतुल्लाह अंसारी इसलिए फायदे में हैं, क्योंकि मुसलमान, पूरा दलित और उनका अपना पिछड़ा हिंदू वोट उनके साथ है. उन्होंने कहा, ‘सपा का साथ न मिलने से उनका 30 हजार यादव वोट कम हो गया, लेकिन ‘बहनजी’ का 65 हजार दलित वोट बढ़ भी तो गया. जो कैंडिडेट सपा छोड़ते हैं, उनका मुस्लिम वोट चला जाता है, लेकिन अंसारी बंधुओं के साथ ऐसा नहीं है. इसिलए उन्होंने सिर्फ यादव गंवाया है और दलित कमाया है, जो इस सीट पर फायदे का सौदा है.’

मेडिकल स्टोर पर मिले लोगों का गणित कुछ और ही है
मेडिकल स्टोर पर मिले लोगों का गणित कुछ और ही है

लेकिन गठबंधन ने यहां से यादव उम्मीदवार नहीं उतारा है. इसका जिक्र किया, तो सतेंद्र मुस्कुराते हुए बोले, ‘यादव इस वक्त पूरी तरह अखिलेशवादी है. वो अंसारी को हराना चाहता है. गठबंधन यहां फाइट में नहीं है. इसलिए आप देखिएगा कि उनका कुछ वोट बीजेपी के पास जरूर जाएगा.’

लहुरी काशी ‘ग़ाज़ीपुर’ के TERI पीजी कॉलेज से फेसबुक लाइव:

1 लाख से ऊपर यहां भूमिहार वोट है, जिसका बड़ा हिस्सा बीजेपी में जाने के आसार हैं. 20 हजार वैश्य और 12 हजार ब्राह्मण भी फूल के साथ बना हुआ है. भूमिहार पूरी तरह बीजेपी के साथ हैं और अंसारी के असर के बावजूद कुछ पिछड़ा वोट भी यहां बीजेपी जरूर लेगी. इसलिए बीजेपी भी मजबूत है और ये थ्योरी जोर मार रही है कि अंसारी को हराने के लिए सपा खुद फाइट से हट गई है. 30 हजार यादव वोटों का फ्लो काफी कुछ तय कर सकता है.

देखिए, क्या मुख़्तार अंसारी का गढ़ ख़तरे में है?


सतेंद्र ने एक बात अंडरलाइन करने वाली और कही, ‘यहां गांवों में अब भी जमींदारी वाला हिसाब-किताब खत्म नहीं हुआ है. दलित लोग भूमिहारों के खेतों में काम करते हैं. वे उन्हें कह देंगे कि तुम्हें वोट नहीं डालना है, तो उनमें से काफी लोग डर से जाएंगे ही नहीं.’

गाजीपुर और मऊ की सियासत का केंद्र कहा जाता है, एक फाटक. ‘फाटक’ से मुराद यहां यूसुफपुर की उस जगह से है, जहां अंसारी बंधुओँ का पुश्तैनी मकान है. उन गलियों में किसी तरह अपनी गाड़ी सरकाते और रास्ता पूछते हुए हम उनके घर पहुंचे. वहां अंसारी परिवार का कोई नहीं था. मुख्तार अंसारी और सिकबतुल्लाह अंसारी के बेटे भी प्रचार में थे, लेकिन सिकबतुल्लाह का चुनाव संचालन देखने वाले रामबली पटेल और 50 के करीब कार्यकर्ता बैठे थे. पटेल ने हमें उनका घर भीतर तक दिखाया और यहां उनके कार्यकर्ताओं से भी बात हुई.

सिकबतुल्लाह का चुनाव संचालन देखने वाले रामबली पटेल
सिकबतुल्लाह का चुनाव संचालन देखने वाले रामबली पटेल

पटेल ने कहा, ‘गाजीपुर जिले की बाकी 6 सीटों के समीकरणों से मोहम्मदाबाद की स्थिति अलग है. बाकी जगह लोग विकास के नाम पर वोट करते हैं, लेकिन यहां विकास के साथ-साथ, कमजोर और दलित पर होने वाला अत्याचार भी चुनावी मुद्दा है. अत्याचार करने वाले एक तरफ हैं और पीड़ित एक तरफ हैं.’

आइए, मुख़्तार अंसारी के घर में ले चलेंगे आपको, जगह- यूसुफ़पुर, मोहम्मदाबाद, ग़ाज़ीपुर

रामबली पटेल बार-बार ‘उस पक्ष’ के लिए ‘सामंती’ और ‘पूंजीवादी’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं. इसके पीछे उनकी शुरुआती राजनीतिक ट्रेनिंग ही है. मुख्तार अंसारी की आज सांप्रदायिक छवि है, लेकिन उनके बड़े भाई अफजाल अंसारी मोहम्मदाबाद से तीन बार सीपीआई के टिकट पर ही विधायक बने थे. 1985, 1989 और 1991 में. पटेल से पूछा कि ‘सामंती’ शब्द से आप क्या मतलब समझते हैं, तो बोले, ‘सामंती वो है, जो इंसान को इंसान न समझे, उसे इज्जत न दे. गैरबराबरी को बढ़ावा दे.’

