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ग्राउंड रिपोर्ट इटवा: जहां सपा के बड़े नेता का काम न करना बोलता है

गांव के पच्छूं टोले में, लक्खा बुआ के घर के सामने बड़ा जकशन रहता. इस टोले से और पश्चिम में बेड़िनों का टोला था, जिसे ‘डेरा’ कहते थे. लक्खा बुआ, डूडू और महरिन दाई की लड़की थीं. उनके घर के ठीक सामने अम्मर गोसाईं का घर था. महरिन दाई और गोसाइन का झगड़ा देखने मेला लग जाता. झगड़ा सबेरे शुरू होता, दोपहर को रुक जाता. झगड़ा देखने-सुनने का चकल्लस लेने वाले कहते – ‘चलो लोगों अपने-अपने घरे, तीसरे पहर फिर आना है.’ तीसरे पहर झगड़ा फिर चालू होता. दीया-बाती के समय फागू मिसिर प्रकट होते, बोलते – ‘का रे लखवा, का रंडियन के मोहल्ला बनाए है. और तुहैं का कहैं गोंसाइन. बहुत बलबलान हौ. सीधै डंडा करैं, औ निकाल लेय, अस मन करता है.’ फिर लोगों की ओर देखकर बोलते – ‘सारे दुनियाभर के लुंगाड़े इकट्ठा होय गए हैं – भगौ सारे – अब्बै दुइ-दुइ डंडा चूतरै पै लगावैंगे – सारी भूसी छूट जाएगी. दीया-बाती का बखत ओ ई राम-रमौझा.’

                                                                 — नंगातलाई का गांव, विश्वनाथ त्रिपाठी


बलरामपुर से इटवा (जिला सिद्धार्थनगर) के लिए थोड़ा सा आगे निकलते ही पूरा दृश्य बदला सा लगा. लगा कि घड़ी की चाल धीमी हो गई. सड़क बहुत घटिया. चारों तरफ सूनापन. हो सकता है कि ये फरवरी के अंत की दोपहर का असर रहा हो. इस सड़क का जितना हिस्सा बलरामपुर में पड़ता है, वो बेहद घटिया है. 10 मीटर सड़क भी बिना गड्ढों के नहीं मिलती है. इटवा के हिस्से की सड़क बीच-बीच में ठीक है.

अगर पता न हो, तो इस सड़क से यूं ही गुजर जाएंगे और आपको ये कभी नहीं लगेगा कि ‘नंगातलाई का गांव’ जितने रोचक गद्य की जमीन यही बिस्कोहर है. ‘बिस्कोहर के बिसनाथ ने रामकथा की करुणा का साक्षात्कार सबसे पहले पच्छूं टोले की नगर-वधू लक्खा बुआ की वाणी के माध्यम से प्राप्त किया. कालीदास, भवभूति से बाद में.’

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बिस्कोहर में सड़क के किनारे कुर्सी पर, चारपाई पर, पान की दुकान पर या किसी और गुमटी में बैठी औरतें दिखती हैं. भारी मेकअप किए हुए. उनकी तरफ देखिए, तो वो कहती हैं – आओ. कितना? 300 रुपए. ज्यादातर अधेड़ हैं. बात करने के लिए कोई तैयार नहीं.

स्थानीय लोग कहते हैं कि वो केवल बाहरी लोगों को बुलाती हैं. वो लोग भले ही 5000 रुपए लेकर जाएं, उन्हें लौटा देंगी, ये कह कर कि तुम लोग घर के हो, इस गंदगी से दूर रहो. स्थानीय लोग उनसे नफरत नहीं करते, सहानुभूति है. कहते हैं कि अब धीरे-धीरे ये सब खत्म हो रहा है, नई पीढ़ी ये नहीं करेगी.

