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बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष रहे नेताजी को तो लहर भी नहीं बचा सकी

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यूपी में कौन कहां से जीता ये तो सब अपडेट ले ही रहे हैं. मगर यहां उन लोगों की लिस्ट है जो यूपी के अंदर पार्टियों के प्रदेश अध्यक्ष रहे हैं. या अभी हैं. उनको जनता ने किस पायदान पर रखा. जिसको पार्टी ने बागडोर सौंपी, उस बागडोर को उन उन्होंने किस तरह संभाला. ज्यादा बात नहीं सब कट तो कट. फटाफट पढ़ जाओ.

1. सूर्य प्रताप शाही- पथरदेवा विधानसभा

99812 वोटों के साथ सूर्य प्रताप शाही पहले नंबर पर चल रहे हैं. समाजवादी पार्टी के शाकिर अली 56815 वोटों के साथ काफी पीछे चल रहे हैं.

सूर्य प्रताप शाही. 10 साल पहले तक शाही बीजेपी की उस लिस्ट में शामिल थे, जिनके लिए कहा जा सकता था कि बीजेपी के सीएम कैंडिडेट हो सकते हैं. उन्होंने अपना पहला चुनाव 1985 में जीता. या ये कहिये कि यूपी की कसिया विधानसभा सीट पर बीजेपी का खाता खोला. ये सीट 2007 तक अस्तित्व में थी, लेकिन 2008 में हुए परिसीमन के बाद इसका क्षेत्र कुशीनगर विधानसभा में मिला दिया गया.

जब 1985 में शाही जीते थे तो दूसरे नंबर पर ब्रहम ब्रह्मशंकर त्रिपाठी रहे थे. इस चुनाव में ब्रह्मशंकर निर्दलीय थे और दोनों के बीच महज 0.72 फीसदी वोटों का ही अंतर था. 1989 के चुनाव में शाही हार गए और ब्रह्मशंकर जीत गए. शाही बीजेपी से थे और त्रिपाठी जनता दल के टिकट पर चुनाव लड़ रहे थे. इस बार दोनों के बीच वोटों का अंतर करीब 11 फीसदी हो गया था. 1991 के चुनाव में बाजी एक बार फिर बीजेपी से शाही के हाथ लगी और जनता दल से ब्रह्मशंकर दूसरे नंबर पर रहे. इस बार वोटों का अंतर करीब 6 फीसदी था.

फिर आया 1993 का चुनाव. बीजेपी की खुमारी उतर चुकी थी, तो ब्रह्मशंकर फिर चुनाव जीत गए. इस बार भी पार्टी जनता दल ही थी. दूसरे नंबर पर रहे शाही और उनके वोटों में 10 फीसदी का अंतर था. 1996 के चुनाव में शाही ने फिर वापसी की. वो इस बार भी बीजेपी से थे, लेकिन दूसरे नंबर पर रहे ब्रह्मशंकर इस बार सपा के टिकट पर चुनाव लड़े थे. इस बार वोटों का अंतर 5 फीसदी रहा. 2002 में चुनाव हुए. रवायत के मुताबिक शाही की सीट चली गई और ब्रह्मशंकर विधायक बन गए. सपा के त्रिपाठी और बीजेपी के शाही के वोटों में इस बार जीत हार का अंतर बड़ा था, 14 फीसदी का. और फिर 2007 का चुनाव कसिया का वो ऐतिहासिक चुनाव था, जब जनता ने सूर्य प्रताप को नकारते हुए ब्रह्मशंकर त्रिपाठी को लगातार दूसरी बार विधायक बना दिया. 2002 में हारने के बाद शाही फिर जीत नहीं पाए.

2. शिवपाल सिंह यादव – विधानसभा जसवंतनगर

शिवपाल सिंह यादव 123141 वोटों के साथ पहले नंबर पर चल रहे हैं. जीत तय है. बीजेपी के मनीष यादव 71622 वोटों के साथ दूसरे नंबर पर चल रहे हैं.

ये वो नेता हैं. जो समाजवादी पार्टी के टूटने की कगार पर ला खड़े हुए. रोज़ नई नई तू तू मैं मैं हुई. अखिलेश ने प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाया तो मुलायम सिंह ने बनाया. और आखिर में अखिलेश की चली. शिवपाल को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिया गया.

6 अप्रैल 1955 को जन्म हुआ था शिवपाल का. इटावा जिले के सैफई में. 5 भाई और एक बहन थे इनके. मुलायम हैं इनके बड़े भाई. इन्होंने बीए तक पढ़ाई की. मुलायम के राजनीति में आने के बाद इन्होंने भी पूरा हाथ बंटाया.

