Submit your post

Follow Us

इलाहाबाद पश्चिम से ग्राउंड रिपोर्ट : झंडा-डंडा भाई का, वोट पड़े भौजाई का

‘तीन किलोमीटर सड़क बनवावा, तो करोड़ रुपया लागी. ए से अच्छा पानी कै बम्बा बनवाय देओ. जहां-जहां सड़क टूटी हय, वहां हल्की मरम्मत करवाय देओ.’

इलाहाबाद पश्चिम के बसपा दफ्तर में रामआसरे पाल ने ये बात मेरे कान में कही. कान में क्यों कही, इस पर सोचना चाहिए. वो यहां से दो बार की बसपा विधायक पूजा पाल का चुनावी दफ्तर देखते हैं और रिश्तेदारी में उनके मौसा लगते हैं. रामआसरे पाल की ये बात इस सीट का मौजूदा अंडरकरंट है. मौजूदा विधायक ने विकास काम ज्यादा नहीं कराया, लेकिन चालाकी से खुद को जनता के बीच स्थापित किया है.

इलाहाबाद: कार्य प्रगति पर है
इलाहाबाद: कार्य प्रगति पर है

जातीय समीकरण भी उनके पक्ष में हैं, इसलिए वो यहां सबसे मजबूत नजर आती हैं. कुछ जगहों पर सारी पॉलिटिक्स रंजिश केंद्रित हो जाती है. फर्रुखाबाद और हमीरपुर में यही सीन है. इलाहाबाद पश्चिम सीट, जिसे लोकल में ‘शहर पश्चिमी’ कहा जाता है, की राजनीति भी ऐसी ही है. ये बाहुबली अतीक अहमद बनाम एक विधवा नेता की कहानी है.

आज कल जेल में चल रहे अतीक अहमद यहां 5 बार से विधायक थे. 2004 में वो सपा के टिकट से फूलपुर से सांसद हो गए. इससे इलाहाबाद पश्चिम विधानसभा सीट खाली हो गई और यहां से उन्होंने अपने भाई अशरफ को चुनाव लड़वाया. लेकिन नतीजे चौंकाने वाले थे. अशरफ को बसपा के राजू पाल ने 4 हजार वोटों से हरा दिया था. अतीक का 25 साल पुराना किला ध्वस्त हो चुका था. एक साल बाद 25 जनवरी 2005 को राजू पाल की गोली मारकर हत्या कर दी गई. अगली सुबह जब भारत गणतंत्र का जश्न मना रहा था, इलाहाबाद में विरोध प्रदर्शन, तोड़-फोड़ और चक्का जाम हो रहा था. हत्या का आरोप अतीक अहमद पर आया.

इलाहाबाद के बसपा कार्यालय में बैठे लोग
इलाहाबाद के बसपा कार्यालय में बैठे लोग

इसके बाद 2005 में यहां उपचुनाव हुए, जिसमें राजू पाल की पत्नी पूजा पाल अशरफ के खिलाफ लड़ीं, जीत नहीं पाईं. बल्कि अशरफ को 90 हजार से ज्यादा बंपर वोट मिले. लेकिन 2007 के चुनाव में पूजा पाल ने अशरफ को 10 हजार वोटों से हरा दिया. नाक का सवाल हुआ तो 2012 में खुद अतीक अहमद लड़ने उतरे. लेकिन उससे ठीक पहले हुए परिसीमन से कुछ मुस्लिम वोट कटकर दूसरी विधानसभा में चला गया और कुछ दलित वोट इस सीट पर बढ़ गया. पूजा पाल के साथ जनता की पुरानी सहानुभूति भी थी. तो उन्होंने अतीक अहमद को भी करीब 9 हजार वोटों से हरा दिया.

इस बार अखिलेश यादव ने अतीक अहमद का टिकट काट दिया. मुलायम भी उन्हें यहां से नहीं, कानपुर कैंट से लड़ाना चाहते थे, लेकिन अखिलेश ने वो गुंजाइश भी खत्म कर दी. सपा-कांग्रेस गठबंधन ने यहां से 28 साल की ऋचा सिंह को टिकट दिया है जो इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में छात्र संघ का चुनाव जीत रातों रात सुर्खियों में आई थीं. वो सीधा अखिलेश से टिकट लेकर आई हैं. इसलिए नगर स्तर के बुजुर्गवार सपा नेता उन्हें अपना नेता मानने में हिचक नहीं रहे.

