Submit your post

Follow Us

मुख्तार अंसारी समाज में नासूर है, पर पॉलिटिक्स में 'नेल पॉलिश' है

3
शेयर्स

समाजवादी पार्टी में घमासान मचा हुआ है. मुख्यमंत्री अखिलेश के चचा शिवपाल यादव नाराज हो गए. इस्तीफे की धमकी दे दी. बड़े भाई मुलायम उनको मना लाये. सबको डांट भी लगाई. इसके तुरंत बाद खबर आई कि अंसारी ब्रदर्स की ‘कौमी एकता दल’ का सपा में विलय हो सकता है. दो महीने पहले इसी बात पर चचा-भतीजे में ठन गई थी. चचा विलय के पक्ष में थे, भतीजे ने साफ-साफ ना बोल दिया था.

पर क्या है ये कौमी एकता दल? क्यों शिवपाल इसके सपोर्ट में हैं? क्या सच में सपा को इसकी जरूरत है?

उत्तर प्रदेश की राजनीति है. कुछ अनोखा तो होना चाहिए. कौमी एकता दल मुख्य रूप से गुंडीशियन (गुंडा+पॉलिटिशियन) मुख़्तार अंसारी की पार्टी है. मुख़्तार अंसारी की गाजीपुर में चलती है. तो पार्टी उसी जिले के आस-पास घूम रही है. लोग कहते हैं कि ये कम्युनल पार्टी है. मुसलमानों की. पर बहुत सारे लोगों का कहना है कि ऐसा नहीं है. नाम के अनुरूप ही ये पार्टी हिन्दू-मुसलमान दोनों के लिए है. ऐसा लग भी रहा है. क्योंकि इस पार्टी ने उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल यानी बनारस, गाजीपुर, बलिया, मऊ और नजदीकी बिहार के बक्सर जिले में मुसलमानों के अलावा प्रभुत्व वाले हिन्दू समुदाय के लोगों को भी खुद से जोड़ लिया है. ध्यान देने लायक बात ये है कि इस एरिया में अशरफ मुसलमान ना के बराबर हैं. ‘अंसारी’ बहुल मुसलमान ज्यादा हैं. जो मुस्लिम समाज के निचले तबके से आते हैं. जाहिर है कि इनको एक हीरो की तलाश है.

phpThumb_generated_thumbnail

वैसे तो मुख्तार समाज में नासूर है, पर राजनीति में नेल पॉलिश है

मुख़्तार अंसारी वैसे तो गाजीपुर जिले के BJP विधायक कृष्णानंद राय की हत्या में दोषी और सजायाफ्ता है. पर जिले के लोग इस बात को कम्युनल राजनीति से नहीं जोड़ते. ऐसा माना जाता है कि ये ‘अंडरवर्ल्ड’ की आपसी लड़ाई का नतीजा था, ‘क्योंकि गाजीपुर में दंगे नहीं होते’. पर गाजीपुर के नजदीक ही मऊ में 2005 में दंगे हुए थे. वहां पर मुख़्तार का नाम आया था. मीडिया में इसकी एक फोटो भी आई थी. जिसमें ये खुली जीप में बन्दूक लेकर खड़ा था. हालांकि इस बात ने उतना ज्यादा तूल नहीं पकड़ा है, जितना दंगे की बात में तूल होता है.

इसके अलावा मुख़्तार अंसारी पर हर तरह के अपराधों का आरोप है. वो जेल में सजा काट रहा है और बाहर पॉलिटिकल काम-काज दोनों भाई अफजाल और सिबगतुल्ला संभालते हैं.

एक जमाने में मुख़्तार ने लोगों का जीना मुश्किल कर दिया था. पर नेतागिरी में आने के बाद अपना स्टाइल चेंज कर दिया. अब वह ‘सामाजिक समरसता’ की बात करता है. अफजाल अंसारी सपा से सांसद भी रह चुके हैं गाजीपुर के. कई पार्टियां बदली हैं. दोनों भाई किसी विज़न या किसी विकास के लिए नहीं जाने जाते. प्रतिनिधि हैं बस एक तबके के. क्योंकि कोई और नहीं है.

उत्तर प्रदेश के चुनाव में अब ‘मुस्लिम’ नेल पॉलिश की जरूरत है

पर अभी उत्तर प्रदेश में राजनीति कुछ अलग ही चल रही है. 2017 में विधानसभा चुनाव हैं. इसके लिए जोर-शोर से तैयारी चल रही है. 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने यूपी की लगभग 90 फीसदी सीटें जीत ली थीं. तो अब मामला मुश्किल है. बीजेपी चुनाव के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रही है. इससे बाकी पार्टियां ज्यादा सचेत हैं. पर दादरी और कैराना की घटना और कई जगह दलित समुदाय के साथ मार-पीट ने बीजेपी को पीछे धकेल दिया है. जबकि सपा ने ओबीसी और मुस्लिम वोट से ही अपनी राजनीति की है. लेकिन बसपा से खतरा है क्योंकि उन्होंने 100 से ज्यादा टिकट मुसलमानों को दिए हैं. इसके लिए अंसारी ब्रदर्स की कौमी एकता दल को अपनी तरफ खींचने का प्रयास किया गया.

शिवपाल सब कुछ तय कर ही चुके थे पर ऐन मौके पर अखिलेश नाराज हो गए और सब कैंसल करवा दिया. अखिलेश को लगता है कि इससे उनकी विकासपरस्त वाली छवि को धक्का लगेगा और बीजेपी को अंसारी बंधुओं के खिलाफ ध्रुवीकरण का मौका मिल जाएगा. जब दोस्ती होते-होते भी न हो पाई तो यह ताकतवर अंसारी बंधुओं के लिए सेल्फ रेस्पेक्ट का मामला हो गया. 

