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एग्जिट पोल से भी पहले ये रिपोर्ट बताएगी यूपी में किसकी सरकार बनने वाली है

यूपी में कौन जीत रहा है, किसकी सरकार बन रही है? ये सवाल पूछे नहीं जा रहे, बल्कि जगह-जगह ऐसे बिखरे पड़े हैं, जैसे यूपी में बिजली के तार. आप चाय की दुकान पर चले जाइए या फिर सोशल मीडिया पर. सवाल ऐसे पीछा करेगा, जैसे आप विक्रम हो और सवाल ‘बेताल’. बस किसी तरह पुख्ता हो जाए कि आखिर कौन यूपी का सीएम बनने वाला है. चलिए हम आपको बताए देते हैं कि यूपी में किसकी सत्ता आने वाली है! एग्जिट पोल से पहले ये जानकारी हाथ लग गई है.

ये जानकारी इसलिए भी अहम है कि जब आप चाय, पान की दुकान या किसी अपने से राजनीति को लेकर दावे पेश करें तो जीत आपकी ही हो. एग्जिट पोल, एग्जिट पोल चिल्लाया जाएगा. वो बताएंगे कि किसकी सरकार बन रही है. यूपी में एग्जिट पोल हो या फिर बिजली के पोल सब उलझे हुए हैं. एग्जिट पोल से मुझे भी कुछ याद आ गया. मैं भी दो बार एग्जिट पोल के लिए सैंपल जुटा चुका हूं.

मेडिकल स्टोर पर चुनावी अड्डेबाजी
गाजीपुर में मेडिकल स्टोर पर चुनावी अड्डेबाजी

साल 2012 था. यूपी में विधानसभा चुनाव नज़दीक थे. एक प्राइवेट कंपनी की तरफ से यूपी इलेक्शन के लिए सर्वे करने निकले. वही सर्वे, जिसके आंकड़ों को आपकी आंखों पर बांधकर दिखाया जाता है कि किसकी सरकार आ रही है. कौन सीएम की कुर्सी पर बैठेगा. और फिर जब रिजल्ट आता है, तो सर्वे धड़ाम से मुंह के बल गिर जाते हैं. पट्टी खुल जाती है. जैसे दिल्ली विधानसभा चुनाव के रिजल्ट में हुआ, जैसे बिहार विधानसभा चुनाव में हुआ. और जैसे 2014 के लोकसभा चुनाव में हुआ. बार-बार होने वाले इन सर्वों की हालत पतली होती है, मगर ये हर बार टीवी स्क्रीन और अखबारों की सुर्खियां बनते हैं और सबके दावे अलग-अलग. और ऐसे दावे कि खुदाई बस में हो, तो शपथग्रहण समारोह भी यही करा दें.

तो हां, मुझे टीम लीडर बनाकर भेजा गया था. दो ज़िलों से सैंपल लेने थे और 7 लोगों की टीम वहीं से पैसों पर हायर करनी थी. सैंपल मतलब एक फॉर्म था, जिसमें 15-20 सवाल थे. ‘सड़क बनी या नहीं’, ‘राशन मिलता है या नहीं’, ‘कोई सरकारी योजना का लाभ हुआ या नहीं’, ‘किसे मुख्यमंत्री देखना चाहते हैं’ आदि आदि. इन सवालों को पूछने का मकसद ये जानना होता था कि वो किस नेता की तारीफ कर रहा है और इस बार किसे वोट देने वाला है. क्योंकि सीधे-सीधे पूछ लिया कि किसे वोट दोगे, तो सामने वाला लड़ मरेगा. ‘क्यों बता दें? ये हमारा अधिकार है. किसी को भी दें.’ काश यही अधिकार मतदाता को उस वक़्त भी याद आ जाया करे, जब वो जाति के नाम पर मोहर लगा देता है.

survey

एक विधानसभा इलाके से 500 फॉर्म भरवाने थे. टाइम था दो दिन का. 7 लोगों की टीम एक दिन में 250 फॉर्म भरती थी, लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ कि 250 फॉर्म भरे जाएं और वो भी इलाके में घूमकर. एक-दो इलाकों में घूमे और उसी हिसाब से भरवा दिया फॉर्म. लगा दिया कि यहां मुलायम सिंह को लोग चाहते हैं, वहां मायावती को और न जाने कहां बीजेपी को. भर गए सैंपल.

