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मथुरा से ग्राउंड रिपोर्ट: 'जान चली जाए, मगर वोट उन्हें ही देंगे'

विधानसभा सीट: मथुरा
उम्मीदवार: प्रदीप माथुर (कांग्रेस, मौजूदा विधायक)
श्रीकांत शर्मा (बीजेपी)
डॉ अशोक अग्रवाल (आरएलडी)
योगेश द्विवेदी (बीएसपी)

अलीगढ़ से मथुरा के रास्ते में धुंध थी. लेकिन मथुरा पहुंचने तक गर्मी महसूस होने लगी और जैकेट उतारनी पड़ी. धूप खिली है. यह जिज्ञासु और बातूनी लोगों का शहर है. सांस्कृतिक इतिहास की वजह से भी और टूरिस्ट प्लेस होने की वजह से भी. यहां के लोग पर्याप्त व्यवहार कुशल हैं. कैमरा देखकर भागते नहीं हैं, पास आते हैं.

यहां ‘नमस्ते’ लगभग विलुप्त है. अभिवादन का एक ही तरीका है- ‘राधे राधे’. कोई उत्साही टूरिस्ट किसी मुसलमान से भी अनजाने में ‘राधे राधे’ कह जाए तो उसे इन्हीं शब्दों में जवाब भी मिल जाता है. होली गेट पर लोगों ने बताया कि यहां मौसमी गर्मी सोमवार से बढ़ी, लेकिन चुनावी गर्मी दो-तीन दिनों से ही बढ़ी है.

 

मथुरा विधानसभा सीट में मथुरा शहर, वृंदावन शहर और आस-पास के 25-30 गांव शामिल हैं. वैश्य और ब्राह्मण बहुल आबादी है. करीब 70 हजार ब्राह्मण, 65 हजार वैश्य, 35 हजार मुसलमान और 25-30 हजार जाट हैं. इसलिए सभी पार्टियां सवर्ण उम्मीदवार उतारती हैं. यहां से 9 बार कांग्रेस, 4 बार बीजेपी जीती है. लेकिन इस सवर्ण बहुल ‘धर्मनगरी’ से आज तक किसी पार्टी ने महिला उम्मीदवार नहीं उतारा. जेंडर स्टडीज पढ़ने वालों के लिए ये सीट ‘केस स्टडी’ की अच्छी संभावना है.

mathura

तीन बार से लगातार विधायक कांग्रेस के प्रदीप माथुर सबसे मजबूत उम्मीदवार हैं. ये उनकी अपनी बनाई ‘रेपुटेशन’ है कि प्रदेश में कांग्रेस के बीमार होने के बावजूद वो यहां से जीतते रहे. पिछला चुनाव बड़ा दिलचस्प था. दूसरे नंबर पर बीजेपी के देवेंद्र कुमार शर्मा और तीसरे पर सपा के डॉक्टर अशोक अग्रवाल थे. पहले और दूसरे के बीच 501 और दूसरे-तीसरे के बीच 948 वोटों का फासला था.

कागजी गणित के मुताबिक सपा-कांग्रेस गठबंधन से प्रदीप माथुर को और मजबूत होना चाहिए. लेकिन यहां के एक वरिष्ठ पत्रकार के मुताबिक, प्रदीप माथुर के मामले में गठबंधन का एकमात्र फर्क यही है कि उनकी प्रचार गाड़ियों पर पहले एक झंडा दिखता था, अब दो दिखते हैं. बल्कि गठबंधन का साइड इफेक्ट जरूर हुआ कि इससे सपा के डॉ. अशोक अग्रवाल का टिकट कट गया और वो नाराज होकर आरएलडी में चले गए. मथुरा में उनकी छवि सरल व्यक्तित्व वाली शख्सियत की है, जो आपके कहने से आपका काम कराने चल देता है. लोग उन्हें ‘डॉक्टर साहब’ कहते हैं. वैसे भी यहां आरएलडी की ठीक-ठाक पकड़ है. जयंत चौधरी यहां से सांसद रहे हैं.

