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यूपी में भले ही बीजेपी जीती हो, लेकिन कुर्सी किसके हाथ लगी

गठबंधन हार गया. बीजेपी जीत गई. ओह जीत नहीं गई, बल्कि रिकॉर्ड बना दिया. चर्चाएं बहुत हैं. गठबंधन कैसे हारा. क्या वजह रही बसपा की हालत इतनी बुरी क्यों हुई. क्या वजह रही जो बीजेपी इतने प्रचंड बहुमत से सत्ता में आई. सीएम कौन बनेगा. कौन इस कुर्सी पर बैठेगा. लेकिन क्या आप जानते हैं कि कोई नेता है जो कुर्सो पर बैठ गया है. सब जीत रहे थे मगर ये नेता कुर्सी पर निगाह जमाये था. चौंकिए मत सच बता रहे हैं. बीजेपी के जीते 312 नेता, (गठबंधन समेत 325)  मगर सच में कुर्सी इस एक नेता के हाथ लगी है.

सच सिर्फ ये ही नहीं होता कि गिलास आधा खाली है. सच ये भी है कि गिलास पानी से आधा भरा है. तो कुर्सी का सच भी ये है कि कुर्सी एक विधानसभा सीट का नाम है, जहां से सकेंद्र प्रताप वर्मा ने बाज़ी मार के कुर्सी विधानसभा सीट पर अपना कब्ज़ा जमा लिया.

सकेंद्र प्रताप ने 28 हज़ार 679 वोटों से समाजवादी पार्टी के फरीद महफूज़ किदवई को हराया. उफ्फ अखिलेश यादव की इतनी बुरी हार कि बीजेपी का नेता-नेता (बच्चा बच्चा की तरह पढ़ना) अखिलेश यादव से कुर्सी छीनने में लगा था. सकेंद्र प्रताप को एक लाख 8 हज़ार 403 वोट मिले. और फरीद को 79 हज़ार 724 वोट मिले. इस कुर्सी को झपटने के लिए बसपा ने भी कोशिश की. लेकिन उनके नेताजी वीपी सिंह वर्मा 51 हज़ार 91 वोट ही हासिल कर पाए. इनको तो वोट भी ऐसे मिले हैं जैसे किसी ने 101 का शगुन (51 और 91) दिया हो. पीस पार्टी ने भी अपना पहरेदार छोड़ा था. पीस पार्टी के सरवर अली 8 हज़ार 329 वोटों पर ही सिमट गए. लगता है उन्हें तो कुर्सी को छूने भी नहीं दिया गया.

 

sakendra pratap

सत्ता भी गई और कुर्सी भी गई. मतलब अखिलेश यादव पिताजी से भी अलग हुए और हार भी गए. कोई नहीं बुरा न मानो होली है.

कुर्सी बाराबंकी जिले की विधानसभा सीट है. जहां 2012 में एक बार ही चुनाव हुआ था. ये दूसरी बार चुनाव था. 2012 में सपा के फरीद महफूज़ ने ही ये सीट जीती थी. तब बीजेपी की राज लक्ष्मी तीसरे नंबर पर रही थीं. यानी सत्ता जिसकी कुसरी उसकी.

जय जनादेश!


 

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