ऋचा सिंह
ऋचा सिंह

पुरुष वर्चस्व वाली यूनिवर्सिटी में आजादी के बाद पहली बार कोई महिला छात्र संघ चुनाव जीती थी. वो भी सपा के छात्र संगठन के समर्थन से. इसके बाद वो अखबारों में फिर दिखाई दीं, जब एक कार्यक्रम के लिए यूनिवर्सिटी आए बीजेपी सांसद योगी आदित्यनाथ को उन्होंने यूनिवर्सिटी में घुसने नहीं दिया. इसके बाद फेसबुक के वामपंथी भी उनके मुरीद हो गए और उन्हें ‘प्रतिरोध की आवाज’ कहा गया. दिल्ली में उन्होंने कन्हैया और उमर खालिद के साथ मंच साझा किया और योगी को ‘भगाने’ का अपना अनुभव मंच पर साझा किया. तभी से अखिलेश की नजर ऋचा पर थी. अखिलेश ने अप्रैल 2016 में उन्हें पार्टी जॉइन करा दी.

chatra-sangh

इससे पहले पिछले साल फरवरी में ऋचा ने एक अखबार से कहा था, ‘पॉलिटिक्स में न्यूट्रल महिलाओं के लिए स्पेस नहीं है. उन्हें या तो स्मृति ईरानी की तरह जिद्दी होना होगा या मायावती और ममता बनर्जी की तरह ऑटोक्रेटिक. शुरुआती महीनों में मुझे ये बात साफ समझ आई है. कि बतौर महिला आप अपने घर से बाहर आ सकते हैं, आप काम पर जा सकते हैं, लेकिन आपको सत्ता पाने की इजाजत नहीं है.’

सपा कार्यकर्ताओं के साथ ऋचा
सपा कार्यकर्ताओं के साथ ऋचा

सत्ता पाने की इजाजत और हौसला उन्हें अखिलेश से मिला. लेकिन उनका पूरा करिश्मा अब भी एक छात्र नेत्री जैसा ही है. ऋचा सिंह बोलती बढ़िया हैं. उनके भाषण के उतार-चढ़ाव, शैली और उच्चारण में लेफ्ट की ट्रेनिंग दिखती है. करैली इलाके में उनका भाषण सुनकर किसी विधायक की छवि नहीं बनी, जेएनयू की प्रेसिडेंशियल डिबेट याद आ गई.

उनके भाषणों में जेएनयू के गायब छात्र नजीब, तीन तलाक और नोटबंदी जैसे राष्ट्रीय मुद्दे खूब होते हैं. पब्लिक अभिभूत होकर ताली तो पीटती है, लेकिन लोग विधायक में इससे ज्यादा कुछ खोजते हैं. वो जो नाली-खड़ंजा बनवा दे, कचहरी-पुलिस केस में मदद कर दे और हमारा फोन उठा ले. वह हर लिहाज से नई नेता हैं और ये चीज व्यावहारिक नजरिये से उनके खिलाफ जाती है. उस लिहाज से वो अच्छा चुनाव लड़ रही हैं, खूब मेहनत भी कर रही हैं. लेकिन इलाके के जातीय समीकरण उनके लिए बड़ी बाधा हैं.

इस सीट पर करीब 80 हजार दलित वोट है. 40 हजार पाल वोट है. 60 हजार मुसलमान है. 30-40 हजार पटेल है. 55 हजार ब्राह्मण और 20 हजार ठाकुर वोट हैं. दलित और पाल वोट ही पूजा को चुनाव जिताते रहे हैं.

