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मैं यूपी विधानसभा हूं और ये मेरी 65 साल की कहानी है

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~ राजन पाण्डेय बता रहे हैं उत्तर प्रदेश में पहली विधानसभा से लेकर अब तक की विधानसभा में राजनीति की उठा-पठक और बदलते समीकरणों के बारे में


 

उत्तर प्रदेश विधानसभा: 1950 से अब तक

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उत्तर प्रदेश विधानसभा

देश की राजनीति में उत्तर प्रदेश की अहमियत इसी बात से समझी जा सकती है कि अब तक हुए 14 प्रधानमंत्रियों (कार्यवाहक को छोड़ के) में से आठ अकेले उत्तर प्रदेश से आये हैं, जिनमें से दो (चरण सिंह और विश्वनाथ प्रताप सिंह) प्रदेश के मुख्यमंत्री भी थे. 545 सदस्यों वाली लोकसभा में उत्तर प्रदेश अकेले 80 सदस्य भेजता है, जो दूसरे सर्वाधिक सदस्य भेजने वाले राज्य महाराष्ट्र (48 लोकसभा सीटें) का लगभग दोगुना है. 403 निर्वाचित सदस्यों वाली उत्तर प्रदेश विधानसभा देश की सबसे बड़ी राज्य विधायिका है. प्रदेश की विधानसभा का पहला चुनाव 1937 में हुआ था जब उसे संयुक्त प्रान्त (यूनाइटेड प्रोविन्सिज) के नाम से जाना जाता था. 26 जनवरी 1950 को तत्कालीन प्रीमियर पंडित गोविन्द वल्लभ पन्त प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बने थे और 1951 में पहले आम चुनाव के बाद नवगठित उत्तर प्रदेश की पहली विधानसभा का गठन हुआ था, जिसमें तब 430 निर्वाचित सदस्य हुआ करते थे. एक नॉमिनेटेड सदस्य था.

पहली, दूसरी और तीसरी विधानसभा: स्थिरता का दौर

गोविंद वल्लभ पंत

अपनी राजनैतिक अस्थिरता के चलते किस्से-कहानियों का हिस्सा बन चुकी उत्तर प्रदेश की शुरुआती चुनावी राजनीति स्थायित्व का नमूना थी, जब प्रदेश और देश की राजनीति पर कांग्रेस के दबदबे को किसी भी विपक्षी दल से कोई बड़ी चुनौती नहीं मिल रही थी. प्रदेश की पहली विधानसभा ने अपना पांच साल का कार्यकाल बिना किसी दिक्कत के पूरा किया. यहां तक की जब दिसम्बर 1954 में तत्कालीन मुख्यमंत्री पंडित पन्त को केन्द्रीय गृह मंत्री बना के दिल्ली बुला लिया गया, तो नए मुख्यमंत्री के बतौर डॉक्टर सम्पूर्नानन्द का चुनाव बिना किसी उठा-पटक के संपन्न हो गया. यूं सत्तारूढ़ उत्तर प्रदेश कांग्रेस अपनी गुटबाजी के लिए तब भी बदनाम थी, पर पंडित पन्त के रहते गुटों पर लगाम बनी रही. उनके दिल्ली जाते ही चौधरी चरण सिंह और चन्द्र भानु गुप्ता-कमला पति त्रिपाठी गुटों की सर फुटौव्वल चरम पर पहुंच गई.

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डॉक्टर सम्पूर्नानन्द

दूसरी विधानसभा के चुनावों के बाद सत्ता फिर कांग्रेस के हाथ में आई और डॉक्टर सम्पूर्नानन्द फिर से मुख्यमंत्री बने, पर कमलापति त्रिपाठी और चन्द्र भानु गुप्ता की हरकतों के चलते उन्हें 1960 में अपने पद से हटना पड़ा और चन्द्र भानु गुप्ता विधान सभा के बचे कार्यकाल के लिए मुख्यमंत्री बने. तीसरी विधान सभा में भी कांग्रेस ही जीती और चन्द्रभानु गुप्ता फिर मुख्यमंत्री बने.