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दिल्ली में जीबी रोड जैसी जगहों की बहुत बातें होती हैं. वहां एनजीओ काम करते हैं, स्कीमें लाई जाती हैं. यहां कम से कम स्वास्थ्य का हाल ही पता कर लें. पता चला कि एक सरकारी अस्पताल है. वो सरकारी अस्पताल राजनीतिक नकारेपन का एक आख्यान है. गेहूं की लहलहाती फसल के बीच खड़ा अस्पताल. पहुंचे तो ताला लगा था. पता चला कि डॉक्टर नहीं हैं, एक कंपाउंडर आते हैं. जब-तब छुट्टी मार लेते हैं.

अस्पताल 14 साल पहले बना था, तब से शायद ही कभी कोई डॉक्टर रहा हो. एक अच्छी बात ये है कि अस्पताल के बगल में डॉक्टरों के रहने के लिए आवास बना है, बुरी बात ये है कि इसमें कोई रहता नहीं. दरवाजे पर जो ताला लगा है, उसमें लगी जंग से पता चलता है कि उसकी चाबी का कहीं कोई पता नहीं होगा. लेकिन आस-पास के लोगों ने उसे बेकार नहीं जाने दिया है. उसमें उगी फूस को काटकर वहीं सूखने के लिए डाल दिया है और उसके कई गट्ठर लगे हैं, जो उनके छप्पर छाने के काम आएगी.

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वहां हमें जगदीश और अनिल समेत 2-3 और लोग मिलते हैं. उनमें से एक उसे बनाने में मजदूरी कर चुके हैं. बताते हैं कि बिल्डिंग अच्छी बनी थी, लेकिन फर्श बनाने में गड़बड़ी की गई थी, जो धंस गई थी. अस्पताल के काम के लिए पानी की टंकी भी बनी है, जिसे देखकर लगता नहीं कि उसका कोई इस्तेमाल होता है. अस्पताल के सामने एक सरकारी नल लगा है, जो खराब है. अस्पताल में इस्तेमाल के लिए पानी थोड़ी दूर पर मौजूद एक बाबा की कुटी से लाया जाता है.

राम प्रसाद यादव बताते हैं कि उनका राशन कार्ड तक नहीं बना है. आधार कार्ड बना है. वो कहते हैं कि आधार कार्ड बनवाना अपने हाथ में है, तो वो बनवा लिया, राशन कार्ड बनवाना अपने हाथ में नहीं. उन्हें उम्मीद भी नहीं कि उनका राशन कार्ड बनेगा. वोट के बारे में पूछने पर वो गाली भी देते हैं और कहते हैं कि हमेशा सपा को वोट दिया है, फिर से देंगे.

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नोटबंदी का असर बताते हुए वो लोग कहते हैं कि धान 800 रुपए में बिका, जबकि पहले रेट ज्यादा था. जिस खेत में फसल बहुत, बहुत अच्छी हो, उसमें बीघे में 6 क्विंटल धान हुआ. यानी 4800 रुपए. लागत थी 4000 रुपए बीघे. 4-5 महीने की मेहनत में 800 रुपए की बचत. खुद को भले नहीं मिला, लेकिन वो लोग गैस सिलिंडर वाली उज्ज्वला योजना की तारीफ करते हैं.

वो लोग बताते हैं कि गरमी के मौसम में आग लगी, सबकी झोपड़ियां जल गईं. लेखपाल आए, नाप-वाप कर चले गए. बाढ़ आई. मुआयना हुआ. लेकिन कहीं कोई मुआवजा नहीं मिला.

हम वहां के लोगों से बात कर रह ही रहे थे कि दो लोग बाइक पर वहां पहुंचे. मुझे लगा कि कहीं कपाउंडर तो नहीं. क्योंकि ऐसा होता है, स्कूल जाओ, मास्टर न हो, तो थोड़ी देर में पहुंच जाते हैं. लेकिन वो लोग मरीज थे. फोड़ा था, इंजेक्शन लगवाने आए थे. लेकिन वहां ताला लगा था.

