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'ददुआ के बेटे बीर पटेल को कोई हरा दे तो मैं अपना जियो सिम तोड़कर फ़ेंक दूंगा'

चित्रकूट के दो परिचय हैं.

एक. अयोध्या के बाद ये यूपी की दूसरी रामनगरी है.
दो. ये ‘बुंदेलखंड के वीरप्पन’, नामी डकैत ददुआ की धरती है.

यूपी में बीजेपी की राजनीति ‘रामभरोसे’ रही. बाबरी का विवादित ढांचा गिरा और उन्हें सत्ता मिल गई. लेकिन फिर गिरे तो गिरते ही गए. इस बार मोदी और सत्ता परिवर्तन के नाम पर बीजेपी मुख्य मुकाबले में है.

आज भी चुनावी मौकों पर उत्साही नेताओं से लेकर अमित शाह तक, राम मंदिर का जिक्र कर देते हैं. राम आस्था के प्रतीक हैं, लेकिन प्रदेश की दूसरी राम नगरी केंद्र और प्रदेश दोनों की जबरदस्त उपेक्षा की शिकार है.

वो बुंदेलखंड का चित्रकूट ही था, जहां मान्यता है कि भगवान राम ने अपने वनवास के 11.5 साल बिताए थे. ये बुंदेलखंड का चित्रकूट ही है जो मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बीच वास्तविक विकास के लिए पिस रहा है.

चित्रकूट दो हिस्सों में है. एमपी वाला चित्रकूट सतना जिले में है. यूपी वाले को 1997 में जिला बना दिया गया, जिसका मुख्यालय ‘करवी’ है. पहले विधानसभा का नाम भी करवी था. 2012 से पहले हुए परिसीमन में इसका नाम भी चित्रकूट कर दिया गया. ये बांदा लोकसभा लगती है, जहां से बीजेपी के भैरों प्रसाद मिश्रा सांसद है. ये चित्रकूट विधानसभा है, जहां से ददुआ के बेटे बीर कुमार पटेल सपा विधायक हैं.

राम घाट
राम घाट

चित्रकूट का सबसे मशहूर घाट है- राम घाट. यहां फेसबुक लाइव के दौरान बीर पटेल के परिचय में उनके पिता का जिक्र किया तो पुष्पेंद्र सिंह नाराज हो गए. पुष्पेंद्र पिछले चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी थे. इस बार गठबंधन में उनका टिकट कट गया, पर पार्टी के फैसले पर निष्ठा बनी हुई है, इसलिए बीर पटेल को खुलकर डिफेंड करते हैं. उन्होंने कहा, ‘किसी का बेटा होना अपराध नहीं है. इस धरती का परिचय ऐसे मत दीजिए. ये मां अनुसुइया की धरती है. मां मंदाकिनी की धरती है.’

राम घाट पर गंदगी
राम घाट पर गंदगी

लेकिन मंदाकिनी की हालत बुरी है. राम घाट पर इस नदी के एक तरफ यूपी है और दूसरी तरफ एमपी. नदी में गंदगी ही गंदगी दिखी. पहले लगा कि ये पूजा के फूल होंगे. लेकिन फिर नाविक 50 कदम दूर ले गए जहां सीवर लाइन का पानी मंदाकिनी में मिलता है. वहां पानी पर कीड़े रेंग रहे थे, भयंकर बदबू थी. उन्होंने कहा कि उधर लोग मंदाकिनी के जल से आचमन करते हैं और 50 मीटर दूर हालत देखिए. एक नौजवान नाविक ने पुष्पेंद्र के सामने कहा कि बताइए विधायक जी ने क्या काम करवाया है. साफ तो करवा नहीं पाए, चले हैं मां मंदाकिनी कहने.

राम घाट पर गंदगी
राम घाट पर गंदगी

बीर पटेल ही थे, जो नामांकन के समय ‘MLA’ का फुल फॉर्म नहीं बता पाए थे और अखबारों ने चटखारे लेकर ये खबर छापी थी. लेकिन फिर भी ऐसा नहीं है कि उन्हें वोट की कमी है. चित्रकूट शहर में अकबर खान ने कहा, ‘बीर पटेल ने काम नहीं किया, लेकिन उनको वोट अखिलेश और उनकी जाति के नाम पर मिलेगा.’

‘ददुआ के नाम पर वोट नहीं मिलेगा?’
‘अब उनके नाम पर कोई वोट नहीं पड़ता.’

जहां ददुआ के किस्से सुने.
जहां ददुआ के किस्से सुने.