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चन्द्रभानु गुप्ता

पर आतंरिक विरोध के चलते उन्हें हटाकर सुचेता कृपलानी को मुख्यमंत्री बनाया गया. इस समय तक प्रदेश की राजनीति की खासियत ये थी कि तमाम गुटबाजियों के बावजूद शासक दल को कोई बड़ी टूट फूट नहीं झेलनी पड़ी और तीनों विधानसभाओं ने अपना कार्यकाल पूरा किया.

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सुचेता कृपलानी

चौथी विधानसभा: शुरू हुआ विघटन और अस्थिरता का दौर

लम्बे समय से चरण सिंह कांग्रेस में अपनी स्थिति से असंतुष्ट थे और पार्टी के ब्राह्मण-बनिया-ठाकुर या ऊंची जाती वाले नेतृत्व से नाराज थे. चन्द्र भानु गुप्ता से कभी ओबीसी उम्मीदवारों को पुलिस भरती में उम्र में छूट तो कभी किसानों से लिए जाने वाले टैक्स में 50% बढ़ोत्तरी जैसे सवालों पर चरण सिंह की ठनती रही थी. यही वह दौर था जब हरित क्रांति के चलते पिछड़ी, खेतिहर जातियां आर्थिक रूप से मजबूत हो रहीं थीं और लोहिया का “पिछड़ा पावे सौ में साठ” का नारा उनकी राजनैतिक आकांक्षाओं को नए पंख दे रहा था. ऐसे में अंततः चरण सिंह ने कांग्रेस छोड़कर पिछड़ों और किसानों की राजनैतिक ताकत के दम पर सिंहासन कब्जाने का फैसला किया. 1967 में हुए चौथी विधानसभा के चुनावों में कांग्रेस घिसटते-घिसटते बहुमत तक पहुंच पायी पर चन्द्र भानु गुप्ता को मुख्यमंत्री बनाने के सवाल पर चरण सिंह ने कुछ अन्य मुद्दों का बहाना बनाकर पार्टी तोड़ दी.

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चरण सिंह

उनके साथ कांग्रेस के 16 और विधायक भी चल दिए और गुप्ता सरकार अल्पमत में आ गई. 19 दिन मुख्यमंत्री रहने के बाद गुप्ता जी को कुर्सी छोड़नी पड़ी और कम्युनिस्टों, समाजवादियों, जनसंघियों और अम्बेडकरवादियों, यानी समूचे विपक्ष की मदद से पहली बार कोई गैर उच्च जातीय व्यक्ति प्रदेश का मुख्यमंत्री बना. इस प्रयोग को नाम दिया गया संयुक्त विधायक दल, या संविद सरकार. अपने विचारधारात्मक अंतर्विरोधों के चलते ये सरकार एक साल भी न चल पायी और आखिर फरवरी 1968 में प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया. उत्तर प्रदेश के राजनैतिक इतिहास में यह पहली विधानसभा थी जो अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई.

पांचवीं विधानसभा: जब बना मुख्यमंत्रियों की संख्या का रिकॉर्ड

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हेमवती नन्दन बहुगुणा

1969 में हुए पांचवीं विधानसभा के चुनावों में कांग्रेस को 425 सीटों में से 211 पर विजय मिली, जबकि जनसंघ को 49, कम्युनिस्ट पार्टियों को 5, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी को 33 और चरण सिंह की भारतीय क्रांति दल को 98 सीटें मिलीं. अपने दम पर स्पष्ट बहुमत पाने में कांग्रेस एक बार फिर नाकाम रही. यूं जोड़-तोड़ करके कांग्रेस के चन्द्र भानु गुप्त एक बार फिर मुख्यमंत्री बने पर उनकी सरकार एक साल से ज्यादा नहीं चल पायी. अस्थिरता का जो दौर पिछली विधानसभा से शुरू हुआ था वो जारी रहा, लेकिन मुख्यमंत्रियों की संख्या के मामले में इस विधानसभा ने रिकॉर्ड बनाया. पहले गुप्ता की सरकार को पटखनी देकर चरण सिंह मुख्यमंत्री बने, पर उनकी सरकार 8 महीनों में ही धराशायी हो गई और राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया. अक्टूबर 1970 में जोड़ तोड़ करके कांग्रेस ने फिर सरकार बनायी और एक नया मुख्यमंत्री- त्रिभुवन नारायण सिंह गद्दी पर बैठा. पर लगभग पांच महीनों में ही उनकी जगह कमलापति त्रिपाठी को मुख्यमंत्री बना दिया गया. त्रिपाठी जी की मुख्यमंत्री बनने की साध तो पूरी हुई, पर 2 साल 2 महीने बाद उनके हाथ से भी कुर्सी सरक गई. लगभग पांच महीने फिर राष्ट्रपति शासन रहा और उसके बाद नवम्बर 1973 से मार्च 1974 तक हेमवती नन्दन बहुगुणा राज्य के मुख्यमंत्री रहे. इस एक विधानसभा के दौरान 5 मुख्यमंत्री बने और दो बार राष्ट्रपति शासन लगा.

छठी और सातवीं विधानसभा: कांग्रेस का अवसान और जनता सरकार का आगमन

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राम नरेश यादव

छठी विधानसभा के दौरान भी अस्थिरता चलती रही और बार बार राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा. तमाम कोशिशों के बाद भी भारतीय क्रांति दल और समाजवादी पार्टियां कांग्रेस के मुकाबले कोई संयुक्त विकल्प खड़ा कर पाने में असफल रहे थे और 1974 के चुनाव में कांग्रेस 215 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी का अपना रुतबा बरक़रार रखे हुए थी. एक सशक्त विकल्प के लिए राज नारायण की संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी और चरण सिंह की भारतीय क्रांति दल ने विलय करके 1974 में ही भारतीय लोक दल की स्थापना की. बाद में इंदिरा गांधी की लगाई इमरजेंसी के चलते समूचा विपक्ष एकजुट हुआ और जनता पार्टी के रूप ने सभी विपक्षी पार्टियां 1977 के चुनाव में उतरीं. इंदिरा की तानाशाही और आपातकाल की ज्यादतियों के विरुद्ध उमड़े जन विक्षोभ में केंद्र और राज्य दोनों जगह कांग्रेस का सफाया हो गया और सातवीं विधानसभा में जनता पार्टी को 425 में से 352 सीटें मिलीं जबकि कांग्रेस 47 सीटों पर सिमट गई. प्रदेश की सर्वोच्च सीट पर पहली बार पिछड़ी जाति का एक व्यक्ति- राम नरेश यादव काबिज हुआ. मगर घटक दलों की आपसी फूट के चलते वे दो साल भी मुख्यमंत्री नहीं रह पाए और फरवरी 1979 में बनारसी दास को जनता पार्टी सरकार का मुखिया बनाया गया. दलों की आपसी फूट तब भी नहीं रुकी और अंत में जनता सरकार अपनों के खींचे ही मुंह के बल गिरी. प्रदेश में फिर राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा.

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बनारसी दास

आठवीं और नवीं विधानसभा: स्थिरता की वापसी

जनता सरकार जन आकांक्षाओं पर सवार होकर सत्ता तो पहुंच गई थी पर वायदों को पूरा करने में उसकी अक्षमता और राजनैतिक स्वार्थों के चलते अंधे हुए उसके नेताओं की आपसी जूतम पैजार ने मरी हुई कांग्रेस में नए प्राण फूंक दिए. 1980 में हुए आठवीं विधानसभा के चुनावों में कांग्रेस ने धमाकेदार वापसी की और 425 में से 309 सीटों पर अपना परचम लहराया, जबकि बिखर चुका विपक्ष सवा सौ सीटों तक भी नहीं पहुंच सका और माकपा, आर पी आई जैसी विपक्षी पार्टियों को शून्य पर समझौता करना पड़ा. यही ट्रेंड अगले चुनावों में भी जारी रहा और मार्च 1985 में हुए नवीं विधानसभा के चुनावों में कांग्रेस 269 सीटों के साथ स्पष्ट बहुमत लेकर आई. हालांकि कांग्रेस की गुटबाजी फिर अपने चरम पर पहुंच गई और इन दो विधानसभाओं में कांग्रेस ने 5 बार मुख्यमंत्री बदले.

