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रायबरेली में इस बंदे का भौकाल गांधी परिवार से भी बड़ा है!

लोकसभा चुनावों में रायबरेली सोनिया गांधी का गढ़ कहलाता है. लेकिन विधानसभा में इस जिले की सदर सीट अखिलेश सिंह की बपौती हो जाती है.

राजा भैया, अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी की लीग में अखिलेश सिंह को शामिल करने से उनके समर्थक नाराज होते हैं. लेकिन इस ‘बाहुबलि’ नेता ने साबित किया है कि वो यहां निजी तौर पर कांग्रेस पार्टी के जनाधार से ऊपर निकल गए हैं. 23 साल से वो यहां से विधायक हैं. शुरुआत में तीन बार कांग्रेस से विधायक रहे. फिर 2007 में निर्दलीय जीते और 2012 में पीस पार्टी के टिकट पर लड़कर भी 30 हजार के अंतर से जीत गए.

अखिलेश सिंह
अखिलेश सिंह

2007 और 2012 में प्रियंका गांधी ने अपने कथित गढ़ में अखिलेश सिंह को हराने के लिए प्रचार भी किया था. लेकिन सदर सीट पर अखिलेश सिंह की दीवार गांधी परिवार से भी मजबूत है. अखिलेश की रैली में दोगुनी भीड़ आती थी. लेकिन अब उन्हें बुजुर्गियत और बीमारियों ने घेर लिया है. इसलिए वो अपनी 28 साल की बिटिया अदिति सिंह को विरासत सौंपने की तैयारी कर चुके हैं. वो खुद पार्टी में नहीं आए, लेकिन अमेरिका से मैनेजमेंट पढ़कर लौटी अदिति को कांग्रेस जॉइन करवा दी. अब अखिलेश का अपना वोट, सपा का मुस्लिम वोट और कांग्रेस का लॉयल वोट एक होकर अदिति के जीतने की तगड़ी संभावना बना रहा है.

अदिति सिंह
अदिति सिंह

एक फूल वाले से चुनावी माहौल पूछा तो उसने सीधे कहा, यहां भइया एक ही आदमी का जोर है. आप भी जान रहे हो. रायबरेली की लोकसभा सीट ज्यादातर गांधी परिवार और उनके करीबियों के पास रही. अटल काल में दो बार यहां से बीजेपी के अशोक सिंह चुनाव जीते. पिछले चार बार से सोनिया गांधी सांसद हैं.

SARDAR ASKING FOOLWALE

रायबरेली से ही अपेक्षित था कि वहां कांग्रेस के ऐसे वाचाल समर्थक मिलेंगे. फेसबुक लाइव में खूब गरमागरमी हुई.

SP E-RICKSHAW

कांग्रेस के समर्थकों ने सपा सरकार की ओर से बांटे गए लाल-हरे ई-रिक्शे दिखाए कि देखिए कैसे बेरोजगारी को ये आदमी खत्म कर रहा है. इसी में एक शख्स नोटबंदी पर बोलते बोलते गाली देने वाला था, उसे रोक लिया. फिर वह कहने लगा कि आप सब मीडिया वाले बिके हो, मोदी की बात करते हो.

रायबरेली में कितना विकास हुआ, जितना होना था क्या उतना हुआ, या उसे थोड़ा हुआ; ये यहां सामान्य प्रश्न हैं. एक लोकल शिक्षक ने कहा, ‘ऐसा नहीं है कि रायबरेली में सब सर्वोत्तम है. सैफई की बात नहीं कर रहा. आप पश्चिमी यूपी के किसी भी ठीक-ठाक शहर से तुलना कर लीजिए. सोनिया का इलाका हल्का ही पड़ेगा. लेकिन बात ये है कि रायबरेली को जो कुछ मिला है, वो कांग्रेस और गांधी परिवार से ही मिला है. दूसरों ने दुश्मनी निकाली है. इसलिए एक भक्ति संप्रदाय पैदा हो गया है.’

toilet

उन्होंने आगे कहा, ‘आपको पता है कि मायावती के राज में यहां रात 12 बजे लाइट जाती थी और सुबह 4 बजे जाती थी. ताकि रायबरेली के लोग सो न सकें.’