मुख़्तार अंसारी के इलाक़े में लाल झंडे वाले भी हैं, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया के दफ़्तर से, मऊनाथ भंजन, कौड़ी बिल्डिंग

पटेल कहते हैं कि सामंती लोगों का अत्याचार कम हुआ है, पर बंद नहीं हुआ है और अंसारी परिवार उनके सताए लोगों की लड़ाई ही लड़ रहा है. वे यहां ‘भूमिहारों’ का जिक्र नहीं करते, लेकिन उनका मतलब उन्हीं से है. इस सीट पर अंसारी परिवार के वोटबैंक का बड़ा आधार यही है. उन्होंने एक अत्याचार का जवाब दूसरी दबंगई से दिया है.

घर में अफजाल अंसारी के पिता की एक तस्वीर
घर में अफजाल अंसारी के पिता की एक तस्वीर

राजबली पटेल से पूछा कि फिर अंसारी बंधुओं को लोग मुसलमानों का नेता क्यों कहते हैं, तो बोले कि इस सीट पर अल्पसंख्यक वोट सिर्फ 7 फीसदी है. पिछली बार उन्हें मिले 67 हजार में से सिर्फ 7 हजार वोट मुसलमानों का था. राजभर, चौहान, लोहार हर जाति के लोग उन्हें वोट करते हैं. उन्होंने कहा, ‘उन्होंने अपने इस कार्यकाल में 12 कब्रिस्तानों और 80-85 मंदिरों की चारदीवारी बनवाई. मंदिरों की संख्या कहीं ज्यादा थी.’

अफजाल अंसारी का घर

अंसारी बंधुओं के लिए यहां कोई ‘बाहुबली’ शब्द का इस्तेमाल नहीं करता, बल्कि ज्यादातर लोगों के लिए उनका आपराधिक इतिहास मायने ही नहीं रखता. हिंदू भी सिकबतुल्लाह के बारे में इज्जत से बात करते हैं. मुख्तार अंसारी की तरह सिकबतुल्लाह के भी दो लड़के हैं. बड़े सुहैब उर्फ मन्नू अंसारी, जो लखनऊ से इंजीनियरिंग के बाद लंदन से एमबीए करके आए हैं. उन्होंने भी इसी सीट से पर्चा भरा था, तो कुछ लोगों ने बाप-बेटे में अनबन वाला निष्कर्ष निकाल लिया. लेकिन बाद में मन्नू ने नामांकन वापस ले लिया. कहा जाता है कि मन्नू एक डमी कैंडिडेट के तौर पर खड़े होना चाहते थे, ताकि पिता के प्रचार के लिए ज्यादा गाड़ियां आदि मिल जाएं. सिकबतुल्लाह के दूसरे बेटे सलमान, जो बीबीए कर चुके हैं और अब लखनऊ से एमबीए की तैयारी है.

अफजाल के घर के बाहर जमा उनके समर्थक
अफजाल के घर के बाहर जमा उनके समर्थक

गाजीपुर से रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा सांसद हैं, जिनके उभार से अंसारी बनाम भूमिहार की सियासी लड़ाई और बढ़ी है. ये पूर्वांचल के पिछड़े इलाकों में से है, सड़कें ठीक नहीं हैं, स्वास्थ्य सेवाएं भी कम हैं. साक्षरता और रोजगार का हाल तो और भी बुरा है. मऊ से मोहम्मदाबाद वाली सड़क के चौड़ीकरण का काम अभी चल रहा है. जो सड़क अभी है, उसमें गड्ढे बहुत हैं. ट्रकों की आवाजाही यहां बहुत होती है, इसलिए सड़क जल्दी टूटती है.

इन्हें लोग सड़क कहते हैं
इन्हें लोग सड़क कहते हैं (सभी तस्वीरें: अमितेष सिन्हा)

लेकिन कोई इन पर बात नहीं करता. यूसुफपुर में अलग-अलग लोगों ने सिकबतुल्लाह और अलका राय की जीत के दावे किए. लेकिन, उनसे सड़क, बिजली और अस्पताल के बारे में पूछा, तो ‘सड़क तो हइये है खराब’ वाली भाषा में जवाब मिले. सजातीय कैंडिडेट न हो, तो लोग अपनी पसंदीदा पार्टी को वोट देने से भी बचते हैं. लेकिन जो बना है, उसे बनाए रखने के लिए, जो रुका है उसे रोके रखने के लिए, एक स्वीकृति आ गई है. ‘विकास तो हइए नहीं है! ई बताइए क्षत्रिय किधर जा रहा है?’


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