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नारायण दत्त तिवारी

दसवीं, ग्यारहवीं और बारहवीं विधानसभा: नयी राजनैतिक शक्तियों का उदय, सवर्णों का पत्ता साफ़

दसवीं, ग्यारहवीं और बारहवीं विधानसभाओं में अस्थिरता के दौर की वापसी हुई और कोई भी सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पायी. साथ ही साथ जहां एक ओर भाजपा ने बाबरी मस्जिद की जगह अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण को मुद्दा बनाकर उग्र हिंदुत्व की राजनीति शुरू की वहीँ समाजवादी दलों ने पिछड़ों को सरकारी नौकरियों और शिक्षा में 27% आरक्षण दिलाकर सामाजिक न्याय की राजनीति को नया रूप दिया. इसी दौर में प्रदेश के राजनैतिक मंच पर पिछड़े और दलित वर्गों की राजनैतिक ताकतों के प्रतिनिधि नये राजनैतिक दलों का न सिर्फ उदय हुआ, बल्कि कुर्सी पर उनकी पकड़ इतनी मजबूत भी हुई कि आने वाले दस सालों तक कोई सवर्ण मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नहीं बैठ सका. सरकार बनाने वाले सभी दलों ने पिछड़ों और दलितों को ही मुख्यमंत्री बनाया. बाद के दौर में भी प्रदेश की राजनीति इस दौर की दो राजनैतिक शख्सियतों- मायावती और मुलायम सिंह के इर्द गिर्द ही घूमती रही.

तेरहवीं विधानसभा: एक ही ऑफिस में दो-दो मुख्यमंत्री-बलप्रयोग को शाब्दिक अर्थ में लिया

प्रदेश की राजनीति यूं तो कभी आदर्श नहीं रही लेकिन तेरहवीं विधानसभा को राजनितिक व्यवहार का सबसे गंदा उदाहरण कहा जा सकता है. अस्थिरता के चलते राजनैतिक दलों ने सरकार बनाने के लिए हर संभव हथकंडा अपनाया जिसमें विधायकों की खरीद-फरोख्त और बल प्रयोग जैसे तरीके भी शामिल थे. 1997 में अपनी सरकार बचाने के लिए कल्याण सिंह ने न सिर्फ मंत्री पद का लालच देकर विरोधी दलों से विधायकों को तोड़ने का कारनामा किया, बल्कि सदन में बहुमत साबित करते वक्त उनके समर्थकों ने विरोधी विधायकों को दौड़ा-दौड़ा के पीटा भी. जिसकी रिकॉर्डिंग्स आज भी लोकतंत्र को शर्मसार करतीं हैं. इसी विधानसभा के दौरान सदन में शक्ति प्रदर्शन को विधायकों ने पहली बार शाब्दिक अर्थ में लिया और जम कर एक-दूसरे की धुनाई की.

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शक्ति प्रदर्शन का शाब्दिक अर्थ

लेकिन मजे की बात ये रही कि विरोधी दलों, विशेष तौर पर समाजवादी पार्टी और राज्य के राज्यपाल रोमेश भंडारी ने भी हर नीचता तक जाकर कल्याण सरकार को बर्खास्त कराने के ठठ करम किए.

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रोमेश भंडारी

एक ही ऑफिस में दो-दो मुख्यमंत्री

1998 में एक मजेदार वाकया तब सामने आया जब 21 फरवरी को कल्याण सरकार के ही एक घटक दल लोकतान्त्रिक कांग्रेस के नेता जगदम्बिका पाल ने राज्यपाल के सामने दावा किया कि उनके पास सदन के बहुमत का समर्थन है. राज्यपाल रोमेश भंडारी ने भी सभी प्रक्रियाओं को ताक पर रखकर बिना कल्याण से बात किए उनकी सरकार बर्खास्त कर दी और पाल को मुख्यमंत्री की शपथ दिला दी. कल्याण सिंह उसी दिन उच्च न्यायालय से स्टे ले आये और अगले दिन मुख्यमंत्री सचिवालय में एक अद्भुत नजारा देखने को मिला. जब मुख्यमंत्री कल्याण सिंह अपने दफ्तर पहुंचे तो वहां जगदम्बिका पाल उनकी कुर्सी पर बतौर मुख्यमंत्री पहले से बैठे हुए थे. रिकार्ड्स के हिसाब से जब कल्याण ने पाल को उच्च न्यायालय का आदेश दिखाया तो वे कुर्सी छोड़ के चले गए. लेकिन कुछ जानकार बताते हैं कि कुर्सी से चिपके जगदम्बिका पाल को घसीट कर दफ्तर से बाहर निकाला गया था.