पूजा का पंफलेट
पूजा का पंफलेट

मंदर मोड़ पर पूजा की रैली में गया था पर वो बहुत देर से पहुंचीं इसलिए उनका भाषण नहीं सुन पाया. करैली इलाके में ऋचा सिंह का भाषण सुना. अच्छा-तीखा भाषण था. उन्होंने कहा कि अगर नोटबंदी से जनता खुश है तो मैं बीजेपी को चुनौती देती हूं कि वो इसके नाम पर वोट मांगकर दिखाए. लेकिन इसी भाषण में एक चीज ‘प्रॉब्लमैटिक’ थी. तीन तलाक के मुद्दे पर उन्होंने कहा, ‘तीन तलाक होगा कि नहीं होगा. ये हमारी शरीयत तय करेगी. ये हमारे देश का कानून तय करेगा. ये जुमले फेंकने वाला प्रधानमंत्री नहीं तय करेगा.’ 27 साल की नौजवान छात्र नेता, जिसे पार्टी में आने से पहले उम्मीदों का रौशनदान कहा गया, अगर एक ही वाक्य में शरीयत और देश के कानून का जिक्र एक साथ करे तो इसका नोटिस लेना चाहिए.

ऋचा की सभा में लोग
ऋचा की सभा में लोग

अब बची भाजपा, जो कभी यहां से जीती नहीं. पार्टी ने अपने राष्ट्रीय स्तर के नेता पश्चिम बंगाल के प्रभारी रहे सिद्धार्थनाथ सिंह को टिकट दिया है. उनके पैंफलेट पर उनका नारा लिखा है, ‘अबकी बार न फूल न हाथी, अबकी बार लाल बहादुर शास्त्री का नाती.’ सिद्धार्थनाथ सिंह भारत के दूसरे प्रधानमंत्री के नाती हैं और इसी आधार पर वोट मांग रहे हैं. अपने राजनीति-काल में वो यहां ज्यादा रहे नहीं, पर उनके मकान-वकान यहां जरूर हैं. चुनाव तक उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती ‘बाहरी’ के लेबल को निकाल फेंकने की है.

bjp

लोगों ने कहा कि किसी लोकल इलाहाबादी को बीजेपी टिकट देती, तो इस बार उसका चांस था. सिद्धार्थनाथ के जीतने की संभावना तभी है, जब सारा गैरयादव ओबीसी और कुछ दलित वोट उन्हें मिले. बीजेपी दफ्तर में सहसंयोजक कमलेश मिले. उन्होंने दावा किया कि पासी और कनौजिया वोट उनके साथ है. बहुत सारे सोनकर समाज के फल विक्रेताओं ने कहा कि वो पूजा पाल को वोट नहीं देना चाहते, लेकिन सिद्धार्थनाथ बड़े नेता हैं, जीतकर बाहर चले गए तो क्या करेंगे. पूजा पाल कुछ करें न करें, सुख-दुख में बुलाने पर आती जरूर हैं.

लोकसभा और विधानसभा के चुनावों में ये एक बड़ा अंतर है. विधायक का जन्मदिन, शादी और तेरहवीं में आना – न आना. लोग विधायक से अपेक्षा रखते हैं कि वो उनकी पहुंच में रहे. सांसद से वैसी अपेक्षा नहीं रखते. केशव प्रसाद मौर्य यहां से सांसद हैं पर लोग पार्टी में उनकी बढ़ती जिम्मेदारियों के बारे में जानते हैं और उनके क्षेत्र में कम आने से बहुत आहत नहीं दिखते. इन्ही में से एक फल विक्रेता ने कहा था, ‘जात का वोट तो ठीक है. पर पूजा पाल का सबसे बड़ा फैक्टर सहानुभूति है. इस बार तो चुनाव फिर भी फंसा है. लेकिन अभी उनके खिलाफ अतीक अहमद या उनके भाई खड़े हो जाएं तो वो एकतरफा जीत जातीं.’