जितने भी लोगों से बात की, लगा नहीं कि ददुआ कोई चुनावी मुद्दा है. यहां लोग एक वाक्य में उसे बदमाश कहते हैं और दूसरे वाक्य में ये भी कहते हैं कि वो गरीबों को नहीं सताता था और उसने जाने कितने जरूरतमंदों के कन्यादान करवाए. एक समय पड़ोस की 10 से ज्यादा विधानसभाओं पर उसका असर था. किसी भी नुक्कड़ पर खड़े हो जाइए तो लोग बता देते हैं कि मायावती ने लंबे समय तक ददुआ के असर का इस्तेमाल किया और उसे संरक्षण भी दिया. लेकिन बाद में बेटे की सियासत चमकाने के लिए उसने पार्टी बदल ली. सपा की मदद से ददुआ का बेटा बीर कुमार पटेल जिला पंचायत सदस्य बन गया. उनके पैतृक गांव देवकली में ऐसी दावत दी गई कि लोग आज तक मिसाल देते हैं. इतनी पूड़ी छनी थी कि उन्हें 8 ट्रैक्टर ट्रॉली में रखा गया था. हर गांव के लिए अलग भोजन पंडाल लगा था. बड़े बड़े नेता पहुंचे थे.

ददुआ के किस्से गांव वालों की ज़ुबानी

लेकिन फिर ददुआ की बसपा नेता दद्दू प्रसाद से अनबन हो गई. ददुआ जब हाथी के साथ था तो उसके असर के बूते दद्दू प्रसाद चुनाव जीतते थे. लेकिन ददुआ ने कभी किसी बड़े नेता को सेंटा नहीं. यहां के एक पुराने पत्रकार का दावा है कि असल बात ये थी कि ददुआ ने दद्दू प्रसाद को जूते से मारा था, जिसकी शिकायत उन्होंने मुख्यमंत्री मायावती से कर दी थी. दद्दू प्रसाद उन दिनों मायावती के खास थे और वो वैसे भी ददुआ के पार्टी बदलने से नाराज थीं. बताते हैं कि इसके बाद मायावती ने पुलिस बल को खुली छूट दी और ददुआ को मार गिराया गया.

बहुत सारे लोग उसके एनकाउंटर में मारे जाने पर सवाल करते हैं. कोई बताता है कि बारूद बिछाया गया था. कोई कहता है कि टिफिन में बम भिजवाकर उसे मरवाया गया था.

लेकिन ददुआ की मौत के बाद उनके परिवार का राजनीति में पूरी तरह प्रवेश हो गया. उनके भाई बाल कुमार पटेल 2009 में मिर्जापुर से सपा सांसद बने. 2012 में ददुआ पुत्र बीर पटेल चित्रकूट से विधायक हो गए.

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राजनीतिक-सामाजिक नजरिये से चित्रकूट में ब्राह्मणों और कुर्मियों में छत्तीस का आंकड़ा रहा है. बीजेपी ने यहां से एक बार फिर चंद्रिका प्रसाद उपाध्याय को टिकट दिया है, जो मुरली मनोहर जोशी के ओएसडी रहे हैं. लेकिन बीजेपी की मुश्किल ये है कि बसपा ने भी ब्राह्मण कैंडिडेट उतार दिया है. जगदीश प्रसाद गौतम दलित वोट तो लेंगे ही, ब्राह्मण वोट भी काट सकते हैं. गौतम लोकसभा चुनाव में बसपा के बांदा प्रभारी थे और ये उनका पहला विधानसभा चुनाव है. रियल एस्टेट का काम करते हैं, इसलिए पैसे की कमी नहीं है.

एक पत्रकार ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, ‘कहते हैं कि जगदीश गौतम ने पिछले चुनाव में लखनऊ में ‘प्रसाद’ चढ़ाया था, इसलिए दो साल पहले ही इनका टिकट फाइनल हो गया था. तब से ये लोगों से मिलते जुलते रहते हैं.’ इस सीट पर 65 हजार दलित वोट भी हैं. यहां कुछ स्तरों पर दलित-कुर्मी गठजोड़ भी रहा है, लेकिन अब वह कितना प्रभावी है, इस बारे में पुख्ता तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता.

नोटबंदी से भाजपा का वोटर टूटा है, ऐसा चित्रकूट जैसे छोटे बाजारों में आकर पता लगता है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में नोटबंदी के समर्थक कई व्यापारी मिले थे. लेकिन चित्रकूट में कई छिटपुट कारोबारियों ने बेहिचक कहा कि वो नोटबंदी से नाराज हैं. कैमरा लिए बिना गया तो वैश्य दुकानदारों में भी नाराजगी दिखी. एक गुप्ता जी मिले जो आगरा और कानपुर से जूते लाकर यहां बेचते हैं. उन्होंने कहा कि वो बीजेपी को वोट करते रहे हैं पर नोटबंदी के समय आमदनी आधी हो गई थी. अभी हाल कुछ ठीक है. मैंने पूछा कि सब व्यापारी तो नाराज नहीं है तो कहने लगे, ‘ज्यादातर नाराज हैं. लेकिन वे लोग बीजेपी से अपनी बनी बनाई तोड़ना नहीं चाहते. ताकि कोई भी जीते तो अपने काम न रुकें. इसलिए सामने हाथ जोड़ते हैं लेकिन पीछे गाली देते हैं.’

