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यूपी का वो मुख्यमंत्री जिसे देश के प्रधानमंत्री ने उपचुनाव में हरवा दिया

अभी तक आपने पढ़ा कि 1969 तक देश में राजनीति ही बदल गई थी. कांग्रेस दो धड़ों में टूट गई थी. यूपी में चौधरी चरण सिंह सरकार बना के जा चुके थे. राष्ट्रपति शासन लग चुका था. पर इसके बाद 18 अक्टूबर 1970 को यूपी को एक गांधीवादी मुख्यमंत्री के रूप में मिला. नाम था त्रिभुवन नारायण सिंह. लाल बहादुर शास्त्री के मित्र. ईमानदार नेताओं में गिने जाते थे. यूपी के ये पहले मुख्यमंत्री थे जो बनने के वक्त किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे. यूपी में दुबारा ऐसा हुआ सीधा रामप्रकाश गुप्ता के साथ.


इस राजनीति की शुरूआत वाराणसी से होती है. वाराणसी कांग्रेस की राजनीति का केंद्र था. कांग्रेस में दो गुट थे. एक रघुनाथ सिंह का था और दूसरा कमलापति का. फिर स्टेट समिति में भी दो गुट हो गये थे. एक पुरुषोत्तम दास टंडन का. दूसरा रफी अहमद किदवई का. टंडन वाले के समर्थक गोविंद बल्लभ पंत, संपूर्णानंद और चंद्रभानु गुप्ता थे. गुप्ता का प्रभाव टंडन पर ज्यादा था. कुल मिलाकर राजनीति उसी समय बहुत जटिल हो गई थी. आपसी झंझट बहुत हो गये थे. सबको पता था कि 1952 में चुनाव हो रहे हैं. सब लोग नेता बनने के चक्कर में थे.

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त्रिभुवन नारायण सिंह (8 अगस्त 1904- 3 अगस्त 1982)

यूपी की राजनीति में गांधीवादी त्रिभुवन का नाम तो शुरू से ही था

Ph. Studio/May, 1957, A37(a) 65IST URS OF AMIR KHUSRO COMMEMORATED IN DELHI Smt. Sucheta Kripalani addressing the gathering on May 19, 1957, the second day of the 3-day celebrations.
सुचेता कृपलानी

लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ हो रहे थे. सबको सांसद बनना था. संपूर्णानंद ने विधानसभा चुनाव में खड़ा होने से मना कर दिया. कमलापति को मिलने वाली सीट दक्षिण बनारस संपूर्णानंद को दे दी गई. फिर राजनीति ऐसी हो गई कि सब एक-दूसरे पर आरोप लगाने लगे. नेहरु प्रचार करने आए तो कांग्रेस समिति की अध्यक्षा तुगम्मा ने उनके हाथ में इस्तीफा दे दिया. इसके साथ ही बहुत सारे लोगों पर डिसिप्लिनरी एक्शन हुआ.

1954 में मुख्यमंत्री गोविंदबल्लभ पंत केंद्र में चले गये. तो संपूर्णानंद को मुख्यमंत्री बनाया गया. उस वक्त इनके अलावा कमलापति त्रिपाठी, चंद्रभानु गुप्ता, रघुनाथ सिंह और त्रिभुवन सिंह सारे लोगों को मुख्यमंत्री उम्मीदवार समझा जाता था. सब कुछ ऐसे ही चलता रहा. चंद्रभानु गुप्ता भी मुख्यमंत्री बन गये. फिर एकदम से नेहरू ने सुचेता कृपलानी को मुख्यमंत्री बना दिया. इसके बाद नेहरू की डेथ हो गई. राजनीति फिर बदल गई.

यूपी में चौधरी चरण सिंह और राममनोहर लोहिया की राजनीति शुरू हुई. 1967 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए विनाशकारी साबित हुआ. इस चुनाव में कांग्रेस के कई नेता हार गये. कमलापति त्रिपाठी जैसे बड़े नेता भी हार गये थे. फिर चरण सिंह मुख्यमंत्री बने. इसके बाद राष्ट्रपति शासन लग गया. फिर चंद्रभानु गुप्ता बने.