पूजा पाल का एक समर्थक
पूजा पाल का एक समर्थक

बसपा के चुनावी दफ्तर में रामआसरे पाल अतिशयोक्ति में ये भी कह गए थे कि यूपी की राजनीति में दो महिलाएं हैं, जिनके भतीजा, बेटा, सास या ससुर राजनीति में नहीं हैं. जो अकेली हैं और अपने दम पर हैं. एक मायावती और दूसरी पूजा पाल. बसपा के मीडिया कवरेज के बारे में पूछा उन्होंने इलाहाबादी लहजे में कहा, ‘भइया अब चुनाव वोही क है जौन ढोला लइके घर-घर घूमै. हम लोग कई महीनों से घर घर जा रहे हैं. बाकी दोनों कैंडिडेट तो बाहरी हैं. सपा तो कंपटीशन से ही बाहर है.’

मंदर मोड़ पर पूजा पाल की रैली में गया. वहां कई महिलाओं ने बताया कि पूजा पाल उनकी निजी समस्याओं में कैसे आर्थिक मदद करती हैं. उन महिलाओं के लिए सड़कों का निर्माण और विधायक निधि का इस्तेमाल मायने ही नहीं रखता. प्रदेश स्तर के चुनावों का एक पहलू ये भी होता है, इसे भी नोट करना चाहिए.

पूजा की सभा में लोग
पूजा की सभा में लोग

हालांकि, ज्यादातर मुस्लिम वोट ऋचा सिंह के साथ ही है. अतीक अहमद जब लड़ते थे तो मुसलमान वोट उन्हें मिलता था. लेकिन ऋचा के मंच पर गठबंधन के नगर स्तरीय नेताओं ने बसपा के खिलाफ जो कहा, उससे लगा कि कुछ वोट हाथी के साथ जाने का भय उन्हें सता रहा है. मुस्लिम बहुल इलाके में हुई सभा में सपा के नगर अध्यक्ष ने कहा, ‘आप हाथी को वोट दोगे तो इसका मतलब है कि फूल को दे रहे हो.

चुनाव के बाद दोनों एक हो जाएंगे. किसी निर्दलीय को वोट दे देना पर हाथी को मत देना.’ ऋचा की सभाओं में अतीक अहमद जिंदाबाद के नारे भी लग रहे हैं. अतीक की मशीनरी अगर उनके साथ है तो वो व्यावहारिक तौर पर कुछ निश्चिंत हो सकती हैं. सैद्धांतिक सवालों से बाद में निपट लेंगी. अखिलेश भी इस पर तिरछी मुस्कान छोड़ सकते हैं.

इलाहाबाद में साइकिल को बसपा का सहारा
इलाहाबाद में साइकिल को बसपा का सहारा

एमजी रोड पर एक दुकान के सामने एक शख्स अतीक अहमद की तारीफ करने लगा. उसने कहा कि सपा ही जीतेगी. पीछे से उसका दोस्त बोल पड़ा, ‘अरे ये कुछ ही कहे, वोट पूजा पाल को देगा.’ फिर उसने एक साहित्यिक लाइन कही जो इलाहबादियों से अपेक्षित होती है, ‘झंडा बैनर भाई का. वोट पड़े भौजाई का.’


 

यूपी के द लल्लनटॉप शो:


 

ये भी पढ़ें:

‘ददुआ के बेटे बीर पटेल को कोई हरा दे तो मैं अपना जियो सिम तोड़कर फ़ेंक दूंगा’ 

बीजेपी के गुरु गुड़ ही रहि गए, सपा का चेला सक्कर हुई गवा

बाराबंकी वाला स्किल इंडिया, जहां जान मोहम्मद भी भोले कह के हाथ उठाता है

ग्राउंड रिपोर्ट बांदा : डाकुओं के आतंक और रेत के अवैध खनन में बर्बाद होती ऐतिहासिक विरासत

मोदी ने अखिलेश को वो बात याद दिलाई, जो मुलायम खुद भूल चुके हैं

‘जब ये नेता पैदा हुआ तो आसमान में दो-दो इंद्रधनुष निकले थे’

Tags : #Allahabadgroundreport  #MulayamSinghYadav #AkhileshYadav #SamajwadiParty #Congress #UPElection2017 #UPAssemblyElection2017 #BSP #Mayawati #NarendraModi #BJP #AllahabadWest

groundreportAllahabad

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें