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अतरौली से ग्राउंड रिपोर्ट: एक परिवार से दिल्लगी तमाम समीकरणों पर भारी है

विधानसभा सीट: अतरौली
जिला: अलीगढ़
रिपोर्टिंग: टीम मोती

प्रत्याशी: संदीप सिंह (बीजेपी)
वीरेश यादव (सपा)
हाजी इलियास चौधरी (बसपा)
मनोज यादव (आरएलडी)

क्या करोगे तुम आखिर, कब्र पर मेरी आकर
थोड़ी देर…टुं टुं टुं टुं… थोड़ी देर…टुं टुं टुं टुं…

संजीव राजा की विधानसभा आ गई तो लाउडस्पीकर की आवाज से गाड़ी में अल्ताफ राजा का स्वर टूट गया. ये अलीगढ़ शहर है, जहां बीजेपी प्रत्याशी राजा का मुकाबला सपा के जफर आलम और बसपा के मोहम्मद आरिफ से है. हैरत है कि चुनाव आयोग की एक लाउडस्पीकर वाली गाड़ी अलीगढ़ में अवधी गाना बजाकर मतदान की अपील कर रही है. जिसके बोल हैं,

‘अपने वोटवा के ताकत अब सब का देखावा भाई
बड़ी है ताकत वोटवा के, ई चूक न करियो भाई’

कहीं पूर्वांचल वाली पेन ड्राइव गलती से इधर तो नहीं आ गई!

खैर!


फ्लैशबैक

साल 1962. अलीगढ़ की अतरौली सीट. 30 साल का लोध समाज का लड़का जनसंघ से चुनाव लड़ता है. हारता है. अगला चुनाव. 1967. इस बार वो कांग्रेस प्रत्याशी को 4 हजार वोटों से हरा देता है. इसके बाद वो यहां से 8 बार विधायक बनता है. दो बार प्रदेश का मुख्यमंत्री बनता है. सियासी सैचुरेशन के बाद ये विरासत उनके बेटे को ट्रांसफर होती है, लेकिन वे संभाल नहीं पाते. फिर बीजेपी से रूठने-मनाने के कई एपिसोड और 2013 में कुछ अधिक टिकाऊ तरीके से बीजेपी में वापसी. वो पूर्व मुख्यमंत्री अब सियासी सैचुरेशन पर है, इसलिए खुद बीजेपी जॉइन नहीं करता, बेटे को करवाता है. वह व्यक्ति अब राजस्थान का राज्यपाल है और उसका नाम कल्याण सिंह है. 1967 को ठीक 40 साल बीत चुके हैं और अब उनका 26 साल का पोता अतरौली से चुनाव लड़ रहा है.


जो काम राजवीर न कर सके, वो संजू कर पाएंगे?

पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के 26 साल के पोते संदीप इस बार अतरौली से भाजपा कैंडिडेट हैं. उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी के खालसा कॉलेज से ग्रेजुएशन किया. फिर इंग्लैंड की लीड्स यूनिवर्सिटी से जन संपर्क (पब्लिक रिलेशंस) पढ़कर आए. जब हम उनके चुनावी दफ्तर पहुंचे तो वह जनसंपर्क पर ही निकले हुए थे.

बीजेपी कार्यालय से फेसबुक लाइव 

यहां जितने लोग बैठे मिले, सब कल्याण मशीनरी के लोग थे. ढूंढने पर भी बीजेपी की पारंपरिक मशीनरी का आदमी नहीं मिला. सबने माना कि जब ‘बाबूजी’ (यहां कल्याण को यही कहा जाता है) ने जन क्रांति पार्टी बनाई थी तो ये सारे लोग भी भाजपा छोड़ गए थे. कल्याण सिंह के बेटे राजवीर को यहां राजू भैया और संदीप को संजू कहा जाता है.