ये होती है इन एग्जिट पोल्स की हकीकत. इस बार फिर ये सैंपल एग्जिट पोल की शक्ल में आपके सामने होंगे. विश्वास दिलाया जा रहा होगा कि ये सरकार आ रही है. उनका पता नहीं, लेकिन हमारी ये रिपोर्ट एकदम सच्ची है. आप पूरे दावे के साथ कह सकते हैं किसकी सरकार आ रही है.  पढ़िए :


1. तो बात ऐसी है कि ‘काम बोलता है’. ये फॉर्मूला जिस तेजी के साथ प्रचारित किया गया है, उसी हिसाब से अगर ये हिट हो गया, तो समाजवादी पार्टी बढ़त बना ले जाएगी और अकेले ही इतनी सीट ले आएगी कि अगर कांग्रेस दामन छोड़ भी दे, तो सरकार पर कोई आंच न आए.

2. यूपी में समाजवादी पार्टी का कांग्रेस से गठबंधन फायदा देगा, क्योंकि मुसलमानों के लिए अब ये बेहतर ऑप्शन है. इससे पहले मुसलमान ऊहापोह था कि वो कांग्रेस के साथ जाए, बसपा के साथ जाए या फिर सपा के साथ. अब कट टू कट बात है कि कांग्रेस-समाजवादी पार्टी साथ हैं तो बीजेपी को यही गठबंधन टक्कर दे सकता है. इसलिए इस बार मायावती को नहीं, गठबंधन को वोट दें. ये सोच गठबंधन को सत्ता के कालीन तक ले जा सकती है.

3. 2014 में नरेंद्र मोदी की लहर चली. दलित वोट बीजेपी में शिफ्ट हो गया. ऐसा विश्लेषकों ने कहा था. अगर यूपी का नतीजा पिछली बार जैसा रहा, तो यही बात एक बार फिर दोहराई जाएगी. पीएम मोदी धड़ाधड़ रैलियां कर रहे हैं. अगर पीएम मोदी का जादू चला, तो बीजेपी सत्ता में पूर्ण बहुमत से आ जाएगी.

मऊ में बीजेपी समर्थक
मऊ में बीजेपी समर्थक

4. नोटबंदी को लेकर खूब हो-हल्ला हुआ. यूपी के लड़के बार-बार जनता को याद दिला रहे हैं कि पीएम मोदी ने आप को कतारों में खड़ा कर दिया. लोगों की मौतें हुईं. काम-धंधे बंद हुए. अगर लोगों के दिमाग में ये बात घर कर गई, तो बीजेपी धराशायी हो जाएगी.

5. बसपा को लोग कम आंक रहे हैं. ये गलती कर रहे हैं. मायावती बार-बार दंगों को याद दिलाती रही हैं. बीजेपी का खौफ दिखाती रही हैं. ऐसे में मुसलमानों के वोट बंट सकते हैं. और मुसलमानों के वोट बंटे, तो ये तय है भैया कि आंधी बीजेपी की चल जाएगी और वो सत्ता पर काबिज हो जाएगी.

6. दलित वोट तो बसपा के साथ हैं ही. अगर मुसलमान वोट भी बसपा को मिले, तो बसपा को सत्ता में आने से कोई नहीं रोक सकता. चाहे काम कितना भी बोलता हो. सरकार तो वोटों से ही बनती है.

आजमगढ़ के बीजेपी समर्थक
बसपा समर्थक

7. अगर मुसलमान वोट समाजवादी पार्टी को मिले और दलित वोट बीजेपी में शिफ्ट हो जाए, तो फिर कोई ताकत बसपा का सूपड़ा साफ़ होने से नहीं रोक सकती. 2014 याद आ जाएगा.

8. जैसा कि सातवें समीकरण में बताया कि अगर मुसलमानों के वोट समाजवादी पार्टी को मिले और कांग्रेस के वोट भी उसी को ट्रांसफर हो गए, तो अखिलेश भैया इस बार भी सरकार बना लेंगे.

रायबरेली की एक तस्वीर
रायबरेली की एक तस्वीर

9. ठहरिए. इतनी जल्दी में काहे हैं. मान लीजिए अगर कांग्रेस के वोट समाजवादी पार्टी को ट्रांसफर नहीं हुए, अखिलेश को पूरे यादव वोट नहीं मिले, बीएसपी ने वेस्ट यूपी में बढ़त बना ली, पूर्व यूपी में बीजेपी ने खूंटा गाढ़ दिया, तो फिर क्या? फिर होना क्या है किसी को बहुमत नहीं मिलेगा.