Pradeep mathur

बीजेपी ने अपने राष्ट्रीय सचिव, प्रवक्ता और अमित शाह के खास श्रीकांत शर्मा को चुनाव मैदान में उतारा है. दिल्ली में उनकी उम्मीदवारी का ऐलान करते हुए जेपी नड्डा ने उन्हें ‘सबका प्रिय’ बताया था. महेश शर्मा के बाद पश्चिम यूपी में एक बड़ा ब्राह्मण चेहरा स्थापित करने की यह बीजेपी की दूसरी कोशिश है. लेकिन उनकी मुश्किल ये है कि बहुत सारे लोग उन्हें खुलेआम ‘बाहरी’ बता रहे हैं. श्रीकांत शर्मा गोवर्धन में पैदा हुए, मथुरा के डीएवी कॉलेज से स्कूल की पढ़ाई की और फिर दिल्ली यूनिवर्सिटी चले गए. वहीं एबीवीपी की राजनीति की और तब से दिल्ली में ही ‘सेटल्ड’ हैं. इसलिए जो बीजेपी के प्रतिबद्ध वोटर नहीं हैं, वो उन्हें लेकर संशय में हैं.

गोविंदगंज मंडी में एक शख्स ने कहा कि श्रीकांत शर्मा को लड़ाना ही था तो गोवर्धन सीट से लड़ाना था. एक पान वाले ने वो बात बताई, जो दिल्ली में भी सुनी जाती है. कि श्रीकांत शर्मा 2014 में मथुरा से लोकसभा का टिकट मांग रहे थे, लेकिन हेमा मालिनी उनका टिकट काट ले गई थीं. इसलिए ये उन विरली विधानसभाओं में है, जहां भाजपा उम्मीदवार के बैनरों पर स्थानीय भाजपा सांसद की फोटो नहीं दिखती है. श्रीकांत शर्मा के बैनरों पर नरेंद्र मोदी और अमित शाह की बड़ी बड़ी तस्वीरें हैं और तीन छोटी तस्वीरें, अटल, राजनाथ और केशव प्रसाद मौर्य की हैं. जाहिर है, वो ऊपर से टिकट लेकर आए हैं. ऊपर ही रिपोर्ट करते हैं.

Shri Kant Sharma

श्रीकांत शर्मा को टिकट मिलने से देवेंद्र कुमार शर्मा का टिकट कटा है, जो पिछली बार शानदार चुनाव लड़े थे और सिर्फ 501 वोटों से रह गए थे. दिल्ली से आए इस ताप को बीजेपी के कुछ कार्यकर्ता भी महसूस कर रहे हैं.

यहां से बीएसपी ने अपने लोकल ‘चाय वाले’ यानी योगेश द्विवेदी को उम्मीदवार बनाया है. 1995 में वो एक बीएसपी समर्थक के होटल में वेटर थे. उसी साल कांशीराम और मायावती यहां आए तो योगेश ने उन्हें चाय-नाश्ता कराया था. बाद में उनकी मां बीएसपी में शामिल हुईं और चुनाव लड़ीं. फिर योगेश ने विरासत संभाली. वो यहां से लोकसभा चुनाव भी लड़ चुके हैं. पिछले विधानसभा चुनाव में भी उन्हें 15 परसेंट वोट मिले थे. अपने हिस्से के वोट वो इस बार भी ले जाएंगे.

Yogesh Dwivedi BSP

मथुरा की गोविंदगंज मंडी में हर पार्टी के समर्थक मिले. वृंदावन के मशहूर प्रेम मंदिर के सामने के दुकान वालों ने प्रदीप माथुर और श्रीकांत शर्मा में ही मुख्य मुकाबला बताया. लेकिन मथुरा से पीटीआई भाषा के पत्रकार विजय आर्य ‘विद्यार्थी’ डॉक्टर साहब (अशोक अग्रवाल) के असर को अहम मानते हैं. उनके मुताबिक, वो सबके वोट में सेंध लगा रहे हैं और हो सकता है कि कांग्रेस का मुस्लिम वोट भी उनके पास चला जाए. अशोक अग्रवाल चाइल्ड स्पेशलिस्ट हैं. 2012 में उन्हें पहले बसपा का टिकट मिला था, लेकिन ऐन मौके पर टिकट काट दिया गया. फिर उन्हें तुरंत ही सपा से टिकट मिल गया और वे शानदार चुनाव लड़े. इस बार उनकी उम्मीदवारी गठबंधन की भेंट चढ़ गई. इसलिए इस बार उनके लिए क्षेत्र में एक किस्म की सहानुभूति हो गई है. बताया गया कि बहुत सारे सपा कार्यकर्ता उनके साथ लगे हैं..