चोट खाए हुए मुख़्तार और अफजाल ने प्रदेश की सब छोटी मुस्लिम पार्टियों को इकठ्ठा करना शुरू किया. लगभग 15 ऐसी पार्टियां मिल गईं. इस फ्रंट का नाम ‘इत्तेहाद फ्रंट’ रखा गया है. ऐसे तो चुनाव में इनका कोई वजूद नहीं है. क्योंकि इनमें से पीस पार्टी को छोड़कर किसी के पास एक विधायक तक नहीं है. पर अगर ये मिल के लड़ें, तो आजमगढ़, बनारस, गाजीपुर, मऊ, बलिया तक के चुनाव समीकरण बिगाड़ सकते हैं.

तजुरबा नहीं सिखाता, आदर्शों पर चलना?

उत्तर प्रदेश में 18 फीसदी मुसलमान हैं. पूर्वांचल के कुछ इलाकों में ये संख्या और ज्यादा है. और इसी एरिया में अंसारी ब्रदर्स अपना खूंटा गाड़ चुके हैं. वहीं दलितों पर अत्याचार के बाद मायावती भी अपना वोट बैंक बढ़ाने में लगी हुई हैं. ऐसे में समाजवादी पार्टी को कौमी एकता दल की बहुत ही जरूरत है. क्योंकि किसी भी सूरत में वो वोट नहीं कटने देना चाहते.

2012 में ‘आपराधिक छवि’ के चलते अखिलेश ने मुख़्तार को पार्टी में शामिल नहीं किया था. पर अब जरूरत महसूस हो रही है. वहीं अंसारी ब्रदर्स को पता है कि अगर वोट काटकर वो कुछ विधायक बना भी लेते हैं, तो राज्य की राजनीति में ज्यादा कुछ नहीं कर पाएंगे. अगर सपा के साथ आ जाते हैं, तो मंत्री पद की भी संभावना रहेगी.

अखिलेश विकास की छवि के भरोसे चुनाव जीतना चाहते हैं. राजनीति में यह अच्छी-आदर्श बात है. लेकिन उनके पिता मुलायम सिंह यादव को 49 साल का राजनीतिक तजुरबा है. ये तजुरबा बिलाशक उन्हें आदर्शवादी राजनीति से रोकता ही होगा.


ये भी पढ़ें:

शिवपाल यादव समाजवादी पार्टी की टूटी टांग हैं या बैसाखी?

जब 21 साल की मायावती ने मंच पर जाकर केंद्रीय मंत्री की धज्जियां उड़ा दी थीं

कहानी राजनाथ सिंह की, जिनके PM बनने की भविष्यवाणी अभी मरी नहीं

यूपी चुनाव जीतने के लिए सभी पार्टियों को करने होंगे ये 5-5 काम

 

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

ग्राउंड रिपोर्ट

इस नेता ने राजा भैया का रिकॉर्ड ऐसा तोड़ा कि सब चौंक गए!

उस नेता का नाम बहुत कम लोग जानते हैं.

Live UP Election Result 2017: चौचक नतीजे, चौकस कमेंट्री वाला लल्लनटॉप टीवी देखें

दी लल्लनटॉप की टीम न सिर्फ अपडेट दे रही है, बल्कि नतीजों के पीछे की पूरी कहानी भी बतला रही है.

पिंडरा से ग्राउंड रिपोर्ट : 'मोदी पसंद हैं, वो विधायक तो बनेंगे नहीं, फिर क्यों जिता दें'

इस सीट पर वो नेता मैदान में है जो 2014 में नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ा.

ग्राउंड रिपोर्ट वाराणसी साउथ : बनारस के चुनाव में वो मुद्दा ही नहीं है, जिसे बड़ा मुद्दा बताया जा रहा है

इतने सारे रोड शो का असर सीधा पड़ेगा या उल्टा

रामनगर ग्राउंड रिपोर्ट: एक-एक बनारसी की पॉलिटिक्स मोदी-अखिलेश की पॉलिटिक्स से कहीं आगे है

पोलिंग से एक दिन पहले यहां का वोटर एकदम साइलेंट हो गया है.

ग्राउंड रिपोर्ट सोनभद्र: KBC में इस शहर पर बने एक सवाल की कीमत 50 लाख रुपए थी

यहां के लोग गर्व से कहते हैं, 'मुंबई वाले हमारी एक बोरी बालू में 6 बोरी पतला बालू और एक बोरी सीमेंट मिलाकर यूज करते हैं.'

ग्राउंड रिपोर्ट : ये बागी बलिया है, जहां सांड को नाथ कर बैल का काम लिया जाता है

यूपी के इस आखिरी छोर पर सियासत बहुत पीछे छूट जाती है.

पथरदेवा ग्राउंड रिपोर्ट: जब-जब ये नेता चुनाव जीतता है, यूपी में बीजेपी सरकार बनाती है

यहां बीजेपी के सूर्य प्रताप शाही के लिए एक वोटर रियासत अली कहते हैं, 'अबकी इनका वनवास खत्म कराना है'.

नौतनवा ग्राउंड रिपोर्ट: मां-पापा और भाई जेल में, तो बहन लंदन से आई चुनाव प्रचार के लिए

पेश है बाहुबलियों की सीट का हाल.

ग्राउंड रिपोर्ट पडरौना: जहां के लोगों को याद है कि पीएम ने ढाई साल पुराना वादा पूरा नहीं किया

यहां बीजेपी नेता के लिए नारा था, 'राम नगीना बड़ा कमीना, फिर भी वोट उसी को देना'.