यह सही है कि यूपीए के समय में रायबरेली को हजारों करोड़ की परियोजनाएं मिलीं. पेट्रोलियम प्लांट, NIFT, एम्स, ट्रेनें, पड़ोस के ऊंचाहार में NTPC आदि आदि. बल्कि ऐसा भी हुआ कि अलग अलग मंत्रालयों ने ‘मैडमजी’ को खुश रखने के लिए बहुत कुछ रायबरेली को दिया. एक साहब बोले, ‘आपको क्या लगता है कि सोनिया रेल बजट से पहले फोन करके कहती होंगी कि रायबरेली से फलानी ट्रेन चलवा दीजिए. मंत्री लोग खुद ही कर देते थे.’

राय बरेली में सोनिया गांधी. तस्वीर पुरानी है. (Photo: Daily Mail)
राय बरेली में सोनिया गांधी. तस्वीर पुरानी है. (Photo: Daily Mail)

लेकिन कुछ समझदार लोग यूपीए के समय मिली परियाजनाओं के ‘एग्जीक्यूशन’ से खुश नहीं है. बहुत सारे लोगों ने एम्स की बात कही, जो यूपीए के समय में बनकर तैयार हुआ था, लेकिन अब तक उसका उद्घाटन नहीं हो सका है. मशीनें आकर रखी हुई हैं, लेकिन ओपीडी खुला नहीं, इसलिए जनता का भला हुआ नहीं.

घंटाघर चौराहे पर एक गुटखा दबाए हुए एक लापरवाह नौजवान ने कहा, ‘द्याखौ ई मोदी क लिए रहा सुनहरा मौका. उनका झंडियै तो दिखावै क रहा.’ पट्ठे की बात में दम था. प्रधानमंत्री ही आकर एम्स का उद्घाटन कर जाते तो रायबरेली में बहुत लोग उनकी तरफ हो जाते.

SARDAR JI TALKING WITH SARDAR

यहां एक ‘गुरु तेग बहादुर मार्केट’ है जिसे लोग ‘सुपर मार्केट’ भी कहते हैं. यहां सिखों की बहुत सारी दुकानें हैं. यहां आकर 1984 के दंगों की यादें भी ताजा हो गईं. एक बुजुर्ग सिख व्यापारी ने अपनी दुकान दिखलाई जो साल 84 में जला दी गई थी. बोले 2 करोड़ का नुकसान हुआ था और मुआवजा हजारों में मिला. पहले वो कांग्रेस में थे, लेकिन दंगों के बाद ही कांग्रेस छोड़ दी. लेकिन पंजे पर मुहर लगाना नहीं छोड़ा. उनकी दुकान पर आज भी इंदिरा के साथ वाली तस्वीर लगी हुई है.

Sardar with Indira Gandhi

 

इसी बाजार में जूतों की एक दुकान पर राजनीतिक चर्चा होती देख रुक गया. सब दुकान वाले बैठे थे. सबने कहा कि नोटबंदी ने उनकी आमदनी आधी कर दी थी. अब कुछ सुधार हुआ है, लेकिन पूरा नहीं हुआ. इसी दुकान में दिल्ली के ‘कूल लुक’ वाला एक नौजवान दिखा. उसने बताया कि यहां नॉन वेज का ठेला लगाता हूं. दिल्ली में दोस्त हैं, जिनसे सीखकर ये लुक अपनाया है. घर के हालात ऐसे रहे कि पढ़ाई नहीं कर पाया. घर में मैं और मॉम हैं. नोटबंदी के बाद मेरा बहुत नुकसान हुआ. आमदनी बहुत घट गई.

नेता पुत्र या नेता पुत्री पॉलिटिक्स में उतरते हैं तो वंशवाद का सवाल मुंह बाए उनके सामने खड़ा होता है. अदिति सिंह से ये सवाल पूछा तो बोलीं कि मैं ऐसे पॉलिटिक्स में नहीं आई, तैयारी के साथ आई हूं. बहुत मेहनत की है. दो साल तक पढ़ाई की है. जब यूएस से लौटी थी तो हिंदी का टच भी छूट गया था. एक टीचर घर पर हिंदी और पॉलिटिकल साइंस पढ़ाने आते थे. मुझे नहीं पता था कि जिला पंचायत क्या होता है, नगर पंचायत क्या होता है, विधायक निधि क्या होता है. सब मैंने सीखा.

अदिति से बातचीत

अदिति से बात करके लगा कि वो तेजी से सीख रही हैं. पढ़ाई लिखाई और दुनिया घूमने से काफी कुछ आसान हो जाता है. उनसे बातचीत शुरू करने जा रहे थे तो बोलीं, रुक जाइए अभी अज़ान हो रही है. ये हो जाए, फिर बात करते हैं. whatsapp पर उनका स्टेटस है, ‘हर हर महादेव.’