नोटबंदी से यहां मथुरा के व्यापारियों को नुकसान तो हुआ है, लेकिन बाजारों में इस पर मिला-जुला रुझान ही मिला. कुछ इस फैसले के पीछे के साहस पर मुग्ध दिखे, कुछ ने बताया कि उनकी आमदनी कैसे घट गई थी. मंडी में फूल वाले गुप्ता जी हाथ पकड़कर ले गए और कहने लगे कि देखिए उन दिनों मैं पच्चीसों टोकरी फूल कूड़े में फेंकता था. वैश्य वोट बीजेपी का पारंपरिक वोट है, लेकिन इस बार वह थोड़ा बहुत कटकर अशोक अग्रवाल को जा सकता है. उन्हें मथुरा के 25-30 हजार जाट वोट भी ‘हैंडपंप’ के नाम पर मिल सकते हैं.

सुनिए क्या कहते हैं मथुरा के लोग

विद्यार्थी कहते हैं कि श्रीकांत शर्मा के रूप में बीजेपी ने एक निर्विवाद चेहरा ढूंढा था, वो दिल्ली में ऊंचे पदाधिकारी भी हैं, लेकिन उनके ‘बाहरी’ होने का भाव वाकई यहां पर बना हुआ है. वैसे भी विधायकों से लोग कॉरपोरेटर जैसी अपेक्षा रखते हैं; कि वह नाली-सड़क-खड़ंजे का काम करवा दे, कभी पुलिस थाने की कोई बात हो जाए तो विधायक को फोन करें तो वो आ जाए. ये बात श्रीकांत के खिलाफ जाती है, क्योंकि उनका मथुरा के लोगों से वैसा राब्ता नहीं रहा. विश्राम घाट पर एक चतुर्वेदी साहब ने कहा, ‘वो तो जीत के दिल्ली चले जाएंगे तो हम उन्हें कैसे बुलाते फिरेंगे.’

प्रदीप माथुर की भी पार्टी में जैसे जैसे जिम्मेदारियां बढ़ीं, जनता से उनका फासला थोड़ा सा बढ़ गया. अब वो बड़े नेता हैं और अशोक अग्रवाल गली-गली में पहुंच रहे हैं. श्रीकांत शर्मा का प्रचार भी धांसू हैं. बीजेपी के बड़े-बड़े होर्डिंग हर जगह नजर आते हैं.

यहां आश्रमों में करीब तीन हजार विधवाएं रहती हैं. लेकिन इजाजत का हवाला देकर आश्रम में दाखिल नहीं होने दिया गया. बाहर जो ‘विधवा माताएं’ मिलीं उन्होंने कहा, ‘तुम तो फोटो खींचकर पैसे बना लोगे. हमें क्या दोगे.’ उनसे दिक्कतें पूछीं, पेंशन का हाल पूछा तो जवाब मिला, हमें खूब बढ़िया पेंशन मिल रही है. एक ने मजाक में कहा, ‘हमें महीने में 50 हजार मिलते हैं’ और सब खिलखिला पड़ीं. उनसे कई बार पूछा और हर बार जवाब मिला कि वे सभी खुश हैं. जिंदगी में उनके हिस्से खूब दुख आया है, लेकिन सरकारी योजनाओं और करीब 4 हजार महीने की पेंशन से उनमें मज़ाक करने का माद्दा भी आया है. इसका भी नोटिस लेना चाहिए.

Vidhwa ashram

होली गेट पर ही इंदिरा गांधी की तस्वीर रखकर जूतों की सिलाई का काम करते चाचा-भतीजा मिले. किशन मौर्या और दीपक मौर्या. कहने लगे कि हमारे पिताजी इंदिरा के फैन थे, इसलिए हम भी हैं. मर जाएंगे पर वोट कांग्रेस को देंगे. मोटा-मोटी यहां कांग्रेस और बीजेपी के बीच मुख्य मुकाबला माना जा रहा है, लेकिन कुछ समीकरणों ने इसे आंशिक तौर पर तीन-तरफा बना दिया है.

chacha bhateeja indira gandhi fan

सियासत देखिए कैसे उलझाती है. एक वोटर मिला जिसे अखिलेश यादव पसंद है, जिसे पिछली बार सपा कैंडिडेट रहे डॉक्टर अशोक अग्रवाल भी पसंद हैं. लेकिन समीकरणों के लिहाज से उसे वोट प्रदीप माथुर को देना पड़ रहा है. उसने कहा कि दिल डॉक्टर साहब के साथ है, पर दिमाग माथुर के साथ जाने को कहता है. मथुरा में माहौल अभी बनना शुरू हुआ है. सबकी प्रचार गाड़ियां घूम रही हैं. चुनाव आते आते तक ‘इमोशंस’ हावी हो सकते हैं.

खुद सुनिए मथुरा को


 

हम ला रहे हैं चुनाव की चौचक कवरेज ‘द लल्लनटॉप शो’ के साथ

चुनावी किस्से भी सुन लीजिये

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