कल्याण सिंह के पोते संदीप सिंह, नातजुर्बेकार होने के बावजूद भी लोगों का भरोसा है इनपर
कल्याण सिंह के पोते संदीप सिंह, नातजुर्बेकार होने के बावजूद भी लोगों का भरोसा है इन पर

एक नौजवान कार्यकर्ता ने बताया कि छुटपन में संजू अपने पिताजी के साथ कभी-कभी आया करते थे, पर राजनीति से उनका सीधा नाता कभी नहीं रहा. पर मोटा-मोटी स्वर वही था कि वे नेता नहीं हैं तो क्या हुआ, नेता हो जाएंगे. परिवारवाद के बारे में दिल्ली में आप चाहे जैसे बात करें, यहां इस पर लोग चहकते हुए सकारात्मक तरीके से बात करते हैं. एक परिवार से दिल लगा हुआ है, जैसा मामला है. ये दिल्लगी तमाम समीकरणों पर भारी है और ‘अपने राजा’ से स्नेह वाले पौराणिक उदाहरणों की याद दिलाता है.

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भारतीय जनता पार्टी का चुनाव कार्यालय

कहीं मैं ही जीत न जाऊं, कहीं मैं ही हार न जाऊं!

अगर आप अतरौली शहर और यहां के कुछ गांव घूम लें तो अंदाजा हो जाता है कि कल्याण-परिवार की यहां कैसी पकड़ है. फिर 2012 में उनकी बहू कैसे हार गईं? एक टीवी चैनल के पत्रकार ने बताया कि पहले इस सीट पर कल्याण सिंह का सजातीय लोधी-राजपूत वोटर काफी तादाद में था, लेकिन 2012 में परिसीमन की वजह से इसका कुछ इलाका बरौली विधानसभा में चला गया. तब कल्याण की बहू जन क्रांति पार्टी से लड़ी थीं तो वैसे भी बीजेपी के पारंपरिक वोट उन्हें नहीं मिले थे. इसलिए सपा के वीरेश यादव जीत गए.

इस सीट पर 65 हजार यादव और 40 हजार मुस्लिम वोट हैं, जिसकी वजह से सपा मुख्य मुकाबले में बनी हुई है. हालांकि इलाके के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि कांग्रेस सपा गठबंधन का वीरेश यादव को फायदा तो हुआ है, लेकिन दूसरा पहलू भी है. कांग्रेस का मुस्लिम वोट वीरेश यादव को मिलेगा, लेकिन कांग्रेस का हिंदू, खास तौर से सवर्ण वोट अब बीजेपी के पास जा सकता है. एक पत्रकार का कहना था कि जहां गठबंधन की वजह से कांग्रेस कैंडिडेट का टिकट कटा है, वहां वो सपा कैंडिडेट को हराने में भी लगे हैं. बल्कि अलीगढ़ की कुछ सीटों पर ऐसी स्थिति है कि हर प्रत्याशी ये सोचेगा कि कहीं मैं ही जीत न जाऊं, और कहीं मैं ही हार न जाऊं.

ये बातें सुनने पढ़ने में अच्छी हैं, लेकिन संदीप सिंह अगर चुनाव नहीं जीतते तो चौंकाने वाली बात होगी. परिसीमन के बाद भी यहां 60 हजार लोधी-राजपूत वोट हैं और संदीप के कार्यालय सचिव ‘पंडित जी’ 25 हजार वोटों से जीत दर्ज करने का दावा करते हैं. लोधी राजपूत वोट को यहां शॉर्ट में ‘एलआर वोट’ कहते हैं. इलाके के पत्रकारों और नुक्कड़ों पर पौधों की तरह उगे हुए चुनाव विश्लेषक इसी टर्म का इस्तेमाल करते हैं.

क्या चुनाव लड़ने में कल्याण सिंह का मार्गदर्शन मिलता है, पूछा तो ‘पंडित जी’ बोले, ‘उनसे फोन पर बात होती है, लेकिन राजनीति की बात नहीं होती. स्वास्थ्य वगैरह की बात होती है. वो अब संवैधानिक पद पर हैं.

कल्याण सिंह एक्टिव हैं?