अदिति का मुकाबला बसपा के शाहबाज खान और बीजेपी की अनीता श्रीवास्तव से है. शाहबाज खान नसीमुद्दीन सिद्दीकी के करीबी हैं. उनकी प्लाईवुड फैक्ट्रियां हैं और किलागंज में रहते हैं. वहीं पेशे से वकील अनीता श्रीवास्तव बीजेपी की जिला महिला मोर्चे की अध्यक्ष हैं. रायबरेली में दो-तीन लोगों ने ये कहा कि यहां बीजेपी ने जान-बूझकर हल्का कैंडिडेट उतारा है, क्योंकि अदिति सिंह को चुनाव जिताना है. डिम्पल भी निर्विरोध जीती थीं, याद करिए. हालांकि एक पत्रकार ने कहा कि बीजेपी मजबूत कैंडिडेट लाती भी कहां से. वो यहां तीसरे नंबर पर है.

रौला अदिति का ही है. चुनाव आयोग को यहां आकर देखना चाहिए कि कांग्रेस के झंडे-झंडियां कहां-कहां लगे हैं. पूरे शहर में पंजा ही पंजा नजर आता है.

SP INC FLags (1)

अदिति साड़ी पहनकर अपनी फॉर्चुनर से प्रचार करने जाती हैं. लेकिन उनका लहजा और तौर तरीका ‘यूएस-रिटर्न्ड’ वाला ही है. दिल्ली से आई पत्रकारों की टोली देखकर उन्होंने हमसे शुरुआती बातचीत अंग्रेजी में ही की. हालांकि उनका दावा है कि क्षेत्र की देहाती जनता से कम्युनिकेट करने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं है. वो अवधी बोल नहीं पातीं, लेकिन समझ लेती हैं. एक पत्रकार ने कहा कि आप अदिति की प्रोफाइल के चक्कर में क्यों पड़े हैं, वोट उनके पिताजी के नाम पर पड़ रहा है. उन्होंने ही बताया कि अदिति लोकल पत्रकारों के फोन नहीं उठातीं. आस-पास के नेताओं के जरिये उनसे बात करनी पड़ती है.

अदिति सिंह की जनसभा
अदिति सिंह की जनसभा

लगता नहीं है कि अखिलेश अदिति को रायबरेली में बिठाए रखने के लिए राजनीति में लाए होंगे. बहुत जल्द वे दिल्ली में बैठना चाहेंगी. यूपी के सियासी लेखपाल उन पर नजर रखें.

अब अखिलेश सिंह के करिश्मे की बात! अगर आप कुंडा से रायबरेली पहुंचें तो अखिलेश का करिश्मा राजा भैया के भौकाल की संशोधित सिकुड़न है. हमारे पूर्व पड़ाव का विस्तार ही. लोग कहते हैं कि अखिलेश सिंह गरीबों की मदद करते हैं, किसी गरीब के घर में आग लग जाए तो पुलिस की गाड़ी बाद में, विधायक जी के लोगों की गाड़ी पहले पहुंचती है. इन्होंने राजनीति का एक ऐसा नियम विकसित कर दिया है कि मैं तुम्हारा नेता हूं और मैं गरीबों की मुसीबत में मदद करूंगा. बस तुम ‘विधायक निधि का क्या हुआ’ और ‘ठेकेदारी के टेंडर किसके पड़ रहे हैं’, जैसे सवालों से मतलब मत रखो.

रायबरेली सुपरमार्केट में ही हमारे देखते देखते गायों का एक झुंड सड़क पर दौड़ गया, जिसकी टक्कर से एक अंकल जी अपना स्कूटर लेकर गिर गए. बच्ची भी साथ में थी. मैं मदद के लिए दौड़ा तो हाथ में माइक देखकर बोले, ‘ये है भइया रायबरेली. आप इसको रिकॉर्ड करना जरूर.’

गाय से टकरा कर गिरे.
गाय से टकरा कर गिरे.