अस्पताल की दीवारों पर नारे लिखे हुए हैं:

पूरा होगा हर एक सपना, अगर छोटा परिवार हो अपना

गर्भावस्था के दौरान तीन जांच करवाएं, मां-बच्चे की जान पर आंच न आने पाए

इन नारों के नीचे लिखा है कि अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें – 1800-180-1900

ऐसे ही कोई फोन नंबर इस बात के लिए क्यों नहीं लिख दिया जाता कि अस्पताल में डॉक्टर न हों, दवा न हो, सुविधा न हो, तो इस नंबर पर फोन करें.

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इस अस्पताल में लगे पत्थर पर माता प्रसाद पांडेय का नाम लिखा है. समाजवादी पार्टी के बड़े नेता. विधानसभा स्पीकर. इस सीट पर 1974 से अब तक हुए 11 चुनावों में से 6 चुनाव माता प्रसाद पांडेय ने जीते हैं. लेकिन जिस तरह यादव परिवार के गढ़ सैफई और आजम खान के घर रामपुर में बड़े नेता होने का असर काम पर दिखता है, वैसा यहां कुछ भी नहीं है. सपा से इस बार भी माता प्रसाद पांडेय कैंडीडेट हैं. हर कोई कहता है कि उन्होंने काम नहीं कराया, इनमें उनके वोटर भी शामिल हैं.

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इटवा एक छोटा सा कस्बा है. कस्बे में घुसते ही भाजपा कैंडीडेट सतीश चंद द्विवेदी का ऑफिस दिखता है. वो तो नहीं मिले, चुनाव मैनेज करने वाले कुछ लोग मिले. हमारे सामने ही पार्टी की तरफ से चुनाव मैनेज करने वाले एक पदाधिकारी मिलते हैं.

वो किसी को बूथ मैनेजमेंट के बारे में काफी निर्देश देते हैं. उनकी बातें एक सधे मैनेजर की तरह काम के लिए प्रेरित करने वाली भी हैं और ये भी कि कब कैसे क्या करना है. भाजपा के चुनाव में बूथ मैनेजमेंट काफी सुनियोजित रहता है, ये उसकी एक झलक थी. ऑफिस के बगल के एक कमरे में बस्ते तैयार हो रहे हैं. जिसमें वोटर लिस्ट, वोटर पर्ची जैसी चीजें होती हैं.

वो बताते हैं कि सीटों को जीतने की संभावना के आधार पर A, B और C में बांटा गया था. उनके मुताबिक ये सीट C कैटेगरी में थी, लेकिन अब A और A+ में मानी जा रही है. वो कहते हैं कि कुछ सीटें सीधे हाईकमान के कोटे में थीं, ये टिकट वहीं से आया है. शायद उनका इशारा आरएसएस की तरफ था.

बात होते-होते कुछ दूर निकल आई. जीतेंद्र यादव का जिक्र आया. डीपी यादव के भतीजे. पदाधिकारी ने बताया कि उन्होंने कहा था कि अगर जीतेंद्र यादव को टिकट मिले, तो वो सीट भाजपा जरूर जीतेगी. लेकिन उनसे ऊपर से कहा गया कि वो एक सीट देख रहे हैं, पार्टी पांच राज्यों में चुनाव देख रही है. बात छवि की है.

सतीश संघ से जुड़े रहे हैं. इसका असर वहां लगे बैनर पर भी दिखता है.

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कुछ स्थानीय लोगों ने हमसे कहा था कि अगर यहां के भाजपा नेता हरिशंकर सिंह को टिकट मिलता, तो उनकी जीत पक्की थी. हरिशंकर सिंह को टिकट नहीं मिला, शुरुआती दौर में वो नाराज रहे. इस बारे में पूछने पर चुनाव का काम देखने वाले पुरुषोत्तम कहते हैं कि अमित शाह से मिले भरोसे के बाद वो साथ दे रहे हैं.

हम उनसे मिलके चलने लगे, तो ऑफिस के बाहर गोरखपुर में एक कॉलेज के प्रिंसिपल डॉक्टर विनय सिंह भाजपा उम्मीदवार सतीश चंद द्विवेदी के भाई को समझाते दिखते हैं, ‘तुम चुनाव जीत रहे हो. बस ये बात लोगों को समझाने की जरूरत है. लोगों में थोड़ा कंफ्यूजन है. उन्हें बताओ कि अभी बंबई में कौन जीता.’ सतीश के भाई कहते हैं कि यहां दारू और पैसे बंट रहे हैं.