90 के दशक में ये जिला पंचायत इटावा के अध्यक्ष बने. पर इन्होंने अपनी राजनीति को-ऑपरेटिव से शुरू की. जो काम अमित शाह ने गुजरात में बीजेपी के लिए किया था, वही काम इन्होंने उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के लिए किया. को-ऑपरेटिव के जरिये हर जिले में समाजवादी पार्टी की पकड़ बनाई. उत्तर प्रदेश सहकारी ग्राम विकास बैंक लिमिटेड, लखनऊ के अध्यक्ष बने. 1996 में पहली बार उत्तर प्रदेश विधानसभा पहुंचे. 97-98 में विधानसभा की अनुसूचित जाति और जनजाति से जुड़ी समिति के सदस्य बने. फिर एक वक़्त आया कि समाजवादी पार्टी के महासचिव भी रहे. फिर जब मुलायम की सरकार आई तो कैबिनेट मिनिस्टर भी रहे. जब मायावती की सरकार बनी तो ये नेता प्रतिपक्ष रहे.

2012 के विधानसभा चुनावों के दौरान ही अखिलेश और शिवपाल में मतभेद की बात आई. पश्चिम यूपी के विवादस्पद नेता डी पी यादव के पार्टी में आने को लेकर. अखिलेश ने आने नहीं दिया कि पार्टी की इमेज खराब हो जाएगी. पर शिवपाल का कुछ और मन था. बात बढ़ती गई . इतनी बढ़ी कि उन्हें प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिया और महज़ एक समाजवादी पार्टी का नेता की हैसियत बना दी.

3. पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी- मेरठ विधानसभा

लक्ष्मीकांत वाजपेयी, बीजेपी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष जो लगातार जीत रहे थे. इस बार मोदी लहर होने के बावजूद हार गए. यानी ये 2014 लोकसभा की तरह अरुण जेटली की तरह हार गए. जबकि समाजवादी पार्टी के रफ़ीक अंसारी इस सीट पर बाज़ी मार ले गए. उन्हें 103217 वोट मिले. लक्ष्मीकांत वाजपेयी को 74 हज़ार 448 वोट मिले. इस सीट पर बसपा, सपा, बीजेपी के बीच रफीक शाह अकेले मुस्लिम उम्मीदवार थे. बसपा के पंकज जौली को 12636 वोट मिले. 

डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी मौजूदा विधायक थे. मेरठ उनका गृह जनपद है. चार बार विधायक रह चुके हैं. यूपी के बीजेपी अध्यक्ष पद से हटाकर फूलपुर के सांसद केशव प्रसाद मौर्या को अध्यक्ष बनाया गया. लेकिन ये 2014 लोकसभा चुनाव के दौरान वो अध्यक्ष थे, जब बीजेपी ने यूपी में अच्छा परफॉर्म किया. जब लक्ष्मीकांत को यूपी में बीजेपी अध्यक्ष बनाया गया था, तो 2012 में मुजफ्फरनगर की पुरकाजी सीट से बीजेपी के टिकट से लड़ने वाली साध्वी प्राची ने कहा था, ‘उनके नेतृत्व में 50 सीटें भी हासिल नहीं कर पाएगी. उन्हें (वाजपेयी) जो सहारा देता है, उसे ही वह काट देते हैं.’

लक्ष्मीकांत को सबसे पहले जनता पार्टी ने 1977 में युवा प्रकोष्ठ का अध्यक्ष बनाया था. उसके बाद 1980 में बीजेपी के जिला महासचिव बने. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि उन्हें प्रदेश अध्यक्ष पद से बीजेपी ने इसलिए हटाया है, क्योंकि वो ब्रह्मण थे. और बीजेपी ओबीसी वोटों पर निशाना लगाना चाहती थी. इसलिए कोइरी समाज के केशव प्रसाद मौर्य को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया गया. यूपी में कुर्मी, कोइरी और कुशवाहा ओबीसी में आते हैं. और वोटों की बात की जाए तो तकरीबन 25 परसेंट ओबीसी हैं.

दो बार से लगातार विधानसभा चुनाव जीत रहे लक्ष्मीकान्त का रथ हाजी याकूब कुरैशी ने साल 2007 के विधानसभा चुनाव में रोका था. लेकिन साल 2012 में लक्ष्मीकांत फिर जीत गए थे.

4. संजय कुमार – गोरखपुर रूरल विधानसभा

निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय कुमार बुरी तरह हार चुके हैं. जबकि बीजेपी के बिपिन सिंह ने बाज़ी मार ली है. उन्हें 83686 वोट मिले. जबकि सपा के विजय बहादुर यादव 79276 वोटों के साथ दूसरे नंबर पर रहे.

निषाद पार्टी (निर्बल इंडियन शोषित हमारा आम दल) के अध्यक्ष हैं डा. संजय निषाद. गोरखपुर रूरल से चुनाव लड़े. अपना दल (कृष्णा पटेल गुट), पीस पार्टी और निषाद पार्टी ने ये चुनाव मिलकर लड़ा. लेकिन हालत खस्ता रही.