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जगदम्बिका पाल

और भी हुए हैं सितम: जंबो मंत्रिमंडल, भुलक्कड़ और भगोड़े मुख्यमंत्री

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कल्याण सिंह

इसी विधानसभा के दौरान उत्तर प्रदेश में अब तक का सबसे बड़ा मंत्रिमंडल बनाया गया. 1997 में जोड़-तोड़ से बनी अपनी सरकार को बचाए रखने के लिए कल्याण सिंह ने जम्बो मंत्रिमंडल बनाया जिसमें 93 मंत्री थे. यानी सदन के लगभग हर चौथे विधायक को मंत्री बना दिया गया था. साथ ही साथ इसी विधानसभा में ये भी हुआ कि मुख्यमंत्री रहा कोई व्यक्ति (कल्याण सिंह) विधानसभा के कार्यकाल के दौरान ही अपनी पार्टी छोड़ कर एक नयी पार्टी बनाने चला गया हो. नहीं कल्याण के रिप्लेसमेंट के बतौर लाए गए वरिष्ठ और भुला दिए गए भाजपा नेता रामप्रकाश गुप्ता अपने भुलक्कड़पन के लिए भी प्रसिद्ध रहे क्योंकि वे अपनी ही पार्टी के विधायकों के बारे में भूल जाते थे. कुल मिलाकर इस विधानसभा ने भी दो पार्टियों के चार मुख्यमंत्री देखे (जगदम्बिका पाल को जोड़ें तो पांच) और 2 महीना राष्ट्रपति शासन भी रहा. उत्तर प्रदेश का विभाजन भी इसी दौरान हुआ और सदन की संख्या 425 से घटकर 403 पर आ गई. कुल मिलाकर राजनीति का जो सर्कस तेरहवीं विधानसभा के दौरान देखने को मिला वह “न भूतो न भविष्यति” जैसा ही था.

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रामप्रकाश गुप्ता

अस्थिरता से स्थिरता की ओर: स्पष्ट बहुमत का युग

Mayawati, the chief minister of the northern Indian state of Uttar Pradesh, displays her voter identity card and ink-marked finger after casting vote outside a polling station during the fourth phase of the state assembly elections, in Lucknow February 19, 2012. REUTERS/Pawan Kumar (INDIA - Tags: ELECTIONS POLITICS)

मायावती

2002 में हुए चुनावों के बाद गठित चौदहवीं विधानसभा की शुरुआत ही राष्ट्रपति शासन से हुई, क्यूंकि कोई भी दल सदन में बहुमत नहीं ला पाया था. लेकिन उम्मीद से इतर इस विधानसभा ने सिर्फ दो महीने ही राष्ट्रपति शासन झेला, जो पिछली विधानसभाओं के मुकाबले सबसे कम था. मई 2002 में ही भाजपा के समर्थन से मायावती मुख्मंत्री बनीं. एक साल चार महीने बाद ताज कॉरिडोर मसले पर दोनों के बीच खटपट होने के बाद मायावती ने सदन भंग करने की चिट्ठी राज्यपाल को दे दी, पर मुलायम सिंह ने जोड़-तोड़ करके सदन में अपना बहुमत साबित कर दिखाया. मायावती को मजा चखाने को आतुर भाजपा ने भी उनकी अपरोक्ष मदद की और जिस तरह मुलायम ने बसपा को फोड़कर अपना बहुमत जुटाया उसने एकबारगी 1997 की याद दिला दी. लेकिन अपराध, गुंडागर्दी और भ्रष्टाचार के लिए बदनाम रही इस सरकार को चलाने का खामियाजा सपा को 2007 के चुनावों में चुकाना पड़ा और मायावती 207 विधायकों के स्पष्ट बहुमत के साथ सत्ता में आयीं. इसी के साथ “हंग असेंबली” या त्रिशंकु विधानसभा के दौर का भी अंत हुआ. सोलहवीं विधानसभा में भी यही ट्रेंड जारी रहा और 224 विधायकों के साथ सपा की सत्ता में वापसी हुई. 1990 से 2007 तक का दौर अपराध और राजनीति की सांठ-गांठ के लिए भी बदनाम रहा, पर उसपर तफसील से चर्चा करेंगे अगले लेख में.


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