लेकिन कल्याण सिंह राज्यपाल होते हुए भी टिकट बांटने और कटवाने में खूब एक्टिव हैं, ऐसा बुलंदशहर के गुड्डू पंडित भी कहते हैं और अलीगढ़ में ब्राह्मणों के नेता राजेश भारद्वाज भी. उनका दावा है कि अतरौली का ब्राह्मण कल्याण सिंह से नाराज है क्योंकि वे अब भी यहां दखलअंदाजी कर रहे हैं. उन्होंने फोन पर बताया, ‘कल्याण सिंह ने मुझ पर झूठा केस करवाया और कोल विधानसभा से मेरा जमा-जमाया टिकट कटवा दिया. इसलिए ब्राह्मण उनसे नाराज हैं.’ राजेश इसे ब्राह्मणों का स्वत: स्फूर्त गुस्सा बताते हैं, पर ज़ाहिर है कि वह खुद ही संदीप के खिलाफ ब्राह्मणों को एकजुट कर रहे हैं. उनसे पूछा कि इस नाराज वोट को किधर ले जा रहे हैं तो बोले कि सपा के अलावा विकल्प नहीं है, क्योंकि हराने की स्थिति में वही हैं. यहां से ब्राह्मण वोट 40 हजार हैं, पर भितरघात इतनी मजबूत नहीं दिखती कि ज्यादा असर पड़े.

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ब्राह्मण नेता राजेश भारद्वाज

दो उम्मीदवार और हैं, जो कुछ वोट तो लेंगे ही. बसपा से हाजी इलियास चौधरी, जिन पर मुंबई में कई क्रिमिनल केस हैं. उनकी छवि मुसलमानों में भी अच्छी नहीं है और ‘हिंदू इंस्टिंक्ट’ वाला वोटर तो उनसे नफरत करता है. फिर भी ‘बहन जी वाले वोट’ तो उनको मिलेंगे ही. अजित सिंह की पार्टी आरएलडी से मनोज यादव खड़े हैं, जो सपा के वीरेश यादव के सगे बहनोई हैं. हम भारतीय कई तरीके से रिश्तेदारियों का इस्तेमाल जानते हैं. मनोज यादव अपनी पार्टी के बूते 30 हजार जाट वोटों में सेंध लगाएंगे और ‘जीजा जी’ का काम आसान करेंगे, ऐसा लाल टोपी वाले सुधीजनों का उद्देश्य है.

भैंसों की चोरी, मीट एक्सपोर्ट और बेरोजगारी

अतरौली में रेलवे स्टेशन पुराना मुद्दा है. लेकिन इस वक्त लोग सपा के शासन में गुंडाराज और बढ़ते अपराध पर खूब बात करते हैं. रामघाट रोड पर पिलखुनी गांव में रुकना हुआ. वहां जो मिला उसने भैंसों के चोरी होने की कहानियां बताईं. ये रामपुर की भैंसे नहीं थीं, इसलिए खबरों में नहीं रहीं. लेकिन ये मसला सुनने में जितना मामूली लगता है, उतना है नहीं. अलीगढ़ मीट एक्सपोर्ट के लिए जाना जाता है और इलाके में बेरोजगारी इस कदर है कि भैंस चुराने वाले गिरोह बन गए हैं. वे उन्हें टेम्पो में चुराकर ले जाते हैं और फिर मांस व्यापारियों को रातोंरात बेच देते हैं. सुबह होने तक उनकी हड्डियां बूचड़खाने में पड़ी होती हैं.

पिलखुनी से फेसबुक लाइव 

लोध बहुल पिलखुनी गांव में दो लोगों की बातें अंडरलाइन करने वाली रहीं. एक महिला ने कहा कि हमें प्रधानजी से सारे काम करवाने होते हैं. वो जहां कहेंगे, हम वोट दबा देंगे. नौजवान रोशनलाल ने कहा, ‘कल्याण सिंह हमारे लोधा में से हैं. वो यहां से एक लकड़ी भी खड़ी कर दें तो वो भी चुनाव जीत जाएगी.’

देखिये चुटीला अंदाज़ हास्यकवि का


विधानसभा सीट: बरौली

उम्मीदवार: ठाकुर जयवीर सिंह (बसपा)
चौधरी दलवीर सिंह (बीजेपी)
केशव सिंह बघेल (कांग्रेस)

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गली गली लल्लनटॉप

पड़ोस की सीट बरौली विधानसभा में भी दो दिग्गजों के बीच दिलचस्प मुकाबला है. ठाकुर जयवीर सिंह बनाम चौधरी दलवीर सिंह. दोनों दबंग छवि के नेता हैं. बसपा के ठाकुर जयवीर सिंह मायावती सरकार में मंत्री रह चुके हैं. दलवीर सिंह आरएलडी के बड़े चेहरों में से थे. पार्टी के विधायक दल के नेता थे. लेकिन चुनाव से ठीक पहले बीजेपी में आ गए. इसलिए लड़ाई अब तीखी हो गई है.