‘तो वो सपा के साथ हैं या बसपा के?’
‘कुछ कहा नहीं जा सकता. बीर पटेल अच्छा आदमी नहीं है. बसपा वाला ब्राह्मण है. तो उसकी तरफ भी जा सकते हैं.’

यहां के एक टीवी पत्रकार का कहना है कि व्यापारी नोटबंदी के बाद हुए कॉम्पिलकेशन से ज्यादा नाराज है. जो सुनार का काम करते थे, उन्हें कैश लिमिट ने ज्यादा परेशान किया. उनका माल महंगा आता है. 4-5 हजार रुपये से वो क्या माल ला पाते और क्या बेचते.

सिलाई का काम करने वाले अकबर खान ने ही बताया कि वो जहां रहते हैं वहां हिंदू-मुसलमानों की बराबर संख्या है. उनका कहना है, ‘मुसलमान बसपा में भी जा रहा है, लेकिन सिर्फ सौ में से दस. बाकी बीर पटेल के साथ है. अच्छा तो ये हो कि अखिलेश यादव यहां से बेहतर कैंडिडेट उतारें.

लोग मानते हैं कि जिसका भी मुकाबला होना है, ददुआ पुत्र से ही होना है. बसपा वाले गौतम राजनीति में नए हैं. लेकिन बीजेपी वाले उपाध्याय जी जोशी जी के साथ रहे हैं तो चुनाव लड़ना और जोड़-तोड़ बैठाना जानते हैं.

इस इलाके में प्रभावशालियों का मुख्य रोजगार वही है, जो ददुआ विरासत में छोड़ गया है- सरकारी धन की लूट. इसलिए कुकुरमुत्तों की तरह ठेकेदार उगे हुए हैं. छोटे-मोटे डकैतों का गैंग अब भी सक्रिय है जो कमिशन मांगता है. कोई बड़ा उद्योग यहां है नहीं. अमावस्या के मेले में यहां भारी भीड़ आती है, तभी थोड़ा बहुत रोजगार पैदा होता है. लोगों ने बताया कि मेले में लाखों आदमी आते हैं, लेकिन सिंगल रेलवे लाइन है. ट्रेनों की छत पर सवार होकर लोग राम नगरी पहुंचते हैं. वीडियो यूट्यूब पर मिल जाएंगे.

गुजरात के कुछ ठेकेदार यहां से थोड़ी बहुत संख्या में मजदूरों को ले जाते हैं. इसलिए गुजरात फैक्टर भी है. 2014 के लोकसभा चुनावों के समय गुजरात के विकास का खूब प्रचार किया गया था, लेकिन 2017 में चित्रकूट में लोग गुजरात की बात करते मिले.

ददुआ का गांव देवकली.
ददुआ का गांव देवकली.

ददुआ के गांव भी जाना हुआ. गांव देवकली में घुसते ही एक इंटर कॉलेज है. कच्चे मकान बड़ी संख्या में है. पथरीली जमीन होने से गर्मी बहुत रहती है. फरवरी भी अप्रैल जैसा लगा. लोगों ने बताया कि गर्मी में तापमान 50 डिग्री तक पहुंच जाता है. यहां लोग ददुआ, उसके भाई बाल कुमार पटेल और बेटे बीर पटेल पर गर्व करते हैं.

नाथू सिंह
नत्थू सिंह

गांव के नत्थू सिंह ने कहा कि यहां सब लोग बीर पटेल को ही वोट देंगे, लेकिन वो राजनीतिक आदमी है. बाप वाली बात उसमें नहीं है.

वीर सिंह का नया घर.
बीर सिंह का नया घर.

बीर पटेल चित्रकूट शहर में अपना बड़ा मकान बना रहे हैं. लेकिन हमने वो खंडहर भी देखा जहां ददुआ का पैतृक घर था. लोगों ने बताया कि जब वो गांव में होता था तो जरा सी धूल उड़ती देखकर भाग जाता था. उसे लगता था कि कहीं पुलिस न आ रही हो.

ददुआ का घर, जो हो चुका है खंडहर
ददुआ का घर, जो हो चुका है खंडहर. (सभी फोटो : अमितेश )

इस सीट के समीकरणों पर अंडरलाइन करने वाली बात 21 साल के एक लड़के ने कही. ग्रेजुएशन कर रहे अरविंद पटेल ने कहा, ‘बीर पटेल ने विकास नहीं करवाया है, फिर भी उसको हराना फिलहाल मुश्किल है. कोई और जीत जाए तो मैं अपनी जियो सिम तोड़कर फेंक दूं.’


द लल्लनटॉप की चौचक कवरेज


 

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