10. जब किसी को बहुमत नहीं मिलेगा, तो सरकार किसकी बनेगी?

धत्त तेरे की! सवाल घूम-फिरकर, फिर वहीं आ गया. मतलब जहां से चले थे, वहीं आ गए. ऐसा ही यूपी में सरकार बन जाने पर होता है. चाहे किसी की भी सरकार बन जाए, मगर विकास वहीं का वहीं. यही वजह है कि हर बार जाति के नाम पर वोट पड़ जाता है. फिर पांच साल तक पूछते हैं, ‘भैया, करप्शन क्यों ख़त्म नहीं होता?’

ओहो, मैं भी एकदम से भावना में बह गया. ये बात तो हर बार कही जाती है. बस लोगों के समझ नहीं आती वो बात अलग है. खैर, मैं बात कर रहा था कि अगर किसी को बहुमत नहीं मिला, तो किसकी सरकार बनेगी? उस स्थिति में होगा ये कि जोड़-तोड़ शुरू हो. जिसे अभी तक हमने अपने समीकरण में शामिल नहीं किया है, वो सत्ता में आने की कोशिश करेंगे.

अजित सिंह (बाएं) और ओवैसी (दाएं)
अजित सिंह (बाएं) और ओवैसी (दाएं)

जैसे एक है राष्ट्रीय लोकदल. वही, जिसके कर्ता-धर्ता अजित सिंह हैं और वेस्टर्न यूपी में जाटों में अपनी पकड़ रखते हैं. वो जो सीटें लाएंगे, उनके साथ या तो बीजेपी में जाएंगे या फिर सपा-कांग्रेस गठबंधन के साथ. यूपी में एक पीस पार्टी भी है. वहीं इस बार चुनाव में AIMIM भी अपनी किस्मत आज़मा रही है. अगर सीट लाते हैं, तो सौदेबाजी में वो भी शामिल होंगे. लेकिन अफवाहें तो ये भी कहती हैं कि बसपा और भाजपा गठबंधन कर लेंगी. मगर अफवाहों पर ध्यान नहीं दिया जाता. भले ही वो कभी-कभार सच्ची भी निकल आती हैं.

अब बात सीटों की हो जाए कि किसकी कितनी सीटें आ रहीं हैं. सपा 300+, कांग्रेस 70+, बसपा 300+ और भाजपा 300+. चौंकिए मत. किसी का एग्जिट पोल सपा को, किसी का बसपा, तो किसी का भाजपा को लीड में दिखाएगा.

अब वही सवाल थोड़ा सा घूम गया, क्योंकि पहले था कौन जीत रहा है, लेकिन आंकड़ों में तो सब जीत रहे हैं, तो हार कौन रहा है?

हार रहे हैं मुसलमान, दलित और हार रही हैं पिछड़ी जातियां, क्योंकि वोट भी तो इनके नाम पर ही मांगे जा रहे हैं. तो हारेंगे भी ये ही. और खबरदार जो किसी ने विकास का नाम लिया. बड़ी मुश्किल से विकास को लोरी सुनाकर सुलाया है. बस भेदभाव नहीं होना चाहिए. एकदम सेकुलर टाइप मामला हो जैसे Diwali में Ali और Ramzan में Ram…

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मऊ की ये तस्वीर, यूपी के राजनीतिक समीकरण समझा रही है.

तो समझ आ गया यूपी में किसकी सरकार बनने वाली है? क्या? नहीं समझ आया! कोई बात नहीं. मेरी भी समझ नहीं आया. क्योंकि इस बार यूपी का वोटर एकदम खामोश है. कुछ नहीं पता ऊंट किस करवट बैठेगा. ऊपर जो फोटो है, वो यूपी की है. इस फोटो में जो इन तारों को सुलझा ले, उसको पता चला जाएगा यूपी में किसकी सरकार आ रही है. क्योंकि यूपी के राजनीतिक समीकरण इस फोटो में ही समाए हैं.

जय जनादेश


साथ में पढ़िए यूपी की विधानसभा सीटों की ग्राउंड रिपोर्ट्स:

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