अलीगढ़ शहर के सेंटर पॉइंट चौराहा पर बरौली का एक मुस्लिम नौजवान मिला. शायद इफ्तेख़ार नाम था. उसने कहा कि दलवीर सिंह जब आरएलडी से लड़ते थे तो उन्हें कुछ मुसलमान वोट भी मिलते थे. मैंने खुद उन्हें वोट दिया है. लेकिन अब उनका मुसलमान वोट कट के जयवीर सिंह के पास ही जाएगा, क्योंकि यहां मुख्य मुकाबले में वही हैं. लेकिन दलवीर सिंह के पुराने समर्थकों के साथ-साथ पारंपरिक भाजपाई वोट भी बढ़ जाएगा. इसलिए एक तरह से दोनों प्रत्याशियों के वोट बढ़ने चाहिए. इसलिए मुकाबला कांटे का है.

इफ्तेख़ार
इफ्तेख़ार

रास्ते में ठाकुर जयवीर सिंह की रैली मिली तो उनसे भी बात हुई. वे बाकी प्रत्याशियों की जमानत जब्त होने का दावा कर रहे हैं. पर अगर आप शेरलॉक होम्स देखते रहे हैं तो दलवीर सिंह का नाम लेने पर उनकी मूंछों में आए हल्के उतार को आप महसूस कर सकते हैं.

जयवीर सिंह, बसपा प्रत्याशी
ठाकुर जयवीर सिंह, बसपा प्रत्याशी

जयवीर सिंह का नौजवान बेटा डॉक्टर है, पुणे से पढ़कर आया है, सफेद कुर्ता पायजामा और काली जैकेट पहनकर पिता के साथ घूमता है और मीडिया को देखते ही अंग्रेजी में बात करता है. इस रपट के लेखक को लगता है कि उसमें सियासी चतुराई नहीं है. पता नहीं ये अच्छी बात है या बुरी!

ठाकुर जयवीर सिंह के बेटे. डॉ. देवेश सिंह
ठाकुर जयवीर सिंह के बेटे. डॉ. देवेश सिंह

एक पत्रकार ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि जयवीर सिंह बड़ी मछलियों से चाहे जो करते हों, पर भू-माफियागिरी नहीं करते. जबकि इलाके में जादौन (ठाकुर) प्रॉपर्टी डीलर्स का एक ग्रुप है, जो दबंगई से भू-माफिया वाला काम करता है और इसे चौधरी दलबीर सिंह का आशीर्वाद प्राप्त है.

ये सीट कांग्रेस के हिस्से आई है और सपा कार्यकर्ताओं को लाल टोपी पहनकर कांग्रेस प्रत्याशी का प्रचार करते देख वैसा लगा, जैसा बालकों को चिड़ियाघर में जिराफ देखकर लगता है. गाड़ी रोककर उनसे पूछा कि आप लोग किसके समर्थक हैं तो आधों ने कहा कि सपा के और आधों ने कहा बघेल साहब के.

ये वो सीट है, जिस पर मुकाबला देखने में आनंद आएगा.

31 तारीख को अलीगढ़ में अखिलेश की रैली है. 1 फरवरी को मायावती की और 5 को नरेंद्र मोदी की. 11 तारीख को यहां वोट डाले जाएंगे. रैलियों के बाद काफी कुछ बदल सकता है.

जिला प्रशासन की अपील
जिला प्रशासन की अपील

एक बात और! लगभग सभी जगहों पर लोग अखिलेश यादव के काम-काज और व्यक्तित्व की तारीफ करते हैं. ऐसा लगता है कि अखिलेश यादव ने अपने कार्यकाल के शुरुआती दिनों में जो करिश्मा खो दिया था, वह आखिरी दिनों में दोबारा पा लिया है. लेकिन लेकिन लेकिन! लोगों के वोट देने का पैटर्न इससे अप्रभावित ही लगता है. लोग खुलकर कह रहे हैं कि अखिलेश के नाम पर कम से कम इस जिले में ज्यादा वोट नहीं जा रहे. एक पार्टी प्रमुख होने के नाते अखिलेश के लिए ये खबर अच्छी नहीं है.

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