इटवा में वड़ा-पाव खाते हुए साहिल मिले. साहिल ने बताया कि माता प्रसाद का कॉलेज है और वो अपने स्टाफ से प्रचार कराते हैं. उनके मुताबिक वहां के लिए यूनिवर्सिटी आई थी, लेकिन माता प्रसाद का कॉलेज चलता रहे, इस नाते यूनिवर्सिटी बहुत दूर भेज दी गई. हालांकि सिद्धार्थनगर के हेडक्वॉर्टर नौगढ़ के एक पत्रकार ने बताया कि यूनिवर्सिटी के लिए वहां जगह नहीं थी और न ही रेल लाइन है, ऐसे में वहां यूनिवर्सिटी कैसे बन जाती. यहां सिद्धार्थ विश्वविद्यालय की बात हो रही है, जो पिछले दिनों खबरों में रहा. खबर की वजह थी 84 असिस्टेंट प्रोफेसर की नियुक्ति में 83 ब्राह्मणों का होना.

चौराहे पर मोटरसाइकिलों का एक झुंड नारों का हल्ला मचाते हुए निकलता है. ये सपा का प्रचार था.

साहिल बसपा का समर्थन करते हैं. बसपा से अरशद खुर्शीद चुनाव लड़ रहे हैं. अरशद दूसरे इलाके के हैं, लेकिन करीब दो सालों से इस इलाके में मेहनत कर रहे हैं. बहुत से लोग उनकी तारीफ करते हैं. कहते हैं कि वो हर कार्यक्रम में पहुंचते हैं.

 

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गठबंधन को लेकर एक रोचक बात यहां मिलती है. यहां कांग्रेस के नेता मुकीम हैं. बाकी जगह हो सकता है कि सपा-कांग्रेस गठबंधन से प्रत्याशी को फायदा हुआ हो, लेकिन यहां लोग कहते हैं कि नुकसान होगा. लोग बताते हैं कि यहां पर लोगों पर बहुत से मुकदमे हैं. आधे लोगों पर माता प्रसाद की वजह से और आधे लोगों पर मुकीम की वजह से. अब दोनों के मिलने की वजह से सारे नाराज हैं. लोग कहते हैं कि यहां चीनी मिल बननी थी, मुलायम सिंह यादव ने उद्घाटन किया, लेकिन मिल बनी नहीं. लोग मजाक करते हुए कहते हैं कि किसान चीनी मिल में गन्ना लेकर गए थे, लौटे ही नहीं क्योंकि मिल अभी बनी ही नहीं है.

एक ईंट भट्ठे पर जाते हैं. वहां भी लोग अरशद की तारीफ करते हैं. बाद में उसके मालिक इज़राइल आते हैं. वो मुकीम के रिश्तेदार हैं, वो साफ नहीं कहते, लेकिन मुकीम के मुकाबले अरशद की तारीफ करते हैं. भट्ठे के टैक्स के बारे में पूछने पर वो कहते हैं कि राज्य के सेल्स टैक्स विभाग की स्कीम है समाधान, उसी के तहत 17 पावे के भट्ठे के लिए एक साल के लिए उन्होंने दो लाख तीस हजार रुपए जमा किए. पावा भट्ठे का आकार बताने के लिए इस्तेमाल होता है.

 

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भट्ठे के बगल में एक मंदिर है. जहां हाथी जितने आकार की हाथी की मूर्ति है. अंदर जाने पर दिखता है कि उसके बगल में हाथियों की मूर्ति के ढेर लगे हैं. तमाम तरह के हाथी, अलग-अलग आकार और आकृतियों के. ये समय माता का मंदिर है. समय इस इलाके में धीमा चलता दिखता है, लोग समय को बदलने की चाहत रखते हैं.

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अखिलेश सरकार के इस मंत्री का घर देख कर हैरान रह जाओगे.


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