5. डॉ. अय्यूब- खलीलाबाद विधानसभा

इस सीट पर शुरुआत में मुकाबला त्रिकोणीय दिख रहा था. लेकिन बीजेपी के दिग्विजय नारायण 72061 वोटों के साथ पहले पर, बसपा के मशहूर आलम 56024 वोटों के साथ दूसरे नंबर पर और डॉ. अय्यूब 42041 वोटों के साथ तीसरे नंबर पर चल रहे हैं. यानी ये अध्यक्ष महोदय भी हार चुके हैं.

पीस पार्टी के अध्यक्ष हैं डॉ. अय्यूब. संतकबीर नगर के मेंहदावल से विधायक थे. इस बार खलीलाबाद से विधानसभा चुनाव लड़ रहे थे.
अभी कुछ दिन पहले ही उनपर सेक्सुअल हैरेसमेंट का इल्ज़ाम लगा है. आरोप है कि उन्होंने अपने साथ साल 2012 में चुनाव प्रचार के दौरान एक लड़की को रखा था. उसी लड़की ने सेक्सुअल हैरेसमेंट केस दर्ज कराया है. डॉ. अय्यूब ने इसे विरोधियों की साजिश बताया.

6. के के सचान (बसपा) – तुलसीपुर

बीएसपी के प्रदेश अध्यक्ष रहे हैं के के ( कृष्ण कुमार) सचान. और ये हार चुके हैं. तुलसीपुर सीट से बीजेपी के कैलाश नाथ शुक्ला 18659 वोटों से जीत गए हैं. और कांग्रेस की ज़ेबा रिज़वान 43637 वोटों के साथ दूसरे नंबर पर रहीं. जबकि सपा के अब्दुल मशहूद खान 36549 वोट मिले. यानी गठबंधन होने के बाद भी दोनों ने एक दूसरे को हरा दिया. केके  सचान पर आय से अधिक संपत्ति का आरोप लग चुका है.

इस सीट पर कई बार सपा, बसपा सांसद व विधायक रहे बाहुबली नेता रिजवान जहीर ने हाथ के पंजे से अपनी बेटी जेबा रिजवान को मैदान मे उतारा था. वहीं अखिलेश-राहुल के चुनावी गठबंधन को दरकिनार समाजवादी पार्टी से विधायक अब्दुल मशहूद खां दोबारा से चुनाव लड़ गए. जहां एक ओर अखिलेश और राहुल गांधी मिलकर रैलियां कर रहे थे. वहीं इस सीट पर दोनों के कैंडिडेट एक दूसरे को हराने में जुट गए. इन दोनों की भिड़ंत में भाजपा से कैलाश नाथ शुक्ल आगे निकल गए. और बसपा के के के सचान की हालत तो बहुत बुरी रही.

7. ओम प्रकाश राजभर (बसपा ) – ज़हूराबाद विधानसभा

सुहेल देव पार्टी सुभासपा (सुहलदेव) के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं ओमप्रकाश राजभर. भाजपा से समझौता करके चुनाव लड़े हैं. इनका चुनाव चिह्न छड़ी है.

ओम प्रकाश राजभर जीत की तरफ बढ़ रहे हैं. अबतक 86583 वोटों के साथ पहले नंबर पर हैं. दूसरे पर बसपा के कालीचरण 68502 वोटों के साथ हैं. सपा के महेंद्र 64 हज़ार 574 वोटों के साथ तीसरे नंबर पर चल रहे हैं.

8. राम अचल राजभर – अकबरपुर विधानसभा

रामअचल राजभर फ़िलहाल बसपा के प्रदेश अध्यक्ष हैं. जो अकबरपुर सीट से जीत गए हैं. उन्हें 72 हजार 325 वोट मिले. जबकि सपा के राम मूर्ति वर्मा को 58 हज़ार 312 वोट मिले. जबकि तीसरे नंबर पर बीजेपी के चंद्र प्रकाश वर्मा रहे 

अम्बेडकर नगर में पैदा हुए. राजनीतिक करियर की शुरुआत अकबरपुर से ब्लॉकप्रमुखी के चुनाव से हुई थी. जिसमें वो बुरी तरह हार गए थे. 1991 में पहली बार बसपा के टिकट से विधायकी का चुनाव लड़े. और इस बार भी हार गए. 1993 में फिर चुनाव हुए और विधायक बनकर विधानसभा पहुंच गए. 2007 में बसपा की सरकार ने उन्हें परिवहन मंत्री बनाया. इनके बारे में बताया जाता है कि ये घूम घूमकर चूहे मार की दवा बेचा करते थे. उनका ये काम काफी लंबे टाइम तक चलता रहा. उन्होंने अंग्रेजी में एमए और एलएलबी किया.

क्या वजह रही हार जीत की, वीडियो देखिए

 

 


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