इसके ठीक बाद एक शिक्षक साहब ने बताया कि रायबरेली में पार्किंग, ट्रैफिक मैनेजमेंट और सिविक सेंस खस्ता हालत में है. बाजार की सड़कों के किनारे मोटरसाइकल से अटे रहते हैं. पार्किंग की व्यवस्था अच्छी नहीं है. लोगों को ट्रैफिक सेंस नहीं है. पीछे देखे बिना हाइवे के बीचोंबीच बाइक डाल देते हैं. यूपीएससी की तैयारी कर रहे एक नौजवान से इस पर बात की तो बोला, ‘इसे आप सामान्य बात मत समझिए. रायबरेली में गांधी परिवार ने जो दिया ‘सौगात’ के रूप में दिया. लेकिन कभी यहां की जनता को शिक्षित करने, जागरूक बनाने और उनमें चेतना लाने के लिए कुछ नहीं किया. ये राजा-प्रजा का संबंध रहा है, प्रतिनिधि और जनता का नहीं.’

रायबरेली की एक सड़क
रायबरेली की एक सड़क

फिर भी यहां लोग गांधी परिवार को इतना पसंद क्यों करते हैं? इसका जवाब इत्तेफाक से चाय की एक दुकान पर मिले 70 साल के पूर्व कांग्रेसी रामसेवक चौधरी ने एक किस्से में सुनाया.

उन्होंने बताया, ‘ये वो दौर था जब रायबरेली में सोशलिज्म चलता था. पिछड़े समुदाय का हमारा परिवार भी कांग्रेस विरोधी था. साल 1971 में मैं इम्तेहान देने पहली बार दिल्ली गया. वहां देखा कि तीन मूर्ति रोड पर भीड़ लगी थी. पता चला कि ज्ञानी जैल सिंह और उनके लोग इंदिरा गांधी से मिलने आए हैं. मैं भी लाइन में लग गया. इस लाइन में दो लोग रायबरेली से थे. हम दोनों को अलग ले जाया गया और एक कमरे में बैठा दिया गया. थोड़ी देर में इंदिरा गांधी सामने थीं. उन्होंने पूछा कि तुम लोग यहां कैसे आए. हमने बताया कि मिलने चले आए. सख्त मिजाज की इंदिरा ने कहा कि मैं तो हर दो महीने में आती रहती हूं, वहीं मिल लेते. खैर आए हो तो दिल्ली घूमे? जवाब ना में मिला. फिर इंदिरा गांधी ने हमें कोल्ड ड्रिंक पिलवाई और जीवन में पहली बार हमने उसका स्वाद चखा. इसके बाद उन्होंने अपने लोगों से कहकर अगले दिन हमारे घूमने की व्यवस्था करवाई. वापसी का टिकट-विकट करवाया.’

इंदिरा के निजी व्यवहार ने रामसेवक को इस तरह प्रभावित किया कि इसके बाद वो कांग्रेसी हो गए. संजय गांधी के समय में जब युवक कांग्रेस बनाई गई तो रामसेवक उसके ब्लॉक अध्यक्ष बने. लंबे समय तक कांग्रेस में पदाधिकारी रहे.

लेकिन अब वो कांग्रेस को ‘मैनेजरों की पार्टी’ बताते हैं. पॉलिटिक्स के ‘पीके मेथड’ से उन्हें जबरदस्त नाराजगी है. उन्हें अब लेफ्ट पार्टियां बेहतर लगती हैं. राहुल गांधी के बारे में पूछा तो बोले कि जो नेता मटर और अरहर का पौधा नहीं पहचान सकते, वो हमारे बारे में कैसे फैसला लेंगे. उनसे ज्यादा तो सिंधिया और पायलट जानते हैं. प्रधानमंत्री पर बोले कि उनका तो मैं घोर विरोधी हूं. उनका दल सिर्फ एक समुदाय की प्रगति की बात करता है. लेकिन ये बात सही है कि उन्हें देश-समाज का अच्छा ज्ञान है और वो संघर्ष से होकर गुजरे हैं. और सपा! सपा तो पैदा ही लोहिया के नाम पर हुई जो परिवारवाद के सख्त खिलाफ थे. लेकिन बसपा अपने तरीके से उस वर्ग का प्रतिनिधित्व कर रही है, जिसे लंबे समय तक दबाकर रखा गया था.

मुख्यधारा की राजनीति से जैसा ‘मोह भंग’ रामसेवक जी की बातों में दिखता है, रायबरेली को वैसे मोहभंग में बरसों लगेंगे. छिटपुट जगहों पर ‘जनमानस’ में अब भी राजशाही है, जनतंत्र नहीं.

सुनिए राम सेवक जी को


 

यूपी चुनाव के लल्लनटॉप शो


 

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