इंदिरा के हठ के चलते त्रिभुवन को मौका मिल गया मुख्यमंत्री बनने का

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कमलापति त्रिपाठी

1969 में कांग्रेस में एक और काम हुआ. विभाजन हुआ. इंदिरा गांधी की राजनीति पर काबू पाने के चक्कर में. कमलापति त्रिपाठी ग्रुप ने इंदिरा गुट को समर्थन दिया. दूसरे बड़े नेता रघुनाथ सिंह सिंडिकेट ग्रुप में शामिल हुए. चंद्रभानु गुप्ता भी सिंडिकेट ग्रुप में ही गये. फरवरी 1970 में चंद्रभानु गुप्ता को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा. कमलापति त्रिपाठी के सपोर्ट से चौधरी चरण सिंह फिर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने. कमलापति कांग्रेस के स्टेट प्रेसिडेंट बने. पर सितंबर आते-आते कांग्रेस ने चरण सिंह को समर्थन देना बंद कर दिया. प्रेसिडेंट रूल लग गया.

अक्टूबर 1970 में एक गांधीवादी त्रिभुवन नारायण सिंह को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गई. ये सिंडिकेट ग्रुप के थे. त्रिभुवन नारायण सिंह ने  1957 में चंदौली लोकसभा चुनाव में मशहूर समाजवादी नेता और स्वतंत्रता सेनानी डॉ. राम मनोहर लोहिया को हराया था. लोहिया कोई मामूली नेता नहीं थे. उनको हराना बहुत ही बड़ी बात थी.

पर इंदिरा के सामने ठटना आसान नहीं था, मुख्यमंत्री उपचुनाव हार गये

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इंदिरा गांधी

पर जब त्रिभुवन नारायण सिंह मुख्यमंत्री बने तब वो यूपी के किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे. उनको एक उपचुनाव में खड़ा होना था. और सीट लेनी थी. तो इनके लिए गोरखपुर की मणिराम सीट चुनी गई. चुनाव हुआ. यहां पर त्रिभुवन सिंह को पूरा समर्थन था. क्योंकि मणिराम से 1962, 1967 और 1969 में हिंदू महासभा के महंत अवैद्यनाथ विधायक चुने गये थे. इन्हीं के चेले हैं योगी आदित्यनाथ. पर जब अवैद्यनाथ लोकसभा के लिए चुन लिये गये तो उन्होंने यह सीट छोड़ दी. उन्होंने उप-चुनाव में त्रिभुवन सिंह को अपना समर्थन दिया. मुख्यमंत्री को चार दलों का समर्थन हासिल था. चारों दलों ने मुख्यमंत्री की जीत के लिए काफी मेहनत की थी.

फिर ये भी था कि जवाहरलाल नेहरू कभी भी उपचुनाव में प्रचार करने नहीं जाते थे. फिर त्रिभुवन केंद्र में मंत्री रह चुके थे. तो वो भी इस विधानसभा उपचुनाव में प्रचार करने नहीं गये. कहा कि मुख्यमंत्री नहीं करेगा प्रचार. फिर ये भी संतुष्टि थी कि नेहरू की बेटी इंदिरा भी नहीं ही आएंगी. पर इंदिरा तो इंदिरा थीं. वो आईं चुनाव प्रचार करने. मुद्दा भी वो उठाया जो मुख्यमंत्री की साख पर बट्टा लगा गया. बनारस गोली कांड हुआ था जिसमें छात्र मरे थे.  इंदिरा गांधी ने रामकृष्ण द्विवेदी को सिंह के सामने खड़ा किया. इंदिरा लहर का नतीजा ये हुआ कि सिंह चुनाव हार गये. विधानसभा सेशन में थी और गवर्नर के भाषण पर डिबेट के दौरान ही त्रिभुवन सिंह को बताना पड़ा कि मुझे मुख्यमंत्री पद से हटना पड़ेगा. वो एकमात्र मुख्यमंत्री बने जिसे पद छोड़ना पड़ा, क्योंकि चुनाव जीत नहीं पाये. ऐसा दुबारा सिर्फ शिबू सोरेन के साथ हुआ है.

रामकृष्ण द्विवेदी
रामकृष्ण द्विवेदी

त्रिभुवन नारायण सिंह को हराने वाले रामकृष्ण द्विवेदी चुनाव लड़ने से पहले अमर उजाला में संवाददाता थे. बाद में वे युवा कांग्रेस में शामिल हुए. फिर उन्होंने इंदिरा कांग्रेस के उम्मीदवार के तौर पर उस त्रिभुवन नारायण सिंह को चुनावी मैदान में पटखनी दी, जिन्हें उत्तर प्रदेश की सियासत के ताकतवर नेता चंद्रभानु गुप्ता का समर्थन था. चंद्रभानु गुप्ता उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के ताकतवर गुट सिंडिकेट के मजबूत स्तंभ थे. इस हार ने क्रांतिकारी रिजल्ट दिया. उस वक्त कम्युनिस्टों के समर्थन से इंदिरा गांधी केंद्र की सरकार चला रही थीं. पर जनवरी 1971 के इस उपचुनाव में मुख्यमंत्री के हारने की खबर ने पूरे देश में इंदिरा लहर बना दी. 1971 में इंदिरा ने लोकसभा का मध्यावधि चुनाव बुलाया. गरीबी हटाओ का नारा दिया और जमाना लूट लिया.

कमलापति त्रिपाठी को मुख्यमंत्री बनाया गया. सिंह को हराने वाले रामकृष्ण द्विवेदी को इनाम भी मिला. उन्हें कमलापति ने अपने मंत्रिमंडल में बतौर राज्य मंत्री शामिल किया था.

त्रिभुवन नारायण सिंह के बारे में कुछ बातें-

1. 8 अगस्त 1904 को इनका जन्म बनारस में हुआ था. 1950 से 1952 तक की केंद्र की प्रोविजनल संसद के सदस्य रहे. 1952 और 1957 में लोकसभा गये. 1965 से 70 और 1970 से 76 तक राज्यसभा में रहे. 18 अक्टूबर 1970 से 3 मार्च 1971 तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे. 1977 से 1980 तक वेस्ट बंगाल के राज्यपाल रहे. इससे पहले पत्रकार थे. इंडियन डेली टेलीग्राफ, हिंदुस्तान टाइम्स और नेशनल हेराल्ड जैसे अखबारों में लिखते थे. सिंह नेशनल हेराल्ड में कभी चीफ सब-एडिटर थे. वही नेशनल हेराल्ड जिसके केस में राहुल गांधी और सोनिया गांधी को कोर्ट में उपस्थित होना था.  3 अगस्त 1982 को त्रिभुवन नारायण सिंह की डेथ हो गई.

2. जब त्रिभुवन सिंह बंगाल के राज्यपाल पद से रिटायर होकर लौटे तो वहां की कम्युनिस्ट सरकार ने हावड़ा स्टेशन पर लाल सलाम कहकर जबर्दस्त विदाई दी थी.

3. पहली बार ऐसा हुआ कि कोई मुख्यमंत्री उपचुनाव में हारा था.

4. लाल बहादुर शास्त्री के दोस्त थे. 1948 में शास्त्री ने छात्रों पर लाठी चार्ज करवा दिया था. तो दोनों में बातचीत बंद हो गई थी. पर एक जगह मिले तो एक दूसरे को देखकर रोने लगे. जब शास्त्री मरे थे तो सिंह ने षड़यंत्र की बात करते हुए जांच कराने की मांग खूब की थी.


 

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